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मेरी जीवन-यात्रा
दूसरों को जीवन में रास्ता, शिक्षा और ज्ञान देने वाला इंसान आज खुद अपनी ही जिंदगी से हार-सा गया महसूस कर रहा है।
मुझे हमेशा लगता था कि इंसान का जीवन बहुत मधुर और आनंदमय है। लेकिन समय के साथ समझ आया कि इंसान अपने कर्मों और अपने विचारों से ही अपने जीवन को कभी-कभी इतना कठिन बना देता है कि रास्ता दिखाई देना बंद हो जाता है।
मैंने अपने जीवन में अनेक बाधाओं का सामना किया है। हर परिस्थिति से निकलने के लिए मैंने अपने जीवन को पूरी तरह अनुशासित रखा, योजना बनाई और फिर उसे पूरी मेहनत और लगन से पूरा करने की कोशिश की। मुझे जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जो मुझे रास्ता दिखाता। इसलिए मैंने खुद ही सीखा—कैसे योजना बनानी है, कैसे उसे अमल में लाना है और कैसे कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ना है।
हाँ, जब कभी मैं पूरी तरह टूट जाता था, निराश हो जाता था और लगता था कि अब आगे कोई रास्ता नहीं है, तब मैं प्रभु के पास चला जाता था। उन्हीं के सामने अपना मन खोलकर रो लेता था। और न जाने कहाँ से फिर कोई रास्ता निकल आता था। मैं दोबारा हिम्मत जुटाता और अपने काम में लग जाता।
जब मैं अकेला था और मेरे दो बच्चों की जिम्मेदारी मेरे सामने आई, तब मुझे अपने साथ-साथ उनकी जिंदगी की जिम्मेदारी का भी पूरा अहसास हुआ। उस समय मैंने हिम्मत की, निर्णय लिया और अपनी जिंदगी को फिर से गति दी। उस कठिन समय में प्रभु ही मेरे सबसे बड़े सहारे थे।
जब भी टूटता, निराश होता या खुद को असहाय महसूस करता, उन्हीं के पास जाता, उनके सामने रोता और फिर नई शक्ति के साथ अपने कर्म में लग जाता।
प्रभु के आशीर्वाद और मेरी मेहनत से धीरे-धीरे सब ठीक होता चला गया। जिन चीजों के बारे में कभी मुझे लगता था कि वे मेरे लिए असंभव हैं, वे भी प्रभु की कृपा से आसान होती चली गईं। मेरे दोनों बच्चों की शिक्षा और फिर उनका अपने पैरों पर खड़ा होना—जो कभी मेरे लिए बहुत बड़ी चुनौती और लगभग असंभव-सा लगता था—वह भी प्रभु की कृपा से सहजता से पूरा हो गया।
आज तक मैंने किसी से पाँच पैसे की भी मदद नहीं माँगी। इसके लिए मैं प्रभु का हृदय से धन्यवाद करता हूँ। मैंने अपने जीवन में बहुत कुछ त्यागा और अनेक समझौते किए, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटा।
मेरे जीवन में वह सब नहीं था जो आज की दुनिया में जीवन की खुशी का हिस्सा माना जाता है। बाहर घूमना, यात्राएँ करना, रेस्तराँ में खाना, दोस्तों के साथ मस्ती करना या अपने लिए खुलकर जीना—इन सबका मैंने लगभग त्याग ही कर दिया।
मैंने एक बहुत साधारण जीवन जिया—एक जिम्मेदार माता-पिता की तरह, अपने बच्चों के भविष्य को अपने भविष्य से ऊपर रखकर।
बस, अब तक मेरी जिंदगी की कहानी कुछ ऐसी ही रही है— जिम्मेदारियाँ, संघर्ष, अनुशासन, त्याग, मेहनत और हर कठिन मोड़ पर प्रभु का सहारा।
"भीतर का आईना
भाग रहे हैं हम जिससे,
वह छुपा है अपने ही भीतर।
बुराई कोई बाहर की जंग नहीं,
वह बैठी है मन के अंदर॥
बिन अंधेरे के इस महफ़िल में,
रोशनी का कोई मोल नहीं।
बिन शैतान की उस कहानी के,
भगवान का भी कोई रोल नहीं॥
बुराई तो एक कच्ची मिट्टी है,
जो आत्मा को मजबूत बनाती है।
अनुभव की भट्टी में तपकर ही,
जिंदगी असल रूप पाती है॥
डर, लालच और यह गुस्सा,
मन के गहरे तूफान हैं।
जो थाम ले इन तूफानों को,
वही तो सच्चे इंसान हैं॥
भागना छोड़ो, अब आंखें खोलो,
मन के दोनों रूपों को जानो।
उजाले-अंधेरे के इस संगम को ही,
तुम जीवन का असली सच मानो॥"
You are offering me writing opportunities with monetary compensation, but my interest lies beyond financial gain. In today's world, it is evident that most endeavors are driven by financial motives. Many claim that money is not the ultimate goal, yet their actions suggest otherwise. Nations engage in conflicts, and upon closer inspection, it often revolves around financial interests. Money was intended to facilitate our lives and maintain societal harmony, but now it seems to be having an adverse effect. Our actions and priorities have become inhumane, bordering on satanic.
An individual's experience dictates the level of ease or hardship in life. Outcomes rarely fulfill our explicit expectations, and disappointment follows. Yet, we often fail to reflect on our own involvement in these outcomes.
04/05/2026
Gyan & Wisdom Hub 15K likes, 59 comments. "लोगों का फ़ायदा || OSHO Parvachan "
एक समय था जब हम लोगों को उनके मज़हब से पहचानते थे, इंसानियत से नहीं।
आज जब कोई मुस्लिम होकर शिव भक्ति करता है, तो कहीं स्वागत होता है और कहीं विरोध।
पर असली सवाल यह है — क्या आस्था पर भी समाज का अधिकार होना चाहिए?
धर्म हमें परिवार और परंपरा से मिलता है,
लेकिन आस्था दिल से पैदा होती है।
कोई शिव कहता है, कोई अल्लाह, कोई भगवान —
नाम अलग हैं, पर क्या ईश्वर अलग हो जाता है?
ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता हर इंसान का अपना होता है।
इसलिए किसी की पूजा, किसी की इबादत या किसी की श्रद्धा पर फैसला करना हमारा काम नहीं।
सच्ची सभ्यता वही है जहाँ हम यह कह सकें —
तुम अपने तरीके से मानो, मैं अपने तरीके से मानूँगा,
और हम दोनों एक-दूसरे का सम्मान करेंगे।
क्योंकि आखिर में धर्म नहीं,
इंसानियत ही ईश्वर तक पहुँचाती है।
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