Sukant Ranjan
We, AIM TEAM, are trying our best to bridge the gap of standards between our locality, Ramnagar and
12/10/2024
रावण कुछ और नहीं, हमारा अहंकार है। राम कुछ और नहीं, हमारी आत्मा हैं। आत्मा सदैव अहंकार पर विजय पाती है। आत्मा के हारने का कोई जुगत ही नहीं क्योंकि वही सत्य है और सत्य सदैव अजेय होता है। अहंकार झूठ है और झूठ सदैव पराजित होता है।
परंतु, मानव ही अहंकार को, झूठ को चुनता है और अपनी हार सुनिश्चित करता है। यही मानव की मूलभूत समस्या है। विजयादशमी हमें प्रेरित करता है कि हमारे अंदर का आत्माराम रावण-रूपी अहंकार पर विजय पाये और मुक्त हो जाये। यह तब ही संभव है जब हम अपनी शक्ति को भोग की ओर ना लगाकर त्याग एवं कल्याण की ओर लगाए। 9 तिथियों की माता की पूजा हमें त्याग ही सिखाती है, शुद्धि ही लाती है ताकि दसवें दिन हमारा पराक्रम इतना बलवती हो कि हम अपने ही अहंकार पर विजय पाये।
विजयादशमी की शुभकामनाएं। 🙏🏿
12/05/2024
मातृ दिवस की सबको शुभकामनाएं। एक पुरानी कविता फिर से साझा कर रहा हूँ। 🙏
याद नहीं वे पल मुझे...
आज जब मैं पिता बन चुका हूँ... आज जब मेरे जिगर का टुकड़ा मेरे हाथों में है... आज जब मैं देख पा रहा हूँ कि मेरे बेटे का जीवन उसकी माँ से कितनी गहराई से जुड़ा हुआ है, एक कल्पना मेरे मन को अनायास ही घेरने लगी है कि कभी मैं भी तो अपनी माँ के इतना ही करीब था कि उनके होने पर ही मेरा भी होना था...
वे पल तो कोई याद नहीं कर सकता, मगर माता या पिता बनने के बाद एहसास कर सकता है...
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जब तन तेरा मेरा डेरा था,
मन तेरा मेरा घेरा था,
उर में तेरे था मैं ही समाया,
माँ, जब मैं पूरा का पूरा तेरा था।
तेरी साँसे मेरी हो चली थी,
मेरी किलकारी तेरी धड़कन बनी थी।
मेरी रातें बनी थी तेरी रातें,
मेरा सवेरा तेरा सवेरा बना था।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जो तेरे लहू से मेरा लहू बना था,
तेरे तन से था मेरा भोजन,
तेरी गोद में मुझको जो नींद पड़ा था,
मेरा पूरा होना जब तुझसे ही जुड़ा था।
मैं कमजोर सा तेरी गोद में पड़ा था,
तेरी आँचल की छाँव में पला था,
मेरी आँखों में तब चमक तो होगी माँ,
तेरे चेहरे का जब तस्वीर बना था।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
जो मेरी एक छींक पर जब तू दौड़े आती,
घर सर पर उठाती, तू इतना घबराती,
मेरे तन को लगे जो, तू वही थी खाती।
तेरी अपनी पसंद, तेरा अपना स्वाद,
बस मेरे वास्ते, तूने सब थी भूला दी।
मेरी छीछी-सुसु पे तेरा कहना,
आराम से कर ले, तुझे जितना करना।
तू अपनी माँ के पास है,
कैसी शर्म और कैसा डरना।
उठकर मैंने बैठना सीखा,
चलना सीखा, दौड़ना सीखा,
हाथ-पाँव फेंक-फेंक कर,
खेलना-कूदना सीखा।
माँ! याद नहीं वे पल मुझे...
मेरे कोमल जीवन को,
जब तेरा सहारा मिला था।
तिनका सा बहा था,
तेरा किनारा मिला था।
जीवन दिया, जीवंतता दी,
जिगर दिया, जीवटता दी,
जीवन का हर सुर, हर ताल मिला,
मुझे तेरा पूरा संसार मिला।
तेरा पूरा-पूरा प्यार मिला।
माँ, मैं तेरा टुकड़ा, मैं तेरा प्राण,
मेरे रोम-रोम को तूने लाड़ा था,
मेरे रूप में, माँ तूने ही तो
एक नया जीवन धारा था।
मैं जो भी लिखूँ तेरे बारे में माँ,
मेरा लिखा तो सब तेरा है।
गर, तूने मुझे लिखा न होता,
इस दुनिया में कहाँ कुछ मेरा होता।
पर, धीरे-धीरे मैं तुझसे कुछ अलग होने लगता हूँ...
धीरे-धीरे मुझमें पूरा परिवार समाता है,
धीरे-धीरे मुझमें समाज भी आता-जाता है,
धीरे-धीरे समय मेरा दरवाजा खटखटाता है,
और, धीरे-धीरे तेरा साया सरकते जाता है।
धीरे-धीरे मुझे भी दुनिया की चाहत सताती है,
धीरे-धीरे मेरे अंदर वो अपना घर बनाती है।
धीरे-धीरे माँ तू पीछे हटते जाती है,
तू माँ है, तू तनिक भी न मुझपर जोर चलाती है।
धीरे-धीरे मैं तुझसे अलग कुछ और बनता जाता हूँ
तेरा ही तो टुकड़ा था, ये बिसराते जाता हूँ।
भूली तो तू कुछ न होगी, याद तुझे सब आता होगा,
मुझको ख़ुद से अलग देखना तुझे बड़ा तड़पाता होगा।
आज मुझमें तेरा जो बचा है,
उसे बचाना है माँ मुझको।
तेरी कोमलता, वो तेरा प्रेम,
उस गहन भाव में डूब जाना है मुझको।
मैं भी तुझसा कुछ जी पाऊँ,
उस प्रेम में पूरा हो जाऊँ,
त्याग मेरा धर्म बनें,
यज्ञ सा जीवन बनें।
हे प्रभु! तेरा जगत ये सुंदर कहाया है,
जो माँ-सा तन और माँ-सा हृदय-मन तूने बनाया है।
तृष्णा (तृ) जहाँ तिरोहित (मा) हो जाती है,
वो पूर्ण कृति मातृ कहलाती है।
शब्दार्थ:
बिसरना: भूलना। तिरोहित: ओझल हो जाना।
माँ ।Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Emotional poem। मां के लिए कविता माँ ।Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Emotional poem। मां के लिए कविताLatest PoemLatest Poem in HindiPoem in Hindi 2023 poem #मां के लिए क...
14/04/2024
बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती (अर्थात आज) की पूर्व संध्या पर मुझे पश्चिमांचल हिंदी प्रचार समिति की ओर से अपना वक्तव्य रखने का अवसर मिला। ये वक्तव्य लिखित था जो आप सबके साथ साझा करता हूँ। जरूर पढ़ें। कुछ आवश्यक विचार-बिंदु संविष्ट हैं।
माननीय मुख्य अतिथि वीर नर्मद विश्विद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ रमेश कोठारी जी, पश्चिमांचल हिंदी प्रचार समिति अध्यक्ष डॉ माणिक मृगेश जी, मंच संचालिका तथा समिति उपाध्यक्षा डॉ मीरा सक्सेना जी एवं सभी गणमान्य साहित्य जनों को मेरा प्रणाम।
बाबासाहेब डॉ भीमराव अंबेडकर जयंती के अवसर पर मैं जो अपना वक्तव्य रखने जा रहा हूँ, इसका उद्देश्य वही है जो मैं मानता हूँ कि बाबासाहेब के जीवन का भी एक प्रमुख उद्देश्य था- हिन्दू समाज को जातिगत असमानता से मुक्त कराना।
बात जब भी आती है असमानता की, तो हम कई आधारों पर असमानता की बात करते हैं। जाति, पंथ, नस्ल, रंग, लिंग आदि। इन आधारों पर भेदभाव को सामान्यतः हम नकारते हैं, विशेषकर तब जब इन आधारों पर कमजोरों के शोषण की व्यवस्थाएं बनाई जाती है। ऐसे समाज में कोई न कोई वर्ग या समूह अक्सर कमजोर होता ही है। ये बड़ा ही स्वाभाविक है। अतः ये मैं बहुत स्पष्ट कर दूँ कि समस्या किसी का कमजोर होना नहीं है। समस्या तब उत्पन्न हो जाती है जब कोई ऐसी सामाजिक, आर्थिक या राजनीतिक व्यवस्था बन जाती है जो कमजोरों को उन साधनों से वंचित करने लगता है जो उन्हें पुनः सशक्त बना सकता है। कमजोरों को सशक्तिकरण के साधनों से वंचित करने वाली ऐसी शोषण की व्यवस्थायें ही वास्तविक समस्या है। ऐसी व्यवस्थाएं शोषक वर्ग को थोड़े समय के लिए तो अच्छी लगती हैं, परंतु पूरे समाज अथवा संस्कृति अथवा राष्ट्र पर ये कभी न कभी बहुत भारी पड़ती हैं।
भारत में जाति के नाम पर ऐसी व्यवस्था सदियों तक चलायी गई और आज भी सामाजिक स्तर पर इसका प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है। जाति के नाम पर हमने ये खेल खेला कि अपने ही लोगों को शिक्षा जैसे सशक्तिकरण के सबसे बड़े साधन से सदियों तक वंचित रखा। उनके पिछड़ेपन को ध्यान में रखते हुए उन्हें उचित अवसर न दिया। शोषक वर्ग को ये उनके लिए उचित लगा और आज भी ये मानसिकता जिंदा है। परंतु, उसका ये घोर परिणाम हुआ कि हमने राष्ट्र के रूप में, एक सभ्यता के रूप में अपनी स्वतंत्रता ही गँवा दी और फिर हमने भारत के इतिहास के सबसे काले दिन देखे, भयंकर त्रासदी देखी। मुगलों, अंग्रेजों एवं अन्य आक्रमणकारियों के हाथों हमने अपना लगभग सबकुछ ही गँवा दिया। मुगलों ने तो सीधे-सीधे हमें सांस्कृतिक आघात पहुँचाया। पर, अंग्रेजों ने तो हमारे साथ वही खेल खेला जो हम अपने लोगों के साथ खेल रहे थे। उन्होंने हमारे पूरे समाज को ही, जिसमें पूर्व शोषक-वर्ग भी शामिल था, शिक्षा एवं उचित अवसर से वंचित कर दिया और पूरे भारतीय समाज को ही इस धरा का सबसे पिछड़ा समाज बना दिया। इंडियन होने का अर्थ ही पूरी दुनिया में पिछड़ा होना हो गया। इसमें वो तथाकथित बड़ी जातियाँ भी थी। या कहे कि बड़ी जातियों का ही ये विशेष रूप से उपहास था। आपस में ही खुद को अगड़ा और अपने ही किसी दूसरे को पिछड़ा बताते-बताते खुद ही पूरी दुनिया में हम पिछड़ गए। ये कोई समझदारी नहीं हुई। अतः हमें ये ध्यान रखना होगा यदि परिवार के अन्दर ही कोई शोषण की व्यवस्था हम बनायेंगे तो इसका परिणाम यही होगा कि पूरा परिवार ही कमजोर हो जायेगा और फिर हम स्वयं किसी और के शोषण के लिए उपलब्ध रहेंगे। यही भारत के साथ हुआ और ये आगे भी हो सकता है।
अंत में मैं चिंतन के लिए एक विषय छोड़ जाता हूँ क्योंकि समय की सीमा है। शोषण की व्यवस्था का आधार है- भेदबुद्धि, अनावश्यक असमानता का भाव। और, भेदबुद्धि का कारण है अहंकार। अहंकार का अर्थ है - मैं; मैं का भाव। ये मैं ही है जो किसी भी तुच्छ आधार पर स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की जुगत में लगा रहता है। जाति, पंथ, नस्ल, रंग, लिंग आदि श्रेष्ठता का आधार नहीं है। यहाँ तक कि स्वार्थ के पराभूत होकर किये गए तुच्छ कर्मों के आधार पर भी श्रेष्ठता का उन्माद भरना गलत है। श्रेष्ठता का एक ही आधार है- वो है त्याग; वो भी छोटा-मोटा त्याग नहीं; अहंकार का त्याग।
ईद के अवसर पर कुछ शायरी। जरूर आनंद लें। 🙏🏿
जिंदगी मुख़्तसर यूँ ही न बीत जाये
कि माया तू जाये नहीं, और राम तू आये नहीं।
मेरे खयालों में तू अपनी मौसिक़ी जोड़ दे,
शायद कुछ इसे सुनें और जंजीर तोड़ दें।
गम की इंतहा हो जाये, मसर्रत मुस्तक़िल न आये,
बस जिस ओर सदाएँ आएँ, हम उस ओर ही रवाँ हो जाएं।
सुकांत 'नित्य'
14/02/2024
वसंत में पूरी प्रकृति नवीन हो जाती है। ठीक वैसे ही शिक्षा से ही जीवन को नया रास्ता दिखता है। बहुत ही गहन संबंध है वसंत और माँ शारदा की पूजा का। जैसे वसंत में पेड़ों में नए पत्ते लगते हैं, जो उनके जीवन का आधार बनता है। वैसे ही शिक्षा ही मानव जीवन का आधार है।
वसंत पंचमी की सबको शुभकामनाएं।
पढ़ते रहिये... ज्ञान बढ़ाते रहिये... जीवन में नयापन लाते रहिये... माता का आशीर्वाद पाते रहिये... 🙏
शीर्षक: आहुति…
कब मिट्टी कुंदन हुआ बताना,
दुःसह अनल में जो जला नहीं।
सौंदर्य कहाँ कब निखरा है,
जो तन धूप-ताप में गला नहीं।
उस हीरे की कीमत ही क्या
जो धरणी के तपिश में पला नहीं।
समाज उन्हें नायक न बनाता,
जो विपत्ति में आगे-आगे चला नहीं।
सम्मान उसी का होता है
जो वचन, धर्म से डिगा नहीं।
मान क्या हो उस दुर्बल का,
जो कथनी-करनी पर टिका नहीं।
उस शिक्षा का महत्व ही क्या
जिसमें जीवन जीने की कला नहीं।
उस ज्ञान को लेकर कोई क्या ही करे
जिससे हुआ किसीका भला नहीं।
मित्रों में उसका मोल ही क्या,
जो संकट में संग कभी चला नहीं।
उस प्रेमी का भी नाम नहीं
जो प्रेयसी के रंग में ढला नहीं।
उस दया, उदारता से क्या है करना
जिसमें धन, शक्ति या ज्ञान नहीं
वो शुभचिंतक किस गिनती का हो,
जिसकी कोई पहचान नहीं।
बाजार भी जीत वही आते हैं,
जो पुरुषार्थ से अपना मोल बढ़ाते हैं।
जो पत्थर घीसे न जाते हैं,
दो कौड़ी में बिक जाते हैं।
उनकी आँसुओ की क्या कीमत
जिनके आँखों में भयानक रोष नहीं।
वो क्रोध नहीं स्वीकार्य जगत को,
जिसमें अधम के उद्ध्वंस का उद्घोष नहीं।
मुक्ति भी उसे कहाँ मिलती है
जिसने दर्प के सर्प का मर्दन किया नहीं।
कौन हुआ अमृत के लायक
गरल को जिसने पिया नहीं।
एक चिंगारी में जैसे राख छुपा है
सूखे पर्णों में प्रखर आग छुपा है,
कुछ वैसा ही दावानल ये दुनिया है,
कण-कण में रण का दुर्बोध राग छुपा है।
चुनातियों से भिड़ जाने की
रखो इच्छाशक्ति उत्कट
दारुण दहन में दग्ध हुए बिन,
न चमक निकले तलवार विकट।
आहुति कर्मों की यहाँ सन्मार्ग समझना,
जो आहूत हो जाये उसे भगवान-सा अरचना।
सुलभ, सरल-प्राप्य को कभी विजय न कहना,
काल पर चोट कर ख़ुद को गहरा गढ़ना।
क्योंकि काल ही उसे त्यज देता है
जो काल से सीधे भिड़ा नहीं।
कालोचित जिसने कीमत न दी हो,
इस भव सागर में तिरा नहीं।
अब अंतिम बात...
धरा पे कभी वो जिया नहीं,
जिसने मृत्यु का सामना किया नहीं।
उनका क्या आना, उनका क्या जाना,
जिसने आहूत स्वयं को किया नहीं।
14/11/2023
पढ़ें एवं सुने। 🙏
शीर्षक: आहुति…
कब मिट्टी कुंदन हुआ बताना,
दुःसह अनल में जो जला नहीं।
सौंदर्य कहाँ कब निखरा है,
जो तन धूप-ताप में गला नहीं।
उस हीरे की कीमत ही क्या
जो धरणी के तपिश में पला नहीं।
समाज उन्हें नायक न बनाता,
जो विपत्ति में आगे-आगे चला नहीं।
सम्मान उसी का होता है
जो वचन, धर्म से डिगा नहीं।
मान क्या हो उस दुर्बल का,
जो कथनी-करनी पर टिका नहीं।
उस शिक्षा का महत्व ही क्या
जिसमें जीवन जीने की कला नहीं।
उस ज्ञान को लेकर कोई क्या ही करे
जिससे हुआ किसीका भला नहीं।
मित्रों में उसका मोल ही क्या,
जो संकट में संग कभी चला नहीं।
उस प्रेमी का भी नाम नहीं
जो प्रेयसी के रंग में ढला नहीं।
उस दया, उदारता से क्या है करना
जिसमें धन, शक्ति या ज्ञान नहीं
वो शुभचिंतक किस गिनती का हो,
जिसकी कोई पहचान नहीं।
बाजार भी जीत वही आते हैं,
जो पुरुषार्थ से अपना मोल बढ़ाते हैं।
जो पत्थर घीसे न जाते हैं,
दो कौड़ी में बिक जाते हैं।
उनकी आँसुओ की क्या कीमत
जिनके आँखों में भयानक रोष नहीं।
वो क्रोध नहीं स्वीकार्य जगत को,
जिसमें अधम के उद्ध्वंस का उद्घोष नहीं।
मुक्ति भी उसे कहाँ मिलती है
जिसने दर्प के सर्प का मर्दन किया नहीं।
कौन हुआ अमृत के लायक
गरल को जिसने पिया नहीं।
एक चिंगारी में जैसे राख छुपा है
सूखे पर्णों में प्रखर आग छुपा है,
कुछ वैसा ही दावानल ये दुनिया है,
कण-कण में रण का दुर्बोध राग छुपा है।
चुनातियों से भिड़ जाने की
रखो इच्छाशक्ति उत्कट
दारुण दहन में दग्ध हुए बिन,
न चमक निकले तलवार विकट।
आहुति कर्मों की यहाँ सन्मार्ग समझना,
जो आहूत हो जाये उसे भगवान-सा अरचना।
सुलभ, सरल-प्राप्य को कभी विजय न कहना,
काल पर चोट कर ख़ुद को गहरा गढ़ना।
क्योंकि काल ही उसे त्यज देता है
जो काल से सीधे भिड़ा नहीं।
कालोचित जिसने कीमत न दी हो,
इस भव सागर में तिरा नहीं।
अब अंतिम बात...
धरा पे कभी वो जिया नहीं,
जिसने मृत्यु का सामना किया नहीं।
उनका क्या आना, उनका क्या जाना,
जिसने आहूत स्वयं को किया नहीं।
आहुति।Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Hindi Motivational Poem। Motivational Video। आहुति। Sukant Poetry । Hindi Poems । हिंदी कविता । Introspection। अध्यात्म। Spirituality। Inspirational Video। True Inspiration।Hindi poem Motivational hindi...
08/10/2023
इस कविता को पढ़ें और यदि सुनना आसान लगे तो सुने भी... वीडियो तैयार है...
शीर्षक: जिस राह जाना ज़रूरी है...
ईश्वर... उस अंतिम सत्य का सहारा लो... और चलते जाओ...
रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जाना ज़रूरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
जो घोर निराशा हो,
मन टूट रहा हो,
तो, मन में उसका प्रकाश भरना,
और बिन मन भटकाये चलते जाना।
जो जफ़ा हजारों आयें,
हृदय बिलख जाये,
तो, हृदय में उसका प्रेम भरना
तुम बिना हृदय विदराये चलते जाना।
जो सघन अँधेरा हो,
आँखें निस्तेज हो रही हो,
तो, आँखों में उसकी सूरत भरना,
तुम यूँ पलक सिलाये चलते जाना।
जो लाख ठोकरें खायें,
पग बढ़ते हुए भी बढ़ न पाये,
तूफान में उसकी तुम भी हवा हो जाना,
तुम पग उड़ाये चलते जाना।
जो सौ दर्द हिस्से आये,
बदन टूट जाये,
बदन में उसकी अग्नि भरना,
और बे-शरीर उस क्षण भी चलते जाना।
बस रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जीवन अंकुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह प्रेम सुरूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सौंदर्य नूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह दीवानगी फितूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कुदरत दस्तूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह धर्म की धुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कान्हा की मंजूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सच्चाई पूरी की पूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह जाना जरुरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
चलते जाना... चलते जाना...
जिस राह जाना जरुरी है।Sukant Poetry।Hindi inspirational poetry। Motivational poem।Status video। जिस राह जाना जरुरी है।Sukant Poetry।Hindi inspirational poetry। Motivational poem।UPSC motivationHindi poem Motivational hindi poemMotivational poem in hindi...
27/09/2023
जीवन तब तक द्वंद्वों से भरा होता है जब तक हम कमजोर होते हैं। इस गहरे-भाव वाले कविता को पढ़िये या सुनिये और अपना राय दीजिये। 🙏
शीर्षक: जुनून...
जीने की ज़िद्द क्यों है हमें?
जब जी लेने का जुनून नहीं।
सालों की खबर क्यों रखते हैं हम,
जब इस पल को पी लेने का जुनून नहीं।
हिसाब के बड़े पक्के हैं हम,
हर पल की मौत का खूब हिसाब लगाते हैं,
जब कभी जिंदगी का हिसाब लगाते हैं,
तो हिसाबन ख़ुद को कच्चा ही पाते हैं।
सबने कहा कि जिंदगी एक जंग है
तो, इस जंग में ख़ुद को खूब लड़ाते हैं,
कतरा-कतरा लहू लगाते हैं,
और जिंदगी को ही घायल पाते हैं।
बड़े देर से समझ आया कि...
गलत रास्ते पर हम चले जा रहे थे,
गलत समर में लहू दिए जा रहे थे,
डरते थे हम जिंदगी से शायद,
इसलिए, मौत की घूँट खुशी से पिये जा रहें थे।
जीवन तो एक कलरव है,
हमने कोलाहल बना रखा है।
अमृत का अर्णव मिला हमें पर,
बोतलों में हलाहल सजा रखा है।
जीने वाले तो जी गये ऐसे...
जो मर कर भी जैसे
हजार बार जी उठे।
जो एक शरीर छूटा उनका,
वे हजार दिलों में खिल उठे।
क्योंकि,
उन्हें जीने की जिद्द नहीं थी,
जी लेने का जुनून था।
सालों की खबर नहीं थी उन्हें,
बस, इस पल को पी लेने का जुनून था।
जुनून...।Sukant Poetry।Hindi Kavita।Bhagat Singh Jayanti। Motivational Poem। जुनून...।Sukant Poetry।Hindi Kavita।Bhagat Singh Jayanti। Motivational Poem।Hindi poem Motivational hindi poemMotivational poem in hindiBest motivational poe...
एक कविता सबके साथ साझा करता हूँ जो मेरे हृदय के काफी करीब है। आशा है आप सबको भी पसंद आएगी। कुछ जटिल शब्दों के अर्थ नीचे दे दिये गए है।
शीर्षक: जिस राह जाना ज़रूरी है...
रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जाना जरूरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
जो घोर निराशा हो,
मन टूट रहा हो,
तो, मन में उसका प्रकाश भरना,
और बिन मन भटकाये चलते जाना।
जो जफ़ा हजारों आयें,
हृदय बिलख जाये,
तो, हृदय में उसका प्रेम भरना
तुम बिना हृदय विदराये चलते जाना।
जो सघन अँधेरा हो,
आँखें निस्तेज हो रही हो,
तो, आँखों में उसकी सूरत भरना,
तुम यूँ पलक सिलाये चलते जाना।
जो लाख ठोकरें खायें,
पग बढ़ते हुए भी बढ़ न पाये,
तूफान में उसकी तुम भी हवा हो जाना,
तुम पग उड़ाये चलते जाना।
जो सौ दर्द हिस्से आये,
बदन टूट जाये,
बदन में उसकी अग्नि भरना,
और बे-शरीर उस क्षण भी चलते जाना।
बस रुकना नहीं, चलते जाना।
जिस राह जीवन अंकुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह प्रेम सुरूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सौंदर्य नूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह दीवानगी फितूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कुदरत दस्तूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह धर्म की धुरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह कान्हा की मंजूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह सच्चाई पूरी की पूरी है,
उस राह चलते जाना।
जिस राह जाना जरुरी है,
उस राह पर कदम-ब-कदम पग बढ़ते जाना।
चलते जाना... चलते जाना...
शब्दार्थ:
जफ़ा - जुल्म, सितम, अत्याचार। फितूर - जुनून, पागलपन।
15/08/2023
स्वतंत्रता का भाव भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से ही सबसे अधिक महत्व की रही है। इसके ही उच्चतम स्थिति को मोक्ष कहा जाता है जब व्यक्ति अपने अंदर के सभी बुराइयों से मुक्त होकर अपनी उच्चतम संभावना को प्राप्त करता है।
लेकिन, ऐसा राष्ट्र भी जो स्वतंत्रता को इतनी गहराई से समझता है, परतंत्रता के घोर दंश को झेल चुका है। इसका कारण है कि स्वतंत्रता की अपनी कीमत होती है। एक मजबूत समाज ही इसकी कीमत चुका सकता है। अतः परतंत्रता का सबसे बड़ा कारण समाज का कमजोर होना है। व्यक्ति मजबूत हो, समाज मजबूत हो, राष्ट्र मजबूत हो... यही आज का चिंतन है।
स्वतंत्रता दिवस की सबको शुभकामनाएं... 🙏
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