Fake News Alert
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30/11/2022
भाजपा को वोट देने से पहले 2 बार सोच लेना,
कर्ज चुकाना महंगा पड़ेगा।
31/10/2022
विनम्र श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।
25/04/2020
बिजनौर के बुज़ुर्ग पर ‘बोतल में पेशाब कर फलों पर छिड़कने’ का फ़र्ज़ी आरोप लगाकर वीडियो शेयर किया गय 21 अप्रैल की सुबह से दो वीडियोज़ सोशल मीडिया पर बहुत ज़्यादा वायरल हुए हैं. दोनों में फल बेचने वाला एक बुज़ुर्ग व्यक्ति ....
आओ फिर से दिया जलाएं।
अटल रहे।
अटल रहे।
03/06/2018
आधुनिक भारत में अंग्रॆजॊ का योगदान।
जब इस देश में अंग्रेज आये तो उन्होंने इस देश को कई कुप्रथाओं और मकड़जाल से बाहर निकाला। धार्मिक मान्यताओं की कुरीति से जकड़ा यह देश नही जानता था कि वह किस हाल में हैं। अंग्रेजों ने जब यहाँ की व्यवस्था को समझा तो उसपर ज्यादा हस्तक्षेप नही किया मगर जो अत्यंत क्रूरता वाले धार्मिक विश्वास थे उनको कानूनों के माध्यम से खत्म करने का काम किया। धार्मिक श्रेष्ठ पदवी वालों ने इसे धर्म पर कुठाराघात कहा लेकिन आज हमारे सामने समझने का एक विकल्प जरूर है कि मान्यताएं बड़ी थी या मानवता? संस्कृति बड़ी थी या कुरीति?
अंग्रेजों ने 1795 अधिनियम 11 के तहत दिया शुद्र को सम्पत्ति रखने का अधिकार, 1773 समान न्यायिक व्यवस्था कानून,1804 अधिनियम 3 के तहत कन्या हत्या पर रोक, 1813 दास प्रथा का अंत, 1817 समान नागरिक संहिता, 1819 अधिनिम 7 के तहत शुद्र स्त्री शुद्दीकरण पर रोक, 1880 नरबलि प्रथा पर रोक, 1833 अधिनियम 87 के तहत सरकारी सेवा भेदभाव पर रोक, 1834 सामान विधि आयोग का गठन, 1835प्रथम पुत्र गंगा प्रावह पर रोक, 1835 शूद्रों को कुर्सी पर बैठने का अधिकार, 1829 अधिनियम 17 के तहत विधवाओं को जलाने पर रोक।
1837 ठगी प्रथा पर रोक, 1860 समान क्रिमिनल लॉ लागू, 1830 चरक पूजा पर रोक, 1867 बहु विवाह प्रथा पर रोक हेतु कमिटी गठित, 1871 में 14 वर्ष की कम आयु की बालिका के विवाह पर पर रोक, 1919 सिर्फ ब्राह्मणों के जज बनने पर रोक, 1927 मनु स्मृति का दहन, 1927 शूद्रों को सामूहिक जगहों पर जाने की आजादी,1928 बेगार प्रथा का अंत। इसके अलावा बाल विवाह पर रोक, सती प्रथा पर रोक, स्वर्ग पाने हेतु रथयात्रा पर रोक, विश्वेश्वर मंदिर के पास कुएं में कूदकर जान देने वाली काशीकरबट पर रोक, नरमेध यज्ञ पर रोक, महाप्रस्थान प्रथा पर रोक, तुषानल प्रथा पर रोक, हरिबोल प्रथा पर रोक, भृगुतपन्न प्रथा पर रोक, अश्वमेघ यज्ञ पर रोक,
इसके अलावा कुछ ऐसी प्रथाएं थी जो बहुत ही विचित्र थी जैसे योनि अयोनि, गन्धर्भ विवाह, नियोग प्रथा, और ज जाने क्या क्या..हजारों प्रथाएं तो ऐसी है जो आज भी चल रही है। बाकी आप भारतीय संविधान को देख लीजिए जिसमे उस समय कुल 395 अनुच्छेद थे जिनमें 89 अनुच्छेद ऐसे थे जो भारतीय महिलाओं, वंचित, शोषित, पीड़ित और दबित वर्ग के हितों और ऐसी ही मान्यताओं को खत्म करने हेतु हैं।
अब आप सोचिये कि क्या वाकई अंग्रेजों ने इस देश की सभ्यता, संस्कृति और धर्म पर चोट की थी? सुनने में अच्छा लगता है नियोग प्रथा, अश्वमेघ यज्ञ बड़े धार्मिक और संस्कारी शब्द है लेकिन एकबार इनका पूरा अर्थ समझ लीजिए किसी ज्ञानी या बड़े बुजुर्ग से जो आपको झूठ न बोले केवल पूरी विधि और विधान को उसी रूप में वर्णित करे जैसे शास्त्रों में लिखे हैं यकीन कीजिये आपका सिर चकरा जायेगा। और आप हजार बातें सोचने पर मजबूर भी होंगे और कुप्रथाओं के खात्मे हेतु आगे भी आएंगे।
जब सती प्रथा का अंत हो रहा था तब यही समाज धर्म पर हमला कहकर चिल्ला रहा था। आज शायद ही कोई उस प्रथा का समर्थक मिले। प्रथा पर मत जाओ उसके नाम पर जाओ, ये नाम इसीलिए दिए जाते हैं ताकि इनपर बहस की भी गुंजाईश बाकी न रहे। हरिजन, वर्ण व्यवस्था और वर्णाश्रम उन्ही विचारों की भावना से उतपन्न करवाये गये शब्द है। आज हमारे समाज में ऐसी अनगिनत प्रथाएं चल रही है। साम्प्रदायिक राजनीति की वजह से उन प्रथाओं को अनदेखा किया गया है लेकिन यकीन कीजिये समस्या अभी भी विकराल है खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
जो लोग नही मानते कि अपने देश और धर्म में ऐसा कुछ नही है असल में वे सबसे बड़े मुर्ख है और वही लोग सबसे बड़े अवरोधक भी हैं उंन्नति व प्रगति के क्योंकि ऐसे विषय उनकी नादानी के चलते अछूते रह जाते हैं। दहेज प्रथा को ही देख लो। यह भी हमारी ही सभ्यता है जब सौ या हजार गाए और सोने की अशर्फियाँ व आभूषण दिए जाते थे आज एक बेटी के बाप से पूछो कि उसपर क्या बीतती है जब वो जीवन भर की कमाई एकपल में लूटा देता है। इसके बावजूद कितनी दुल्हने जलाई और लज्जित करके घर बिठाई जाती है? इसलिए जो समझते हैं उन्हें बेहिचक कर आगे आना चाहिए अन्यथा जैसे हम सती प्रथा या नरमेध यज्ञ पर हंसकर उन्हें मुर्ख कह रहे हैं आने वाली पीढ़ी हमें भी ऐसे ही मुर्ख शब्दों से नवाजेगी। ी_विशाल।
13/04/2018
20/11/2017
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