Astro Neeraj Goel
ज्यो.परामर्श : स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, धन लाभ, प्रेम विवाह, अरेंज विवाह, मकान, वाहन, विदेश यात्रा
25/12/2025
अरावली पर्वतमाला को तोड़ने के नुकसान (जो बहुत गहरे और लंबे समय तक चलने वाले हैं)
1. रेगिस्तान का फैलाव
अरावली थार रेगिस्तान के लिए प्राकृतिक दीवार है
इसे तोड़ने से राजस्थान का रेगिस्तान हरियाणा और दिल्ली तक फैल सकता है।
2. जल संकट
अरावली वर्षा जल को रोककर भूजल रिचार्ज करती है
पहाड़ टूटे → पानी बहकर चला गया →
कुएँ सूखेंगे
दिल्ली-NCR में जल संकट और गंभीर होगा
3. जलवायु पर प्रभाव
तापमान में वृद्धि (Heat Island Effect)
मानसून पैटर्न बिगड़ सकता है
धूल भरी आँधियाँ और प्रदूषण बढ़ेगा
4. जैव विविधता का नुकसान
तेंदुआ, सियार, नीलगाय, पक्षी और औषधीय पौधों का आवास नष्ट
कई प्रजातियाँ स्थायी रूप से खत्म हो सकती हैं।
5. प्रदूषण और स्वास्थ्य समस्याएँ
खनन से:
हवा में धूल
पानी में भारी धातुएँ
दमा, टीबी, त्वचा रोग, आँखों की बीमारियाँ बढ़ेंगी
6. प्राकृतिक आपदाओं का खतरा
बाढ़ और मृदा अपरदन (Soil Erosion)
भूस्खलन और ज़मीन धँसने की घटनाएँ
7. भविष्य की पीढ़ियों को नुकसान
कल की भारी कीमत
आने वाली पीढ़ियों को:
पानी नहीं, शुद्ध हवा नहीं
स्थिर जलवायु नहीं
परेशानियों से जुड़े हैं ग्रह
जीवन में थोड़ी-बहुत परेशानियां हों तो यह आम बात है, लेकिन लगातार परेशानियां आने लगें या छोटी समस्याएं भी बड़ा रूप लेने लगें तो यह सामान्य बात नहीं कही जा सकती। आपकी हर ऐसी परेशानी किसी कमजोर ग्रह की निशानी हो सकती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि कई स्वास्थ्य समस्याएं भी आपकी कुंडली में ग्रहों के कमजोर होने की वजह से हो सकती हैं।
छोटी लगने वाली ये परेशानियां कई बार इतनी बुरी तरह प्रभावित करते हैं कि आप जीवनभर उससे उबर नहीं पाते। इससे जुड़े कमजोर ग्रहों की शांति के उपाय कर आप इन परेशानियों से भी आसानी से बच सकते हैं। इसलिए इसके लक्षण समझकर तुरंत इसके उपाय करें।
सूर्य
सूर्य से पूरी पृथ्वी प्रकाशमान होती है, यह जीवन में उजाले और बढ़ते हुए वर्चस्व का प्रतीक है। इसलिए कुंडली में कमजोर सूर्य शिक्षा और कॅरियर को सीधे प्रभावित करता है और व्यक्ति को हर जगह असफलता का सामना करना पड़ता है, वहीं यह आंखों के कई रोग देता है क्योंकि आंखें जीवन में ज्योति यानि कि प्रकाश का प्रतीक होती हैं।
इसके अलावा भी कमजोर सूर्य कई प्रकार की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करता है। ऐसे व्यक्ति को दिल की बीमारियां, सिरदर्द और चर्म रोग भी परेशान करते हैं। उसका पारिवारिक जीवन कलहपूर्ण हो जाता है, विशेषकर अपने पिता से उसके संबंध खराब हो जाते हैं जो कई बार उसके लिए बड़ी परेशानियां पैदा करता है।
चंद्रमा
कमजोर चंद्रमा व्यक्ति को मानसिक रोगी बनाता है। इसके अलावा गठिया, सर्दी-जुकाम, अस्थमा, कफ, निमोनिया जैसे ठंड से जुड़े रोग उसे वर्ष भर परेशान करते हैं। ऐसे व्यक्ति हमेशा किसी ना किसी समस्या से घिरे रहते हैं। ये अक्सर अवसाद के शिकार भी हो जात हैं जो अंतत: इनकी असफलता का कारण बनता है।
मंगल
लाल ग्रह यानि कि मंगल को ग्रहों का सेनापति माना जाता है। कमजोर मंगल से प्रभावित व्यक्ति मति-भ्रम का शिकार होता है। गुस्सा उनकी सबसे बड़ी परेशानी होती है जो अक्सर उन्हें गलत निर्णय लेने के लिए उकसाती है। बवासीर या रक्त से जुड़े रोग इनकी सामान्य जीवनशैली को प्रभावित करते हैं।
ऐसे लोगों के जीवन में में भाइयों से अनबन होता है और वो आए दिन किसी ना किसी छोटी-मोटी दुर्घटना का शिकार होते रहते हैं। कई बार ये बड़ी दुर्घटना के शिकार भी हो जाते हैं जो उम्र भर इन्हें तकलीफ देते हैं। इसलिए कमजोर मंगल की निशानी दिखे, तो तुरंत इसके ज्योतिषीय उपाय करें।
बुध
ज्योतिष शास्त्र में बुध को ग्रहों का राजकुमार माना गया है। बलवान बुध व्यक्ति को बौद्धिक क्षमता देता है, वहीं बुध के कमजोर होने से व्यक्ति को याददाश्त कमजोर होने की परेशानी होती है। ऐसे व्यक्ति तर्क नहीं कर पाते या सही समय पर सही निर्णय नहीं ले पाते। इन्हें कान, नाक और गले के रोग भी परेशान करते हैं।
बृहस्पति
देवगुरु बृहस्पति की नाराजगी व्यक्ति को आर्थिक और सामाजिक परेशानियां देता है। ऐसे लोगों या परिवार के मुखिया की कुंडली में गुरु के कमजोर होने पर पूरे परिवार को धन की कमी का सामना करना पड़ता है। हो सकता है इनके पास अच्छी नौकरी या आय के स्रोत हों, लेकिन ये कभी भी धन संचित नहीं कर पाते।
इनका कमाया हुआ धन अक्सर बेकार की चीजों में ही व्यय होता है या फिजूलखर्च में। ऐसे लोगों के विवाह में भी बाधाएं आती हैं या विवाह के पश्चात संतान उत्पत्ति में परेशानियां आती हैं या देरी होती है। इन्हें गठिया, कब्ज जैसे रोग भी परेशान करते हैं।
शुक्र
शुक्र ग्रह सीधे तौर पर दांपत्य जीवन को प्रभावित करता है। इसलिए कमजोर शुक्र की दशा में व्यक्ति का वैवाहिक जीवन बुरी तरह कलह का शिकार होता है। ऐसे लोग नपुंसकता, डायबिटीज और यकृत या मूत्र संबंधित रोगों के भी शिकार होते हैं। शुक्र भौतिक सुख-सुविधाओं का भी कारक माना जाता है, इसलिए कमजोर शुक्र की दशा में व्यक्ति कभी भी लग्ज़री लाइफ नहीं जी पाता।
शनि
ऐसा माना गया है कि न्याय के देवता शनिदेव व्यक्ति के बुरे कर्मों का ही दंड देते हैं। इसलिए बुरे कार्यों के साथ शनि कमजोर हो सकता है और कमजोर शनि जीवन में कई बड़ी परेशानियां लाता है। गैस, लकवा, कैंसर, मिर्गी, पैरों या हड्डी की परेशानियां ऐसे लोगों को विशेषकर परेशान करती हैं जिसके ठीक होने के बाद भी व्यक्ति किसी ना किसी रूप में इससे प्रभावित रहता है।
राहु
कुंडली में इसकी अशुभ दशा होने पर यह आलस्य की प्रवृत्ति बढ़ाता है। बुद्धि भ्रमित होती है अर्थात व्यक्ति किसी भी चीज के लिए सही निर्णय नहीं ले पाता। अशुभ राहु सीधा तंत्रिका तंत्र पर बुरा असर करता है, इसलिए ये मस्तिष्क से संबंधित बीमारियों जैसे पक्षाघात आदि का जल्दी शिकार होते हैं।
केतु
केतु की बुरी दशा व्यक्ति को गले से नीचे के हिस्सों यानि सिर के अलावा शरीर के अन्य हिस्सों को प्रभावित करता है। ऐसे व्यक्तियों को फेफड़े, पेट और पैरों की परेशानियां लगी रहती हैं... Neeraj goel 9758007088..
कुंडली स्थित शत्रु योग व रोग योग की पहचान, विवेचन एवं फलादेश
जन्म कुण्डली में स्थित छठे भाव से किसी जातक के शत्रु एवं रोग का विवेचन ज्योतिषाचार्यों द्वारा किया जाता है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जन्म कुण्डली के छठे भाव का फलादेश निम्न प्रकार से है -
♦ यदि किसी जातक की जन्म कुण्डली में अष्टमेश लग्न में स्थित हो तो, ऐसे जातक का शरीर रोगों से आक्रांत रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में छठे भाव का स्वामी ग्रह लग्न में स्थित हो तो, ऐसे जातक को उसके ही परिजन एवं मित्रगण हानि व बाधा पहुँचाते हैं एवं ऐसा जातक रोगों से भी बाधित रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, सूर्य ग्रह के साथ युग्म में हों, तो ऐसा जातक ज्वर रोग से पीडि़त रहने वाला होता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, चन्द्रमा ग्रह के साथ युग्म में हों, तो ऐसे जातक को जल से भय रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, मंगल ग्रह से किसी भी प्रकार से सम्बंधित हो, तो ऐसे जातक को शस्त्र से आघात, घाव, व्रण, ग्रन्थि सम्बंधित रोग व विकार एवं प्लेग आदि से ग्रसित होने का भय रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, बुध ग्रह के साथ युग्म में हों, तो ऐसा जातक पित्त रोगी होता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, बृहस्पति ग्रह के साथ, युग्म में हों, तो ऐसा जातक स्वस्थ काया वाला होता है, उसे सरलता से कोई रोग पकड़ नहीं पाता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, शुक्र ग्रह के साथ युग्म में हों, तो ऐसा जातक अपनी स्त्री के स्वास्थ्य के प्रति चिंतित रहने वाला होता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, शनि ग्रह के साथ युग्म में हों, तो ऐसे जातक को चोरों एवं चाण्डालों से भय रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में पहले एवं छठे भाव का स्वामी ग्रह, राहु अथवा केतु से किसी भी प्रकार से सम्बंधित हो, तो ऐसे जातक को सर्प, व्याघ्र आदि से भय रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में छठे भाव का स्वामी ग्रह, किसी भी नीच अथवा पापी ग्रह के साथ बारहवें भाव में स्थित हो एवं लग्न का स्वामी ग्रह बलवान हो, तो ऐसे जातक का स्वास्थ्य उत्तम रहता है।
♦ यदि जन्म कुण्डली में छठे भाव का स्वामी ग्रह, लग्न भाव के स्वामी ग्रह से कमजोर हो एवं छठे भाव के स्वामी ग्रह शुभ ग्रहों से सम्बंधित हो, तो ऐसे जातक के शत्रु भी उसके साथ मित्र भाव रखने वाले होते हैं।.. astrologer Neeraj goel.9758007088.
विवाह विलम्ब और सुखद वैवाहिक जीवन के योग
विवाह एक संश्लिष्ट और बाहू आयामी संस्कार है। इसके सम्बन्ध में किसी प्रकार के फल के लिए विस्तृत एवं धैर्यपूर्व अध्ययन मनन- चिंतन की अनिवार्यता होती है किसी जातक के जन्मांग से विवाह संबंधित ज्ञान प्राप्ति के लिए द्वितीय, पंचम, सप्तम एवं द्वादश भावों का विश्लेषण करना चाहिए। विवाह विलम्ब के योगों की गणना भी महत्वपूर्ण है।
अनेकानेक कन्याओं की वरमाला उनके हाथों ही मुरझा जाती है अर्थात उनका परिणय तब सम्पन्न होता है जब उनके जीवन का ऋतुराज पत्र पात के प्रतीक्षा में तिरोहित हो जाता है वैवाहिक विलम्ब के अनेक कारण हो सकते हैं, जैसे आर्थिक विषमता, शिक्षा की स्थिति, शारीरिक संयोजन, मानसिक संस्कार, ग्रहों की स्थिति इत्यादि।
विवाह विलम्ब के योग
शनि और मंगल यदि लग्न में या नवांश लग्न से सप्तमस्थ हो तो विवाह नहीं होता विशेषतः लग्नेश और सप्तमेश के बलहीन होने पर
यदि मंगल और शनी, शुक्र और चन्द्रमा से सप्तमस्थ हो तब विवाह विलम्ब से होता है
शनि और मंगल यदि षष्ठ और अष्टम भावगत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि शनि और मंगल में से कोई भी ग्रह द्वितीयेश अथवा सप्तमेश हो और एक दुसरे से दृष्ट से तो विवाह में विलम्ब होता है
यदि लग्न, सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र स्थिर राशिगत हों एवं चन्द्रमा चर राशि में हो तो विवाह विलम्ब से होता है
यदि द्वितीय भाव में कोई वक्री ग्रह स्थित हो या द्वितीयेश स्वयं वक्री हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि द्वितीय भाव पापग्रस्त हो तथा द्वितीयेश द्वादश्थ हो तब भी विवाह विलम्ब से होता है
पुरुषों की कुण्डली में सूर्य मंगल अथवा चन्द्र शुक्र की सप्तम भाव की स्थिति यदि पापाक्रांत हो तो भी विवाह में विलम्ब होता है
राहू और शुक्र के लग्नस्थ होने पर भी विवाह में विलम्ब होता है
यदि सप्तम बी हव का स्वामी त्रिक (६,८,१२) भाव में स्थित या त्रिक भाव का स्वामी सप्तम भाव में स्थित हो तो विवाह में अत्यन्त विलम्ब होता है
यदि लग्नेश और शुक्र वन्ध्या राशिगत हो (मिथुन, सिंह,कन्या एवं धनु) तो भी विवाह में विलम्ब होता है।
वैदिक ज्योतिष में विवाह के संदर्भ में आवश्यक निश्चित नियम निरूपित किए गए हैं, जिसके आधार पर विवाह के सम्बंध मे भविष्यवाणी की जा सकती है, हां इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं।
जैसे कुंडली मे निश्चित विवाह योग है या विवाह योग नहीं है? इसके अलावा विवाह विलंब के योग हैं, द्वि-विवाह या तलाक के योग हैं या सुखद वैवाहिक जीवन के योग हंै या प्रेम विवाह के योग है, साथ ही विवाह के समय व जीवन साथी कैसा होगा इन सभी बातों का कुंडली से पता चलता है
जातक की कुंडली मे विवाह प्रकरणों में शुक्र व मंगल महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हंै, इन दोनों ग्रहों को विवाह संस्कार के आधार स्तम्ंभ कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी शुक्र विवाह के कारक है तो मंगल विच्छेदक ग्रह है
विवाह का भाव कुंडली मे सप्तम भाव है। इसके अलावा कन्या की कुंडली में देवगुरू बृहस्पति व वर की कुंडली में सूर्य की महत्ता भी होती है।
सुखद वैवाहिक जीवन का आकलन करते समय कुंडली के चतुर्थ भाव का भी अध्ययन किया जाता है। सप्तम भाव के आधार पर ही नही वरन विवाह के बारे मे निर्णय लेते समय चतुर्थ भाव, पंचम भाव व एकादश भाव का भी गहन अध्ययन आवश्यक है
सुखद वैवाहिक जीवन के योग
सप्तम भाव के स्वामी का सम्बंध पंचम भाव से व पंचम के स्वामी का सम्बंध सप्तम भाव से हो तो वैवाहिक जीवन सुखद होता है।
शुक्र का सम्बंध 6, 8,12 भावों से नहीं हो, मंगल से युति न हो व उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो दांपत्य जीवन सुखद होता है।
पंचम भाव मे सौम्य ग्रह यथा चंद्र, गुरू, बुध हो तो ऎसे जातक सुमधुर वैवाहिक जीवन बिताते हैं।
पंचम, सप्तम भाव के स्वामी साथ राहू या केतू की युति सफल दांपत्य जीवन प्रदान कराती है।
पंचम भाव मे राहू व एकादश भाव में केतू हालांकि संतान पक्ष को कमजोर करती है, पर ऎसे जातकों का वैवाहिक जीवन ठीक रहता है।
शुक्र व चंद्रमा की युति या सम -सप्तक योग सुखद और आनंददायक वैवाहिक जीवन प्रदान कराते हैं।
वैवाहिक जीवन में बाधाएं
शुक्र व मंगल की युति सुखद वैवाहिक जीवन मे बाधाएं प्रदान करते हैं।
सप्तम भाव मे कू्रर ग्रह सूर्य, शनि राहू या केतू अल्प दांपत्य सुख प्रदान कराते हैं।
कुंडली में मंगल दोष विवाह विलंब कराते हंै, मंगल दोष सिर्फ लग्न कुंडली से ही नहीं वरन चंद्र व सूर्य कुंडली से भी देखना चाहिए।
सप्तम भाव का स्वामी यदि 6, 8 व 12 भाव मे स्थित हो तथा कू्र ग्रहों से युति करता हो या उस पर किसी कू्र ग्रह की दृष्टि हो तो वैवाहिक जीवन में बाधाएं आती है।
पंचम भाव में शनि व सप्तम मे सूर्य हो तो विवाह अत्यंत विलंब से होता है।
सप्तम भाव मे मंगल हो और उस पर शनि की दृष्टि हो तो ये द्विविवाह योग बनाते हैं। (नीरज गोयल ) 9758007088 ....
ग्रहों की युति, प्रतियुति
जब दो ग्रह एक ही राशि में हों तो इसे ग्रहों की युति कहा जाता है। जब दो ग्रह एक-दूसरे से सातवें स्थान पर हों अर्थात् 180 डिग्री पर हों, तो यह प्रतियुति कहलाती है।
अशुभ ग्रह या अशुभ स्थानों के स्वामियों की युति-प्रतियुति अशुभ फलदायक होती है, जबकि शुभ ग्रहों की युति शुभ फल देती है।
आइए देखें, विभिन्न ग्रहों की युति-प्रतियुति के क्या फल हो सकते हैं -
1. सूर्य-गुरु : उत्कृष्ट योग, मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, यश दिलाता है। उच्च शिक्षा हेतु दूरस्थ प्रवास योग तथा बौद्धिक क्षेत्र में असाधारण यश देता है।
2. सूर्य-शुक्र : कला क्षेत्र में विशेष यश दिलाने वाला योग होता है। विवाह व प्रेम संबंधों में भी नाटकीय स्थितियाँ निर्मित करता है।
3. सूर्य-बुध : यह योग व्यक्ति को व्यवहार कुशल बनाता है। व्यापार-व्यवसाय में यश दिलाता है। कर्ज आसानी से मिल जाते हैं।
4. सूर्य-मंगल : अत्यंत महत्वाकांक्षी बनाने वाला यह योग व्यक्ति को उत्कट इच्छाशक्ति व साहस देता है। ये व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में अपने आपको श्रेष्ठ सिद्ध करने की योग्यता रखते हैं।
5. सूर्य-शनि : अत्यंत अशुभ योग, जीवन के हर क्षेत्र में देर से सफलता मिलती है। पिता-पुत्र में वैमनस्य, भाग्य का साथ न देना इस युति के परिणाम हैं।
6. सूर्य-चंद्र : चंद्र यदि शुभ योग में हो तो यह युति मान-सम्मान व प्रतिष्ठा की दृष्टि से श्रेष्ठ होती है, मगर अशुभ योग होने पर मानसिक रोगी बना देती है।
7. चंद्र-मंगल : यह योग व्यक्ति को जिद्दी व अति महत्वाकांक्षी बनाता है। यश तो मिलता है, मगर स्वास्थ्य हेतु यह योग हानिकारक है। रक्त संबंधी रोग होते हैं।
8. चंद्र-शुक्र : वैवाहिक जीवन के लिए फलदायी योग, मनचाहा जीवनसाथी मिलता है, विवाह के बाद भाग्योदय, यश मिलता है। कला क्षेत्र में सफलता मिलती है। भाग्य साथ देता है।
9. चंद्र-गुरु : शिक्षा, नौकरी, विवाह, संतति सभी दृष्टि से अत्यंत फलदायक योग, जीवन में धन, यश, सुख सब मिलता है।
10. चंद्र-बुध : बुद्धि व वाक् चातुर्य बढ़ाने वाला योग है। ऐसे व्यक्ति व्यवहार कुशल व लोगों को जोड़ने वाले होते हैं। व्यवहार कार्य में यश मिलता है।
11. चंद्र-राहु : ग्रहण योग, शरीर स्वास्थ्य हेतु हानिकारक, जीवन में रुकावटें आती हैं। पानी से, भूत-पिशाच बाधा से, गुप्त शत्रुओं से परेशानी आती है।
12. चंद्र-केतु : निराशावादी व आलसी बनाने वाला योग है। विरक्ति व संन्यास की तरफ झुकाव, स्वास्थ्य की परेशानियाँ भी बनी रहती हैं।
13. चंद्र-शनि : वृषभ, तुला, मकर, कुंभ राशियों में यह योग शुभ है, जिसके फल 36 वर्ष के बाद मिलते हैं। अन्य राशियों के लिए प्रतिकूल हर कार्य में विलंब, आर्थिक कष्ट तथा वाणी की कठोरता जैसे फल मिलते हैं। इसे विष योग भी कहते हैं।
14. गुरु-राहु : यह चांडाल योग बनाता है। यह युति जिस भाव में हो, उसके फल का नाश करती है। आयु के उत्तरार्द्ध में ही सफलता मिलती है। जीवन निराशा, कष्ट व परेशानी में बीतता है।
15. शनि-मंगल : यह युति जीवन में अनिश्चितता व आकस्मिकता लाती है। सप्तम भाव में होने पर वैवाहिक जीवन का नाश करती है। दुर्घटनाएँ, जीवन में अस्थिरता होती है। अचानक घटनाएँ घटती हैं।astro Neeraj Goel 9758007088
सूर्य-शनि युति जीवन को बनाती है संघर्षमय
वैदिक ज्योतिष में सूर्य को शनि का पिता माना गया है लेकिन शनिदेव अपने पिता सूर्य से शत्रु का भाव रखते हैं। इसी कारण जब भी कुंडली में इनकी युति होती है तो इनके अशुभ फल जातक को मिलते हैं।
इनके आपसी विरोध का अनुमान आप इस बात से लगा सकते हैं कि जिस राशि मे सूर्य उच्च के होते हैं शनि वहां नीच हो जाते हैं और जहाँ तुला में शनि उच्च के होते हैं वहां सूर्य नीच के हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से सूर्य शनि का योग ज्योतिष में काफी बुरे फलदेने वाला बताया गया है।
इसका एक कारण ये भी है कि सूर्य जहाँ रौशनी का कारक है वंही शनि अँधेरे का कारक है। रौशनी अँधेरे को खत्म कर देती है इस प्रकार इन दोनों का योग कभी नही हो पाता। एक के खत्म होने पर दुसरे का समय आता है।
सूर्य जो कि राजा का कारक ग्रह होता है तो शनि देव को दासत्व का कारक ग्रह माना गया है। सूर्य गेहू होता है तो शनि मांस का कारक ग्रह माना गया है। ऐसे में इंसान यदि गेहू और मांस का सेवन एक साथ करता है तो उसे विभिन्न बीमारियों का सामना करना पड़ जाता है।
सूर्य सात्विकता और शुभता फ़ैलाने वाला, सुलभ दृष्ट, प्रकाशवान व ज्वलंत ग्रह है, यह व्यक्ति के जीवन में प्रकाश फैलाता है, जीवनी शक्ति, पिता, सफलता, स्वास्थ्य, आरोग्य, औषधि आदि का कारक है, इसका आंखों की ज्योति, शरीर के मेरूदंड, तथा पाचन क्रिया पर प्रभुत्व है,वहीँ शनि को तामसिक और कठोर ग्रह माना जाता है, यह प्रकाशहीन और ठंडा ग्रह है, जो आलस, गरीबी, लंबी बीमारी और मृत्यु का मुख्य कारक है।
शनि एक राशि का गोचर ढाई वर्ष में पूरा करता है, जो कष्ट, दुःख और हानि दर्शाते हैं, अतः उसे नैसर्गिक पापी ग्रह की संज्ञा दी गई है, यह व्यक्ति के जीवन में संघर्ष और अंधकार पैदा करता है. प्रकाश और अन्धकार का मिलन होने के परिणाम बड़े विचित्र होते हैं. इससे सूर्य भी दूषित होता है और शनि भी दूषित होता है,
यदि सूर्य शनि की युति हो तो पिता और पुत्र में वैचारिक मतभेद बने रहते हैं,सूर्य-शनि की युति के फलादेश का अध्ययन दर्शाता है कि शनि के दुष्प्रभाव से युति वाले भाव तथा उससे सप्तम भाव के फलादेश में न्यूनता आती है।
यह युति सूर्य के कारकत्व पिता की स्थिति, उनका स्वास्थ्य तथा जातक के अपने कार्यक्षेत्र तथा मान-सम्मान में कमी करती है। जातक के अपने पिता से संबंध अच्छे नहीं रहते।
सूर्य के अधिक निर्बल होने पर पिता का साया जल्दी उठ जाता है या जातक अपने पिता से अलग हो जाता है।
इसी प्रकार संबंधियों से भी अलगाव होता है। स्वास्थ्य में भी गड़बड़ रहती है, वाणी में संयम नहीं रह पाता है, जिससे काम बिगड़ सकते हैं, धन संबंधी परेशानियां भी हो सकती हैं,सूर्य शनि के एक साथ होने के कारण पिता पुत्र के संबंधों में समस्या पैदा होती ।
इस युति के कारण वैवाहिक जीवन ख़राब होता है, कभी कभी दो विवाहों के योग भी बन जाते हैं, पिता और पुत्र का आपसी व्यवहार अच्छा नहीं होता, और कभी कभी एक दूसरे से दूर हो जाते हैं, कई बार लाख प्रयास करने पर भी पिता या पुत्र का सुख नहीं मिलता, और कभी कभी पिता पुत्र में से एक ही उन्नति कर पाता है, अतः कुछ आचार्य इस युति को ‘विच्छेदकारी योग की संज्ञा देते हैं।
सूर्य और शनि पिता-पुत्र होने पर भी परस्पर शत्रुता रखते हैं। वैसे भी प्रकृति का विचार करें तो ज्ञान और अंधकार साथ मिलने पर शुभ प्रभाव नहीं देते, सूर्य-शनि युति प्रतियुति जीवन को पूर्णत: संघर्षमय बनती हैं|
विशेषत: जब यह युति लग्न, पंचम, नवम या दशम में हो व दोनों (सूर्य-शनि) में से कोई ग्रह इन भावों का कारक भी हो तो यह योग जीवन में विलंब लाता है। बेहद मेहनत के बाद, कठिनाई से सफलता आती है। पिता-पुत्र में मतभेद हमेशा बना रहता है और एक दूसरे से दूर रहने के भी योग बनते हैं। सतत संघर्ष से ये व्यक्ति निराश हो जाते हैं, डिप्रेशन में भी आ हैं।
यदि शनि उच्च का हो व कारक हो तो 36वें वर्ष के बाद, अपनी दशा-महादशा में सफलता जरूर देता है। यह युति होने पर व्यक्ति को सतत परिश्रम के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए, पिता से मतभेद टालें, ज्ञानार्जन करें, आध्यात्मिक साधना से अपना मनोबल मजबूत करना चाहिए। सूर्य व शनि शांति के अन्य उपाय करने चाहिए|
सूर्य-शनि के अशुभ योग के लिए उपाय-
"शिव पञ्चाक्षरि" मंत्र को पढ़ते हुए भगवान शिव की पूजा करें, और शिवलिंग पर जलाभिषेक करें|
आदित्यह्रदय स्त्रोत का पाठ करें| और प्रतिदिन सुबह-सुबह सूर्य को तांबे के लोटे से जल चढ़ाएं|
शनिवार को तेल का दीपक जलाएं और पीपल की सात परिक्रमा करें|
एक मुखी रूद्राक्ष को लाल धागे में डालकर, रविवार के दिन गले में धारण करें, या पूजा स्थान में स्थापित करें, और पितरों की पूजा व तर्पण करें|
शनिवार के दिन गरीबों को कंबल, चप्पल और कपड़े का दान करें|
सूर्य और शनि दोनों के दोष को दूर करने के लिए हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करें|
सूर्य और शनि के मंत्र का जप करें, सूर्य मंत्र- ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नम:, शनि मंत्र- ऊँ शं श्नैश्चराय नम: का नित्य जाप करें|
बंदरो को चने और गुड़ खिलाना आपके लिए हितकारी रहेगा|
जरूरतमंद और नेत्रहीन लोगों को दान दें, और गाय की सेवा करें|
महा मृत्युंजय मंत्र को पढ़ते हुए भगवान शिव की पूजा करें, और शिवलिंग पर जलाभिषेक करें|
शनिवार के दिन जल में कच्चा दूध मिलाकर पीपल की जड़ में अर्पित करें|
रोज़ाना "शनि स्तोत्र" का पाठ करें, और असहाय लोगों की मदद करें|
हनुमान जी के मंदिर में बैठकर रामरक्षास्त्रोत्र का पाठ करें,
सात मुखी रुद्राक्ष धारण करें, और काले रंग की गाय की सेवा करें|
एक ताम्बे का छल्ला अनामिका अंगुली में धारण करें, और गले में लाल चन्दन की माला धारण करें,
रोज शाम को तुलसी के नीचे घी का दीपक जलाएं और "नमः शिवाय" का नियमित जप करें, ये उपाय करते रहने से सूर्य-शनि के दोष दूर हो जाते हैं।
अगर आपको हमारी ये सब जानकारी पसंद आए तो plz आप हमारे इस पेज को भी लाइक व फॉलो अवश्य करना।
https://www.facebook.com/neerajsml1976 my mo 9758007088 what's app
Astro Neeraj Goel ज्यो.परामर्श : स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार, धन लाभ, प्रेम विवाह, अरेंज विवाह, मकान, वाहन, विदेश यात्रा
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Contact the public figure
Telephone
Website
Address
Shamli