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16/07/2026
भारतीय सेना के ऐसे वीर योद्धा, जिन्होंने रेजांग ला के ऐतिहासिक युद्ध में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए चीनी सेना के खिलाफ अद्भुत साहस का परिचय दिया। कहा जाता है कि भारतीय सैनिकों की संख्या केवल 120 थी, जबकि सामने हजारों चीनी सैनिक थे। इस भीषण युद्ध में मेजर शैतान सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनकी बहादुरी आज भी देश के लिए प्रेरणा है।
युद्ध के करीब तीन महीने बाद जब मेजर शैतान सिंह का पार्थिव शरीर मिला, तो उसे देखकर हर कोई भावुक हो गया। शहादत के बाद भी उन्होंने अपनी बंदूक को मजबूती से थाम रखा था, मानो आखिरी सांस तक मातृभूमि की रक्षा में डटे रहे हों।
18 नवंबर 1962 की सुबह करीब 3:30 बजे लद्दाख की चुशुल घाटी के रेजांग ला क्षेत्र में दुश्मन ने हमला शुरू कर दिया। मेजर शैतान सिंह 13 कुमाऊं रेजिमेंट की लगभग 120 जवानों वाली टुकड़ी की कमान संभाल रहे थे। सामने दुश्मन की भारी संख्या थी, लेकिन उनके हौसले उससे भी बड़े थे।
हालात पूरी तरह विपरीत थे। न पर्याप्त सैनिक थे और न ही आधुनिक हथियार, लेकिन मेजर शैतान सिंह ने अपने साथियों का मनोबल ऊंचा रखते हुए मोर्चा संभाला और दुश्मन का डटकर मुकाबला करने का आदेश दिया।
भारतीय जवानों ने ऐसा जवाब दिया कि दुश्मन को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इससे बौखलाकर दुश्मन ने मोर्टार से हमला तेज कर दिया और भारतीय टुकड़ी चारों ओर से घिर गई। पीछे हटने का मौका था, लेकिन मेजर शैतान सिंह ने आखिरी सांस तक लड़ने का फैसला किया। वह लगातार अपने साथियों का उत्साह बढ़ाते रहे, तभी दुश्मन की गोली लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गए।
साथियों ने उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले जाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया। कहा जाता है कि उन्होंने मशीनगन को रस्सी से अपने पैरों में बंधवा लिया ताकि अंतिम क्षण तक दुश्मन का मुकाबला कर सकें। सुबह होते-होते मेजर शैतान सिंह सहित उनकी टुकड़ी के अधिकांश वीर सैनिक मातृभूमि के लिए शहीद हो चुके थे।
युद्ध के बाद बर्फबारी के कारण उनके और उनके साथियों के पार्थिव शरीर लंबे समय तक नहीं मिल सके। करीब तीन महीने बाद जब मेजर शैतान सिंह का शव मिला, तो उनके पैरों में मशीनगन अब भी बंधी हुई थी। यह दृश्य उनकी अदम्य वीरता और अंतिम क्षण तक लड़ने के संकल्प की अमर गवाही देता है। ऐसे अमर वीरों को राष्ट्र हमेशा नमन करता रहेगा। 💐🇮🇳🇮🇳🇮🇳
16/07/2026
ये हैं गोरखा रेजिमेंट के जांबाज़ जवान विष्णु श्रेष्ठ, जिन्होंने चलती ट्रेन में एक लड़की की अस्मिता बचाने के लिए अकेले ही 40 लुटेरों का डटकर सामना किया और उसे सुरक्षित बचा लिया।
घटना के दौरान विष्णु श्रेष्ठ ने अकेले दम पर लुटेरों से भिड़ते हुए 8 लुटेरों को घायल कर दिया और 3 को मार गिराया, जबकि बाकी लुटेरे अपनी जान बचाकर वहां से भाग निकले।
यह घटना उस वक्त हुई जब ट्रेन में सफर कर रही 18 साल की लड़की पर लुटेरों ने हमला करने की कोशिश की। संयोग से उसी ट्रेन में यात्रा कर रहे विष्णु श्रेष्ठ बिना किसी डर के उनके सामने दीवार बनकर खड़े हो गए।
उन्होंने अकेले ही 8 लुटेरों को घायल किया और 3 को मार गिराया। जब लुटेरों ने देखा कि एक अकेला फौजी उन सब पर भारी पड़ रहा है, तो बाकी लुटेरे डरकर मौके से फरार हो गए।
उनकी बहादुरी और सूझबूझ ने न सिर्फ उस लड़की की इज्जत बचाई बल्कि ट्रेन में मौजूद यात्रियों की जान भी सुरक्षित रखी। उनकी वीरता ने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारतीय सेना के जवान हर परिस्थिति में देश और देशवासियों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।
विष्णु श्रेष्ठ की इस साहसिक बहादुरी के लिए उन्हें पूरे देश से सम्मान और सराहना मिल रही है। ऐसे वीर सैनिकों की वजह से ही हमारा देश सुरक्षित है। 💐💐🇮🇳🇮🇳
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