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14/08/2024
https://youtu.be/NlZH9-EewNw?si=kn8LihbvsZoi02TN
कौन था जो कहता था उसने एक स्टेनोग्राफर की मदद से पाकिस्तान बना दिया
12/08/2024
https://youtu.be/pEhfb2PHA94?si=HgWFCIo8sDKkPHt6
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31/07/2024
कल से शुरू हो रही हमारी PSC क्लास
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प्री के साथ मेंस की पढ़ाई और किसी संस्था में नहीं करवाई जाती
11/09/2021
भीषण गर्मी से परेशान लोगो का बस्तरिया कोल्डड्रिंक - माड़िया पेज
आधुनिक समाज में लोग गर्मी से राहत पाने तरह तरह के जतन करते है। इसके लिए लोग स्वयं को गर्मी से बचाने पंखे कूलर से लेकर शीतल पेय का सहारा लेते है ।
वहीं बस्तर अंचल के लोग गर्मी से बचने अपने परंपरागत पेय पदार्थ माड़िया पेज का सहारा लेते है । माड़िया पेज से उन्हें गर्मी से राहत तो मिल ही जाती है साथ ही यह उनके लिए शक्तिवर्धक की तरह भी काम करता है। जिससे वे भीषण गर्मी में भी मेहनत वाले काम आसानी से करने में सक्षम हो पाते हैं। आदिवासियों और ग्रामीणों का प्रमुख पेय पदार्थ रागी से बना मड़िया पेज है। जिसको पीने से न केवल शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि देर तक शरीर का तापमान भी नियंत्रित रहता है।
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11/09/2021
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बैताल रानी लांजी राज की राजकुमारी थी। वह बड़ी सुंदर और रूपवती थी। उसका विवाह धमधा के राजा से हुआ था। तब गोंड़वाना राज्य था। धमधा, ठाकुरटोला, गंडई और लांजी के राजा गोंड ही थे। धमधा के राजा अपनी रानी के साथ वन भ्रमण के लिए आते थे। लांजी आते-जाते वे ठाकुरटोला राजा के यहाँ कुछ दिन विश्राम करते फिर अपने गंतव्य को निकल जाते।
इस बीच बैताल रानी एक चरवाहे की बांसुरी सुन कर सम्मोहित हो गई और उससे प्रेम करने लगे। प्रेम कहाँ जाति-पाति या अमीर-गरीब देखता है। चरवाहा भी रानी पर आसक्त हो गया। दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा। वन भ्रमण के बहाने रानी चरवाहा से मिलती। चरवाहा गाय चराता, बांसुरी बजाता।उसकी बांसुरी की धुन सुन रानी अपनी सुध-बुध बिसर जाती। राजा के गुप्त चरों ने जब बताया कि रानी चरवाहा से प्रेम करती है और जंगल में चोरी-छिपे उससे मिलने जाती है। तब राजा आग बबूला हो गया। तब तक बैताल रानी और चरवाहा भाग कर जंगल में छुप गए थे।
इधर राजा हाथ में तलवार लेकर घोड़े पर सवार हुआ और रानी को ढूढंते हुए बसंत पुर जंगल की ओर गया। पहाड़ी में आहट हुई तो राजा रूक गया। देखा तो बैताल रानी चरवाहे के साथ थी। राजा का खून खौल गया। उसने उसी स्थान पर रानी को तलवार से तीन टुकड़ों में काट दिया। चरवाहे को भी मार डाला।
तब से यह किवदंती लोक में प्रचलित है कि बैताल रानी पत्थर बन गई और आज भी तीन टुकड़ों में पड़ी हुई है। हमारी बड़ी भौजी ने यह भी बताया था कि ‘चल रानी लांजी जाबो ’ कहने पर मूर्ति के टुकडे अपने स्थान से हट जाते हैं। और ‘चल रानी धमधा जाबो’ कहने पर मूर्ति के टुकड़े अपने स्थान से नहीं हिलते। (वैसे ये सच नही है)
बेतालरानी घाट में 15-16 मोड़ है जो पर्यटकों को आकर्षित करता है ।
11/09/2021
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ओड़िशा के प्रमुख लोक-पर्व ‘नुआखाई’ का सांस्कृतिक प्रभाव भी पश्चिम ओड़िशा के सीमावर्ती छत्तीसगढ़ में भी साफ देखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद, महासमुन्द, रायगढ़, जशपुर, धमतरी सहित बस्तर संभाग के कुछ जिले भी इनमें शामिल हैं, जहाँ पड़ोसी राज्य की तरह उत्कल संस्कृति से जुड़े लाखों लोग इसे पारम्परिक रीति-रिवाजों के साथ उत्साह से मनाते हैं।
छत्तीसगढ़ जब दक्षिण कोसल के नाम से प्रसिद्ध था, तब उसके भौगोलिक क्षेत्र में वर्तमान ओड़िशा के भी कई इलाके शामिल थे। इसलिए यह कहा जा सकता है कि ‘नुआखाई’ दोनों राज्यों की साझा लोक-संस्कृति का प्रतीक है।
नुआखाई का सरल शाब्दिक अर्थ है नया खाना। नुआ यानी नया। खेतों में खड़ी नई फ़सल के स्वागत में यह मुख्य रूप से ओड़िशा के किसानों और खेतिहर श्रमिकों द्वारा मनाया जाने वाला पारम्परिक त्यौहार है, लेकिन समाज के सभी वर्ग इसे उत्साह के साथ मनाते हैं।
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी पश्चिम ओड़िशा के हजारों लोग विगत कई दशकों से निवास कर रहे हैं। वे हर साल यहाँ नुआखाई का त्यौहार परम्परगत तरीके से उत्साह के साथ मनाते आ रहे हैं। नुआखाई के एक दिन पहले यहाँ नये धान की बालियों के साथ चुड़ा (चिवड़ा ), मूंग और परसा पत्तों की बिक्री की जाती है
इतिहासकार जनश्रुतियों का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि पश्चिम ओड़िशा में नुआखाई की परम्परा शुरू करने का श्रेय बारहवीं शताब्दी में हुए चौहान वंश के प्रथम राजा रमईदेव को दिया जाता है। वह तत्कालीन पटना (वर्तमान पाटनागढ़) के राजा थे। पाटनागढ़ वर्तमान में बलांगीर जिले में है। कुछ जानकारों का कहना है कि पहले बलांगीर को ही पाटनागढ़ कहा जाता था।
रमईदेव ने देखा कि उनकी प्रजा केवल शिकार और कुछ वनोपजों के संग्रहण से ही अपनी आजीविका चलाती है और यह जीवनयापन की एक अस्थायी व्यवस्था है। इससे कोई अतिरिक्त आमदनी भी नहीं होती और प्रजा के साथ-साथ राज्य की अर्थ व्यवस्था भी बेहतर नहीं हो सकती। उन्होंने लोगों के जीवन में स्थायित्व लाने के लिए उन्हें स्थायी खेती के लिए प्रोत्साहित करने की सोची और इसके लिए धार्मिक विधि-विधान के साथ नुआखाई पर्व मनाने की शुरुआत की। कालांतर में यह पश्चिम ओड़िशा के लोकजीवन का एक प्रमुख पर्व बन गया।
वर्षा ऋतु के दौरान भाद्र महीने के शुक्ल पक्ष में खेतों में धान की नई फसल, विशेष रूप से जल्दी पकने वाले धान में बालियां आने लगती हैं। तब नई फ़सल के स्वागत में नुआखाई का आयोजन होता है। यह हमारी कृषि संस्कृति और ऋषि संस्कृति पर आधारित त्यौहार है।
26/08/2021
#बस्तर 😍
26/08/2021
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26/08/2021
यह मंदिर शंकरी (संकरी) घाटी में चौरा गांव (प्राचीन चवरापुर की स्थली) में मंडवा महल से आधा किमी. पश्चिम में स्थित है। यह मंदिर भी शिव मंदिर ही है। ईंट निर्मित इस मंदिर की मिट्टी में चूने के प्लास्टर का प्रयोग मिलता है। यह मंदिर भोरमदेव एवं मंडवा महल की अपेक्षा छोटा है। इसका मुख पूर्व दिशा की ओर है।स्थानीय फणी नागवंशी राजा द्वारा इस मंदिर का निर्माण लगभग 14वी ईसवी में कराया गया को शिव को समर्पित था। गर्भगृह के बिचो बीच कृष्ण प्रस्तर निर्मित शिवलिंग स्थापित है तथा गणेश की मूर्ति रखी है। मंदिर को कृष्ण प्रस्तर निर्मित द्वार चौखट के सिरदल पर मध्य में बैठे हुए चतुर्भुज गणेश एवं शिव पार्वती तथा द्वार शाखाओं पर नदी देवियों का अंकन किया गया है। संभवतः मंदिर का द्वार खुला होने से छेरी अर्थात् बकरी आदि पशुओं के इसमें बैठने या बांध दिए जाने के कारण इसका नाम बाद में छेरकी महल पद गया होगा।
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26/08/2021
पचराही कवर्धा
फणिनाग वंश की निशानियां मिलती है जहाँ कदम कदम पर
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