Mainpura devi asthan
मनोकामना पुर्ति सिद्धपीठ शिव और देवी मंदिर मैनपुरा पटना ८००००१
जहां प्रेम वहां भक्ति,
जहां शिव वहां आदिशक्ति
🙏🌹
23/05/2024
वन्दे विष्णुम भवभयहरं सर्व लोकेकनाथम। ॐ नमोः नारायणाय नमः। ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय नमः।
गुरूवार को जगत प्रतिपालक भगवान श्रीहरि विष्णु जी की पूजा-अर्चना का विधान है । श्री हरि विष्णु जी समस्त देशवासियों की रक्षा करते हुए संपूर्ण विश्व का कल्याण करें और सबको अखंड सौभाग्य, स्वस्थ, सुखी तथा समृद्ध जीवन प्रदान करें, यही कामना है ।
उमा कहउ मैं अनुभव अपना सत हरि भजनु जगत सब सपना
सभी बड़े एवं छोटे मंदिरों में ट्रस्ट अर्थात प्रबंधन की तरफ से एक निशुल्क पुस्तकालय होना चाहिए।
:- ISRO - Indian Space Research Organisation प्रमुख एस. सोमनाथ, आप क्या सोचते हैं?
16/05/2024
माता सीता के प्राकट्य दिवस ' सीता नवमी ' की हार्दिक शुभकामनाएं!
15/05/2024
ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै सर्व दुष्टानाम वाचं मुखं पदम् स्तम्भय जिह्वाम कीलय-कीलय बुद्धिम विनाशाय ह्लीं ॐ नम:।
10/05/2024
16/04/2024
पावन - पर्व श्रीरामनवमी के शुभ अवसर पर
प्रभु श्रीराम विश्वव्यापी हैं। विश्व की कोई ऐसी भाषा नहीं , जिसने प्रभु श्रीराम के गान से अपने को पवित्र न किया हो। विश्व में रामकथा पर जितने भी ग्रंथ लिखे गए हैं , उतने ग्रंथ किसी एक कथा पर आज तक नहीं लिखे गए हैं। अब तक संसार की विभिन्न भाषाओं में प्रायः 500 अलग-अलग प्रकार की रामायण प्रकाशित की जा चुकी हैं।
हॉलैण्ड स्थित महर्षि वैदिक विश्वविद्यालय की शोध से पता चलता है कि सारे संसार में लगभग 1000 नगर ऐसे हैं , जिनका नाम " राम " से प्रारंभ होता है। विश्व के प्रत्येक महाद्वीप (महादेश) से कुछ उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है -
एशिया - रामहमोज (ईरान) , रामाल्लाह (इराक) , रामगढ़ (बांग्लादेश)।
यूरोप - रामकस्टहट (स्पेन) , रामटेन (डेनमार्क) , रामसेल (बेल्जियम)।
अफ्रीका - रामे (दक्षिण अफ्रीका)।
उत्तरी अमेरिका - रामपार्ट (कनाडा) , रामसिटो (अमेरिका)।
दक्षिण अमेरिका - रामोज (ब्राज़ील) , रामोन (अर्जेंटीना)।
ऑस्ट्रेलिया - रामसे।
भारत के जनमानस को " राम " ने सर्वाधिक प्रभावित किया है। अपने देश के हर छठवें व्यक्ति के नाम में " राम " शब्द लगा हुआ है। आंध्र प्रदेश में रामाराव , तमिलनाडु में रामचंद्रन , कर्नाटक में रमैया , महाराष्ट्र में रामनायक , गुजरात में रामभाऊ , पंजाब में रामसिंह , बंगाल में रामप्रसाद तो हिंदी-भाषी क्षेत्रों में रामचंद्र के रूप में राम जन-जन में लोकप्रिय हैं।
भारतीय संविधान निर्मात्री समिति द्वारा संविधान में कतिपय चित्र समाविष्ट किए गए , जिनमें से प्रमुख है - लंका विजय के पश्चात् प्रभु श्रीराम के स्वदेश वापसी का चित्र।
भगवान श्रीराम में आदर्श लोकनायक के सभी गुण मौजूद थे। इसीलिए वे सदियों से जन-जन के आराध्य बने हुए हैं।
अब हम ' राम ' को निम्नलिखित उदाहरण से जानें। एक बड़े पात्र में रस रहता है तथा उसमें रसगुल्ले रहते हैं। रस में रसगुल्ला रहता है तथा रसगुल्ला में रस रहता है। इसी प्रकार जो प्रभु-सत्ता हम सभी में रम रही है और हम सभी जिस प्रभु-सत्ता में ही रम रहे हैं , उसी परम सत्ता को ' राम ' शब्द से विभूषित किया गया है। ऐसी प्रभुसत्ता का प्रकटीकरण त्रेता युग में चैत्र शुक्ल नवमी को पावन अयोध्या में हुआ था।
प्रभु श्रीराम का स्मरण - मात्र भी कितना विलक्षण प्रभाव डालता है ? इसका सबसे बड़ा प्रमाण रावण के ही जीवन से जुड़ा हुआ है।
अपने दल के लगभग संपूर्ण योद्धाओं के विनष्ट हो जाने पर रावण ने कुंभकरण को जगाया। रावण की बातों को सुनकर कुंभकरण ने कहा - क्या सीता तुम्हारे वश में हुई ? रावण ने कहा - नहीं। तब कुंभकर्ण ने कहा - तुम तो मायावी हो। क्या तुम राम बनकर कभी उसके सम्मुख गए ? तो रावण ने जो उत्तर दिया , वह बहुत ही अद्भुत है।
रावण ने कहा -
राम: किं नु भवान् भून्न तच्छृणु सखे लीलातलश्यामलम्।
रामांग भजतो ममापि कलुषो भावों न सज्जायते।।
अर्थ - जब मैं राम का रूप धारण करने के लिए दूर्वादल श्याम राघवेंद्र के अंगो का ध्यान करने लगा , तब एक-एक करके मेरे हृदय के सारे कालुष्य समाप्त होने लगे। फिर तो सीता को वश में करने का प्रश्न ही समाप्त हो गया।
अब हम समझ गए होंगे कि भक्त तुलसीदास ने " राम " के स्मरण पर जोर क्यों दिया ? केवल नाम - स्मरण से ही मन में निर्मलता एवं पवित्रता आने लगती है।
अनेक विदेशी गैर - हिंदुओं को भी प्रभु श्रीराम ने अपनी ओर आकृष्ट किया है। केवल दो दृष्टांत देना ही पर्याप्त होगा।
बेल्जियम के फादर बुल्के तो भारत में आकर " राम " के ही होकर रह गए। उनका शोधपरक ग्रंथ - ' राम कथा - उद्भव एवं विकास ' विश्व प्रसिद्ध है।
इस आलेख का समापन स्व० शायर शम्सी मीनाई के नज्म से करता हूं -
मैं राम पर लिखूं , मेरी हिम्मत नहीं है कुछ ,
तुलसी व वाल्मीकि ने , छोड़ा नहीं है कुछ।
वह राम , जिसका नाम है जादू लिए हुए ,
लीला है जिसकी ओम् की खुशबू लिए हुए।।
आप सभी को श्रीरामनवमी की हार्दिक बधाई।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।
06/03/2024
श्री रामचरितमानस
भक्त तुलसीदास जी मंगलाचरण के अंतर्गत लिखते हैं -
भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यंति सिद्धा: स्वान्त:स्थमीश्वरम्।।
सरलार्थ - मैं श्रद्धा - विश्वास रूपी श्री भवानी और श्री शंकर जी की वंदना करता हूं , जिनके बिना सिद्ध लोग भी अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते हैं।
निहितार्थ -
मानव व्यक्तित्व के दो द्वार होते हैं - हृदय तथा मस्तिष्क । हृदय के द्वार से मनुष्य भावना के स्तर पर किसी से रिश्ते स्थापित करता है , जिससे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा प्रस्फुटित होती है । मस्तिष्क के द्वार से बुद्धि किसी व्यक्ति ,वस्तु अथवा विचार में विश्वास उत्पन्न करती है । वह मनुष्य धन्य है , जिसका हृदय एवं मस्तिष्क दोनों ही समान रूप से विकसित हुआ है।
वृक्ष दो तरह से जीवन - तत्व ग्रहण करता है - पत्तियों एवं जड़ों द्वारा । जड़े पृथ्वी से रस खींचती हैं और पत्तियां सूक्ष्म आकाश से प्राण - शक्ति का अवगाहन करती हैं इन दोनों क्रियाओं के साथ - साथ चलते रहने के कारण ही वृक्ष फूल - फल पैदा करने में सक्षम होते हैं । इसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी पल्लवित - पुष्पित होता रहे , इसके लिए श्रद्धा एवं विश्वास दोनों का सम्मिश्रण होना जरूरी है।
ऋग्वेद के श्रद्धा - सूक्त में उल्लेख है -
श्रद्धा प्रातर्हवामहे श्रद्धां मध्यंदिनं परि।
श्रद्धां सूर्यस्य निम्रुचि श्रद्धे श्रद्धापयेह न:।।
अर्थ - हम प्रातः , मध्यान्ह एवं सूर्यास्त सभी समय श्रद्धा देवी का आह्वान करते हैं । हे श्रद्धा देवी ! हम सभी में श्रद्धा का आधान करो ।
स्कंद पुराण में लिखा है -
श्रद्धया भजत: पुंस: शिलाऽपि फलदायिनी ।
अर्थ - मनुष्य श्रद्धा से शिला (पत्थर) की भी पूजा करे , तो वह फलदायक होता है।
जिस स्त्री को अन्य लोग सामान्य स्त्री समझते हैं , वही स्त्री श्रद्धा के कारण अपने संतान की मां के रूप में ईश्वर के समान वंद्य एवं पूज्य होती है।इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि जब ज्ञान श्रद्धा के सांचे में ढाला जाता है , तब उसमें कितना अंतर आ जाता है।
विश्वास के बल पर ही हम सभी अपना जीवन - यापन करते हैं । जब चिकित्सक रोगी को सुई लगाता है अथवा दवा लिखता है , तो रोगी को यह विश्वास रहता है कि सुई और दवा से मेरा रोग दूर हो जाएगा। जब हम किसी होटल में भोजन करने जाते हैं , तो यह विश्वास रहता है कि भोजन पवित्र एवं ताजा होगा । वह खाद्य - पदार्थ विषमय नहीं होगा। बिना विश्वास के हम जी ही नहीं सकते।
महाकवि एवं संत तुलसीदास जी में काव्य चातुर्य है । वे वंदना तो भवानी - शंकर की करते हैं , पर श्रद्धा एवं विश्वास का महत्व दर्शाते हैं। भवानी को उन्होंने 'श्रद्धा ' कहा ।
मार्कंडेय पुराण में उल्लेख है -
या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धा रूपेणसंस्थिता।
श्री शंकर को ' विश्वास ' कहा क्योंकि राम नाम में विश्वास होने के कारण ही कालकूट गरल (विष) पीकर भी शंकर जीवित ही नहीं रहे वरन् " नीलकंठ " शब्द से विभूषित किए गए ।शंकर जी तो साक्षात् विश्वास के मूर्ति हैं।
श्रद्धा - विश्वास युक्त सिद्ध अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर का अनुभव करते हैं ।
श्रद्धा व विश्वास के कारण ही पत्थर की काली मूर्ति श्री रामकृष्ण परमहंस के लिए साक्षात " जगत - जननी " बन गई । गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति से श्रद्धा - विश्वास के कारण ही अर्जुन से भी एकलव्य श्रेष्ठ धनुर्धर बना । एक छोटा - सा श्रीकृष्ण का खिलौना मीराबाई के लिए श्रद्धा - विश्वास के कारण ही उसका " सर्वस्व " बन गया था।
जो अपने अंतः करण में ईश्वरत्व की उपलब्धि कर पाता है , उसी के लिए सारा जगत ईश्वरमय हो जाता है ।
तभी तो भक्त तुलसीदास जी " सियाराम मय सब जग जानी " की घोषणा कर सके थे ।
"करउं प्रणाम जोरि जुग पानी।"
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।
25/02/2024
श्री रामचरितमानस
रामनाम मनि दीप धरु जीह देहरीं द्वार।
तुलसी भीतर बाहेरहुं जौं चाहसि उंजियार।।
सरलार्थ - श्री तुलसीदास जी कहते हैं कि (मुखरूपी दरवाज़े की) जीभरूपी देहली पर श्री रामनामरूपी मणि दीपक रख , जो तू भीतर और बाहर भी उजाला चाहता है।
निहितार्थ -
" श्री राम नाम प्रकरण " के अंतर्गत श्रीरामभक्त तुलसीदास जी राम नाम के प्रभाव को दर्शाते हुए उपर्युक्त दोहा लिखते हैं।
हम सभी जानते हैं कि जो लोग केवल इस लोक का विचार कर कार्य करते हैं , उन्हें भौतिक सुख तो प्राप्त होता है , लेकिन वे आध्यात्मिक सुख से वंचित रह जाते हैं। जो लोग केवल आध्यात्मिकता का विचार करते हैं , वे भौतिक सुख से वंचित रह जाते हैं।
तुलसीदास जी मनुष्य का इकतरफा सुख नहीं चाहते हैं। वे चाहते हैं कि मनुष्य का सांसारिक जीवन तथा आध्यात्मिक जीवन - दोनों जीवन आनंदमय हो।
अधिकांश लोग ऐसा ही चाहते हैं , पर यह कैसे उपलब्ध होगा ? यह नहीं जानते हैं।
इसके लिए तुलसीदास जी श्री रामचरितमानस में बड़ा ही सरल एवं सुगम उपाय उपर्युक्त दोहा के माध्यम से बतलाते हैं।
अलंकार की दृष्टि से यहां रूपक अलंकार का प्रयोग श्री तुलसीदास जी ने किया है।
जब हम रात्रि में किसी घर के दरवाजे के चौखट पर जलता हुआ दीपक रखते हैं , तो उसका प्रकाश घर के भीतर भी आता है और घर के बाहर भी जाता है। एक ही प्रज्वलित दीपक से घर का भीतरी भाग और बाहरी भाग दोनों प्रकाशित हो जाता है।
यहां यह विचारणीय है कि साधारण दीपक तभी तक जलता है, जब तक उसमें तेल रहता है और बाती रहती है। तेल और बाती के न रहने पर दीपक बुझ जाता है। तेल और बाती के रहते हुए भी प्रबल वायु के झोंके से दीपक बुझ जाता है। इस कारण पुनः अंधकार का साम्राज्य स्थापित हो जाता है।
तुलसीदास जी ज्ञानी भक्त थे। उन्होंने साधारण दीपक का दृष्टांत न देकर मणि-दीप का दृष्टांत दिया है। सामान्य दीपक की भांति मणि-दीप में जहां एक ओर तेल - बाती की आवश्यकता नहीं पड़ती , वहीं दूसरी ओर वायु के प्रबल झोंके का भी भय नहीं रहता। अतः इसके बुझने का सवाल ही नहीं उठता।
तुलसीदास जी किस मणिदीप का उल्लेख कर रहे हैं?यहां पर तुलसीदास जी " रामनामरूपी " मणिदीप का उल्लेख कर रहे हैं। इसकी दीपशिखा प्रचंड विघ्नरूप प्रखर वायु से भी नहीं बुझ सकती।
यह देह मंदिर के समान है , उसका द्वार मुख है तथा जिह्वा (जीभ) देहली है। जिह्वा पर रत्नरूपी राम नाम रहता है। नाम के जप से भीतर प्रकाश होता है , तब निर्गुण ब्रह्म का अनुभव होता है और जब बाहर प्रकाश होता है , तब सगुण ब्रह्म दृश्यमान होता है।
भक्त तुलसीदास जी के कहने का आशय यह है कि बिना राम नाम के जपे हृदय में प्रकाश नहीं हो सकता और हमें निर्गुण - सगुण ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं हो पाता है।
।। श्री राम जय राम जय जय राम ।।
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी...
संत रैदास
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