Extra knowledge lamp
Media/News/Education
15/08/2024
देवी पार्वती की एक मूर्ति, पाकुड़ झारखंड में, बांसलोई नदी के रेतीले तटों की खुदाई के दौरान, मिली थी। मूर्ति पूरी तरह से, सही हालत में है, और यह 7 शताब्दी, पाल और सेन युग की है। देवी अपने हाथों में, कमंडल, त्रिशूल, और एक शिव-लिंगम लिए हुए हैं, जबकि उनका निचला दाहिना हाथ, वरद मुद्रा में है, और देवी के चरणों के पास, उनके पुत्र गणेश, और कार्तिकेय की मूर्ति है। ग्रामीणों ने अनुरोध किया है कि, उन्हें देवी की मूर्ति रखने, और उनके लिए बनाए जाने वाले मंदिर में, पूजा करने की अनुमति दी जाए।
13/08/2024
हर हर महादेव
13/08/2024
चन्नकेशव मंदिर बेलूर, कर्नाटक के हासन जिले में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है। यह मंदिर होयसल वंश के राजा विष्णुवर्धन द्वारा 1117 ईस्वी में बनवाया गया था। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और दक्षिण भारतीय वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।
मंदिर की वास्तुकला और मूर्तिकला बहुत ही अद्वितीय और जटिल है। यहाँ की दीवारों पर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और महाकाव्यों से संबंधित उत्कृष्ट मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। मंदिर का मुख्य गर्भगृह, मण्डप और प्रवेश द्वार सभी अपनी अद्वितीय कलात्मकता के लिए प्रसिद्ध हैं।
चन्नकेशव मंदिर का निर्माण होयसल शैली में किया गया है, जिसमें नक्काशी और अलंकृत मूर्तियों का विशेष ध्यान रखा गया है। यहाँ के स्तंभ, छत और दीवारें सभी नक्काशीदार और सजावटी डिजाइनों से सुसज्जित हैं, जो इस मंदिर को कला का एक अद्वितीय नमूना बनाते हैं।
बेलूर के चन्नकेशव मंदिर में वार्षिक रथ यात्रा और कई धार्मिक त्योहार मनाए जाते हैं, जो बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं और पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। यह मंदिर न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय कला और स्थापत्य का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
चन्नकेशव मंदिर की वास्तुकला कई अद्वितीय और महत्वपूर्ण तत्वों से सुसज्जित है, जो इसे भारतीय स्थापत्य कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनाते हैं। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण तथ्य दिए जा रहे हैं:
1. चन्नकेशव मंदिर होयसल वंश की विशिष्ट वास्तुकला शैली का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें विस्तृत और जटिल नक्काशी, उच्च स्तरीय शिल्पकला, और अलंकृत मूर्तियाँ शामिल हैं।
2. मंदिर के शिखर (टॉवर) को 'तारिका मुखी' शैली में बनाया गया है, जो इसके भव्यता और सुंदरता को बढ़ाता है। शिखर पर बारीकी से नक्काशी की गई है, जिसमें पौराणिक और धार्मिक दृश्य उकेरे गए हैं।
3. मंदिर के भीतर के स्तंभों पर की गई नक्काशी अत्यंत विस्तृत और जटिल है। प्रत्येक स्तंभ को अलग-अलग डिजाइनों से सजाया गया है, जिसमें जीवंत चित्रण और जटिल पैटर्न शामिल हैं।
4. मंदिर की बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं, नर्तकों, संगीतकारों, और पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। यह मूर्तियाँ मंदिर की कहानी और धार्मिक महत्व को प्रकट करती हैं।
5. मंदिर का मुख्य गर्भगृह भगवान विष्णु को समर्पित है, जिसमें भगवान विष्णु की चन्नकेशव के रूप में प्रतिमा स्थापित है। यह प्रतिमा अत्यंत भव्य और विस्तृत है, जिसे देखने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है।
6. मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर सोपान (सीढ़ियाँ) और मण्डप (हॉल) बने हुए हैं। मण्डप में बड़ी संख्या में स्तंभ हैं, जिन पर उत्कृष्ट नक्काशी की गई है। यहाँ का नृत्य मंडप विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहाँ नर्तकियों की मूर्तियाँ और नृत्य के विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया है।
7. एक विशेष स्तंभ जिसे "नरसिंह स्तंभ" कहा जाता है, वह अपनी आधार से घुमाया जा सकता है। यह स्तंभ वास्तुकला और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में होयसल शिल्पकारों की अद्वितीय क्षमता को दर्शाता है।
8. मंदिर का संपूर्ण डिज़ाइन तारामंडल रूप में है, जिसमें 16 मुख्य बिंदु (कोनों) हैं। इस डिज़ाइन का उद्देश्य संरचना की स्थिरता और भव्यता को बढ़ाना था।
9. मंदिर के निर्माण में मुख्यतः साबुन के पत्थर (soapstone) का उपयोग किया गया है, जो आसानी से नक्काशी के लिए उपयुक्त है और समय के साथ मजबूत भी होता है।
चन्नकेशव मंदिर की वास्तुकला भारतीय शिल्पकला और वास्तुकला की एक अनमोल धरोहर है, जो इतिहास, कला और धर्म के अद्वितीय संगम को प्रदर्शित करती है।
13/08/2024
एक बेहतरीन जानकारी ..... स्वर्ग से आए हैं तीन फूल अपराजिता, पारिजात और #मधुकामिनी, जानिए मधुकामिनी क्या है?
मधुकामिनी के फूल गर्मियों में खिलते हैं। घर में अगर एक बार आपने कामिनी के फूल का पौधा लगा दिया तो ४-५ वर्ष या इससे अधिक समय तक फूल आते रहेंगे। सौंधी और मनमोहक खुशबू के कारण इसे अपने घर की बालकनी में लगाना बहुत ही आसान है।
मधुकामिनी प्लांट को सबसे अच्छे इनडोर और आउटडोर पौधों में से एक माना जाता है। वास्तु के अनुसार यह प्लांट घर-आंगन को खुशियों से भर सकता है।जरूरी बात यह है कि यह कम रखरखाव वाला पौधा है और इसमें सुगंधित फूलों के गुच्छे होते हैं जो सुंदर तितलियों और चिड़ियों को बहुत आकर्षित करते हैं।
मधुकामिनी फूल का वनस्पति नाम है मुराया पैनीकुलेटम। यह एक सफेद रंग का फूल है जो घर की सज्जा के साथ औषधि के लिए भी प्रयोग किया जाता है
खूशबूदार फूलों में से मधुकामिनी दिन रात महकने वाला प्लांट है। यह एक सदाबहार झाड़ीनुमा पौधा है जिसका आकार ५-१५ फिट तक होता है। नारंगी यानी संतरा जैसी सुगंध आने के कारण इसको ऑरेंज जैस्मीन नाम से भी जाना जाता है। इसके फूलों का रंग सफेद होता है!
इसके फूलों की मनभावन सुगंध मानसिक तनाव को दूर करने वाली होती है!
मान्यता है कि जो तीन फूल स्वर्ग से आए हैं उसमें अपराजिता, पारिजात के साथ तीसरा फूल मधुकामिनी ही है...
मधुकामिनी के लाभ
इसके मात्र २ पत्तों को उबाल कर पीने से श्वास रोग में बहुत ज्यादा लाभ होता है। गला साफ़ होता है।
इसके फूलों को बेडरूम में रखने से दाम्पत्य जीवन सुखी रहता है। ऐसा माना गया है।
मधुकामिनी की पत्तियां शुभकारी होती हैं इसीलिए विवाह मण्डपों में इसका प्रयोग होता है।
तमिल भाषा में इसे वेंगराए और तेलगु में नागागोलुंग , मराठी में कुंती तो मणिपुरी में कामिनी कुसुम कहा जाता है। कन्नड़ में काडु कारिबेयु तो मलयालम में
#मारामुला कहा जाता है।
04/08/2024
मानवी मेंदूचे वजन किती आहे?
मानवी मेंदूचे वजन प्रत्येक व्यक्तीनुसार बदलते. परंतु सरासरी ते अंदाजे तीन पौड(1.4 किलोग्रॅम ) असते.
03/08/2024
अणू प्रकल्पात इंधन भरले
राजस्थानातील रावतभाता येथील अणूऊर्जा प्रकल्पाच्या सात क्रमांकाच्या युनिटमध्ये आज पासून आण्विक इंधन भरण्याची प्रक्रिया सुरू झाली आहे हे देशातील तिसरे स्वदेशी बनावटीचे सातशे मेगावॅट क्षमतेचे आण्विक रिऍक्टर आहे.
02/08/2024
River Basin of India
02/08/2024
काजू के पौधे को घर में कैसे लगाए और कैसे ढेर सारे काजू पाये।
काजू का परिचय :- काजू एक प्रकार का पेंड है जिसका फल सूखे मेवे के लिए बहुत लोकप्रिय है। काजू का आयात-निर्यात एक बड़ा व्यापार भी है। काजू से कई प्रकार की मिठाइयाँ और अन्य चीजे बनायीं जाती हैं। काजू का पेंड तेजी से बढ़ने वाला पेंड है जो काजू और काजू का बीज पैदा करता है। काजू की उत्त्पति ब्राजील में हुई है। लेकिन आज काजू को दुनिया भर में उगाया जाता है। सामान्य तौर पर काजू का पेंड 13-14 मीटर तक होता है। हालाँकि काजू की बौनी कल्टीवर प्रजाति जो 6 मीटर की ऊंचाई तक होती है। जल्दी तैयार होने और ज्यादा उपज देने की वजह से बहुत फायदेमंद साबित हो रहा है।
सही पौधा :- आप जब भी काजू को अपने घर में लगाए तो हायब्रिड पौधा ही लगाए। यह घर के गमलों में आसानी से उग जाता है और कुछ ही समय के अंदर हमें इससे काजू प्राप्त होने लगते हैं।
मिटटी और जलवायु :- काजू को अपने पुरे भारतवर्ष में कही भी उगाया जा सकता है। जिन इलाको में तापमान 20 डिग्री सेल्शियस के ऊपर होता है वहा काजू की फसल बहुत अच्छी होती है। काजू को किसी भी प्रकार की मिटटी में उगाया जा सकता है। लेकिन अगर काजू को रेतीली लाल मिटटी में उगाया जाये तो बहुत अच्छे परिणाम मिल सकते हैं।
गमला :- काजू की जड़ें अधिक फैलती हैं। अतः जब भी काजू के पेंड को लगाए तो कम से कम 2 फ़ीट के गमले में ही लगाए। पौधा अच्छे से ग्रोथ कर पायेगा।
काजू लगाने का सही समय :- काजू को किसी भी मौसम में लगाया जा सकता है। लेकिन दक्षिण एशियाई क्षेत्र में जून से दिसम्बर तक का समय उत्तम माना जाता है।
खाद और उर्वरक :- काजू की फसल खाद डालने पर अच्छा परिणाम देती है। इसलिए पर्याप्त मात्रा में सही वक्त पर खाद और उर्वरक डालना बेहद जरुरी है। खाद के रूप में वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग कर सकते हैं।
काजू के स्वास्थ्य संबंधी फायदे
ह्रदय रोग से लड़ने में सक्षम
उच्च रक्तदाब को कम करने में
तंत्रिका तंत्र को मजबूत करने में
पित्त-पथरी को रोकने में
वजन को कम करने में
हड्डियों के लिए फायदेमंद
कोलोन, प्रोस्टेट और लिवर कैंसर को रोकने में सहायक
स्वस्थ दिमाक के स्वस्थ संचालन में सहायक
मधुमेह के खतरे को कम करता है।
त्वचा के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
एक पेड़ से कितनी उपज होती है?
आमतौर पर अगर पौधों की अच्छे से देखभाल की जाए तो काजू का एक पौधा लगभग 8 किलोग्राम प्रतिवर्ष की उपज देता है. यह इस बात पर भी निर्भर करेगा की पौधे की देखभाल अच्छे से हुई है या नहीं.
काजू के पौधों को लगाने के लिए एक महीने पहले ही गड्ढा तैयार करना चाहिए. इसके बाद अच्छे से गड्ढे की निकाई गुड़ाई करके उसमें छोटा गड्ढा करके काजू के पौधे लगा सकते हैं. बारिश के मौसम में इसके पौधे लगाने से इन्हें सिंचाई की जरुरत नहीं होती है और जल्दी ही पौधे तैयारहो जाते हैं.
प्रदेश में बस्तर और जशपुर जिले के पठार में काजू की खेती कई वर्षों से की जा रही है लेकिन इससे किसानों को उम्मीद के मुताबिक फायदा नहीं हो रहा है। काजू उत्पादक किसानों की आय बढ़ाने और कम रकबे में अधिक उत्पादन के लिए बस्तर कृषि महाविद्यालय के डीन एचसी नंदा और वैज्ञानिक डॉ विकास रामटेके अब काजू के हाइब्रिड पौधे तैयार करने में जुटे हुए हैं। प्रदेश में यह पहली बार है जब किसी कृषि महाविद्यालय में संचालित अखिल भारतीय काजू अनुसंधान परियोजना में हाईब्रिड पौधे तैयार किए जा रहे हैं। वैज्ञानिक रामटेके ने कहा कि इस पौधे से जो फल तैयार होगा उससे बीज तैयार किया जाएगा। इस काम में करीब पांच साल लग जाएंगे। इससे पहले बस्तर के कृषि वैज्ञानिक डॉ मंगल सिंह पैकरा, डॉ धनंजय शर्मा और डॉ केआर साहू ने सात साल की मेहनत के बाद इंदिरा काजू- 1 नाम का बीज तैयार किया था जो काजू के अन्य बीजों की तुलना में करीब डेढ़ गुना मोटा है। किसानों को प्रोत्साहित करते हुए इस साल 150 से ज्यादा किसानों को बीज दिया गया।
01/08/2024
Satwiksairaj Rankireddy and Chirag Shetty crash out of Paris Olympics 2024!
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Website
Address
At Post/Ambheri. Tal-khatav Dist-Satara
Satara
415527
02/08/2024