JBKSS ARMY
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अगर पढ़े-लिखे युवा राजनीति से दूर रहेंगे, तो फैसले अनपढ़ लोग ही करेंगे।
राजनीति खाली जगह नहीं छोड़ती अगर अच्छे लोग नहीं आएंगे, तो गलत लोग जगह ले लेंगे।
जादूगोड़ा का दर्द सिर्फ एक इलाके की कहानी नहीं, बल्कि विकास के नाम पर झेली जा रही पीड़ा की सच्चाई है।
झारखंड के जादूगोड़ा में जहां एक ओर यूरेनियम खनन से देश को ऊर्जा मिलती है, वहीं दूसरी ओर वहां के आदिवासी और स्थानीय लोग गंभीर बीमारियों, विकलांगता और प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। मासूम बच्चे जन्म से ही शारीरिक और मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं, और कई परिवार अपनी जमीन, अपना स्वास्थ्य और अपना भविष्य खो चुके हैं।
रेडियोधर्मी कचरे का असर पानी, मिट्टी और हवा तक पहुंच चुका है। लेकिन सवाल यह है कि क्या विकास का मतलब लोगों की जिंदगी से समझौता करना है?
आज जरूरत है कि जादूगोड़ा के लोगों को न्याय मिले, सुरक्षित जीवन मिले और उनकी आवाज़ सुनी जाए।
विकास तभी सार्थक है, जब उसमें इंसान और इंसानियत दोनों सुरक्षित हों।
गर्मी दस्तक देने को है, और सबसे बड़ी चुनौती पानी की होने वाली है।
झारखंड के अधिकतर गांवों और मोहल्लों में चापानल खराब पड़े हैं,
लेकिन जिम्मेदार विभाग अब भी खामोश है।
जब तापमान बढ़ेगा, तब लोगों की परेशानी भी बढ़ेगी । क्या प्रशासन तब जागेगा, जब हालात बिगड़ जाएंगे?
👉 अभी से मरम्मत और पानी की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है,
ताकि आम जनता को पानी के लिए भटकना न पड़े।
मेहनत करने के बाद भी जल सहिया को मिलते हैं मात्र ₹2000,
वहीं “मंईयां” को घर बैठे ₹2500 हर महीने!
क्या यही है मेहनतकश महिलाओं के साथ न्याय?
जो जमीन पर काम कर रही हैं, उन्हें ही नजरअंदाज किया जा रहा है।
👉 सरकार को तुरंत जल सहिया के मानदेय में वृद्धि करनी चाहिए।
👉 मेहनत का सम्मान होना चाहिए, न कि उपेक्षा।
सभी सरकारी अधिकारियों को सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने की आवश्यकता है, ताकि जनता की समस्याओं की जानकारी तुरंत मिल सके और उनका शीघ्र समाधान किया जा सके।
कहाँ है झारखंड का स्थानीय नीति ? कहाँ है झारखंडियों की पहचान 1932 का खतियान ?
आज यह एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है कि पुलिस अधिकारी, जो कभी समाज में साहस, ईमानदारी और न्याय के प्रतीक माने जाते थे, वे आज के युवाओं के आदर्श क्यों नहीं बन पा रहे हैं। जब व्यवस्था में पारदर्शिता, संवेदनशीलता और निष्पक्षता की कमी दिखाई देती है, तो युवाओं का विश्वास भी कमजोर पड़ता है। जरूरत है कि पुलिस व्यवस्था अपने आचरण, ईमानदारी और जनता के प्रति जिम्मेदारी से फिर से वही भरोसा कायम करे, ताकि आने वाली पीढ़ी उन्हें गर्व के साथ अपना आदर्श मान सके।
झारखंड में पुलिस के 23,645 पद वर्षों से रिक्त पड़े हैं, लेकिन इन पदों के लिए राज्य के हजारों युवा लगातार मेहनत कर रहे हैं।
कोई सुबह-सुबह मैदान में दौड़ लगा रहा है, कोई रात-रात भर पढ़ाई कर रहा है, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उन्हें अपने राज्य की सेवा करने का मौका मिलेगा।
लेकिन भर्ती प्रक्रिया में लगातार हो रही देरी से युवाओं के सपने और उम्मीदें दोनों प्रभावित हो रही हैं।
सरकार को चाहिए कि जल्द से जल्द इन रिक्त पदों पर बहाली की प्रक्रिया शुरू करे, ताकि मेहनत कर रहे युवाओं को न्याय मिल सके।
जब विधानसभा अध्यक्ष के आदेशों का ही समय पर पालन नहीं हो रहा है, तो सोचिए आम विधायक की बातों का क्या हाल होगा?
यह स्थिति बताती है कि प्रशासनिक व्यवस्था में जवाबदेही और अनुशासन की कमी है। अगर लोकतांत्रिक संस्थाओं के आदेशों को ही गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तो जनता की आवाज़ और जनप्रतिनिधियों की भूमिका कमजोर पड़ जाएगी।
राज्य सरकार 109 वर्तमान और पूर्व विधायकों को 20-20 डिसमिल जमीन देने की तैयारी कर रही है।
इस फैसले का विरोध डुमरी विधायक श्री ने किया है। उनका कहना है कि विधायक पहले से सक्षम होते हैं, इसलिए उन्हें सरकारी जमीन देने के बजाय सरकार को जनता के हित और उनकी जरूरतों पर ध्यान देना चाहिए।
बात जमीन अधिग्रहण की है, बात विस्थापितों के हक की है।
विकास के नाम पर अन्याय स्वीकार नहीं।
बिजली की समस्या हो तो उपभोक्ता कहां जाए?
अगर ट्रांसफार्मर जल जाए तो ग्रामीण किसके पास जाए?
आज हालात यह है कि लोग बिजली विभाग के चक्कर लगाते रहते हैं, लेकिन समाधान के बजाय उन्हें इधर से उधर घुमाया जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर जलने के बाद कई-कई दिन तक बिजली बहाल नहीं होती।
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