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#श्री_नवदुर्गा_धाम_सरायतरीन�
#जय_श्री_महाकाल�

27/03/2023

🙏जय भोले नाथ 🙏
🙏जय श्री महाकाल 🙏

आप सभी भक्तों से अनुरोध है कि ज्यादा से ज्यादा संख्या में आकर धर्मलाभ उठाएं।🙏🙏
जय भोले नाथ 🙏

27/03/2023

नवरात्रि का छठा दिन, माता का छठा स्वरूप:-"माँ कात्यायनी"
कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवें रूप है। यह अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हैमावती, इस्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं। शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं। यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थी, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया। वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतांजलि के महाभाष्य में किया गया है, जिसे दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में लिखी गयी थी। उनका वर्णन देवी-भागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे ४०० से ५०० ईसा में लिपिबद्ध किया गया था। बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका-पुराण (१०वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है।
परंपरागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं। नवरात्रि उत्सव के षष्ठी में उनकी पूजा की जाती है। उस दिन साधक का मन 'आज्ञा' चक्र में स्थित होता है। योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है। परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं।
माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे। उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए। इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे। इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी। उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें। माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली।
कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया। महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की। इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं।
ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं। आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था।
माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं। भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी। ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है। इनकी चार भुजाएँ हैं। माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है। बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।
माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है। वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है।
नवरात्रि का छठा दिन माँ कात्यायनी की उपासना का दिन होता है। इनके पूजन से अद्भुत शक्ति का संचार होता है व दुश्मनों का संहार करने में ये सक्षम बनाती हैं। इनका ध्यान गोधुली बेला में करना होता है। प्रत्येक सर्वसाधारण के लिए आराधना योग्य यह श्लोक सरल और स्पष्ट है। माँ जगदम्बे की भक्ति पाने के लिए इसे कंठस्थ कर नवरात्रि में छठे दिन इसका जाप करना चाहिए।

'या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:॥

अर्थ : हे माँ ! सर्वत्र विराजमान और शक्ति -रूपिणी प्रसिद्ध अम्बे, आपको मेरा बार-बार प्रणाम है। या मैं आपको बारंबार प्रणाम करता हूँ।
इसके अतिरिक्त जिन कन्याओ के विवाह मे विलम्ब हो रहा हो, उन्हें इस दिन माँ कात्यायनी की उपासना अवश्य करनी चाहिए, जिससे उन्हे मनोवान्छित वर की प्राप्ति होती है। विवाह के लिये कात्यायनी मन्त्र-

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि !
नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:।

माँ को जो सच्चे मन से याद करता है उसके रोग, शोक, संताप, भय आदि सर्वथा विनष्ट हो जाते हैं। जन्म-जन्मांतर के पापों को विनष्ट करने के लिए माँ की शरणागत होकर उनकी पूजा-उपासना के लिए तत्पर होना चाहिए।
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"जय माता दी"

25/03/2023

🚩🌷🐚🔱|| नवरात्र ||🔱🐚🌷🚩
🥀🌷🔱|| चौथा दिन ||🔱🌷🥀
माँ दुर्गा नौ रुपों में से चौथा रूप है,माँ कूष्माण्डा का।
नवरात्र के चौथे दिन माँ कूष्माण्डा की पूजा की जाती है।
🌺🌹|| स्तुति मंत्र ||🌺🌹 या देवी सर्वभूतेषु माँ कूष्माण्डा रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
🐚🌹🌺🔱|| माँ कूष्माण्डा ||🔱🌹🌺🐚
माँ कूष्माण्डा अपनी मन्द मुस्कान से अण्ड अर्थात ब्रह्माण्ड को उत्पन्न
करने के कारण इन्हें माँ कूष्माण्डा के नाम से जाना जाता है।

संस्कृत भाषा में "कूष्माण्डा", "कूम्हडे" को कहा जाता है,"कूम्हडे" की बलि इन्हें प्रिय है।
इस कारण भी इन्हें माँ कूष्माण्डा के नाम से जाना
जाता है।

माँ कूष्मांडा का नाम का अर्थ है, वह देवी जिनके उदर में त्रिविध
तापयुक्त संसार स्थित है, वह "कूष्माण्डा" माँ है।

माँ कूष्माण्डा इस चराचार जगत की अधिष्ठात्री है।
जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था

माँ कूष्मांडा जिनका मुखमंड सैकड़ों सूर्य की प्रभा से प्रदिप्त है, उस
समय प्रकट हुई उनके मुख पर बिखरी मुस्कुराहट से सृष्टि की पलकें झपकनी
शुरू हो गयी है।

और जिस प्रकार फूल में अण्ड का जन्म होता है उसी प्रकार कुसुम अर्थात फूल
के समान मां की हंसी से सृष्टि में ब्रह्मण्ड का जन्म हुआ है।

माँ कूष्मांडा का निवास सूर्यमण्डल के मध्य में है।
यह सूर्य मंडल को अपने संकेत से नियंत्रित रखती है।

माँ कूष्मांडा अष्टभुजा से युक्त हैं ,अत: इन्हें देवी अष्टभुजा के नाम से भी जाना जाता है।

माँ अपने इन हाथों में क्रमश: कमण्डलु, धनुष, बाण,कमल का फूल,अमृत से
भरा कलश,चक्र तथा गदा है।

माँ के आठवें हाथ में बिजरंके (कमल फूल का बीज) का माला है
यह माला भक्तों को सभी प्रकार की ऋद्धि सिद्धि देने वाला है।

माँ कूष्मांडा अपने प्रिय वाहन सिंह पर सवार रहती है। जो भक्त श्रद्धा पूर्वक माँ कूष्मांडा की उपासना करता है।
उसके सभीप्रकार के कष्ट रोग,शोक का अंत होता है। और आयु एवं यश की प्राप्ति होतीहै।
वह भक्त सभी प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है,और माँ का अनुग्रह प्राप्त करता है। एवं अन्य प्रकार की सभी बाधा दूर हो जाती है।
भोग:-
माता को मालपुए का भोग लगाएं।
लाल वस्त्र,लाल फूल,लाल चूड़ी चढ़ाये।
लाभ:-
बुद्धि का विकास होता है एवं निर्णय करने की शक्ति में वृद्धि होती है।

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