Mfa Story
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26/10/2024
योगेश ट्रेन की जनरल बोगी में बर्थ सीट पर सोया हुआ था | गाडी रूककर वापस चली तो अचानक उसकी नजर अपनी तलाकशुदा पत्नी रागिनी पर पडी | पता नहीं कब वह उसके सामने वाली सीट पर आकर बैठ गई थी | 6 साल बाद वह उसे देख रहा था | वह बहुत कमजोर हो गई थी | उसने पुरानी
सस्ती सी साडी पहन रखी थी | ना माथे पर बिंदी और ना गले में मंगलसूत्र था | तो क्या उसने अभी तक दूसरा विवाह नहीं किया | क्या अभी तक वह मेरी तरह अकेली ही है | योगेश ऐसा सोच ही रहा था कि तभी रागिनी की नजर उस पर पडीनजरे मिली तो योगेश दूसरी तरफ देखने लगा | फिर पता नहीं
योगेश के दिमाग में क्या आया कि वह सीट से नीचे उतर आया और रागिनी के पास बैठे लडके से कहा कि वह ऊपर वाली सीट पर चला जाये | लडका मान गया तब योगेश रागिनी के पास बैठ गया | बैठते ही योगेश बोला " रागिनी
कैसी हो ?"
रागिनी ने नजर न मिलाते हुए खिडकी की तरफ देखते हुए बोला कि " मैं ठीक हूँ और आप? "
योगेश बोला मैं भी ठीक हूँ और कानपुर जा रहा हूँ |त्यौहार होने के कारण रिजर्वेशन सीट नहीं मिली | इस कारण जनरल बोगी में आना पडा | तुम कहां जा रही हो ? वह बोली मैं भी कानपुर ही जा रही हूँ | आजकल माँ वही बडे भईया के पास ही है | बीमार है इसलिए मिलने जा रही हूँ | काफी देर दोनों चुप रहे |
फिर योगेश बोला " एक बात पूछूँ ?" रागिनी ने आँखों से ही पूछा क्या? योगेश संकोच करते हुए पूछा " अभी तक शादी क्यों नहीं की ?
वह कुछ नहीं बोली | मगर जब योगेश ने दोबारा नहीं पूछा तो रागिनी ने पूछा " आपने की है शादी " योगेश ने भी बिना बोले ना में गर्दन हिला दी | फिर काफी देर तक दोनों चुप रहे | मानो एक दूसरे को परख रहे थे |
डिब्बे में कुल्फी बेचने वाला आ गया था | योगेश बोला खाओगी रागिनी ने ना में सिर हिला दिया. योगेश ने रिक्वेस्ट करते हुए फिर पूछा " खा लो यार , तुम्हारे
साथ मैं भी खा लूंगा " | जानता हूँ तुम्हारी सबसे बडी
कमजोरी कुल्फी है | वह थोडा मुस्कुराई तो योगेश ने महसूस किया कि वह अपनी आँखों से बहने वाली आंसुओं को समेटने का प्रयास कर रही है | 5 साल उसके साथ रहा था ,जब वह अपने आँसुओं को समेटने का प्रयास करती थी तो ऐसे ही मुस्कुराया करती थी | योगेश दूसरी तरफ देखने
लगा तो रागिनी चुपके से अपनी आँसुओ को पोछने लगी |
फिर वह सहज होकर बोली " एक शर्त पर खाउंगी "योगेश बोला क्या शर्त है ? तो रागिनी बोली " पैसे मैं दूंगी " योगेश कुछ नहीं बोला फिर रागिनी ने दो कुल्फियां खरीद ली और एक कुल्फी योगेश को देते हुए बोली " अब मैं भी कमाने लगी हूँ , एक प्राइवेट स्कूल में पढाती हूँ , महीने के 10 हजार मिलते हैं | कुल्फी खाते हुए योगेश बोला " तलाक के समय
कोर्ट के आदेश पर मैं तुम्हें 30 लाख रूपये दे तो रहा था। अगर ले लेती तो अपना स्कूल खोल लेती | जबकि तुम बहुत स्वाभिमानी हो , इस जमाने में पैसे के बिना कुछ नहीं होता | वह हंस कर बोली अगर ले लेती तो अपनी जमीर को क्या जवाब देती | तो ये जमीर रोज कहता कि जिसे छोड कर
आयी हो उसी के सहारे पल रही हो | योगेश बोला तुम बहुत अच्छी हो , मासूम हो | ये एहसास तुमसे तलाक लेने के बाद मुझे हुआ | तुम यकीन नहीं करोगी? मैं बहुत बदल गया हूँ | पीना बिल्कुल छोड दिया है , गुस्सा बिल्कुल नहीं करता | अब मैं किसी को नीचा दिखाने की कोशिश भी नहीं करता जो तुम्हें बहुत बुरा लगता था | वो सब बुरी आदतें मैने छोड दी है | वह उदास होकर बोली " अब क्या फायदा " जब मैं मना किया करती थी तब आप मेरी एक भी बात नहीं सुनते थे | आपके कारण मैं हमेशा टेंशन में रहती थी | इसी कारण मुझे दो बार गर्भपात भी हुआ | वरना आज मेरे भी दो बच्चे होते | एक 8 साल का हो गया होता और दूसरा 6 साल का होता | कहकर
वो रो पडी | बच्चों की बात पता चली तो योगेश के भी आंखों में आँसों आ गये लेकिन वह पुरूष था तो आँसुओं को पलकों तक पहुँचने से पहले ही पी गया और बोला " कभी कभी लगता है मैं बहुत बुरा आदमी हूँ | मैने कभी रिश्तों की कदर नहीं की , उसी की सजा झेल रहा हूँ आज | बिल्कुल अकेला हो गया हूँ , अब मां भी नहीं रही | "
मां के होने पर रागिनी को बडा दुख हुआ और बोली मां को भली चंगी छोड कर आयी थी , उनको क्या हो गया था | इस बार योगेश भावुकता वश अपने आँसुओं को नहीं रोक पाया
और बोला वो तुम्हें हर दिन याद करती थी , बोलती थी बहु को वापस घर ले आओ | मैं उन्हें कैसे समझाता कि तलाक के बाद बहुएं वापस घर नहीं आती | फिर दोनों के बीच चुप्पी छा गई थी | कानपुर आ गया था |स्टेशन आने वाला था | योगेश बोला वापस कब जाओगी? रागिनी बोली आज रात यही रूकूंगी , कल की सुबह की ट्रेन से वापस जाउंगी | फिर वही खडी हो गई ,योगेश भी खडा हो गया और पूछा" कितने बजे वाली ट्रेन से वापस जाओगी "
रागिनी बोली हम गरीब लोग हैं ,रिजर्वेशन नहीं करा पता हैं , जनरल डिब्बे में सफर करते हैं | इसलिए जो भी ट्रेन मिलती है टिकट लेकर चढ जाते हैं | इतना कहकर वह नीचे उतर गई | योगेश अपना सूटकेस सम्हालता हुआ उसके पीछे लपका और बोला अगर मैं रिजर्वेशन की दो टिकटें ले लूं तो मुझे पता है कि तुम मेरे साथ नहीं चलोगी लेकिन मैं तुम्हारे साथ सफर करना चाहता हूँ | जनरल में ही चल लूंगा , बताओ कितने बजे
यहां मिलोगी ? रागिनी आटो में बैठती हुई बोली " 9 बजे यहां मिलूंगी " फिर उसके देखते देखते आटो आँखों से ओझल हो गया | योगेश कानपुर दो दिन के लिए आया था मगर रागिनी का
साथ पाने के लिए उसने अपना शेड्यूल बदल लिया | उसने जल्दी से अपने बिजनेस का काम पूरा किया और अगले दिन सुबह साढे 8 बजे ही स्टेशन आ गया | रागिनी 9 की जगह
10 बजे स्टेशन पहुँची | और बोली आप अभी तक यहीं पर , मैं सोच रही थी कि आप चले गये होंगे |
रागिनी बहुत खुश थी | बोली मां अब बिल्कुल ठीक है | योगेश बोला मैं तुम्हारा भी टिकट ले आया हूँ | अब 30 रूपये के टिकट के लिए कुछ कहना मत | रागिनी हंसते हुए बोली अभी ट्रेन आने में आधा घंटा है , चलो तब तक कुल्फी खाते हैं | पैसे मैं दे दूंगी , हिसाब बराबर हो जायेगा | इतना कहकर
वह फिर मुस्कुरा दी | वह जब भी मुस्कुराती थी योगेश की नजर उसके चेहरे पर ठहर जाती थी | फिर दोनों ने कुल्फी खायी और तब तक ट्रेन आ गयी और फिर से एक नया सफर
शुरु हो गया मगर इस सफर में कुछ खास था | योगेश कुछ कहने के लिए तिलमिला रहा था | मगर डर भी रहा था कि वह मना करा देगी तो | योगेश नोटिस कर रहा था कि रागिनी बडे भाई के घर से नई साडी पहन कर आई थी |वह बहुत सुन्दर लग रही
थी | खिडकी से आ रही ठंडी हवा के झोंके से रागिनी के ललाट पर लटकी बालों की एक लडी झूम उठती है | उसे ऐसे देखकर योगेश के दिल में एहसास सा उठता है कि ये औरत कभी उसकी जिन्दगी थी मगर मैं इसे सम्हाल कर नहीं रख
पाया | योगेश की मन:स्थिति से अनजान रागिनी बोली " क्या हुआ आप गुमशुम से क्यों हो ?" | दोस्त बन कर ही सही कुछ बात तो कर लो | योगेश बोला मुझे दोस्ती नहीं चाहिए | रागिनी को झटका सा लगा , बोली " फिर क्यों मेरे साथ सफर करने के लिए उतावले थे आप" योगेश बोला "मुझे तू चाहिए "
| हमेशा के लिए | जन्मों जन्मों के लिए | मेरे साथ हंसने के लिए , मेरे साथ रोने के लिए | वह इतनी जल्दी में ये सारी बातें बोला कि रागिनी बस उसके मुंह की ओर देखती रह गई | वह आगे बोला " मैं गलत था , तुम्हारी कदर नहीं कर पाया " |
मगर तुम्हारे जाने के बाद मुझे मेरे गलतियों का एहसास हो गया है | मुझे माफ कर दो " कहकर वह रो पडा | रागिनी चुप हो गई , बस उसके चेहरे की तरफ देखे जा रही थी | योगेश
उसके दोनों हाथ पकड कर बोला " मुझे माफ कर दे यार | मैं वादा करता हूँ अब कभी भी तुम्हारे आंसुओं की वजह नहीं बनूंगा | तू जो कहेगी वही करूंगा , प्लीज लौट आ | " रागिनी ने माथे पर साडी थोडी सी पीछे सरकाई और बोली इधर देखिये जरा |" योगेश ने देखा रागिनी ने मांग भर रखी थी | वह बोली मैं जानती थी आप यही सब करोगे | मैंने कल ही सोच
लिया था कि अब अकेले चलने के दिन खत्म हो गये हैं | मेरा हमसफर लौट आया है | अब आगे का सफर उसी के साथ तय करना है | थक गई हूँ मैं अकेले चलते चलते | कहते हुए वह अजीब सी मुद्रा में मुस्कुराने लगी | योगेश बोला , मैं
जानता हूँ जब तेरा दिल रोने को होता है तब तू ऐसे ही मुस्कुराती है | मत रोक इन आंसुओं को , इन्हें बह जाने दो | दिल हल्का हो जायेगा | इतना सुनते ही रागिनी का संयम जवाब दे गया | वह जोर जोर से रोने लगी , पूरे डिब्बे के लोग
उन्हें देखने लगे | मगर रागिनी ने लोगों की परवाह नहीं की | वह योगेश के कंधे पर सर रखकर रोती रही | कुछ देर बाद रागिनी का गांव आ गया | गाडी कुछ पल रूकी फिर चल पडी | रागिनी को अब वहां उतरना ही नहीं था | जिन्दगी में एक नया सफर फिर से शुरू हो गया | अब उसकी मंजिल मायका
नहीं पिया का घर था | जो वर्षों से उसके उसके लौटने का इन्तजार कर रहा था | वह अब भी योगेश के कंधे पर सर रखी थी | आंखें बंद कर मंद मंद मुस्कुरा रही थी , एक मासूम बच्चे की तरह |
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एक स्कूल के प्रिंसिपल एक बड़ी मीट की दुकान में घुसे और काउंटर पर बैठे लड़के से कहा कि मुझे दो किलो मीट दे दो।
वहां लड़के ने कहा हां सर आप बैठिए और एक कप चाय भी दी और अपने कर्मचारियों से दो किलो अच्छा मीट बनाने को कहा.
गोश्त को बैग में डालने के बाद कर्मचारियों ने खुद जाकर गाड़ी में रख दिया.
जब प्रिंसिपल ने पैसे देने चाहे तो लड़के ने बड़ी अज़ीज़ि से मना कर दिया और कहा कि आप तो हमारे टीचर हैं सर
जब प्रिंसिपल ने पूछा बेटा तुमने मेरी इतनी खिदमत की और मीट के पैसे भी नहीं लिए, क्या तुम मुझे जानते हो?
तो इस लड़के ने कहा आप मेरे टीचर हैं.
क्या आपको याद है 10-12 साल पहले जब मे आपके स्कूल मे पड़ता था जब मैंने क्लास मे एक में गलती की थी, आपने कहा था कि जब तक आप अपने वालिद को अपने साथ नहीं लाओगे तब तक आप क्लास में प्रवेश नहीं कर सकते, इसलिए मैं स्कूल से भाग गया था और एक कसाई के यहाँ काम पे लग गया
उसके बाद मेने काम सीख कर तरक़्क़ी करता गया और आज मेरे पास शहर मे 4 दुकानें, 2 घर, 1 फार्म हाउस और 3 लगज़री गाड़िया हैं
अगर आप मुझे उस दिन स्कूल से न भगाते तो मे भी आज कही 15-20 हजार की नौकरी कर रहा होता या रेजयुम हाथ मे लेकर ऑफिस ऑफिस घूम रहा होता
इतना सुनकर प्रिंसिपल साहब ज़ारो क़तार रोने लगे और बोले की काश मे भी उस दिन तेरे साथ स्कूल छोड़ कर भाग आया होता
एक पुरानी कहानी है कि एक धोबी के पास एक गधा था जिसे वो कपड़े लादकर लाने ले जाने के लिए इस्तेमाल करता था। एक बार धोबी कपड़े धोने के लिए नदी किनारे आया। गधे की पीठ से कपड़े उतारते वक़्त उसे याद आया कि जिस रस्सी से वो गधे को पेड़ से बांध देता था, वो आज उस रस्सी को लाना भूल गया है। धोबी बड़ी चिंता में पड़ गया। वो इस चिंता में घुला ही जा रहा था कि क्या अब फिर से उसे इतनी दूर जाकर रस्सी लानी होगी क्योंकि नहीं तो मेरे कपड़े धोने जाते ही ये गधा तो कहीं रपक (निकल) लेगा। वो ये सब सोच ही रहा था कि उधर से एक आदमी गुज़रा जो काफ़ी पढ़ा-लिखा और समझदार दिखता था। धोबी ने अपनी दास्तां उस आदमी से कह डाली और उससे किसी सलाह की आशा करने लगा। उस आदमी ने धोबी की पूरी बात इत्मीनान से सुनी और उससे कहा कि रस्सी लाने की कोई ज़रूरत नहीं है बस जब रस्सी होने पर तुम जिस प्रकार अपने गधे को बांधते आए हो ठीक उसी प्रकार का अभिनय करो। काल्पनिक रस्सी से उसे बांध दो। धोबी ने ठीक वैसा ही किया और बिल्कुल वैसे ही अपने गधे को थपथपाया जैसे वो रस्सी मजबूती से बांधने के बाद थपथपाया करता था।
धोबी कपड़े धोता जाता और बीच-बीच में दूर बंधे अपने गधे को देखकर आश्चर्यचकित होता जाता कि ये काल्पनिक रस्सी तो ख़ूब काम कर रही है। कई बार अनायास उसके मुंह से ठहाके भी निकल जाते।
सारे कपड़े धोने के बाद उसने वो कपड़े गधे पर लाद दिए और फिर उसने गधे को ठहाके लगाते हुए कुछ यूं हांका कि 'तू तो सच में गधा है जो रस्सी थी ही नहीं उससे बंधा पड़ा रहा' लेकिन उसके ठहाके तुरंत रुक गए जब गधा आगे बढ़ने को तैयार ही नहीं हुआ। धोबी के बहुत हांकने के बाद भी गधा एक पैर भी आगे बढ़ाने के लिए तैयार नहीं था। धोबी घबरा गया, घबराकर उसने इधर-उधर देखा और पाया कि पेड़ की छांव में बैठकर वही समझदार और काफ़ी पढ़ा-लिखा आदमी मुस्कुरा रहा है। वो आदमी भी ये सब तमाशा देखने के लिये बैठ गया था हालांकि वो पढ़ा-लिखा था लेकिन अक्सर वो कहीं भी तमाशे देखने रुक जाया करता था। उस आदमी ने कहा कि तुम शायद भूल गए हो कि तुम्हारा गधा बंधा है, उसे ठीक उसी प्रकार खोलो जिस प्रकार रोज़ खोलते आए हो। धोबी एक बार फिर से आश्चर्यचकित हुआ और उसने ठीक उसी प्रकार अपने गधे को खोला जिस प्रकार वो रोज़ उसकी रस्सी खोला करता था और फिर से उसे थपथपाया करता था। ऐसा करते ही गधा अपने रास्ते चल दिया।
सीख :---
यहां गधे की जगह हम अपने आप को रखकर देख सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि हम तमाम तरह के काल्पनिक पाशों (बंधनों) में बंधे हों और हम ये बात जानते ही न हों।
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गरीब किसान के खेत में बिना बोये लौकी की बेल उग आई बेल बड़ी होने पर उसमे तीन लौकियाँ लगी। उसने सोचा, उन्हें बाजार में बेचकर घर के लिए कुछ सामान ले आएगा. अतः वो तीन लौकियाँ लेकर गाँव के बाजार में गया और बेचने के यत्न से एक किनारे बैठ गया।
गांव के प्रधान आये, पूछा , " लौकी कितने की है?"
" मालिक, दस रुपये की। " उसने दीनता से कहा। लौकी बड़ी थी। प्रधान ने एक लौकी उठा ली और ये कहकर चलता बना," बाद में ले लेना। "
इसी प्रकार थाने का मुंशी आया और दूसरी लौकी लेकर चलता बना। किसान बेचारा पछता कर रह गया। अब एक लौकी बची थी। भगवन से प्रार्थना कर रहा था कि ये तो बिक जाये, ताकि कुछ और नहीं तो बच्चों के लिए पतासे और लइया ही लेता जायेगा।
तभी उधर से दरोगा साहब गुज़रे। नज़र इकलौती लौकी पर पड़ी देखकर कडककर पूछा , " कितने की दी ?"
किसान डर गया। अब यह लौकी भी गई। सहमकर बोला ," मालिक, दो तो चली गयीं , इसको आप ले जाओ। "
" क्या मतलब ?" दरोगा ने पूछा, " साफ़ - साफ़ बताओ ?"
किसान पहले घबराया, फिर डरते - डरते सारा वाक़्या बयान कर दिया। दरोगा जी हँसे। वो किसान को लेकर प्रधान के घर पहुंचे। प्रधान जी मूछों पर ताव देते हुए बैठे थे और पास में उनकी पत्नी बैठी लौकी छील रही थी। दरोगा ने पूछा,' लौकी कहाँ से लाये ?"
प्रधान जी चारपाई से उठकर खड़े हो गए , " बाजार से खरीदकर लाया हूँ। "
"कितने की ?"
प्रधान चुप। नज़र किसान की तरफ उठ गयी। दरोगा जी समझ गए। आदेश दिया," चुपचाप किसान को 100 रुपये दो नहीं तो चोरी के इलज़ाम में बंद कर दूंगा। " काफी हील-हुज्जत हुई पर दरोगा जी अपनी बात पर अड़े रहे और किसान को सौ रुपये दिलाकर ही माने।
फिर किसान को लेकर थाने पहुंचे। सभी सिपाहियों और हवलदारों को किसान के सामने खड़ा कर दिया। पूछा," इनमे से कौन है ?" किसान ने मुंशी की तरफ डरते-डरते ऊँगली उठा दी। दरोगा गरजा ," शर्म नहीं आती ? वर्दी की इज़्ज़त नीलाम करते हो। सरकार तुम्हे तनख्वाह देती है , बेचारा किसान कहाँ से लेकर आएगा। चलो, चुपचाप किसान को सौ रुपये निकलकर दो। " मुंशी को भी जेब ढीली करनी पड़ी।
अब तक किसान बहुत डर गया था। सोच रहा था, दरोगा जी अब सारे पैसे उससे छीन लेंगे। वह जाने के लिए खड़ा हुआ। तभी दरोगा ने हुड़का," जाता कहाँ है ? अभी तीसरी लौकी की कीमत कहाँ मिली ? " उन्होंने जेब से पर्स निकाला और सौ रुपये उसमे से पकड़ाते हुए बोले , " अब जा , और आईन्दा से तेरे साथ कोई नाइंसाफी करे तो मेरे पास चले आना। "
किसान दरोगा को लाख दुआएं देता हुआ घर लौट आया, लेकिन सोचता रहा , ये किस ज़माने का दरोगा हैं।
एक गॉव में माधव नाम का एक व्यापारी रहता था। उसका एक बेटा भोला था। माधव का बादाम, काजू बेचने का व्यापार था।
माधव की सेहत कुछ ठीक नहीं रहती थी। इसलिये वह अपने काजू बादाम शहर में बेचने नहीं जा पाता था।
एक दिन माधव उदास बैठा था। भोला बाहर खेल कर घर आया तो उसने अपने पिता से पूछा –
भोला: क्या बात है बापू तुम कुछ उदास बैठे हो?
माधव: क्या बताउं बेट ये बादाम और काजू लेकर शहर जाना चाहता हूं लेकिन बीमारी के कारण इतना कमजोर हो गया हूं, कि हिम्मत ही नहीं है कहीं जाने की।
भोला: तो क्या हुआ बापू मुझे बताओं में इन्हें शहर में बेच आता हूं।
माधव: नहीं बेटा तू अभी बहुत छोटा है और शहर में बहुत से ठग घूमते रहते हैं तेरे जैसे बच्चे को देखेंगे तो वह सारा माल और पैसा लूट लेंगे।
भोला: बापू मेरा केवल नाम भोला है। आप एक बार आजमा कर तो देखो, मैं ये सारे काजू, बदाम बेच भी दूंगा और आपसे अच्छे दामों पर बेचूंगा।
भोला की मॉं: नहीं नहीं छोटे से बच्चे को शहर नहीं भेज सकते। आप कहो मैं चली जाती हूं। लेकिन मैंने तो गॉव के बाहर का रास्ता भी नहीं देखा।
भोला: मॉं तुम्हें याद है मैं एक बार बापू के साथ शहर गया था। मुझे रास्ता अच्छे से याद है। मुझे जाने दो।
भोला बहुत देर तक जिद करता रहा। आखिर माधव उसे शहर भेजने के लिये तैयार हो गया।
माधव: बेटा शहर जा तो रहा है। लेकिन मेरी तीन बातें याद रखना। तुझे कोई लूट नहीं सकेगा।
पहली बात: अपनी मॉं से चार रोटी ले जाना जब भी भूख लगे तब तीन बार ये बात बोलना उसके बाद खाना वह बात है -‘‘एक खाउं, दो खाउं, तीन खाउं या चारों को खा जाउं।
दूसरी बात: जब तू रात को किसी धर्मशाला में विश्राम करने के लिये रुके तो जो भी कमरा ले उसकी सांकल (कुण्डी) अन्दर से लगा कर देख लेना। अगर सांकल ठीक से न लगे तो अगली धर्मशाला में चले जाना।
तीसरी बात: जब भी किसी दुकान पर काजू बदाम दिखाये और वो कीमत कम करने को बोले तो ऐसे बोलियो – ‘‘बापू से पूछ कर आता हूं’’ यह कहकर वहां से चल दियो। अगर दुकानदार रोके तो ठीक नहीं तो दूसरी दुकान पर चले जाना।
भोला ने सारी बातें ध्यान से सुनी और चार रोटी और एक प्याज लेकर एक पोटली में मेवा भर कर शहर पहुंच जाता है।
शहर पहुंचते पहुंचते उसे शाम हो जाती है।
तभी उसके पीछे चार बदमाश लग जाते हैं। भोला इस सब से बेखबर एक अंधेरी गली से जाने लगता है।
पहला बदमाश: यह मौका अच्छा है इसे इस गली में पकड़ कर लूट लेते हैं जरूर इसकी पोटली में कीमती सामान होगा।
तीनो उसकी हां में हां मिलाते हैं। वे धीरे धीरे भोला की ओर बढ़ने लगते हैं। इधर भोला को भूख लगती है वह एक जगह बैठ जाता है, और खाने की पोटली खोल लेता है – एक खाउं, दो खाउं, तीन खाउं या चारों को खाजाउं।
भोला की पीठ के पीछे कुछ दूर खड़े चारों बदमाश यह बात सुन लेते हैं।
भोला तीन बार तेज आवाज में यह बात बोलता है।
यह सुनकर चारों वहां से भाग जाते हैं। भोला बैखबर अपना खाना खा रहा था।
कुछ दूर जाकर दूसरा बदमाश बोलता है: अबे मरवा दिया था वो लड़का नहीं भूत था। हम चारों को खाने की बात कर रहा था, अच्छा हुआ भाग आये।
खाना खाकर भोला एक धर्मशाला में पहुंचता है। धर्मशाला का मालिक शातिर चोर था। वह भोला को कमरा दिखाता है। भोला देखता है कमरे में सांकल नहीं है मतलब वह अंदर से बंद नहीं होगा।
धर्मशाला का मालिक: बच्चे ये कमरा सबसे अच्छा है और इससे भी अच्छी बात है यह मुफ्त है। इसका कोई किराया नहीं है।
भोला: मुझे ऐसा कमरा चाहिये जिसमें सांकल हो।
धर्मशाला का मालिक समझ जाता है कि यह बच्चा समझ गया कि रात को सोने के बाद कोई भी इसका माल चुरा लेगा। वह कहता है –
मालिक: आगे बहुत सी धर्मशाला हैं। बहुत महंगी हैं यहां मुफ्त में मिल रही है तो नखरे कर रहा है। चल भाग यहां से।
भोला आगे एक धर्मशाला में कमरे की सांकल बंद करके देख लेता है और कमरा लेकर चैन से सो जाता है।
अगले दिन वह अपनी पोटली लेकर एक दुकान पर जाता है।
दुकानदार: तुम्हारे काजू बदाम अच्छे नहीं हैं। जितने पैसे तुम मांग रहे हो मैं तो उसके आधे दूंगा।
भोला: रुको पिताजी से पूछ कर आता हूं। वह उठ कर चल देता है।
दुकानदार: अरे मैं तो समझ रहा था ये तो अकेला है इसके साथ इसका बाप भी है। सही दाम में दे रहा है खरीद लेता हूं। कहीं किसी और दुकानदार को माल न दे दे। सुनो लड़के सारे काजू, बादाम तौल दो और पैसे ले लो।
भोला सारा माल बेच कर पैसे लेकर अपने घर आ जाता है।
शिक्षा: बड़ों की सीख को बिना कारण पूछे मान लेना चाहिये।
आपको यह कहानी कैसी लगी कमेंट में जरूर बताएं।
यह कहानी सुनकर सुनकर आपको सोचने पर मजबूर कर देगी✍️
एक गांव में रामदयाल नाम का बूढ़ा व्यक्ति रहता था, जो बहुत कमजोर हो चुका था। उसकी नजर कमजोर हो गई थी, और वह चलने-फिरने में भी असमर्थ था। अपनी बची कुची जिंदगी अपने बेटे रवि के साथ बिताने की चाहत में, वह शहर में रवि के घर रहने चला गया।
रवि एक छोटे से मकान में रहता था, जिसमें उसकी पत्नी सीमा और उनका 5 साल का बेटा आयुष भी रहते थे। रामदयाल के आने से उनके परिवार में एक सदस्य और बढ़ गया।
यह परिवार रोज सुबह और शाम डाइनिंग टेबल पर साथ में खाना खाया करता था। लेकिन रामदयाल की कमजोरी के चलते वह अक्सर खाने की चीजें नीचे गिरा देता, और कभी-कभी कांच के बर्तन भी टूट जाते थे। कुछ दिनों तक रवि और सीमा ने यह सब सहन किया, लेकिन फिर वे चिढ़ने लगे।
एक दिन रवि ने सीमा से कहा, "ऐसा कब तक चलेगा? हमें कुछ करना पड़ेगा।" सीमा भी इस बात से सहमत हो गई। अगले दिन रवि कहीं से एक पुरानी मेज लेकर आया और घर के एक कोने में रख दिया। उसने रामदयाल से कहा, "पिताजी, आप यहीं बैठकर खाना खा लिया करें।" उन्होंने रामदयाल के लिए लकड़ी का बर्तन भी बनवा दिया, ताकि उनके कांच के बर्तन सुरक्षित रहें।
अब रामदयाल एक कोने में बैठकर अकेले खाना खाने लगे, जबकि बाकी परिवार डाइनिंग टेबल पर खाता था। डाइनिंग टेबल पर बैठे रवि और सीमा कभी-कभी रामदयाल की ओर देखते, उनकी आंखों में आंसू नजर आते, लेकिन उन पर कोई असर नहीं होता।
एक दिन जब रवि और सीमा डाइनिंग टेबल पर खाना खा रहे थे, उनका बेटा आयुष जमीन पर बैठकर कुछ कर रहा था। उन्होंने देखा कि आयुष के हाथ में लकड़ी का टुकड़ा है, लेकिन वे समझ नहीं पाए कि वह क्या कर रहा है।
रवि ने पूछा, "बेटा, आओ खाना खा लो। तुम नीचे बैठकर क्या कर रहे हो?"
आयुष ने मासूमियत से जवाब दिया, "अरे मम्मी-पापा, मैं आप दोनों के लिए लकड़ी का बर्तन बना रहा हूं, ताकि जब आप बूढ़े हो जाओ, तो मैं आपको इसमें खाना दे सकूं।"
आयुष की बात सुनकर रवि और सीमा के दिलों में तीर की तरह उतर गई। दोनों की आंखों में पानी आ गया, और उन्हें अपने भविष्य की एक झलक मिल गई। उन्होंने अगले ही दिन कोने से वह पुरानी मेज हटा दी, और अब रामदयाल फिर से परिवार के साथ मिलकर खाना खाने लगे। उनकी गलतियों से अब किसी को कोई परेशानी नहीं होती थी।
सीख :-
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में हर कोई बूढ़ा होगा, और हमें अपने बड़े-बुजुर्गों का सम्मान और ख्याल रखना चाहिए। जैसा हम अपने लिए चाहते हैं, वैसा ही हमें दूसरों के साथ भी व्यवहार करना चाहिए।
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धन्यवाद
एक 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला रात को 11 बजे अपने 83 वर्षीय बुजुर्ग पति के साथ बेडरूम में लेटी हुई थी। तभी उन्हें खिड़की से कुछ हलचल दिखी! उन्होंने अपने पति से कहा: "सुनो, मैंने अभी-अभी खिड़की से बाहर देखा और मुझे लगा कि गैरेज की लाइट जल रही है! क्या आप जाकर गैरेज की लाइट बंद कर देंगे?"बुज़ुर्ग बड़ी मुश्किल से बिस्तर से उठे, दरवाज़ा खोला और बाहर आए। उन्होंने देखा कि 5–6 चोर उनके गैरेज का दरवाज़ा तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं! बुजुर्ग ने बिना चोरों को भनक लगे, वहीं से करीबी थाने को फोन किया: "देखो, मेरा पता लिखो, हम घर पर केवल दो बुजुर्ग हैं! अभी 5–6 चोरों ने मेरे गैरेज पर हमला किया है और गैरेज का दरवाज़ा तोड़ रहे हैं! जल्दी से जल्दी हमारी मदद के लिए एक पुलिस टीम भेजें।"दूसरी तरफ से आवाज आई: "हमने पता लिख दिया है! आप चिंता न करें! लेकिन अभी हमारी कोई टीम फ़्री नहीं है, जैसे ही किसी टीम से हमारा संपर्क हो जाता है, मैं उन्हें आपके घर भेज दूंगा!"ये सुनकर वो बुजुर्ग मानो खून का घूंट पीकर रह गए! तकरीबन 10 मिनट बाद, उन बुजुर्ग ने फिर से पुलिस स्टेशन फोन किया! "सुनो, अब किसी को भेजने की जरूरत नहीं है, मैंने उन सभी 5–6 चोरों को अपनी सुरक्षा के लिहाज से गोली मार दी है!"
बुजुर्ग का फ़ोन आते ही अफरातफरी मच गई! पांच मिनट के भीतर पुलिस की एक टीम, एक हेलीकॉप्टर, एक पैरामेडिक, तीन डॉक्टर और दो एंबुलेंस के साथ वहां पर पहुँच गई! सब कार्यवाही होने के बाद में पुलिस टीम का प्रभारी बड़े बुजुर्ग के पास पहुँचा और बोला: "आपने तो कहा था कि आपने उन चोरों को गोली मार दी है! लेकिन हमने तो उन्हें ज़िंदा गिरफ़्तार किया है?" बुजुर्ग ने जवाब दिया, "और आपने भी तो कहा था कि अभी आपकी कोई टीम फ्री नहीं है!"
"दोस्तों इस कहानी के लिए एक लाइक तो बनता है!"👍
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