Bhakti Ras
05/09/2024
प्रीत की रीत न जाने सखी, वो तो नन्द के बालक सावरियॉ।
दिल छिन लियो, ठुकराई दियो, झट भाग गयो कर बावरियॉ।।
केहि देश गयो, ना संदेश दियो, वो भुलाय गयो, सुधि मोर खबरियॉ।
दरद की मारी वन वन डोलूँ, अति पीर उठे आठो घरिया...!!!!
पितृ दोष के लक्षण
1. पितृ दोष होने पर व्यक्ति के जीवन में संतान का सुख नहीं मिल पाता है। अगर मिलता भी है तो कई बार संतान विकलांग होती है, मंदबुद्धि होती है या फिर चरित्रहीन होती है या फिर कई बार बच्चे की पैदा होते ही मृत्यु हो जाती है।
2. नौकरी और व्यवसाय में मेहनत करने के बावजूद भी हानि होती रहे।
परिवार में अक्सर कलह बने रहना या फिर एकता न होना। परिवार में शांति का अभाव।
3. परिवार में किसी न किसी व्यक्ति का सदैव अस्वस्थ बने रहना। इलाज करवाने के बाद भी ठीक न हो पाना।
4. परिवार में विवाह योग्य लोगों का विवाह न हो पाना। या फिर विवाह होने के बाद तलाक हो जाना या फिर अलगाव रहना।
5. पितृदोष होने पर अपनों से ही अक्सर धोखा मिलता है।
6. पितृदोष होने पर व्यक्ति बार-बार दुर्घटना का शिकार होता है। उसके जीवन में होने वाले मांगलिक कार्यों में बाधाएं आती हैं।
7. परिवार के सदस्यों पर अक्सर किसी प्रेत बाधा का प्रभाव बने रहना। घर में अक्सर तनाव और क्लेश रहना।
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24/02/2022
जलाशयारामसुरप्रतिष्ठा सौम्यायने जीवशशाक्डशुक्रे।
दृश्ये मृदुक्षिप्रचरध्रुवे स्यात् सिते स्वर्क्षतिथिक्षणे वा ।। मु.चि. २/६१.
जलाशय ( तालाब, पोखरा, वापी, कूप ), आराम ( उपवन, बगीचा, उद्यान, ), सुर ( देव ) की प्रतिष्ठा सौम्य ( उतर) अयन में गुरू, शुक्र, चन्द्र, के दृश्य रहने पर मृदु ( मृगशीर्ष, रेवती, चित्रा, अनुराधा ), क्षिप्र ( हस्त, आश्विनी, पुष्य ), चर ( स्वाती , पुनर्वसु, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा ), ध्रुव ( उ. फा., उ.षा., उ.भा., रोहिणी ) नक्षत्रो में शुक्लपक्ष में की जाती है। इन १६ नक्षत्रों में देवप्रतिमा की प्रतिष्ठा की जाती है।
शुक्लपक्ष में प्रतिमा प्रतिष्ठा करें – मुहूर्तचिन्तामणि में पक्षेसिते कहकर शुक्लपक्ष को देव प्राणप्रतिष्ठा हेतु स्वीकार किया गया है। मत्स्यपुराण में भी शुक्ल पक्ष में ही प्रतिमा प्राणप्रतिष्ठा करने को कहा गया है- प्राप्यपक्षं शुभं शुक्लमतीते चौतरायणे। कतिपय ग्रन्थों में माघादि पॉच महीनों में कृष्णपक्ष की पंचमीतिथि तक देवप्रतिष्ठा वहित मानी गयी है- देवतारामवाप्यादिप्रतिष्ठामुतरायणे। माघादिपच्जमासेषु कृष्णेप्यापच्जमीदिनम् ।।
देव प्रतिमा की प्रतिष्ठा माघ, फाल्गुन, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ ( हरिशयनपूर्व ) पॉच मासों में की जाती है। उग्र देवों की प्रतिष्ठा दक्षिणायन में भी होती है जैसे – काली, नृसिंह, वराह, वामन,महिषवाहिनी, महाविद्या, श्मशानदेवता , भैरव आदि। देवप्रतिष्ठा में मंगलवार, रिक्ततिथि तथा अमावास्या वर्जित है। सूर्य सिंह लग्न, हस्त नक्षत्र में, चन्द्रादि आठ ग्रह पुष्य नक्षत्र में , ब्रम्हा् कुम्भ लग्न, पुष्य- श्रवण- अभिजित् में, विष्णु कन्या लग्न पुष्य – श्रावण- अभिजित् में , शिवपार्वती मिथुन लग्न , पुष्य- श्रवण – अभिजित् में भगवती दुर्गा मूल नक्षत्र में कुबेर- कार्तिकेय अनुराधा लग्न में प्रतिष्ठित किये जाते है। स्थिर ( २, ५, ८, ११ ) लग्न में सभी देवों की प्रतिष्ठा की जाती है।
ग्राह्य नक्षत्र –
अश्विनी रोहिनी, मृगशिरा, पुनर्वसु, पुष्य, उ.फा.,हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, उ.षा., श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, उ.भा., रेवती ( १६ नक्षत्र )
ग्राह्य तिथि-
देवर्षि नारद के मत से द्वितया, तृतीया, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी ओर पूर्णिमा को देवप्रतिष्ठा करनी चाहिए- द्वितीयसादिद्वयो: पच्जम्यादित: तिसृषु क्रमात् । दशम्यादिचतसृषु पौणमास्यां विशेषत:। मुहूर्त चिन्तामणि के अनुसार प्रतिमा प्रतिष्ठा रिक्ता तिथि (४, ९, १४ ) को छोड़कर सभी तिथियों में की जाती है- रिक्ता तिथि वर्जते ।
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08/02/2022
क्या भगवान हमारे द्वारा चढ़ाया गया भोग खाते हैं ?
यदि खाते हैं, तो वह वस्तु समाप्त क्यों नहीं हो जाती ?
और यदि नहीं खाते हैं, तो भोग लगाने का क्या लाभ ?
एक लड़के ने पाठ के बीच में अपने गुरु से यह प्रश्न किया।
गुरु ने तत्काल कोई उत्तर नहीं दिया।
वे पूर्ववत् पाठ पढ़ाते रहे।
उस दिन उन्होंने पाठ के अन्त में एक श्लोक पढ़ाया:
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥
पाठ पूरा होने के बाद गुरु ने शिष्यों से कहा कि वे पुस्तक देखकर श्लोक कंठस्थ कर लें।
एक घंटे बाद गुरु ने प्रश्न करने वाले शिष्य से पूछा कि उसे श्लोक कंठस्थ हुआ कि नहीं ? उस शिष्य ने पूरा श्लोक शुद्ध-शुद्ध गुरु को सुना दिया।
फिर भी गुरु ने सिर 'नहीं' में हिलाया, तो शिष्य ने कहा कि" वे चाहें, तो पुस्तक देख लें; श्लोक बिल्कुल शुद्ध है।”
गुरु ने पुस्तक देखते हुए कहा“ श्लोक तो पुस्तक में ही है, तो तुम्हारे दिमाग में कैसे चला गया? शिष्य कुछ भी उत्तर नहीं दे पाया।
तब गुरु ने कहा “ पुस्तक में जो श्लोक है, वह स्थूल रूप में है। तुमने जब श्लोक पढ़ा, तो वह सूक्ष्म रूप में तुम्हारे दिमाग में प्रवेश कर गया,
उसी सूक्ष्म रूप में वह तुम्हारे मस्तिष्क में रहता है। और जब तुमने इसको पढ़कर कंठस्थ कर लिया, तब भी पुस्तक के स्थूल रूप के श्लोक में कोई कमी नहीं आई।
इसी प्रकार पूरे विश्व में व्याप्त परमात्मा हमारे द्वारा चढ़ाए गए निवेदन को सूक्ष्म रूप में ग्रहण करते हैं,
और इससे स्थूल रूप के वस्तु में कोई कमी नहीं होती। उसी को हम प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं।
शिष्य को उसके प्रश्न का उत्तर मिल गया।
09/01/2022
"कैकेई", "कैकेय देश" (वर्तमान काकेशियस )के "राजा अश्वपति" की बेटी थीं "मंथरा" उनके चाचा "वृहद स्रव" की बेटी थीं ,मतलब उनकी "चचेरी बहन" थीं और "मंथरा और कैकेई दोनों अप्सराओं के समान सुन्दर थीं","मंथरा" को उनके लालच ने कुरूप बना दिया,दरअसल वे और ज्यादा खूबसूरत दिखने के लिए एक दवा का प्रयोग करने लगीं ,जो कि अधिक मात्रा में लेने के कारण , गलत प्रभाव करने लगी,और मंथरा का शरीर 3 जगह से टेडा हो गया ,और वे कुब्जा कहलाने लगी,विवाह के उपरांत कैकेई उनको अपने साथ अयोध्या ले आयी,क्यूंकि दोनों बहनों में अत्यधिक स्नेह था,🌷क्या राम की इच्छा के विरुद्ध कभी कोई कार्य हो सकता था,नहीं,राम कैकेई को सबसे अधिक स्नेह करते थे ,और कैकेई भी सबसे ज्यादा राम को स्नेह करती थी,राम ने जब अवतार लिया तो उन्होंने कैकेई से ही कहा कि मुझे कुछ समय के लिए वन जाना है ,और इसमें आप मेरी सहायता करो ,कैकेई ने हमेशा के लिए सारे संसार में अपने लिए घृणा उत्पन्न कर लेंगी ,ऐसा जानकर भी प्रभु राम का साथ दिया ,वे सबसे बड़ी प्रभु भक्त थीं,विवाह उपरांत ",कनक भवन और दिव्य चूड़ामणि" उन्होंने ही "सीता जी" को समर्पित की थीं ",चूड़ामणि" जिसके पास रहती ,उसके" पति" को कोई हरा नहीं सकता था ,इसलिए "सीता जी ने हनुमान जी से उसे प्रभु श्री राम के पास भेज दिया" 🌷कैकेई कोई बुरी महिला नहीं बल्कि प्रभु राम की परम भक्त में सर्वोपरि थीं🌷उनके बारे में अपशब्द नहीं कहना चाहिए ,प्रभु श्री राम सबसे ज्यादा उनका ही सम्मान करते थे 🌷🙏🙏 जय सिया राम🙏🙏🙏🌷हो सकता है मुझसे लिखने में त्रुटि हो गई हो ,यहां अनेक विद्वजन हैं से मुझे क्षमा करके मेरा मार्गदर्शन करेंगे , ऐसी मुझे आशा है,इस तरह की पोस्ट में इसलिए लिखती हूं ,क्यूंकि समय के अनुसार हमारे धार्मिक ग्रंथो से छेड़छाड़ की गई है,लोगों तक ये जानकारी पहुंच सके और आने वाली पीढ़ियों तक लाभ पहुंच सके ,इसी आशा के साथ 🙏🙏🙏🌷
18/12/2021
दत्त आत्रेय सिर्फ वहीं अवतरित होते है जहां अत्रि जैसी प्रचंड वेद निष्ठा हो। और अनसूया जैसा सतीत्व।
लेकिन ऐसा सतीत्व भी तभी निर्माण हो सकता है जब पति भी अत्रि जैसा हो। दोनो ही एक दूसरे के पूरक है।
जो किसी एक का हो सकता है वह सबका नहीं हो सकता। सब के लिए नहीं हो सकता। और यह मनोभाव है। यह सतीत्व है। और यह सतीत्व का दायित्व है कि निर्वस्त्र तो ईश्वर के सामने भी नहीं। यदि ईश्वर को भी उन्हे निर्वस्त्र देखना है तो शिशु रूप में आना होगा जहां कामनाएं न हो मन में। और ऐसी पतिव्रता पत्नी, और ऐसे पति अत्रि के घर आता है दत्त, अवधूत दत्त।
गुजराती मे कहा भी जाता है,
અત્રિ અનસૂયા કરી નિમિત્ત,
પ્રગટ્યો જગ કારણ નિશ્ચિત.
अत्रि और अनसूया को ही निमित्त बना कर जग कारण से, जगत का उद्धार करने केलिए उस दत्त ने अवतरण किया।
और वह दत्त भी कैसा अवधूत, वेश्या तक उसके गुरु। २४ गुरु बना कर जगत को बोध दिया। यदि शिष्यत्व निर्माण हुआ है भीतर तो गुरुत्व तो प्रकृति के कण कण में है।
चन्द्र और दुर्वासा उनके भाई थे। ब्रह्म की सृजन शक्ति, विष्णु का पालन भाव और शिव का परम ज्ञान एवम् मृतुन्जय यह तीनों का प्रतीक है दत्त आत्रेय।
तत्कालीन समाज में उपनिषद् का निवृत्ति वाद एवम् ज्ञान मार्ग अवधूत ने प्रस्थापित किया। यह बिलकुल ऐसे है कि परम कर्म मार्गी अत्रि और उसके पुत्र परम निवृत्ति वादी। कर्म का अंत जैसे ज्ञान। अत्रि का अंत जैसे दत्त।
सप्तर्षि मे से एक अत्रि के पुत्र दत्त स्वयं ईश्वर है। अवतार हैं। आज उनका अवतरण दिन है। जिसे भारत में दत्तात्रेय जयंती के रूप में मनाया जाता है। 😊🙏
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त। 💐
(Repost)
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