ShreejeeKripa
राधे तेरी चरण कमलो की धूल जो पा जाऊं,
सच कहती हूं राधे जन्नत को भी भूल जाऊं!
11/11/2024
Radhe Radhe ❤️
06/04/2024
. "श्रीराधा प्रेम"
श्री राधा श्री कृष्ण के जीवन में अलौकिक प्रेम की मूर्ति बनकर आईं। जिस प्रेम को कोई नाप नहीं सका, उसकी आधारशिला राधा ने ही रखी थी। राधा जी वृंदावन की अधीश्वरी हैं। राधा जी अनादि सनातन तथा शाश्वत हैं। वृंदावन में यमुना पार भांडीर वन में स्वयं ब्रह्माजी के पुरोहितत्व में श्रीकृष्ण-राधा विवाह भी संपन्न हुआ था। श्री राधा कृष्ण का संबंध निस्वार्थ प्रेम की अदृश्य बेड़ी से बंधा हुआ है।
श्री राधा और श्री कृष्ण के प्रेम की गहराई को दर्शाते कई प्रसंग हमारे धर्म ग्रंथों में दिए गए हैं। उन्हीं के अनुसार राधा श्री कृष्ण कि आह्लादिनी शक्ति थी। वे साक्षात् लक्ष्मी थी जिन्होंने राधा रूप में अवतार लिया मगर ब्रज में कुछ स्त्रियाँ राधा जी के चरित्र पर लांछन लगाती थी।
उन में दो प्रधान थी। एक थी वृद्धा और एक थी युवती। दोनों ही परपुरूष की ओर कभी नहीं देखती थी। किंतु देखना ही तो कोई पाप नहीं पाप तो होता है मन से कभी-कभी तो यह सदाचार का मिथ्या अभिमान साधना में बड़ा भारी विध्न उत्पन्न करता है। जब तक यह अभिमान चूर नहीं होता तब तक मनुष्य की बुद्धि ठिकाने नहीं आती। इन दोनों को अपने अस्तित्व पर बड़ा अभिमान था। इसी अभिमान में भर कर वे सब को असती मानती थीं और ऊपरी बातें देख निन्दा करती थी।
एक दिन कृष्ण कुछ बीमार हो गए। मंत्र-तंत्र, जादू-टोना, झाड़-फूंक जड़ी-बूटियों सभी से उपचार किया गया। किंतु किसी से कुछ लाभ नहीं हुआ। यशोदा जी के धैर्य का बांध टूट गया। वे ढाढ़ मार कर रोने लगीं। उसी समय सहसा एक वैद्य एक हाथ में झोली तथा डंडा लेकर नंद बाबा के द्वार पर आए। झोली डंडा रख उन्होंने कहा,"मैं मधुपुरी से आया हूँ। मैंने सुना कि नंद के कुमार कुछ अस्वस्थ हैं, मैं अभी इन्हें अच्छा कर सकता हूँ।"
यशोदा मईया पर तो मानों किसी ने अमृत छिड़क दिया हो। वे बोली,"वैद्यराज ! मेरे लाला को तुम शीघ्र अच्छा कर दो। तुम जो मांगोगे वही दूंगी।" वैद्य ने गंभीरता से कहा, "मेरे गुरू की आज्ञा है कि मैं जिस की चिकित्सा करता हूँ। उसके घर का जल भी नहीं पीता। यदि मैं रोगी से कुछ लेने लगूँ तो मेरी विद्या विफल हो जाएगी।" यशोदा मईया बोली, 'आप जैसे भी चाहें मेरे बच्चे को अच्छा कर दें। कोई वस्तु चाहिए तो मैं एकत्रित कर दूँ।" वैद्य ने कहा, "मुझे एक घड़ा यमुना जल चाहिए।" यशोदा मईया बोली, "आप जितना जल कहें मैं स्वयं जाकर यमुना से लाकर दे सकती हूँ।"
वैद्य ने कहा, "आप यह कार्य नहीं कर सकती। आपके अतिरिक्त जो भी पतिव्रता स्त्री हो जिसे अपने पतिव्रत पर पूर्ण विश्वास हो। केवल वही स्त्री इस कार्य को पूरा कर सकती है।" सभी का मन धड़कने लगा। मन से भी कभी जिस ने पर पुरूष का चिन्तन न किया हो ऐसी स्त्री सर्वत्र नहीं मिल सकती। सब सहम गई। यशोदा मईया बोली, "वैद्यराज यह प्रतित कैसे हो कि यह जल सती का ही लाया हुआ है। सभी अपने मन में तो अपने को सती समझती हैं।" हँस कर वैद्य बोले, "मन में समझने से क्या होता है ? सती की एक परिक्षा है। उस परीक्षा में उर्तीण होकर जो कलश को यमुना जी से भर कर लाए वही सती है जो न ला पाए वही असती है।"
मिट्टी का घड़ा मंगवाया गया। वैद्यराज ने अपनी झोली से एक सोने की कील निकाली। उस से घड़े में सौ छिद्र कर दिए। फिर बालों की एक लम्बी डोरी बनवाई उस बाल तन्तू को यमुना के उस पार से इस पार तक बांध दिया और कहा जो घड़े को लेकर जो इस बाल पर चल कर बीच धारा से जल भर ले आए और जल की एक बूँद भी न गिरे, वही स्त्री सती समझी जाएगी। उसी के लाए हुए जल से कृष्ण ठीक हो जाएँगे।
यह सुन कर सभी स्त्रियों का साहस छूट गया अब सब मिल कर उन दोनों को उकसाने लगी। दोनों ही बारी-बारी से घड़ा लेकर उस बाल पर चढ़ी किंतु पैर रखते ही तन्तू टूट गया। अब अन्य स्त्रियों को साहस छूट गया। जब कोई भी स्त्री घड़ा उठाने को तैयार न हुई तो यशोदा मईया रोने लगी बोली वैद्यराज, "असंभव बात क्यों कर रहे हैं ?" वैद्य ने कहा, "संसार में असंभव कुछ नहीं है। पतिव्रता स्त्री सब कुछ कर सकती है।" यशोदा मईया बोली," तो आप ही बताओ कौन है ऐसी पतिव्रता स्त्री ?" वैद्य ने कहा, "मैं ज्योतिष से गणना करके बताता हूँ।" काफी समय तक वैद्य गणना करते रहे। अंत में बोले,"यहां कोई राधा है ?"
राधा का नाम सुनते ही यशोदा मईया की आँखों में चमक आ गई और बोली, "हाँ ! है उसे कृष्ण के रोगी होने की बात मालूम नहीं होगी। नहीं तो वह सबसे पहले आती।" यशोदा मईया ने एक सखी को भेजा और वह राधा रानी को बुला लाई। वैद्य ने राधा-रानी को दूर से ही आते देख कर उनकी वंदना की और कहा, "देखो राधा ! यह घड़ा यमुना जी से भरकर बाल पर चल कर लाना होगा।" राधा रानी ने पूछा, "इससे क्या होगा वैद्य जी ?" वैद्य ने कहा, "इससे कृष्ण जल्दी अच्छे हो जाएँगे।" राधा रानी बोली, "अच्छा मेरे लाए जल से कृष्ण अच्छे हो जाएँगे।" ऐसा कह कर उन्होंने तुरन्त घड़े को उठा लिया। कोलाहाल मच गया। सभी का ह्रदय धड़क रहा था। कुछ स्त्रियाँ मन ही मन हँस रही थी। कुछ परिणाम देखने को उत्कंठित हो रही थीं।
श्री राधे ने केश सूत्र को प्रणाम किया और फिर सरलता से उसके ऊपर चढ़ गई। वह बाल नहीं टूटा। धीरे-धीरे उस बाल पर चलती ही गई। सरलता से घड़ा भर कर वापिस आ गई और उस सौ छिद्रों वाले घड़े से एक बूँद भी पानी न टपका। जल लाकर वे वैद्य के समीप आ कर खड़ी हो गई।
वैद्य ने कहा, "आप ही कृष्ण के ऊपर तीन चुल्लु जल डाल दें। अभी इनका सारा रोग खत्म हो जाएगा और यह स्वस्थ हो जाएँगे।" राधा जी ने वैद्य जी के कहे अनुसार ही किया तुरन्त श्री श्याम सुंदर का रोग अच्छा हो गया।
राधा जी का नाम कृष्ण से पहले लिया जाता है। राधा नाम के जाप से श्री कृष्ण प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर दया करते हैं। राधा जी का श्री कृष्ण के लिए प्रेम नि:स्वार्थ था। श्री राधा जी भगवान श्री कृष्ण की परम प्रिया हैं तथा उनकी अभिन्न मूर्ति भी। राधा जी भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अघिष्ठात्री देवी हैं। अत: भगवान इनके अधीन हैं।
जय जय श्री राधे 🙏🙇🙏
28/03/2024
एक ऐसे कथावाचक जिनके पास पत्नी के अस्थि विसर्जन तक के लिए पैसे नहीं थे ... तब मंगलसूत्र बेचने की बात की थी।
यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि पूज्यनीय रामचंद्र डोंगरे जी महाराज जैसे भागवताचार्य भी हुए हैं जो कथा के लिए एक रुपया भी नहीं लेते थे 🙏 मात्र तुलसी पत्र लेते थे। जहाँ भी वे भागवत कथा कहते थे, उसमें जो भी दान दक्षिणा चढ़ावा आता था, उसे उसी शहर या गाँव में गरीबों के कल्याणार्थ दान कर देते थे। कोई ट्रस्ट बनाया नहीं और किसी को शिष्य भी बनाया नहीं।
अपना भोजन स्वयं बना कर ठाकुरजी को भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते थे। डोंगरे जी महाराज कलयुग के दानवीर कर्ण थे।
उनके अंतिम प्रवचन में चौपाटी में एक करोड़ रुपए जमा हुए थे, जो गोरखपुर के कैंसर अस्पताल के लिए दान किए गए थे। स्वंय कुछ नहीं लिया|
डोंगरे जी महाराज की शादी हुई थी। प्रथम रात के समय उन्होंने अपनी धर्मपत्नी से कहा था, "देवी मैं चाहता हूं कि आप मेरे साथ १०८ भागवत कथा का पारायण करें, उसके बाद यदि आपकी इच्छा होगी तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करेंगे'।
इसके बाद जहाँ जहाँ डोंगरे जी महाराज भागवत कथा करने जाते, उनकी पत्नी भी साथ जाती।१०८ भागवत कथा पूर्ण होने में करीब सात वर्ष बीत गए। तब डोंगरे जी महाराज पत्नी से बोले, *अब अगर आपकी आज्ञा हो तो हम गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर संतान उत्पन्न करें'।
इस पर उनकी पत्नी ने कहा, 'आपके श्रीमुख से १०८ भागवत कथा श्रवण करने के पश्चात मैंने गोपाल को ही अपना पुत्र मान लिया है, इसलिए अब हमें संतान उत्पन्न करने की कोई आवश्यकता नहीं है"। धन्य हैं ऐसे पति-पत्नी, धन्य है उनकी भक्ति और उनका कृष्ण प्रेम।
डोंगरे जी महाराज की पत्नी आबू में रहती थीं और डोंगरे जी महाराज देश दुनिया में भागवत कथा रस बरसाते थे।
पत्नी की मृत्यु के पांच दिन पश्चात उन्हें इसका पता चला। वे अस्थि विसर्जन करने गए, उनके साथ मुंबई के बहुत बड़े सेठ थे "रतिभाई पटेल जी" |
उन्होंने बाद में बताया कि डोंगरे जी महाराज ने उनसे कहा था ‘कि रति भाई मेरे पास तो कुछ है नहीं और अस्थि विसर्जन में कुछ तो लगेगा। क्या करें’ ? फिर महाराज आगे बोले थे, ‘ऐसा करो, पत्नी का मंगलसूत्र और कर्णफूल पड़ा होगा उसे बेचकर जो मिलेगा उसे अस्थि विसर्जन क्रिया में लगा देते हैं’।
सेठ रतिभाई पटेल ने रोते हुए बताया था....
जिन महाराजश्री के इशारे पर लोग कुछ भी करने को तैयार रहते थे, वह महापुरुष कह रहा था कि पत्नी के अस्थि विसर्जन के लिए पैसे नहीं हैं।
हम उसी समय मर क्यों न गए l
फूट फूट कर रोने के अलावा मेरे मुँह से एक शब्द नहीं निकल रहा था।
सनातन धर्म ही सर्वोपरि है । ऐसे संत और महात्मा आप को केवल सनातन संस्कृति में ही मिलते है। हमारे देश में बहुत सी बातें हैं जो हम सभी तक पहुंच नहीं पायी । मैं कोशिश करता रहता हूं कि हमारे देश की संस्कृति को हम सभी जाने।
जय श्री राधे कृष्ण 🚩🙏
*ऐसे महान विरक्त महात्मा संत के चरणों में कोटी कोटी नमन भी कम है ||
10/01/2024
Radha Naam ❤️
व्रत कथा (सफला एकादशी )
चम्पावती नगरी में एक महिष्मान नाम का राजा राज्य करता था। उस राजा के चार पुत्र थे उन पुत्रों में सबसे बडा लुम्पक, नाम का पुत्र महापापी था। वह हमेशा बुरे कार्यो में लगा रहता था और पिता का धन व्यर्थ करने से भी पीछे नहीं हटता था। वह सदैव देवता, ब्राह्मण, वैष्णव आदि की निन्दा किया करता था। जब उसके पिता को अपने बडे पुत्र के बारे में ऎसे समाचार प्राप्त हुए, तो उसने उसे अपने राज्य से निकाल दिया। तब लुम्पक ने रात्रि को पिता की नगरी में चोरी करने की ठानी। वह दिन में बाहर रहने लगा और रात को अपने पिता कि नगरी में जाकर चोरी तथा अन्य बुरे कार्य करने लगा। रात्रि में जाकर निवासियों को मारने और कष्ट देने लगा। पहरेदार उसे पकडते और राजा का पुत्र मानकर छोड देते थे। जिस वन में वह रहता था उस वन में एक बहुत पुराना पीपल का वृक्ष था जिसके नीचे, लुम्पक रहता था। पौष माह के कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन वह शीत के कारण मूर्छित हो गया। अगले दिन दोपहर में गर्मी होने पर उसे होश आया। शरीर में कमजोरी होने के कारण वह कुछ खा भी न सका। आसपास उसे जो फल मिलें, उसने वह सब फल पीपल कि जड़ के पास रख दिये। इस प्रकार अनजाने में उससे एकादशी का व्रत पूर्ण हो गया। जब रात्रि में उसकी मूर्छा दूर होती है तो उस महापापी के इस व्रत से तथा रात्रि जागरण से भगवान अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उसके समस्त पाप का नाश कर देते हैं। लुम्पक ने जब अपने सभी पाप नष्ट होने का पता चलता है तो वह उस व्रत की महिमा से परिचित होता है और बहुत प्रसन्न होता है। अपने आचरण में सुधार लाता है व शुभ कामों को करने का प्रण लेता है। अपने पिता के पास जाकर अपनी गलतियों के लिए क्षमा याचना करता है। तब उसके पिता उसे क्षमा कर अपने राज्य का भागीदार बनाते हैं
न जाने क्या किया जादू सखी री 🤩
09/08/2023
Guru bhagwan 🙏
जब एक Doctor ने महाराज जी से उनकी दिनचर्या पूछी !!! Bhajan Marg by Param Pujya Vrindavan Rasik Sant Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj, Shri Hit Radha Keli Kunj, Varah Ghat, Vrindavan DhamGoogle Map L...
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