Advocate Akhand Mishra Ak
Legal Service/Law Education
29/08/2025
सर्वोच्च न्यायालय का अहम फैसला...
National Highways Authority of India - NHAI
24/08/2025
माननीय सर्वोच्च न्यायालय का स्वागत योग्य निर्णय..
इंसानों के कुकर्मों एवं उपेक्षाओं का शिकार हुए सामाजिक पशुओं का भी इस धरती पर रहने का उतना ही अधिकार है जितना एक इंसान का.. प्राथमिक तौर पर प्रत्येक राज्य की यह जिम्मेदारी है कि वह सामाजिक पशुओं का सही से व्यवस्थापन करते हुए उनकी निगरानी करें एवं इस हेतु सुरक्षात्मक प्रबंध करे एवं समाज के प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा करने हेतु प्रेरित करे।
24/08/2025
न्यायपालिका का लचीलापन एवं धीमी न्यायालीन प्रक्रिया का परिणाम... !
18/08/2025
अगर पुलिस एफआईआर दर्ज न करे, ऐसी स्थिति में क्या करें,
आइए जानते हैं..
BNSS Section 175(3)...
यदि पुलिस संज्ञेय अपराध पर भी एफआईआर दर्ज नहीं करती है तो आप सीधे सक्षम न्यायालय में आवेदन ( इस्तगासा) कर सकते हैं, जिस पर मजिस्ट्रेट (न्यायाधीश) आदेश दे सकता है कि एफआईआर दर्ज की जाए और मामले की जांच की जाए।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा है कि- शिकायतकर्ता को एफआईआर दर्ज कराने का पूरा अधिकार है यदि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना करती है तो वह सक्षम न्यायालय से इस हेतु प्रार्थना कर सकता है।
केस शीर्षक- ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
AIR 2012 (4 SCC 1)
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Adv Akhand✒️
12/08/2025
सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के लिए पहले सेशन कोर्ट में अर्जी देना अनिवार्य नहीं है। आवेदक चाहें तो सीधे हाईकोर्ट में भी अग्रिम जमानत के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।
केश शीर्षक - मंजीत सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (Criminal Appeal/ 11679/2025)
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Adv Akhand
02/08/2025
फौती नामांतरण...
क्या करें अगर कोई फौती नामांतरण में गलत सजरा (वंशवृक्ष) के आधार पर अवैध नामांतरण करवा लेता है...
✓नामांतरण आदेश की प्रमाणित नकल नकल-शाखा (तहसील/जिला) से निकलवायें।
✓नकल, खसरे, न्यायालय फीस चालान सहित अपील-आवेदन एसडीओ कोर्ट में करें।
✓एसडीओ (राजस्व) मामले की जांच उपरांत, वारिशों (बेटे/बेटी/पौत्र) का नाम खसरे में जोड़ने हेतु , संशोधित आदेश करेगा।
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✒️Compliation By- Adv Akhand Mishra
19/07/2025
1 जुलाई 2024 से तीन नए आपराधिक कानूनों को लागू हुए एक वर्ष की अवधि पूरी हो चुकी है...
आईए जानते हैं इन तीन नए आपराधिक कानूनों {भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) 2023, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA)} 2023, के लागू होने से क्या कुछ विशेष रूप से बदलाव हुआ है___
नये आपराधिक क़ानून लागू होने से क्या-क्या बदल गया ?
1. एफ़आईआर, जांच और सुनवाई के लिए अनिवार्य समय-सीमा तय की गई है. अब सुनवाई के 45 दिनों के भीतर फ़ैसला देना होगा, शिकायत के तीन दिन के भीतर एफ़आईआर दर्ज करनी होगी.
2. एफ़आईआर अपराध और अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम (सीसीटीएनएस) के माध्यम से दर्ज की जाएगी ये प्रोग्राम राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के तहत काम करता है.
3. सीसीटीएनएस में एक-एक बेहतर अपग्रेड किया गया है, जिससे लोग बिना पुलिस स्टेशन गए ऑनलाइन ही ई-एफआईआर दर्ज करा सकेंगे.
4. ज़ीरो एफ़आईआर किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज हो सकेगी चाहे अपराध उस थाने के अधिकार क्षेत्र में आता हो या नहीं.
5. पहले केवल 15 दिन की पुलिस रिमांड दी जा सकती थी. लेकिन अब 60 या 90 दिन तक दी जा सकती है. केस का ट्रायल शुरू होने से पहले इतनी लंबी पुलिस रिमांड को लेकर कई क़ानून के जानकार चिंता जता रहे हैं.
6. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को ख़तरे में डालने वाली हरकतों को एक नए अपराध की श्रेणी में डाला गया है. तकनीकी रूप से राजद्रोह को आईपीसी से हटा दिया गया है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने भी रोक लगा दी थी, यह नया प्रावधान जोड़ा गया है. इसमें किस तरह की सज़ा दी जा सकती है, इसकी विस्तृत परिभाषा दी गई है.
7. आतंकवादी कृत्य, जो पहले ग़ैर क़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम जैसे विशेष क़ानूनों का हिस्सा थे, इसे अब भारतीय न्याय संहिता में शामिल किया गया है.
8. इसी तरह, पॉकेटमारी जैसे छोटे संगठित अपराधों समेत संगठित अपराध में तीन साल की सज़ा का प्रवाधान है. इससे पहले राज्यों के पास इसे लेकर अलग-अलग क़ानून थे.
9. शादी का झूठा वादा करके सेक्स को विशेष रूप से अपराध के रूप में पेश किया गया है. इसके लिए 10 साल तक की सज़ा होगी.
10. व्याभिचार और धारा 377, जिसका इस्तेमाल समलैंगिक यौन संबंधों पर मुक़दमा चलाने के लिए किया जाता था, इसे अब हटा दिया गया है. कर्नाटक सरकार ने इस पर आपत्ति जताई है, उनका कहना है कि 377 को पूरी तरह हटाना सही नहीं है, क्योंकि इसका इस्तेमाल अप्राकृतिक सेक्स के अपराधों में किया जाता रहा है.
11. जांच-पड़ताल में अब फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने को अनिवार्य बनाया गया है.
12. सूचना प्रौद्योगिकी का अधिक उपयोग, जैसे खोज और बरामदगी की रिकॉर्डिंग, सभी पूछताछ और सुनवाई ऑनलाइन मोड में करना.
13. अब सिर्फ़ मौत की सज़ा पाए दोषी ही दया याचिका दाखिल कर सकते हैं पहले एनजीओ या सिविल सोसाइटी ग्रुप भी दोषियों की ओर से दया याचिका दायर कर देते थे.
उक्त तीन नए आपराधिक कानूनों में कुछ इस तरह के विशेष बदलाव किए गए हैं तथा कुछ नए उपबंधों को भी जोड़ा गया है।
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✒️Compliantion By - Adv Akhand
17/05/2023
CJI ने लॉन्च किया ‘ई-फाइलिंग 2.0’, चौबीसों घंटे उपलब्ध होगी सेवा____
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) डी वाई चंद्रचूड़ ने शुक्रवार को ‘ई-फाइलिंग 2.0’ लॉन्च किया और वकीलों से कहा कि इलेक्ट्रॉनिक रूप से मामले दर्ज करने की सुविधा अब चौबीसों घंटे उपलब्ध होगी।
देश भर में ई-अदालत और मामलों की ई-फाइलिंग की वकालत करने वाले मुख्य न्यायाधीश ने शीर्ष अदालत परिसर में एक ‘ई-सेवा केंद्र’ का भी उद्घाटन किया।
उन्होंने कहा, “हमने आज सुबह ‘ई-फाइलिंग 2.0’ का अनावरण किया है। ये सुविधाएं सभी वकीलों के लिए 24X7 उपलब्ध होंगी।” प्रौद्योगिकी से परिचित”।
सीजेआई ने शुक्रवार की कार्यवाही की शुरुआत में कहा, “मैं सभी वकीलों से ‘ई-फाइलिंग 2.0’ का उपयोग करने का अनुरोध करता हूं।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, जो कोर्ट रूम में मौजूद थे, और अन्य वकीलों ने इस कदम की सराहना की।
कानून अधिकारी ने कहा, “माई लॉर्ड्स की वजह से ही हम उस मानसिक अवरोध से छुटकारा पा सके।”
‘ई-सेवा केंद्र’ पर, CJI चंद्रचूड़ ने कहा, “ई-फाइलिंग सॉफ्टवेयर के माध्यम से न केवल मामले दर्ज करने के लिए ‘ई-सेवा केंद्र’ में चल सकते हैं, बल्कि किसी भी अदालत या न्यायाधिकरण से मामले की स्थिति जानने के लिए अन्य सेवाओं का लाभ उठा सकते हैं। देश भर में…”
ई-फाइलिंग मोड के माध्यम से शीर्ष अदालत और कई अन्य अदालतों में मामले दायर किए जा रहे हैं।
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Source - www.vidhiksiksha.com
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13/05/2023
¶पत्नी द्वारा ऐसे आरोप जो पति के प्रतिष्ठा को प्रभावित करते हैं, मानसिक क्रूरता के समान और तलाक मांगने का आधार:_____ सुप्रीम कोर्ट
भारत में शादी करने को चाहे जितना भी आसान बना दिया जाये लेकिन तलाक लेना उतना ही मुश्किल है तलाक अगर आपसी सहमति से हो जाये तो अच्छा है वरना ये प्रोसेस बहुत लम्बा होने वाला है। क्योकि जब मामला कोर्ट में पहुँचता है तो केस कितना लम्बा नहीं बता सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पत्नी द्वारा लगाए गए ऐसे आरोप,जो पति के करियर और प्रतिष्ठा को प्रभावित करते हैं,वह तलाक मांगने के लिए उसके खिलाफ की गई मानसिक क्रूरता के समान है।
न्यायमूर्ति *संजय किशन कौल*,न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी और न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की खंडपीठ ने कहा कि सहनशीलता का स्तर हर जोड़े में एक दूसरे से भिन्न होता है और अदालत को पक्षकारों की पृष्ठभूमि, शिक्षा के स्तर और स्टे्टस को भी ध्यान में रखना होगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या क्रूरता का आरोप विवाह के विघटन को सही ठहराने के लिए पर्याप्त है।
इस मामले में पति एक सेना अधिकारी है,जिसने अपनी तलाक की याचिका में आरोप लगाया था कि उसे अपनी पत्नी की तरफ से दायर कई दुर्भावनापूर्ण शिकायतों का सामना करना पड़ा है,जिन्होंने उसके कैरियर और प्रतिष्ठा को प्रभावित किया है और उसकी मानसिक क्रूरता हुई है। फैमिली कोर्ट ने उसके पक्ष में तलाक का फैसला दिया था परंतु हाईकोर्ट ने उसे फैसले को पलट दिया था। शीर्ष अदालत के समक्ष अपील में पति ने प्रस्तुत किया कि उसकी पत्नी ने उसके खिलाफ सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के समक्ष कई शिकायतें दायर की थी,जो चीफ आॅफ आर्मी स्टाॅफ से लेकर अन्य अधिकारियों के समक्ष दायर की गई थी। इन शिकायतों ने उसकी प्रतिष्ठा और मानसिक शांति को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।
पीठ ने कहा कि, ”मानसिक क्रूरता का आरोप लगाने वाले पति या पत्नी की मांग पर विवाह के विघटन पर विचार करते समय यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मानसिक क्रूरता इस तरह की होनी चाहिए,जिसके परिणामस्वरूप वैवाहिक संबंध को जारी रखना संभव ना रहे। दूसरे शब्दों में, व्यथित पक्ष से यह उम्मीद नहीं की जा सकती है कि इस तरह के आचरण को क्षमा कर दे और अपने जीवनसाथी के साथ रहना जारी रखे। सहनशीलता का स्तर हर जोड़े में एक दूसरे से भिन्न होता है और अदालत को पक्षकारों की पृष्ठभूमि, शिक्षा के स्तर और स्टे्टस को भी ध्यान में रखना होगा, ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि क्या क्रूरता का आरोप विवाह के विघटन को सही ठहराने के लिए पर्याप्त है।”
हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए, पीठ ने कहा कि, ”हमारा मानना है कि हाईकोर्ट ने इस टूटे हुए रिश्ते को मध्यम वर्ग के विवाहित जीवन के सामान्य झगड़े या परेशानी के रूप में वर्णित करने में गलती की थी। यह अपीलकर्ता के खिलाफ प्रतिवादी द्वारा निर्दयतापूर्वक क्रूरता करने का एक मामला है और इसलिए इस मामले में हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करने और फैमिली कोर्ट के आदेश को बहाल करने के लिए पर्याप्त स्पष्टीकरण पाए गए हैं।”
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¶केस टाइटल – जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार
¶केस नंबर – CA NOS. 3786-3787 ऑफ़ 2020
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Akhand Mishra Ak (Legal Knowledge)
30/04/2023
भारतीय दंड संहिता,1860 के अंतर्गत महिलाओं से संबंधित अपराध.. एक नजर में_____
आइए जानते हैं भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत महिलाओं के विरुद्ध कौन-कौन से अपराध दंडनीय हैं एवं भारतीय दंड संहिता 1860 में इन अपराधों के संबंध में क्या प्रावधान किए गए हैं__
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¶ धारा 304 (बी)- दहेज मृत्यु ( Dowry Death)
¶ धारा 312- गर्भपात कारित करना (Causing Miscarriage)
¶ धारा 313- स्त्री की सम्मति के बिना गर्भपात कारित करना
¶ धारा 314- गर्भपात कारित करने के आशय से किए गए कार्यों द्वारा कारित मृत्यु
¶ धारा 354- स्त्री की लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग
•354 (ए)- लैंगिक उत्पीड़न और लैंगिक उत्पीड़न के लिए दंड
•354 (बी)- विवस्त्र करने के आशय से स्त्री पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग
•354 (सी)- दृश्यरतिकता (Voyeurism)
•354 (डी)- पीछा करना ( Stalking)
¶ धारा 366- विवाह आदि के करने को विवश करने के लिए किसी स्त्री को व्यपहृत करना, अपहृत करना या उत्प्रेरित करना
• 366 (ए)- अप्राप्तवय लड़की का उपापन (Procuration Of Minor Girl)
•366 (बी)- विदेश से लड़की का आयात करना (Importation Of Girl From Foreign Country)
¶ धारा 372- वेश्यावृत्ति, आदि के प्रयोजन के लिए अप्राप्तवय को बेचना
¶ धारा 373- वेश्यावृत्ति, आदि के प्रयोजन के लिए अप्राप्तवय का खरीदना
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°°°°°°°यौन अपराध°°°°°°
¶ धारा 375- बलात्संग( R**e)
¶ धारा 376- बलात्संग के लिए दंड ( Punishment For R**e)
✓376 (ए)- पीड़िता की मृत्यु या लगातार विकृतशील दशा कार्य करने के लिए दंड
✓376 (एबी)- 12 वर्ष से कम आयु की स्त्री से बलात्संग के लिए दंड
✓376 (बी)- पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ पृथक्करण के दौरान मैथुन
✓376 (सी)- प्राधिकार में किसी व्यक्ति द्वारा मैथुन
✓ 376 (डी)- सामूहिक बलात्संग (Gang R**e)
✓376 (डीए)- 16 वर्ष से कम आयु की स्त्री से सामूहिक बलात्संग के लिए दंड
✓376 (डीबी)- 12 वर्ष से कम आयु की स्त्री से सामूहिक बलात्संग के लिए दंड
✓376 (E)- पुनरावृतिकर्ता अपराधियों के लिए दंड
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¶ धारा 498- विवाहिता स्त्री को आपराधिक आशय से फुसलाकर ले जाना, या ले जाना या निरूद्ध रखना
✓498 (ए)- किसी स्त्री के पति या पति के नातेदार द्वारा उसके प्रति क्रूरता करना।
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Compilation By- Akhand Mishra AK ✍️
Source:- Indian Penal Code, 1860
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