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26/09/2020
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01/11/2018
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02/08/2018
भगवान् श्री चित्रगुप्तजी का जन्म् ~ प्राचीनकाल में ईस पृथ्वी पर प्रभास छेत्र में मित्र नाम के एक धर्मात्मा कायस्थ निवास करते थे । जो सदा सब प्राणियो के हित मेँ तत्पर रहते थे , उनके दो सन्ताने हुई ~ एक् पुत्र और एक कन्या । पुत्र का नाम चित्र और कन्या का नाम चित्रा हुवा । चित्रा बड़ी सुंदरी और सुशीला थी । इन दोनों के जन्म लेते ही उनके पिता मित्र की मृत्यु हो गयी । धर्मात्मा कायस्थ मित्र की पत्नी ने पति के साथ चितामे प्रवेष किया । तदनंतर इन दोनों अनाथ बालको का ऋषियोँ ने पालन किया । वे महान् वन में ही बड़े हुए । और वचपन से ही व्रतपरायण रहे । एक बार प्रभाष छेत्र में उन दोनों ने ~ महादेव सूर्य की स्थापना की और वे बड़ी भारी तपस्या में संलग्न हो गए । धर्मात्मा चित्र ने धुप माला चन्दन आदि उपचारो से सूर्यदेव का पूजन किया और वशिष्ट जी के द्वारा बताये हुए अड़सठ नामो द्वारा उनका स्तवन किया । धर्मात्मा चित्र के इस प्रकार स्तुति करने पर भगवान् सूर्यदेव ने प्रसन्न होकर कहा ~ वत्स ! तुम्हारा भला हो । तुम कोई वर मांगों । धर्मात्मा चित्र ने कहा ~ सूर्य देव मेरी यही कामना है सब कार्यो में मेरी रूचि हो और मुझे कुशलता प्राप्त हो । एवमस्तु ~ कहकर भगवान् सूर्य ने उनकी इच्छा का अनुमोदन किया । तब से धर्मात्मा चित्र सर्वार्थ ~ कुशल हुए । धर्मराज को जब यह बात मालूम हुई , तब उन्होंने सोचा , यदि यह बालक मेरा लेखक हो जाता तो बड़ा अच्छा होता । एक दिन धर्मात्मा चित्र क्षारसमुद्र के भीतर अग्नितीर्थ में स्नान करने के लिए गए । उसमे प्रवेश करते ही उन्हें धर्मराज अपनी रथ में वैठा कर सम्मान पूर्वक स्वर्ग लोक को ले गए । वहाँ वे चित्रगुप्त नाम से प्रसिद्ध हुए । चित्रगुप्तजी सम्पूर्ण विश्व के शुभासुभ चरित्रो को लिखते है । इसीलिए उनके द्वारा स्थापित सूर्यदेव का नाम ( चित्रादित्य ) हुआ । जो मनुष्य सप्तमी को उपवास करके उनकी पूजा करता है , उसे सात जन्मों तक दुःखो की प्राप्ति नहीं होती ।।
( स्कन्द पुराण पृष्ट नम्बर 1277 )
****************** opsrivastava-varanasi
29/05/2018
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