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05/05/2026
शहर में बैठे पिज़्ज़ा खाने वाले क्या जानें...कितनी रातें लगी हैं उसको फसल उगाने।
शहर की चमकती रोशनी और एसी की ठंडी हवा में शायद ही किसी को यह अहसास होता होगा कि गाँव के एक कोने में, मिट्टी की महक और तपती धूप के बीच एक किसान किस संघर्ष से गुजर रहा है। जब रातें गहरी होती हैं, पूरी दुनिया सो जाती है, तब भी खेत में कहीं न कहीं एक लालटेन जलती रहती है। वह लालटेन सिर्फ रोशनी नहीं देती, बल्कि उस उम्मीद को भी जिंदा रखती है जो किसान अपने हर बीज में बोता है।
वो जब अपनी थकी हुई कमर सीधी करके आसमान की ओर देखता है, तो उसे बादलों में भी अपने आने वाले कल का चेहरा दिखाई देता है। कभी ये बादल बारिश का डर बनकर मंडराते हैं, तो कभी पूरे मौसम का सहारा बनकर बरसते हैं। पर शहर में बैठे लोगों को इनमें से कुछ भी नज़र नहीं आता। उन्हें तो सिर्फ अपनी प्लेट में सजाया हुआ खाना दिखता है लेकिन उसके पीछे की मेहनत नहीं।
आज दर्द से चीखता रोता उसका दिल है,
क्या वाक़ई कड़ी मेहनत यही वो फल है?
जब वह अपनी फसल को मंडी लेकर जाता है, तो उसकी आँखों में चमक होती है। वह सोचता है कि आज उसकी मेहनत को सही दाम मिलेगा, आज महीनों की तकलीफ़ को थोड़ी राहत मिलेगी। लेकिन सच्चाई अक्सर उसके सपनों से भी ज्यादा कठोर निकलती है। कभी फसल का दाम गिर जाता है, कभी खरीदार मुंह फेर लेते हैं, और कभी सरकारी काग़ज़ात उसे उलझाकर उसकी उम्मीदें तोड़ देते हैं। उसके पास सिर्फ एक सवाल बचता है क्या वाकई यही है उसके पसीने का मूल्य?
इस सड़े हुए अनाज के पीछे की मेहनत किस-किस को मालूम है?
जब मौसम धोखा दे देता है और अनाज स्टोर में सड़ने लगता है, तब यह सड़ना सिर्फ अनाज का नहीं होता यह किसान की उम्मीदों का सड़ना होता है। हर एक दाना उसके हाथों की मेहनत से जन्मा था। जब वह दाना खो जाता है, तो ऐसा लगता है जैसे उसकी मेहनत, उसका संघर्ष, उसकी जागी हुई रातें और उसके टूटे हुए सपने सब एक साथ ढह जाते हैं।
शहर में लोग बस देखते हैं कि अनाज खराब हो गया। लेकिन वे नहीं देखते कि किसान की आँखें भी उसी अनाज की तरह टूटकर बिखर गईं। वे नहीं जानते कि इन दानों में उसकी पत्नी की दवा, उसके बच्चों की किताबें, उसके घर की मरम्मत, और उसकी अधूरी उम्मीदें दबी पड़ी हैं।
फिर भी, वह हार नहीं मानता। अगली सुबह फिर उठता है, फिर हल चलाता है, फिर बीज डालता है, क्योंकि उसका जीवन उसके खेत से ही जुड़ा है। यही उसकी पहचान है और यही उसकी जंग।
किसान की कहानी मिट्टी पर लिखी जाती है, लेकिन उसे पढ़ने का सब्र बहुत कम लोगों में होता है। शायद इसलिए उसकी पुकार बार-बार शोर में दब जाती है।
पर सच यही है
जिसने हमें खिलाया है, उसकी थाली आज भी खाली है।
जब 27 लाख वास्तविक मतदाता सूची से हट गए हों, और अपीलें लंबित हों, तब चुनाव की निष्पक्षता कितनी बचती है। TMC का चुनाव में न उतरना एक मजबूत राजनीतिक संदेश होता। लेकिन Election Commission of India, Supreme Court of India, और संस्थागत प्रक्रियाओं पर भरोसा ही विपक्ष को भाग लेने पर मजबूर करता है यही भरोसा अब लगातार कमजोर होता दिख रहा है।
04/05/2026
रातें चाहे कितनी भी लंबी क्यों न हों… सुबह होना तय है.....उस रात भी मैं ठीक यही सोच रहा था। आसमान काला था, हवा भारी थी और भीतर जमा हुआ दुःख मानो साँसों पर बोझ बनकर बैठ गया था। ऐसा लग रहा था जैसे यह अँधेरा कभी खत्म नहीं होगा। पर तभी, जाने क्यों, दिल में एक हल्की-सी आवाज उठी— “कभी कोई रात ऐसी नहीं रही जो बीती न हो।”
मैंने इस आवाज को सुना, जैसे कोई पुराना दोस्त समझा रहा हो। जीवन के पन्ने खुद-ब-खुद खुलने लगे। याद आया, पहली बार जब दिल टूटा था, लगा था दुनिया खत्म हो गई है। वो लंबी सिसकियों वाली रातें, वो चुप्पी, वो अकेलापन सब अनंत जैसा लगता था। लेकिन आज? वही दुःख एक धुंधली स्मृति है, जैसे किसी पुराने फोटो पर समय की धूल जमी हो।
कभी पढ़ाई का दबाव भीतर तूफ़ान की तरह घूमता रहता था। लगता था कि यह संघर्ष कभी नहीं बीतेगा। लेकिन एक दिन वही किताबें बंद हो गईं, परिणाम आ गए, और जीवन आगे बढ़ गया। तब पता चला कि वक़्त कभी ठहरता नहीं… हम ही ठहर जाते हैं।
एक और पल याद आता है जब घर के किसी अपने को खो दिया था। वो शोक इतना गहरा था कि जैसे दिल का एक हिस्सा हमेशा के लिए टूट गया हो। लगता था यह दर्द उम्रभर साथ चलेगा। मगर धीरे-धीरे, उसी दर्द के आसपास नए अनुभव उग आए। मुस्कुराने के कारण लौटे, साँसें हल्की हुईं। दुःख गया नहीं, पर शांत हो गया। जैसे बारिश के बाद मिट्टी में रह जाने वाली नमी दिखती नहीं, पर रहती है।
जीवन ने मुझे बार-बार बताया कि कोई ऐसा दुःख नहीं जिसे समय शांत न कर दे।
समय कठोर नहीं है बस धैर्यवान है।
और स्मृतियाँ?
वे भी हमेशा चमकती नहीं रहतीं। समय उन पर धूल डाल देता है, ताकि हम आगे बढ़ सकें। वरना हम अतीत के बोझ में ही दबे रह जाते।
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो हर कठिन रात, हर भारी क्षण, हर आँसू मुझे एक ही बात सिखाता है
सबकुछ अस्थायी है।
हमारे सुख, हमारे दुःख, हमारे लोग, हमारी इच्छाएँ सब बदलते हैं, रूप बदलते हैं, और फिर आगे बढ़ जाते हैं।
तो फिर हम क्यों अटक जाते हैं?
क्यों सोचते हैं कि यह दर्द, यह मुश्किल, यह अकेलापन आख़िरी है?
जीवन का सच इतना सीधा है कि कभी-कभी हम उसे समझ ही नहीं पाते
जो भी है, वह बीत जाएगा।
जो बीत गया, वह लौटेगा नहीं।
और जो आने वाला है, वह अपने समय पर ही आएगा।
बस चलते रहना है, साँस लेते रहना है, स्वीकार करते रहना है।
क्योंकि दुनिया की किसी भी रात के पास इतनी ताक़त नहीं कि वह सुबह को रोक सके।
और यही जीवन का सबसे बड़ा जादू है—
कि चाहे जितनी भी अँधेरी रात हो…
सुबह होना तय है।
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मूंग की फसल में सुंडी की रोकथाम के लिए कीटनाशक का छिड़काव
03/05/2026
शिक्षक सिर्फ एक पेशा नहीं होता, वह वह शक्ति है जो एक साधारण इंसान को असाधारण बना देती है। कहा जाता है—
“शिक्षक समाज और राष्ट्र के निर्माता होते हैं”, और यह बात सौ प्रतिशत सही है, क्योंकि शिक्षक केवल किताबों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला, सही-गलत की पहचान, नैतिक मूल्य, संस्कार और आत्मविश्वास भी सिखाते हैं।
शिक्षक शब्द का अर्थ ही अपने भीतर एक गहरा संदेश छुपाए हुए है—
शि → शिखर तक ले जाने वाला
क → कमजोरी दूर करने वाला
क्ष → क्षमा की भावना रखने वाला
यानी वह व्यक्ति जो विद्यार्थी की कमजोरियों को समझकर, उसे सही दिशा दिखाकर, उसकी हर गलती को क्षमा करके उसे सफलता के शिखर तक पहुँचाए, वही सच्चे अर्थों में शिक्षक कहलाता है।
एक अच्छा शिक्षक वही है जो छात्र की आँखों में सपने पहचानता है, और फिर उन सपनों को पूरा करने की राह में आने वाली हर चुनौती को समाप्त करने में उसका साथी बन जाता है।
आज के समय में जब जीवन तेज़ गति से आगे बढ़ रहा है, ऐसे में एक शिक्षक न सिर्फ पढ़ाता है, बल्कि जीवन में संतुलन, संवेदनशीलता, अनुशासन और धैर्य जैसे गुण भी सिखाता है।
वह कभी कठोर बनकर हमें वास्तविक जीवन के लिए तैयार करता है, तो कभी दोस्त बनकर हमारे मन की उलझनें समझता है।
शिक्षक वह दीपक है जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में उजाला करता है।
वह वह सीढ़ी है जिस पर चढ़कर विद्यार्थी नई ऊँचाइयाँ पाता है।
वह वह दिशा है जो भटकते हुए को सही राह दिखाती है।
वह वह आशीर्वाद है जो जीवनभर साथ चलता है।
सच्चे शिक्षक का प्रभाव कभी खत्म नहीं होता।
उनकी बातें, उनकी डांट, उनकी सीख जीवनभर हमारे साथ रहती हैं और हर मोड़ पर हमें सही फैसला लेने में मदद करती हैं।
हर विद्यार्थी की सफलता में उसके शिक्षक का योगदान छुपा होता है।
और यही कारण है कि शिक्षक केवल पढ़ाते नहीं, जीवन बनाते हैं।
ऐसे सभी गुरुओं को मेरा हृदय से प्रणाम।
17/04/2026
महेश हमेशा समय को अपनी मुट्ठी में क़ैद समझता था घड़ी की सुइयाँ, मोबाइल का टाइमर, दफ़्तर की फाइलें, सब कुछ उसके इशारों पर चलता हुआ सा लगता था। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ उसे एहसास हुआ कि समय किसी का नहीं होता, और न ही किसी की पकड़ में आता है।
सुबह की धूप में बैठकर वह अक्सर सोचता “उम्र बढ़ रही है, समय घटता जा रहा है… पर अभी भी समय है, बस वह नहीं है जिसके साथ समय का पता नहीं चलता।”
महेश एक दिन स्टेशन पर बैठा लोगों को आते-जाते देख रहा था। किसी की ट्रेन छूट रही थी, कोई भागकर चढ़ रहा था, कोई उतरकर किसी को गले लगा रहा था। उसे लगा जैसे ज़िंदगी भी एक स्टेशन ही है जहाँ मन, क़दम, रेल, गाड़ी और हवाई जहाज़ सब अलग-अलग रास्तों पर निकलते हैं। कोई लौट रहा है, कोई जा रहा है… लेकिन कोई भी उस तरह नहीं लौटता, जैसी उम्मीद में हम खड़े रहते हैं।
महेश की ज़िंदगी में भी कोई था अनुपमा। दोनों साथ चलते-चलते कहीं रुक गए थे। रुकना शायद उनके रिश्ते का हिस्सा था, और चलना ज़िंदगी की मजबूरी। वे रुके भी एक-दूसरे के साथ थे और चले भी एक-दूसरे से दूर होकर।
यही तो अजीब बात है—हम किसी के साथ चलते भी हैं और किसी के साथ रुकते भी… पर यह तय नहीं कर पाते कि कौन हमारे साथ रहेगा, और किसके साथ बस यादों की दूरी ही रह जाएगी।
साल बीत गए। महेश ने अपनी दौड़ जारी रखी। नौकरी, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ सब कुछ चलता रहा। लेकिन उसकी रफ़्तार के भीतर एक धीमी सी कमी महसूस होती थी, जैसे सांसें तो चल रही हों पर मंज़िल का पता न हो।
एक शाम वह पुराने शहर गया जहाँ हर गली में उसकी और अनुपमा की यादें थीं। वहाँ खड़े होकर उसने महसूस किया—हम सब धीरे-धीरे याद होने की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
जीवन का हर कदम एक निशान छोड़ता है। कुछ गहरे, कुछ हल्के, कुछ मिट जाने वाले।
महेश ने उस दिन ये समझा कि इंसान उम्र से नहीं, यादों से बूढ़ा होता है। उम्र तो बस शरीर की रफ़्तार धीमी करती है, लेकिन यादें मन को समय से बहुत आगे ले जाती हैं।
वह घर लौटा, अपनी पुरानी डायरी खोली और लिखा—
“किसी दिन हम सब एक तस्वीर बनकर रह जाएंगे। लोग हमें याद करेंगे, फिर धीरे-धीरे हमारी याद भी धुंधली हो जाएगी। पर जब तक समय है, हमें किसी के साथ चलने और किसी के लिए रुकने का फ़न ज़रूर सीख लेना चाहिए।”
महेश ने घड़ी उतारी और मेज़ पर रख दी।
अब वह समय को नहीं, पलों को जीना चाहता था।
क्योंकि उसे पता चल चुका था—
समय कभी घटता नहीं, बस इंसान उससे दूर होता जाता है।
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