Bhaskar tune
Bhagti sangeet. all tipe Hindi, Rajasthani, Haryanvi song
14/01/2026
आज वो भी मर्द सीमा आनंद के खिलाफ हैं, और उनके खुले विचारों पर सलाह दे रहे हैं ऐसी बात करना सोशल मीडिया पर शोभा नहीं देता है...जो हर लड़की को देखकर के हम बिस्तर होना चाहते हैं....
काफी दिनों से देख रही हूं पर बोलने और लिखने से बचती हूं क्योंकि इस समाज को मै मेरी नजर बिना किसी चश्मे के देखती हूं इस लिए बिल्कुल साफ साफ देख पाती हूं
सीमा_आनंद जिन्हें लोग सेक्सोलॉजिस्ट, माइथोलॉजी ऑथर और स्टोरीटेलर के रूप में जानते हैं , केवल काम और कामुकता पर ही नहीं, बल्कि महाविद्याओं, तांत्रिक दर्शन और भगवद्गीता जैसे गूढ़ विषयों पर भी बेहद गहरी और तार्किक व्याख्या प्रस्तुत करती हैं।
उनकी पुस्तक “मोहक कलाएँ” इस समय इसलिए चर्चित है क्योंकि वह कामवासना को केवल वासना नहीं, बल्कि चेतना, ऊर्जा और मानवीय संबंधों के संदर्भ में देखती है।
यह भी एक तथ्य है कि 63 वर्ष की आयु में भी सीमा आनंद आत्मविश्वास, सौंदर्य और गरिमा के साथ स्वयं को प्रस्तुत करती हैं।
लेकिन समस्या यहाँ उनकी उम्र, सुंदरता या विषय नहीं है समस्या हमारी नज़र है।
अगर कोई स्त्री खुले मन से बात करती है, निर्भीक है, मुस्कुराकर संवाद करती है, या समाज द्वारा “वर्जित” माने गए विषयों पर सहजता से चर्चा करती है, तो क्या यह उसे वस्तु (Object) बना देने का लाइसेंस हो जाता है?
हाल ही में शुभंकर मिश्रा के पॉडकास्ट में उन्होंने कामुकता के विभिन्न रूपों पर चर्चा की।
पर उसी क्षण समाज का एक तथाकथित “सभ्य” वर्ग सक्रिय हो गया आक्षेप, गालियाँ, चरित्र-हनन और नैतिकता का ढोंग।
हैरानी की बात यह है कि जिन विचारों को ये लोग कोस रहे हैं,
उन्हीं विचारों पर पश्चिम में शोध, संवाद और सम्मान होता है
और सीमा आनंद वहाँ अपनी ज़िंदगी ससम्मान जी रही हैं।
उन्हें इन आलोचनाओं से कोई फर्क नहीं पड़ता।
जो समाज उनके विचारों को “अश्लील” कह रहा है,
वह यह भी बताए कि इसी सभ्यता के बीच
135 करोड़ की जनसंख्या कैसे पैदा हो गई?
सोशल मीडिया पर वल्गर कंटेंट की सर्चिंग में हम आज भी अग्रणी देशों में हैं।
ग्वालियर में अभी ताज़ा ताज़ा दीवारों पर बनी औरतों की पेंटिंग्स के साथ जो नीच हरकत की गयी है,, उस समाज से क्या उम्मीद की जा सकती है वो कैसे किसी औरत की बेबाकी को सहन करेगा ।
किसी का निजी वीडियो वायरल करने में प्रतियोगिता दिखाई देती है लोग बढ़ चढ़ कर वीडियो इनबॉक्स में मांगते घूमते हैं
और उसी समाज में रोज़ कितनी महिलाएँ और बच्चियाँ शारीरिक हिंसा का शिकार होती हैं हमेशा इस पर चुप्पी क्यों?
सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म पर कितनी गंदगी भरी पड़ी है और लाखों में दर्शक हैं...वहाँ ये ज्ञान जरूरी भी हो जाता है...
आत्ममंथन सिर्फ बोलने वालों को नहीं,
सुनने वालों को भी करना चाहिए।
शायद समस्या स्त्री की स्वतंत्रता या उसका सामाजिक पक्ष नहीं बल्कि समस्या हमारी असहज मानसिकता है।...
और मेरा ज्ञान ये है कि मैं भेद रखती हूं निर्वस्त्र और नंगे लोगों में ....🙏
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