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जहानाबाद लोकसभा चुनाव 2024 | Jahanabad Loksabha Elections 2024 10/05/2024

https://youtube.com/watch?v=Lw6KlngSTmY&si=mTkvsFsYpdLr92iq

जहानाबाद लोकसभा चुनाव 2024 | Jahanabad Loksabha Elections 2024 लाल जमीन अब नीले पताकों से पटने लगी है. ये संकेत है राजनीति में बड़े बदलाव का. बसपा सुप्रीमो मायावती का बिहार में कि.....

Photos from IN CITY's post 03/02/2024

... Very Soon.

30/12/2023
Photos from IN CITY's post 17/11/2023

IN CITY PUBLISHING की पहली पुस्तक. एक नयी शुरुआत..
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06/09/2022

: किंग या किंग मेकर - सिर्फ दिल्लगी या गुल खिलाएगा दिल्ली का सफर
: किंग बनेंगे नीतीश कुमार या बनेंगे किंग मेकर. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए विपक्षी दलों को एकजुट करने की मुहिम के साथ-साथ ये सवाल भी चल रहे हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली के सफर पर हैं. भाजपा कह रहा है ये सफर महज दिल्लगी है. जदयू कह रहा है 2024 में मोदी को सत्ता से बेदखल करने की शुरुआत है. इस बीच 25 सितंबर को हरियाणा के फतेहाबाद में सजने वाले ओम प्रकाश चौटाला के मंच पर विपक्षी दलों के नेताओं के हाथ में हाथ डाल साथ खड़े होने की अटकलें लग रही है. दावा किया जा रहा है कि कर्नाटक में हुए कुमार स्वामी के शपथ-ग्रहण समारोह वाले दृश्य एक बार फिर देखे जा सकते हैं. कुमार स्वामी के शपथग्रहण में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी, उनकी मां कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, बसपा सुप्रीमो मायावती, आंध्र प्रदेश के तत्कालीन सीएम चंद्र बाबू नायडू, राजद नेता बिहार के वर्तमान उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) के नेता सीताराम येचुरी और एनसीपी के शरद पवार सहित कई नेता मौजूद थे. 2019 के लोकसभा चुनाव से लगभग एक साल पहले मंच पर 'एकजुटता' के सीन को तब भी नरेंद्र मोदी के खिलाफ विकल्प की तस्वीर बताया गया था. 25 सितंबर की चौटाला की रैली में भी नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, प्रकाश सिंह बादल, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव के मंच पर साथ रहने का दावा किया जा रहा है. नीतीश ने दिल्ली सफर के दौरान मंगलवार को ओम प्रकाश चौटाला से मुलाकात की है. नीतीश दो दिनों के भीतर दिल्ली में राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, डी. राजा, कुमार स्वामी और अरविंद केजरीवाल सरीखे शीर्ष नेताओं से भी मिल चुके हैं. नीतीश ने मुलाकात की शुरुआत लालू प्रसाद - राबड़ी देवी - तेजस्वी यादव से मिलकर की है.
नीतीश की मुलाकातों को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा स्वाभाविक है. वजह है नीतीश का मोदी को 2024 में बेदखल कर देने का दावा. पहले तो नीतीश ने भाजपा को 50 सीटों के भीतर सिमटा देने का दावा भी कर दिया था. हालांकि अगले ही दिन पलटी मारते हुए उन्होंने कहा था कि संख्या-वंख्या की बात नहीं करते. प्रधानमंत्री पद के चेहरे पर भी नीतीश अब खुद की दावेदारी से इंकार कर रहे हैं. मतलब गोलबंदी कर नीतीश किंग मेकर की भूमिका में रहना चाहते हैं. हालांकि उनके बॉडी लैंग्वेज से राजनीतिक विश्लेषक किंग मेकर वाली भूमिका को पचा नहीं पा रहे.
नीतीश की ऐसी कोशिशों की सफलता पर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है. वजह है विपक्षी एकजुटता के अब तक हुए प्रयासों की असफलता. किंग बनने के सवाल पर तलवारें आपस में ही खिंच जाती है. ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, के. चंद्रशेखर राव सहित दर्जन भर चेहरे सामने आ जाते हैं. सवाल लाजिमी है कि नीतीश का प्रयास सिर्फ दिल्लगी बनकर रह जाएगा या गुल खिलाकर मोेदी की कुर्सी हिला पाएगा.
बिहार के उपमुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार मोदी तो कहते हैं - बिहार बाढ और सूखे की दोहरी मार झेल रहा है, तब नीतीश कुुमार केवल सुर्खियों में रहने के लिए दिल्ली के राजनीतिक पर्यटन पर हैं. नीतीश कुमार उन दलों को कांग्रेस के साथ लाने के असंभव अभियान पर हैं, जो विभिन्न राज्यों में कांग्रेस से लड़ कर ही सत्ता में हैं. केरल, पश्चिम बंगाल, दिल्ली इसके प्रमाण हैं. हालांकि पटना आए के. चंद्रशेखर राव ने यह संकेत दिया था कि विपक्ष न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय कर चुनाव लड़ सकता है. इतना तो तय है कि 2024 से पहले नीतीश अगर विपक्ष कोे एक पलड़े पर तौलने में सफल हो जाते हैं तो किंग या किंग मेकर का ताज उनके सर सजेगा.

01/09/2022

: मुख्यमंत्री ... मीडिया ... मोकामा ... और मंत्री का इस्तीफा : सीबीआई की नो इंट्री ... तेजस्वी के बदलते तेवर और एक्शन पर रिएक्शन
महागठबंधन के लिए आसान नहीं है राजनीति के 'पनघट' तक की डगर
बजने से पहले ही टूटने लगे बिहार सरकार के 'तार'
PATNA : हनीमून मूड के बीच ही बजने से पहले सरकार के तार टूटने लगे. कार्तिक कुमार का मंत्री पद से इस्तीफा अंदर के 'एक्शन' और 'रिएक्शन' का एक 'रिफ्लेक्शन' मात्र है. अभी पूरी फिल्म बाकी है. सरकार बने माह भर भी नहीं हुए. इस बीच के राजनीतिक घटनाक्रमों से इतना तो तय हो गया है कि महागठबंधन के लिए राजनीति के 'पनघट' तक की डगर तय करना आसान नहीं है. प्रधानमंत्री पद तक का सफर तो दूर, राज्य में महागठबंधन मुश्किल में न पड़े यही बड़ी चुनौती होगी. डेढ़-दो सप्ताह की राजनीतिक गतिविधियाें के साथ ही कुछ किरदारों पर गौर करें तो तस्वीर साफ होती दिखेगी.
बिहार का राजनीतिक घटनाक्रम नौकरी के बदले जमीन घोटाले में लालू-तेजस्वी के करीबी भोला यादव की गिरफ्तारी के बाद से ही बदलने लगा. केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई से राजद खेमे में बौखलाहट शुरू हो गयी. तेजस्वी भव: के स्लोगन के साथ जिस तेजस्वी यादव को राजद अब तक मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करता रहा, वो फिर से नीतीश का डिप्टी बनने को राजी हो गये. वजह थी किसी तरह सरकार में आकर जांच एजेंसियों से 'सेफ' होना. दूसरी ओर प्रधानमंत्री बनने की नीतीश की महत्वाकांक्षा ने तेजस्वी की राह आसान कर दी. दोनों करीब हो गये और बन गयी नयी सरकार.
अब यहां इंट्री होती है उस किरदार की, जिसका राजनीतिक वजूद ही नीतीश के शासन में मिटा दिया गया. मोकामा विधायक अनंत सिंह के यहां छापा मरवाकर एके 47 जैसे हथियार बरामद दिखाये गये. इस वजह से अनंत सिंह को विधायकी से हाथ धोना पड़ा. पर उनके प्यादे कार्तिक कुमार पटना में स्थानीय निकाय कोटे से विधान परिषद का चुनाव जीत चुके थे. नीतीश के न चाहते हुए भी अनंत सिंह कार्तिक को मंत्री बनाने में सफल हो जाते हैं.
यहां से दो परिस्थितियां साथ-साथ चलती हैं. एक तरफ कार्तिक को लेकर विपक्षी हमलावर होेता है, दूसरा केंद्रीय एजेंसियों के विरोध में राजद खेमा बिलबिला रहा है. जांच एजेंसियों की बिहार में नो इंट्री जैसे बयान भी राजद के बड़े नेताओं की ओर से आते हैं. नीतीश पर दो तरफा वार. एक तरफ दागी मंत्रिमंडल तो दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई कर रही एजेंसियों की बिहार में इंट्री पर मीडिया के चुभते सवाल. Image-conscious नीतीश की छवि मजबूर मुख्यमंत्री के रूप में बनायी जाने लगी.
उसके बाद जो हुआ थोड़ा उसका भी विश्लेषण कर लें.
सप्ताह भर पहले प्रेस कांफ्रेस कर जांच एजेंसियों को केंद्र सरकार की जमाई बताते हुए तेजस्वी कहते हैं - "ये बिहार है. सब लोगों को बता देते हैं. बिहार में जबरन कोई काम नहीं होता है. जितनी लड़ाई होगी लड़ेंगे. सीबीआई, इडी और कुछ सूत्र वाले पत्रकार चाहेंगे बदनाम करना तोे इ बिहार है सबकुछ ठीक कर देता है." राजद के वरिष्ठ नेता विधानसभा अध्यक्ष रहे उदय नारायण चौधरी और शिवानंद तिवारी कहते हैं - सीबीआई को बिना अनुमति बिहार में प्रवेश पर रोक लगायी जाए. कई नेता को यहां तक कह देते हैं कि सीबीआई के आने पर विरोध होेगा और माहौल हिंसक हो सकता है. जाहिर है ऐसे बयान नीतीश को नागवार गुजर रहे होंगे. जांच एजेंसियों के एक्शन पर मीडिया के समक्ष नीतीश के रिएक्शन से इसका अंदाजा लग रहा था.
अब कल का तेजस्वी के ट्वीट का एक अंश देखिये - "केंद्र सरकार ने बीते 8 वर्ष में जांच एजेंसियों को राजनीतिक प्रतिशोध का एक उपकरण बना दिया है. 8 साल पूर्व देशवासियों ने इनकी इंटेग्रिटी व कार्यप्रणाली पर इस तरह के सवाल कभी नहीं उठाए थे. अभी हमारा CBI से विरोध Institution से नहीं बल्कि इनकी राजनीति से प्रेरित कार्यप्रणाली से है. "
यहां तेजस्वी जांच एजेंसियों के खिलाफ अपने रुख से पलटी मार ठीकरा केंद्र सरकार पर फोड़ रहे हैं. सप्ताह भर पहले तक एजेंसियों को धमकाने वाले तेजस्वी का यह ट्वीट भी देखिए - " एजेंसी के अधिकारियों से हमारा न कभी विरोध था और ना है. हम जानते है कि ये आदेश का अनुपालन कर रहे है, लेकिन CBI का इस्तेमाल राजनीतिक instrument की तरह जो हो रहा है उसका हम विरोध करते रहेंगे. हमारे यहां संविधान को मानने वाली न्यायप्रिय समाजवादी सरकार है जहां हर कोई सुरक्षित है ." इस बदलाव का मायने समझिए.
फिर से हम बात करते हैं कार्तिक की. कार्तिक को कानून मंत्री बनाये जाने के बाद हो रही किरकिरी से आखिरकार उनका विभाग बदल दिया गया. सूत्र बताते हैं कि विधि विभाग बदले जाने से नाराज होकर कार्तिक ने इस्तीफा दिया है. यहां विधि विभाग का मंत्री बनने के पीछे कार्तिक की 'मंशा' पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं. कार्तिक का इस्तीफा मिलते ही बिना विलंब किये स्वीकृत करने की अनुशंसा कर नीतीश ने यहां भी अपना इरादा जाहिर कर दिया.
राजनीतिक विश्लेषकों का यह अनुमान बेवजह नहीं हो सकता कि अंदरखाने सबकुछ ठीक नहीं है. नीतीश सहज नहीं हैं. कार्तिक और एजेंसियों के खिलाफ बयानबाजी पर उन्होंने अपनी नाराजगी जता दी. इसके बाद ही तेजस्वी का बयान बदला और कार्तिक का विभाग. अब कार्तिक के इस्तीफे के मायने भी निकाले जा रहे हैं. अनंत सिंह के साथ सरकार का रवैया पहले जैसा रहता है या नयी सरकार में रूख भी बदलेगा, यह मोकामा विधानसभा उपचुनाव में ही तय होगा. इसका असर सरकार पर कितना और किस रूप में होगा यह वक्त बताएगा.

30/08/2022

: जांच एजेंसियों के 'एक्शन' पर 'रिएक्शन' देने में असहज होने लगे सुशासन बाबू
राजद का मंसूबा : बिहार में सीबीआई की 'नो इंट्री'
महागठबंधन की गांठ : 'मजबूत' या 'मजबूर'
सिपहसलारों कोे आगे कर सरकार पर दबाव बना रहे तेजस्वी

PATNA : कुर्सी के खेल में नीतीश कुमार के 'सुशासन बाबू' की छवि पर ही बन आयी है. Good governance...Good governance..
Good governance. सरकार की पहली , दूसरी और तीसरी प्राथमिकता पूछे जाने पर नीतीश कुमार का यह जवाब तब का है जब पूर्ण बहुमत के साथ 2005 में मुख्यमंत्री बने थे. 2010 में फिर से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी प्राथमिकता वही थी. पहले कार्यकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ ताबड़तोड़ एक्शन और बिहार के विकास के लिए किये कार्यों ने देश भर में नीतीश की छवि 'सुशासन बाबू ' की गढ़ दी. राजनीतिक विश्लेषक भी यह मानते रहे हैं कि कुछ भी हो जाए, नीतीश अपनी इस छवि से समझौता नहीं कर सकते. Image-conscious राजनेता के रूप में नीतीश उभरते चले गये. दूसरे कार्यकाल ( तकनीकी तौर पर तीसरा) में जब नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किया तब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और एनडीए से अलग हो गये. तब भी यह माना गया था कि यह 'सैद्धांतिक स्टैंड' है. तब जीतन राम मांझी को सीएम बनाने से लेकर लालू प्रसाद के करीब आने तक का जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ उसे इस नीतीश के स्टैंड का एक हिस्सा माना गया. 2015 में महागठबंधन के साथ चुनाव लड़कर जब नीतीश ने बीच में ही एनडीए से गठजोड़ कर लिया, तबसे इनकी छवि को पलटीमार के रूप में स्थापित किया जाने लगा. तेजस्वी और तेजप्रताप समेत पूरा राजद खेमा
नीतीश को पलटू राम कहकर संबोधित करता रहा. फिर भी सुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस वाली छवि बचाये रखने का नीतीश का दावा बहुत हद तक मान्य होता रहा.
हालिया घटनाक्रम में पलटे नीतीश कुमार की वो छवि भी दांव पर है. 2020 में एनडीए के साथ चुनाव लड़कर बीच में ही महागठबंधन की सरकार बना राजद खेमे द्वारा दिए गए पलटू राम के इमेज को तो नीतीश ने खुद ही स्थापित कर लिया है. इधर नौकरी के बदले जमीन घोटाले में लालू-तेजस्वी के करीबी भोला यादव की गिरफ्तारी के बाद से ही राजद खेमे में बौखलाहट है. रही सही कसर विश्वास मत वाले दिन ही राजद नेताओं के यहां जांच एजेंसियों की रेड ने पूरी कर दी. राजद खेमे से सीबीआई के बिहार में प्रवेश पर ही रोक लगाने की आवाज उठने लगी है. शिवानंद तिवारी और उदय नारायण चौधरी सरीखे राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी जब ऐसी मांग कर रहे हों तो इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता. माना जा रहा है कि लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव के इशारे के बगैर ऐसा संभव नहीं है. दूसरी ओर जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन 'ललन' ने तो मुकदमों की सुनवाई पूरी हुए बिना ही आईआरसीटीसी और रेलवे में नौकरी घोटाले में क्लीन चिट भी दे दिया.
क्या कहा ललन सिंह ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfOFNHHf_/
जदयू कार्यालय में महागठबंधन के संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में राजद सांसद मनोज झा के निशाने पर भी जांच एजेंसियां ही रहीं. महागठबंधन के दूसरे दल भी हां में हां ही मिलाते रहे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब तक बड़े ही सधे अंदाज में अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. विश्वास मत वाले दिन हुए रेड पर जब उनसे इस संबंध में पूछा गया था तब उन्होंने बस इतना कहा था - देखते न रहिए क्या-क्या होता है.
क्या कहा था नीतीश ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfS4UmmxQ/
सीबीआई के बिहार में प्रवेश पर रोक से संबंधित शिवानंद के बयान पर नीतीश ने कोई तवज्जो नहीं दी.
क्या कहा नीतीश ने सुनिये :
https://fb.watch/fdfLnsk-He/
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो नीतीश के सामने जब असहज परिस्थितियां पैदा होती है तब उनके बयान और बॉडी लैंग्वेज ऐसे ही हो जाते हैं. ऐसे में राजनीतिक गलियारे में यह स्वाभाविक सवाल उठना शुरू हो गया है - महागठबंधन की गांठ 'मजबूत' है या 'मजबूर'?

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