LORD Krishna
The Bhagawad Geeta - words of Lord Krishna to Arjuna. The Gita is the operations manual of how to live life.
******Jai Shree Krishna !******
14/01/2026
*‼️पुण्य का फल देखना चाहता हूं‼️*
एक सेठ बस से उतरे, उनके पास कुछ सामान था।आस-पास नजर दौडाई, तो उन्हें एक मजदूर दिखाई दिया।
सेठ ने आवाज देकर उसे बुलाकर कहा- "अमुक स्थान तक इस सामान को ले जाने के कितने पैसे लोगे?'
'आपकी मर्जी, जो देना हो, दे देना, लेकिन मेरी शर्त है कि जब मैं सामान लेकर चलूँ, तो रास्ते में या तो मेरी सुनना या आप सुनाना ।
सेठ ने डाँट कर उसे भगा दिया और किसी अन्य मजदूर को देखने लगे, लेकिन आज वैसा ही हुआ जैसे राम वन गमन के समय गंगा के किनारे केवल केवट की ही नाव थी।
मजबूरी में सेठ ने उसी मजदूर को बुलाया । मजदूर दौड़कर आया और बोला - "मेरी शर्त आपको मंजूर है?"
सेठ ने स्वार्थ के कारण हाँ कर दी।
सेठ का मकान लगभग 500मीटर की दूरी पर था । मजदूर सामान उठा कर सेठ के साथ चल दिया और बोला, सेठजी आप कुछ सुनाओगे या मैं सुनाऊँ। सेठ ने कह दिया कि तू ही सुना।
मजदूर ने खुश होकर कहा- 'जो कुछ मैं बोलू, उसे ध्यान से सुनना , यह कहते हुए मजदूर पूरे रास्ते बोलता गया । और दोनों मकान तक पहुँच गये।
मजदूर ने बरामदे में सामान रख दिया , सेठ ने जो पैसे दिये, ले लिये और सेठ से बोला! सेठजी मेरी बात आपने ध्यान से सुनी या नहीं।
सेठ ने कहा, मैने तेरी बात नहीं सुनी, मुझे तो अपना काम निकालना था।
मजदूर बोला-" सेठजी! आपने जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी, कल ठीक सात बजे आपकी मौत होने वाली है"।
सेठ को गुस्सा आया और बोले: तेरी बकवास बहुत सुन ली, जा रहा है या तेरी पिटाई करूँ:
मजदूर बोला: मारो या छोड दो, कल शाम को आपकी मौत होनी है, अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो ।
अब सेठ थोड़ा गम्भीर हुआ और बोला: सभी को मरना है, अगर मेरी मौत कल शाम होनी है तो होगी , इसमें मैं क्या कर सकता हूं । मजदूर बोला: तभी तो कह रहा हूं कि अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो। सेठ बोला: सुना, ध्यान देकर सुनूंगा ।
मरने के बाद आप ऊपर जाओगे तो आपसे यह पूछा जायेगा कि "हे मनुष्य ! पहले पाप काफल भोगेगा या पुण्य का "क्योंकि मनुष्य अपने जीवन में पाप-पुण्य दोनों ही करता है, तो आप कह देना कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।
इतना कहकर
मजदूर चला गया । दूसरे दिन ठीक सात बजे सेठ की मौत हो गयी। सेठ ऊपर पहुँचा तो यमराज ने मजदूर द्वारा बताया गया प्रश्न कर दिया कि 'पहले पाप का फल भोगना चाहता है कि पुण्य का' । सेठ ने कहा 'पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन जो भी जीवन में मैंने पुण्य किया हो, उसका फल आंखों से देखना चाहता हूं।
यमराज बोले-" हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, यहाँ तो दोनों के फल भुगतवाए जाते हैं।"
सेठ ने कहा कि फिर मुझसे पूछा क्यों, और पूछा है तो उसे पूरा करो, धरती पर तो अन्याय होते देखा है, पर यहाँ पर भी अन्याय है।
यमराज ने सोचा, बात तो यह सही कह रहा है, इससे पूछकर बड़े बुरे फंसे, मेरे पास कोई ऐसी पावर ही नहीं है, जिससे इस जीव की इच्छा पूरी हो जाय, विवश होकर यमराज उस सेठ को ब्रह्मा जी के पास ले गये , और पूरी बात बता दी
ब्रह्मा जी ने अपनी पोथी निकालकर सारे पन्ने पलट डाले, लेकिन उनको कानून की कोई ऐसी धारा या उपधारा नहीं मिली, जिससे जीव की इच्छा पूरी हो सके।
ब्रह्मा भी विवश होकर यमराज और सेठ को साथ लेकर भगवान के पास पहुचे और समस्या बतायी । भगवान ने यमराज और ब्रह्मा से कहा: जाइये , अपना -अपना काम देखिये , दोनों चले गये।
भगवान ने सेठ से कहा- "अब बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?
सेठ बोला- "अजी साहब, मैं तो शुरू से एक ही बात कह रहा हूं कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।
भगवान बोले- "धन्य है वो सदगुरू(मजदूर) जो तेरे अंतिम समय में भी तेरा कल्याण कर गया , अरे मूर्ख ! उसके बताये उपाय के कारण तू मेरे सामने खडा है, अपनी आँखों से इससे और बड़ा पुण्य का फल क्या देखना चाहता है। मेरे दर्शन से तेरे सभी पाप भस्मीभूत हो गये।
इसीलिए बचपन से हमको सिखाया जाता है कि, गुरूजनों की बात ध्यान से सुननी चाहिए , पता नहीं कौन सी बात जीवन में कब काम आ जाए..!!
13/01/2026
सुलोचना वासुकी नाग की पुत्री और लंका के राजा रावण के पुत्र मेघनाद की पत्नी थी। लक्ष्मण के साथ हुए एक भयंकर युद्ध में मेघनाद का वध हुआ। उसके कटे हुए शीश को भगवान श्रीराम के शिविर में लाया गया था।
अपने पति की मृत्यु का समाचार पाकर सुलोचना ने अपने ससुर रावण से राम के पास जा कर पति का शीश लाने की प्रार्थना की। किंतु रावण इसके लिए तैयार नहीं हुआ। उसने सुलोचना से कहा - कि वह स्वयं राम के पास जाकर मेघनाद का शीश ले आये। क्योंकि राम पुरुषोत्तम हैं, इसीलिए उनके पास जाने में तुम्हें किसी भी प्रकार का भय नहीं करना चाहिए।
रावण के महापराक्रमी पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाद) का वध करने की प्रतिज्ञा लेकर लक्ष्मण जिस समय युद्ध भूमि में जाने के लिये प्रस्तुत हुए, तब राम उनसे कहते हैं - "लक्ष्मण! रण में जाकर तुम अपनी वीरता और रणकौशल से रावण-पुत्र मेघनाद का वध कर दोगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।
परंतु एक बात का विशेष ध्यान रखना कि मेघनाद का मस्तक भूमि पर किसी भी प्रकार न गिरे। क्योंकि मेघनाद एक नारी-व्रत का पालक है और उसकी पत्नी परम पतिव्रता है।
ऐसी साध्वी के पति का मस्तक अगर पृथ्वी पर गिर पड़ा तो हमारी सारी सेना का ध्वंस हो जाएगा और हमें युद्ध में विजय की आशा त्याग देनी पड़ेगी। लक्ष्मण अपनी सेना लेकर चल पड़े। समरभूमि में उन्होंने वैसा ही किया। युद्ध में अपने बाणों से उन्होंने मेघनाद का मस्तक उतार लिया, पर उसे पृथ्वी पर नहीं गिरने दिया। हनुमान उस मस्तक को रघुनंदन के पास ले आये।
मेघनाद की दाहिनी भुजा आकाश में उड़ती हुई उसकी पत्नी सुलोचना के पास जाकर गिरी। सुलोचना चकित हो गयी। दूसरे ही क्षण अन्यंत दु:ख से कातर होकर विलाप करने लगी। पर उसने भुजा को स्पर्श नहीं किया। उसने सोचा, सम्भव है यह भुजा किसी अन्य व्यक्ति की हो।
ऐसी दशा में पर-पुरुष के स्पर्श का दोष मुझे लगेगा। निर्णय करने के लिये उसने भुजा से कहा - "यदि तू मेरे स्वामी की भुजा है, तो मेरे पतिव्रत की शक्ति से युद्ध का सारा वृत्तांत लिख दे। भुजा को दासी ने लेखनी पकड़ा दी। लेखिनी ने लिख दिया - "प्राणप्रिये! यह भुजा मेरी ही है।
युद्ध भूमि में श्रीराम के भाई लक्ष्मण से मेरा युद्ध हुआ। लक्ष्मण ने कई वर्षों से पत्नी, अन्न और निद्रा छोड़ रखी है। वह तेजस्वी तथा समस्त दैवी गुणों से सम्पन्न है। संग्राम में उनके साथ मेरी एक नहीं चली। अन्त में उन्हीं के बाणों से विद्ध होने से मेरा प्राणान्त हो गया। मेरा शीश श्रीराम के पास है।
पति की भुजा-लिखित पंक्तियां पढ़ते ही सुलोचना व्याकुल हो गयी। पुत्र-वधु के विलाप को सुनकर लंकापति रावण ने आकर कहा - 'शोक न कर पुत्री।
प्रात: होते ही सहस्त्रों मस्तक मेरे बाणों से कट-कट कर पृथ्वी पर लोट जाऐंगे। मैं रक्त की नदियां बहा दूंगा। करुण चीत्कार करती हुई सुलोचना बोली - "पर इससे मेरा क्या लाभ होगा, पिताजी। सहस्त्रों नहीं करोड़ों शीश भी मेरे स्वामी के शीश के अभाव की पूर्ती नहीं कर सकेंगे। सुलोचना ने निश्चय किया कि 'मुझे अब सती हो जाना चाहिए।'
किंतु पति का शव तो राम-दल में पड़ा हुआ था। फिर वह कैसे सती होती? जब अपने ससुर रावण से उसने अपना अभिप्राय कहकर अपने पति का शव मँगवाने के लिए कहा, तब रावण ने उत्तर दिया- "देवी! तुम स्वयं ही राम-दल में जाकर अपने पति का शव प्राप्त करो।
जिस समाज में बालब्रह्मचारी हनुमान, परम जितेन्द्रिय लक्ष्मण तथा एक पत्नी व्रती भगवान श्रीराम विद्यमान हैं, उस समाज में तुम्हें जाने से डरना नहीं चाहिए। मुझे विश्वास है कि इन स्तुत्य महापुरुषों के द्वारा तुम निराश नहीं लौटायी जाओगी।"
सुलोचना के आने का समाचार सुनते ही श्रीराम खड़े हो गये और स्वयं चलकर सुलोचना के पास आये और बोले - "देवी! तुम्हारे पति विश्व के अन्यतम योद्धा और पराक्रमी थे। उनमें बहुत-से सदगुण थे। किंतु विधि की लिखी को कौन बदल सकता है। आज तुम्हें इस तरह देखकर मेरे मन में पीड़ा हो रही है। सुलोचना भगवान की स्तुति करने लगी।
श्रीराम ने उसे बीच में ही टोकते हुए कहा - "देवी! मुझे लज्जित न करो। पतिव्रता की महिमा अपार है, उसकी शक्ति की तुलना नहीं है। मैं जानता हूँ कि तुम परम सती हो। तुम्हारे सतित्व से तो विश्व भी थर्राता है। अपने स्वयं यहाँ आने का कारण बताओ, बताओ कि मैं तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ?
सुलोचना ने अश्रुपूरित नयनों से प्रभु की ओर देखा और बोली - "राघवेन्द्र! मैं सती होने के लिये अपने पति का मस्तक लेने के लिये यहाँ पर आई हूँ। श्रीराम ने शीघ्र ही ससम्मान मेघनाद का शीश मंगवाया और सुलोचना को दे दिया।
पति का छिन्न शीश देखते ही सुलोचना का हृदय अत्यधिक द्रवित हो गया। उसकी आंखें बड़े जोरों से बरसने लगीं। रोते-रोते उसने पास खड़े लक्ष्मण की ओर देखा और कहा - "सुमित्रानन्दन! तुम भूलकर भी गर्व मत करना कि मेघनाथ का वध मैंने किया है। मेघनाद को धराशायी करने की शक्ति विश्व में किसी के पास नहीं थी।
यह तो दो पतिव्रता नारियों का भाग्य था। आपकी पत्नी भी पतिव्रता हैं और मैं भी पति चरणों में अनुरक्ती रखने वाली उनकी अनन्य उपसिका हूँ। पर मेरे पति देव पतिव्रता नारी का अपहरण करने वाले पिता का अन्न खाते थे और उन्हीं के लिये युद्ध में उतरे थे, इसी से मेरे जीवन धन परलोक सिधारे।
सभी योद्धा सुलोचना को राम शिविर में देखकर चकित थे। वह यह नहीं समझ पा रहे थे कि सुलोचना को यह कैसे पता चला कि उसके पति का शीश भगवान राम के पास है।
अगर आपको कथा संग्रह की पोस्ट पसंद आती है तो आज ही सब्सक्राइब करें कथा संग्रह
जिज्ञासा शान्त करने के लिये सुग्रीव ने पूछ ही लिया कि यह बात उन्हें कैसे ज्ञात हुई कि मेघनाद का शीश श्रीराम के शिविर में है। सुलोचना ने स्पष्टता से बता दिया - "मेरे पति की भुजा युद्ध भूमि से उड़ती हुई मेरे पास चली गयी थी। उसी ने लिखकर मुझे बता दिया।
व्यंग्य भरे शब्दों में सुग्रीव बोल उठे - "निष्प्राण भुजा यदि लिख सकती है फिर तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है। श्रीराम ने कहा - "व्यर्थ बातें मत करो मित्र। पतिव्रता के महाम्तय को तुम नहीं जानते। यदि वह चाहे तो यह कटा हुआ सिर भी हंस सकता है।
श्रीराम की मुखकृति देखकर सुलोचना उनके भावों को समझ गयी। उसने कहा - "यदि मैं मन, वचन और कर्म से पति को देवता मानती हूँ, तो मेरे पति का यह निर्जीव मस्तक हंस उठे। सुलोचना की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कटा हुआ मस्तक जोरों से हंसने लगा।
यह देखकर सभी दंग रह गये। सभी ने पतिव्रता सुलोचना को प्रणाम किया। सभी पतिव्रता की महिमा से परिचित हो गये थे। चलते!समय सुलोचना ने श्रीराम से प्रार्थना की- "भगवन, आज मेरे पति की अन्त्येष्टि क्रिया है और मैं उनकी सहचरी उनसे मिलने जा रही हूँ।
अत: आज युद्ध बंद रहे। श्रीराम ने सुलोचना की प्रार्थना स्वीकार कर ली। सुलोचना पति का सिर लेकर वापस लंका आ गई। लंका में समुद्र के तट पर एक चंदन की चिता तैयार की गयी। पति का शीश गोद में लेकर सुलोचना चिता पर बैठी और धधकती हुई अग्नि में कुछ ही क्षणों में सती हो गई...!!
।। जय जय सियाराम ।।
11/01/2026
एक बार की बात है नारद जी विष्णु भगवानजी से मिलने गए। भगवान ने उनका बहुत सम्मान किया। जब नारद जी वापिस गए तो विष्णुजी ने कहा हे लक्ष्मी जिस स्थान पर नारद जी बैठे थे। उस स्थान को गाय के गोबर से लीप दो।
जब विष्णुजी यह बात कह रहे थे तब नारदजी बाहर ही खड़े थे। उन्होंने सब सुन लिया और वापिस आ गए और विष्णु भगवान जी से पुछा हे भगवान जब मै आया तो आपने मेरा खूब सम्मान किया पर जब मै जा रहा था, तो आपने लक्ष्मी जी से यह क्यों कहा कि जिस स्थान पर नारद बैठा था उस स्थान को गोबर से लीप दो।
भगवान ने कहा हे नारद मैंने आपका सम्मान इसलिए किया क्योंकि आप देव ऋषि है और मैंने देवी लक्ष्मी से ऐसा इसलिए कहा क्योंकि आपका कोई गुरु नहीं है।
आप निगुरे है। जिस स्थान पर कोई निगुरा बैठ जाता है वो स्थान गन्दा हो जाता है।
यह सुनकर नारद जी ने कहा हे भगवान आपकी बात सत्य है पर मै गुरु किसे बनाऊ?
नारायण बोले: हे नारद !धरती पर चले जाओ जो व्यक्ति सबसे पहिले मिले उसे अपना गुरु मानलो।
नारद जी ने प्रणाम किया और चले गए। जब नारद जी धरती पर आये तो उन्हें सबसे पहले एक मछली पकड़ने वाला एक मछुवारा मिला। नारद जी वापिस नारायण के पास चले गए और कहा महाराज वो मछुवारा तो कुछ भी नहीं जानता मै उसे गुरु कैसे मान सकता हूँ?
यह सुनकर भगवान ने कहा नारद जी अपना प्रण पूरा करो। नारद जी वापिस आये और उस मछुवारे से कहा मेरे गुरु बन जाओ। पहले तो मछुवारा नहीं माना बाद में बहुत मनाने से मान गया। मछुवारे को राजी करने के बाद नारद जी लौट कर भगवान के पास गए और कहा हे भगवान। मेरे गुरूजी को तो कुछ भी नहीं आता वे मुझे क्या सिखायेगे?
यह सुनकर विष्णु जी को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा: हे नारद गुरु निंदा करते हो जाओ मै आपको श्राप देता हूँ कि आपको ८४ लाख योनियों में घूमना पड़ेगा।
यह सुनकर नारद जी ने दोनों हाथ जोड़कर कहा हे भगवान। इस श्राप से बचने का उपाय भी बता दीजिये। भगवान नारायण ने कहा इसका उपाय जाकर अपने गुरुदेव से पूछो। नारद जी ने सारी बात जाकर गुरुदेव को बताई। गुरूजी ने कहा ऐसा करना भगवान से कहना ८४ लाख योनियों की तस्वीरे धरती पर बना दे फिर उस पर लेट कर गोल घूम लेना और विष्णु जी से कहना ८४ लाख योनियों में घूम आया मुझे छमा कर दीजिए आगे से गुरु निंदा नहीं करूँगा।
नारद जी ने विष्णु जी के पास जाकर ऐसा ही किया उनसे कहा ८४ लाख योनिया धरती पर बना दो और फिर उन पर लेट कर घूम लिए और कहा नारायण मुझे छमा कर दीजिए आगे से कभी गुरु निंदा नहीं करूँगा। यह सुनकर विष्णु जी ने कहा देखा जिस गुरु की निंदा कर रहे थे उसी ने मेरे श्राप से बचा लिया। नारदजी गुरु की महिमा अपरम्पार है।
गुरु गूंगे गुरु बाबरे, गुरु के रहिये दास,
गुरु जो भेजे नरक को, स्वर्ग कि रखिये आस !
गुरु चाहे गूंगा हो, चाहे गुरु बावरा हो गुरु के हमेशा दास रहना चाहिए। गुरु यदि नरक को भेजे तब भी शिष्य को यह इच्छा रखनी चाहिए कि मुझे स्वर्ग प्राप्त होगा, अर्थात इसमें मेरा कल्याण ही होगा! यदि शिष्य को गुरु पर पूर्ण विश्वास हो तो उसका बुरा स्वयं गुरु भी नहीं कर सकते।
यह प्रसंग पंडित श्री धन्ने भगत ने एक साधारण पत्थर देकर कहा इसे भोग लगाया करो एक दिन भगवान कृष्ण दर्शन देंगे। उस धन्ने भक्त के विश्वास से एक दिन उस पत्थर से भगवान प्रकट हो गए। फिर गुरु पर तो वचन विश्वास रखने वाले का उद्धार निश्चित है।
16/08/2025
07/05/2023
Dasham skandh utrardh
भगवान के वंश और नृग राजा की कथा
भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक पत्नी के गर्भ से दस-दस पुत्र उत्पन्न हुए, पुत्रो की माताये ही सोलह हजार से अधिक थी, इसलिए उनके पुत्र-पौत्रो की संख्या करोडो़ तक पहुँच गयी .छप्पन करोड़ का भगवान का वंश हो गया. वे रूप, बल, आदि गुणों में, अपने पिता भगवान श्रीकृष्ण से किसी बात में कम न थे. उन्हें पढाने के लिए तीन हजार शिक्षक लगे थे.
रानियाँ देखती कि भगवान हमारे महल से कभी बाहर नहीं जाते, सदा हमारे पास बने रहते है. इससे वे यही समझती कि श्रीकृष्ण को मै ही सबसे प्यारी हूँ. परन्तु वे अपने पति भगवान श्रीकृष्ण का तत्व- उनकी महिमा नहीं समझती थी. वे सुंदरियाँ अपने आत्मानंद में एकरस स्थित भगवान श्रीकृष्ण के कमल-कलि के समान सुन्दर मुख, विशाल बाहु, प्रेमभरी मुस्कान, से स्वयं ही मोहित रहती थी.अब नित्य-निरंतर उनके प्रेम और आनंद की अभिवृद्धि होती रहती थी.वे प्रेम भरी मुस्कराहट, मधुर चितवन, आदि से भगवान की सेवा करती रहती थी. उनमे से सभी पत्नियों के साथ सेवा करने के लिए सैकड़ो दासियाँ रहती फिर भी जब उनके महल में भगवान पधारते, तब वे स्वयं आगे जाकर आदरपूर्वक उन्हें लिवा लाती श्रेष्ठ आसन पर बैठाती, उत्तम सामग्रियों से उनकी पूजा करती, चरणकमल पखारती, पान लगाकर खिलाती, पाँव दबाकर थकावट दूर करती, पंखा झलती, इत्र-फुलेल, चन्दन, आदि लगाती फूलो के हार पहनाती, केश सवारती, सुलाती, स्नान कराती, और अनेक के भोजन कराकर अपने हाथो भगवान की सेवा करती.
रुक्मिणी के दस पुत्र थे जिनमे ‘प्रधुम्न’सबसे बड़े थे. - कामदेव का जन्म ही प्रधुम्न के नाम से भगवान कृष्ण के पुत्र के रूप में हुआ. प्रधुम्न के पुत्र ‘अनिरुद्ध’हुए. जिनका विवाह बाणासुर की बेटी उषा से हुआ.जाम्बवती के बड़े बेटे का नाम साम्ब था.
एक दिन साम्ब, प्रधुम्न, चारुभानु आदि राजकुमार घूमने के लिए उपवन में गए. वहाँ बहुत देर तक खेल-खेलते हुए उन्हें प्यास लगी.वे इधर-उधर जल की खोज करने लगे. वे एक कुएँ के पास गए उसमे जल तो था नहीं, एक बड़ा विचित्र जीव दीख पड़ा. वह जीव पर्वत के समान आकर का एक गिरगिट था उसे देखकर उनके आश्चर्य की सीमा न रही.
उन्होंने यह वृत्तान्त श्रीकृष्ण के पास जाकर निवेदन किया. जगत के जीवनदाता कमलनयन भगवान श्रीकृष्ण उस कुएँ पर आये.और अनायास ही उसको बाहर निकाल लिया. भगवान श्रीकृष्ण के करकमलों का स्पर्श होते ही उसका गिरगिट रूप जाता रहा और वह एक स्वर्गीय देवता के रूप में परिणित हो गया. अब उसके शरीर का रंग तपाये हुए सोने के समान चमक रहा था. भगवान ने उससे पूछा- महाभाग तुम कौन हो? तुम्हे किस कर्म के फलस्वरुप इस योनी में आना पड़ा था? आप अपना परिचय दो.
राजा ने कहा – ‘प्रभु! मै महाराज इक्ष्वाकु का पुत्र राजा नृग हूँ. जब कभी किसी ने आपके सामने दानियो की गिनती की होगी तब उसमे मेरा नाम अवश्य ही आपने सुना होगा. ‘भगवन! पृथ्वी में जितने धूलिकण है, आकाश में जितने तारे है, और वर्षा में जितनी जलधाराएँ गिरती है, मैंने उतनी ही गौएँ दान की थी. वे सभी गौएँ दुधारू, नौजवान, सीधी, सुन्दर, और कपिला थी.उन्हें मैंने न्याय के धन से प्राप्त किया था. उनके सीगो में सोना मढ़ा दिया गया था और खुर चाँदी के थे.उन्हे वस्त्र, हार, से सजा दिया था. सबके बछड़े थे. और भगवन् मै श्रेष्ठ ब्राह्मण कुमारो को जो सद्गुणी, शील, संपन्न, वेदपाठी होते, उन्हें गौओ का दान करता.
एक दिन किसी अयाचक(दान न लेने वाले)तपस्वी ब्राह्मण की एक गाय बिछुड़कर कर मेरी गौओ में आ मिली. मुझे इस बात का बिलकुल पता न चला इसलिए मैंने अनजाने में उसे किसी दूसरे ब्राह्मण को दान कर दिया. जब उस गाय को वे ब्राह्मण ले चले.
तब उस गाय के असली स्वामि ने कहा–‘यह गौ मेरी है’
दान ले जाने वाले ब्राह्मण ने कहा- ‘यह तो मेरी है’ क्योकि राजा नृग ने मुझे दी है और वे दोनों ब्राह्मण आपस में झगड़ते हुए अपनी-अपनी बात कायम करने के लिए मेरे पास आये.
एकनेकहा- यह गाय अभी-अभी आपने मुझे दी है. और दूसरे ने कहा –यदि ऐसी बात है तो तुमने मेरी गाय चुरा ली है. ‘भगवन् उन दोनों ब्राह्मणों की बात सुनकर मेरा चित्त भ्रमित हो गया. मैंने धर्मसंकट में पड़कर उन दोनों से बड़ी अनुनय-विनय की. और कहा कि मै बदले में एक लाख उत्तम गौए दूँगा.मुझसे अनजाने में यह अपराध बन गया है.पर दोनों ब्राह्मण नहीं माने और चले गए.
इसके बाद आयु समाप्त होने पर यमराज ने मुझसे पूंछा – ‘राजन! तुम पहले अपने पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? तुम्हारे दान और धर्म के फलस्वरूप तुम्हे ऐसा तेजस्वी लोक प्राप्त होने वाला है जिसकी कोई सीमा ही नहीं है. तब मैंने यमराज से कहा –‘देव! पहले मै अपने पाप का फल भोगना चाहता हूँ.
और उसी क्षण यमराज ने कहा – तुम गिर जाओ. उनके ऐसा कहते ही, मै वहाँ से गिरा और गिरते ही समय मैंने देखा कि मै गिरगिट हो गया हूँ.तब से आज तक में इसी रूप में पद हूँ आज आपकी कृपा से इस देह से मुक्ति मिली है.राजा नृग इस प्रकार कहकर भगवान की परिक्रमा की.और फिर आज्ञा लेकार सबके देखते-देखते ही वे श्रेष्ठ विमान पर सवार हो गए.
राजा नग के चले जाने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने कुटुंब के लोगो को शिक्षा देने के लिए कहा – जो लोग अग्नि के समान तेजस्वी है वे भी ब्राह्मणों का थोड़े-से-थोड़ा धन हड़पकर नहीं पचा सकते. मै हलाहल विष को विष नहीं मानता क्योकि उसकी चिकित्सा होती है. परन्तु ब्राह्मणों का धन ही ‘परमविष’ है उसको पचा लेने के लिए पृथ्वी में कोई औषधि, कोई उपाय, नहीं है. हलाहल विष केवल खाने वाले का ही प्राण लेता है परन्तु ब्राह्मण के धन रूप अरणी से जो आग पैदा होती है वह सारे कुल को समूल जला डालती है. ब्राह्मण का धन यदि उसकी पूरी-पूरी सम्मति लिए बिना भोग जाये तब तो वह भोगने वाले उसके लड़के, और पौत्र इन तीन पीढियों को ही चौपट करता है. परन्तु यदि बलपूर्वक हठ करके उसका उपभोग किया जाये तब तो पूर्वपुरुषो की दस पीढियाँ और आगे आने की भी दस पीढियाँ नष्ट हो जाती है. जो ब्राह्मण का धन हड़पता है समझना चाहिये कि वह जान-बूझकर नर्क में जाने का रास्ता साफ कर रहे है. उनके रोने पर, उनके आँसू की बूंदों से जितने धरती के धूलिकण भीगते है उतने वर्षों तक ब्राह्मण के स्वत्व छीनने वाले को कुम्भीपाक नरक में दुख भोगना पड़ता है. वे साठ हजार वर्षों तक विष्ठा के कीड़े होते है. इसलिए कभी भूले से भी ब्राह्मण के धन की इच्छा भी करते है उसे छीनना तो अलग रहा. वे इस जन्म में अल्पायु, शत्रुओ से पराजित, और राज्यभ्रष्ट हो जाते है. ब्राह्मण अपराध करे, मार ही क्यों न बैठे. बहुत-सी गालियाँ या शाप ही क्यों न दे. उसे नमस्कार ही करो. इस प्रकार भगवान अपने ही पुत्रो, पौत्रो को समय-समय पर शिक्षा देते रहते थे.
सार-
भगवान भी ब्राह्मण को अपना ईष्ट देव मानते है ब्राह्मण शब्द में ही हम ब्राह्मण 'देव' लगाते है.नारदजी को भगवान वैकुण्ठ बार-बार बुलाते है ताकि उनकी चरण धूलि से वैकुण्ठ पवित्र हो जाये.
Share
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Contact the place of worship
Website
Address
Vyaskulam & Goshala Society Chandankasyap@gmail. Com
Vrindavan
CHANDANKASHYAP