Surya Vision
बाबू, हमहन आदिवासी हइला
पिछले दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक अहम फैसले में घोषणा की कि भारत का आदिवासी वर्ग ही भारत का मूल निवासी है। सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश के आलोक में आदिवासी जनजाति समाज को पूरे भारत में मान्यता मिलनी चाहिए न कि किसी राज्या या जिला या क्षेत्र विशेष में। जब किसी ब्राम्हण या राजपूत या अन्य किसी जाति को राज्य, जिला या क्षेत्र के सीमा से परे पूरे देश में मान्यता मिलती है तो आदिवासी के साथ ऐसा भेदभाव क्यों? इसी तरह अगर किसी ने डाक्टरी या इंजिनीयरिंग की डिग्री या उपाधि हासिल कर ली है तो यह डिग्री पूरे विश्व में मान्य है न कि किसी एक देश, राज्य या क्षेत्र में। आदिवासियों के साथ ऐसा भेदभाव समान मानव अधिकार के संदर्भ में भी प्रश्न खड़ा करता है।
जब हम झारखण्ड, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र मे आदिवासी का पहचान पाते है तो दिल्ली आकर हमारा आदिवासी पहचान क्यों छिन जाता है। झारखण्ड, उड़ीसा या छत्तीसगढ़ का आदिवासी व्यक्ति दिल्ली पहुंचकर गैर आदिवासी कैसे बन जाता है?
इस विषय पर एवं आदिवासियों के पहचान तथा विकास से संबधित विभिन्न विषयों पर विस्तृत चर्चा
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