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ASTROLOGY, can be best described as the Crown of ancient Indian Culture. It has given today's World the basics of their present exitence.

15/05/2018

अस्त ग्रहो के फल -
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ज्योतिष शास्त्र में अस्त ग्रह के परिणामों की विशद व्याख्या मिलती है। अस्तग्रहों के बारे में यह कहा जाता है : “त्रीभि अस्तै भवे ज़डवत”,अर्थात् किसी जन्मपत्रिका में तीन ग्रहों के अस्त हो जाने पर व्यक्ति ज़ड पदार्थ के समान हो जाता है। ज़ड से तात्पर्य यहां व्यक्ति की निष्क्रियता और आलसीपन से है अर्थात् ऎसा व्यक्ति स्थिर बना रहना चाहता है, उसके शरीर, मन और वचन सभी में शिथिलता आ जाती है।
कहा जाता है कि ग्रहों के निर्बल होने में उनकी अस्तंगतता सबसे ब़डा दोष होता है। अस्त ग्रह अपने नैसर्गिक गुणों को खो देते हैं, बलहीन हो जाते हैं और यदि वह मूल त्रिकोण या उच्चा राशि में भी हों तो भी अच्छे परिणम देने में असमर्थ रहते हैं। ज्योतिष शास्त्र में एक अस्त ग्रह की वही स्थिति बन जाती है जो एक बीमार, बलहीन और अस्वस्थ राजा की होती है। यदि कोई अस्त ग्रह नीच राशि, दु:स्थान, बालत्व दोष या वृद्ध दोष, शत्रु राशि या अशुभ ग्रह के प्रभाव में हो तो ऎसा अस्त ग्रह, ग्रह कोढ़ में खाज का काम करने लगता है। उसके फल और भी निकृष्ट मिलने लगते हैं अत: किसी कुण्डली के फल निरूपण में अस्तग्रह का विश्लेषण अवश्य कर लेना चाहिए।
अस्त ग्रह की दशान्तर्दशा में कोई गंभीर दुर्घटना, दु:ख या बीमारी आदि हो जाती है। जब किसी व्यक्ति की जन्मकुण्डली में कोई शुभ ग्रह यथा बृहस्पति, शुक्र, चंद्र, बुध आदि अस्त होते हैं तो अस्तंगतता के परिणाम और भी गंभीर रूप से मिलने लगते हैं। कई कुण्डलियों में तो देखने को मिलता है कि किसी एक शुभ ग्रह के पूर्ण अस्त हो जाने मात्र से व्यक्ति का संपूर्ण जीवन ही अभावग्रस्त हो जाता है और परिणाम किसी भी रूप में आ सकते हैं जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाना, किसी पैतृक संपत्ति का नष्ट हो जाना, शरीर का कोई अंग-भंग हो जाना या किसी परियोजना में भारी हानि होने के कारण भारी धनाभाव हो जाना आदि। यह भी देखा जाता है कि यदि कोई ग्रह अस्त हो परंतु वह शुभ भाव में स्थित हो जाए अथवा उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो अस्तग्रह के दुष्परिणामों में कमी आ जाती है।
यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में लग्नेश अस्त हो और इस अस्त ग्रह पर से कोई पाप ग्रह संचार करे तो फल अत्यंत प्रतिकूल मिलते हैं। यदि कोई ग्रह अस्त हो और वह पाप प्रभाव में भी हो तो ऎसे ग्रह के दुष्परिणामों से बचने के लिए दान करना श्रेष्ठ उपाय होता है। किसी ग्रह के अस्त होने पर ऎसे ग्रह की दशा-अन्तर्दशा में अनावश्यक विलंब, किसी कार्य को करने से मना करना अथवा अन्य प्रकार के दु:खों का सामना करना प़डता है। यदि व्यक्ति की कुण्डली में कोई ग्रह सूर्य के निकटतम होकर अस्त हो जाता है तो ऎसा ग्रह बलहीन हो जाता है।
उदाहरण के लिए विवाह का कारक ग्रह यदि अस्त हो जाए और नवांश लग्नेश भी अस्त हो तो ऎसा व्यक्ति चाहे अमीर हो या गरीब, सुंदर हो या कुरूप, ल़डका हो या ल़डकी निस्संदेह विवाह में विलंब कराता है। यदि इन ग्रहों की दशा या अन्तर्दशा आ जाए तो व्यक्ति जीवन के यौवनकाल के चरम पर विवाह में देरी कर देता है और वैवाहिक सुखों (दांपत्य सुख) से वंचित हो जाता है जिसके कारण उसे समय पर संतान सुख भी नहीं मिल पाता और वैवाहिक जीवन नष्ट सा हो जाता है। अब हम ग्रहों के अस्त होने पर उनके सामान्य फलों पर विचार करते हैं कि किसी ग्रह विशेष के अस्त हो जाने पर उनकी अंतर्दशा में कैसे परिणाम आते हैं :

चंद्रमा :
किसी व्यक्ति की कुण्डली में चंद्रमा के अस्त होने पर मानसिक अशांति, माँ का अस्वस्थ होना, पैतृक संपत्ति का नष्ट होना, जन सहयोग का अभाव, व्यक्ति का अशांत हो जाना, दौरे आना, मिर्गी होना, फेफ़डों में रोग होना आदि घटनाएं होती है। यदि अस्त चंद्रमा अष्टमेश के पाप प्रभाव में हों तो व्यक्ति दीर्घकाल तक अवसादग्रस्त रहता है, इसी प्रकार द्वादशेश के प्रभाव में आने पर व्यक्ति नशे का आदि हो जाता है अथवा किसी बीमारी की निरंतर दवा खाता है।

मंगल :
किसी व्यक्ति की कुण्डली में मंगल के अस्त होने पर उसकी अंतर्दशा में व्यक्ति क्रोधी, नसों में दर्द, रक्त का दूषित हो जाना, उच्चा अवसादग्रस्तता आदि कष्ट हो जाते हैं। यदि अस्त मंगल पर राहु/केतु का प्रभाव हो तो व्यक्ति दुर्घटना, मुकदमेंबाजी या कैंसर का शिकार हो जाता है। यदि मंगल षष्ठेश के पाप प्रभाव में हो तो अस्वस्थ्य, दूषित रक्त, कैंसर या विवाद में चोटग्रस्त हो जाता है। इसी प्रकार अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति घोटालेबाज हो जाता है, भष्टाचार में लिप्त रहता है। द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति किसी नशीले पदार्थ का सेवन करने लगता है।

बुध :
अस्त बुध की अंतर्दशा में व्यक्ति भ्रमित, संवेदनशील, निर्णय लेने में विलंब करता है। अति विश्वास या न्यून विश्वास का शिकार होकर तनावग्रस्त हो जाता है, अशांत रहता है। उसके शरीर में लकवा, ऎंठन, श्वास रोग अथवा चर्म रोग हो जाते हैं। यदि अस्त बुध षष्ठेश के पाप प्रभाव में हो तो व्यक्ति तनाव, चर्म रोग या लकवाग्रस्त होकर अस्वस्थ रहता है। यदि बुध अष्टमेश के पाप प्रभाव में हो तो व्यक्ति दमा रोग से ग्रसित, मानसिक अवसाद अथवा किसी प्रियजन की मृत्यु का शोक भोगता है। यदि बुध द्वादशेश के पाप प्रभाव में हों तो व्यक्ति किसी नशे का शिकार या रोगग्रस्त रहता है।

बृहस्पति :
यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में बृहस्पति अस्त हों और बृहस्पति की अंतर्दशा आ जाए तो व्यक्ति लीवर की बीमारी और ज्वर से ग्रसित रहता है। वह अध्ययन से कट जाता है। उसकी आध्यात्मिक रूचि क्षीण हो जाती है, वह स्वार्थी हो जाता है। यदि अस्त बृहस्पति पर अन्य दूषित प्रभाव हों तो वह पुरूष संतान से वंचित हो सकता है। बृहस्पति के षष्ठेश के पाप प्रभाव में होने पर उच्चा ज्वर, टायफाइड, मधुमेह तथा मुकदमों में फँसना, अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर प्रतिष्ठा में हानि, किसी प्रियजन का वियोग अथवा किसी बुजुर्ग की मृत्यु हो जाना, इसी प्रकार द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति के विवाहेत्तर संबंध बन जाते हैं और वह किसी व्यसन से ग्रसित हो जाता है।

शुक्र :
जब किसी कुण्डली में शुक्र अस्त हो और उसकी अंतर्दशा आ जाए तो व्यक्ति की पत्नी रोगग्रस्त हो जाती है अथवा उसके गर्भाशय या बच्चोदानी में समस्या हो जाती है। व्यक्ति नेत्र रोग, चर्म रोग से भी ग्रसित हो जाता है। अस्त शुक्र के राहु-केतु के प्रभाव में आने पर व्यक्ति की प्रतिष्ठा नष्ट होती है, वह किडनी विकार या मधुमेह का शिकार हो जाता है। यदि अस्त शुक्र षष्ठेश के दुष्प्रभाव में हों तो मूत्राशय रोग, यौनांगों में विकार अथवा चर्म रोग से ग्रसित होता है, अष्टमेश के दुष्प्रभाव में होने पर दांपत्य जीवन में कटुता, किसी प्रियजन की मृत्यु का दु:ख तथा द्वादशेश के दुष्प्रभाव में होने पर व्यक्ति यौन संक्रमण रोग और नशे का आदि हो जाता है।

शनि :
यदि किसी व्यक्ति की कुण्डली में शनि अस्त हो और उनकी दशा-अन्तर्दशा आ जावे तो वह अस्थि भंग होने, टांगों या पैरों में दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द आदि से पीडित रहता है। उसे कठोर परिश्रम करना प़डता है, उसका कार्य व्यवहार नीच प्रकृति के लोगों से रहता है। उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा समाप्त होने लगती है। शनि के राहु-केतु से प्रभावित होने पर जो़डो में दर्द रहने लगता है। अस्त शनि के षष्ठेश के पाप प्रभाव में होने पर रीढ़ की हड्डी में दर्द, जो़डों में दर्द, शरीर में जक़डन रहने लगता है, मुकदमों का सामना करना प़डता है।
अस्त शनि के अष्टमेश के पाप प्रभाव में होने पर अस्थि टूट जाने, रोजगार में समस्या अथवा किसी प्रियजन का अभाव हो जाना होता है। शनि के द्वादशेश के पाप प्रभाव में होने पर व्यक्ति किसी बीमारी से ग्रस्त रहने लगता है अथवा व्यसन में डूब जाता है।

आईये जानते है सूर्य के कितना समीप आने पर कौन सा ग्रह अस्त होता है -

चन्द्रमा जब सूर्य से 12 अंश या इससे अधिक समीप आता है तो अस्त हो जाता है।
गुरू जब सूर्य से 11 अंश या इससे अधिक समीप पर आने पर स्वतः अस्त हो जाता है।
सूर्य से 13 अंश या इससे अधिक समीप आने पर बुध ग्रह अस्त हो जाता है। किन्तु यदि बुध वक्री है तो वह सूर्य से 11 अंश के आस-पास आने पर अस्त हो जाता है।
सूर्य से 09 अंश या इससे अधिक समीप आने पर शुक्र ग्रह अस्त हो जाता है। यदि शुक्र वक्री चल रहा है तो वह सूर्य से 7 अंश या इससे अधिक समीप आने पर अस्त हो जायेगी।
सूर्य से 15 अंश या इससे अधिक समीप आने पर शनि ग्रह अस्त हो जाता है।
सूर्य से 7 अंश या इससे अधिक समीप आने पर मंगल ग्रह अस्त हो जाता है।
राहु-केतु छाया ग्रह होने के कारण कभी भी अस्त नहीं होते है🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻

04/05/2018

🌷🌷पुरुषोत्तम मास🌷🌷

धर्म ग्रंथों के अनुसार तीन वर्ष में एक बार पुरुषोत्तम मास आता है। इसे अधिक मास भी कहते हैं।

पहले हम ये जान लेते हैं कि पुरुषोत्तम मास है क्या ?

ज्योतिष् शास्त्र के अनुसार जिस मास में अमावस्या से अमावस्या
के बीच में कोई संक्रांति न पड़े उसे अधिक मास कहते हैं।

संक्रांति का अर्थ सूर्य का राशि परिवर्तन से है।

सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश को ही संक्रांति कहते हैं।

ज्योतिषीय गणना के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन 6 घंटे 11 मिनट का होता है तथा एक चंद्र वर्ष 354 दिन 9 घंटे का माना जाता है।

सौर वर्ष और चंद्र वर्ष की गणना को बराबर करने के लिए अधिक मास की
उत्पत्ति हुई है।

पुरुषोत्तम मास में पूजा पाठ का विशेष महत्व है।

जो जातक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास से उपवास, पूजा पाठ दान आदि कर्म करता है। उसे पुण्य की प्राप्ति एवं कष्टों से मुक्ति मिलती है। इस वर्ष 16 मई से 13 जून तक सूर्य
संक्रांति न होने के कारण आषाढ़ अधिक मास बनता है।

शास्त्रों के अनुसार मास प्रारंभ के समय भगवान विष्णु की आराधना लाल चंदन, लाल फूल और अक्षत सहित पूजन करना चाहिए।

भगवान को घी,गुड और गेहूं के आटे से मीठे पूवे बना कर कास्य पात्र में फल फूल दक्षिणा वस्त्र के
साथ भोग लगा कर दान करना चाहिए।

धर्म ग्रंथों के अनुसार अधिक मास में शुभ कार्यों को वर्जित कहा गया है। जैसे नामकरण, गृह प्रवेश, जनेऊ संस्कार, मुंडन, विवाह, नव वधू प्रवेश, गाड़ी खरीदना,नींव पूजन आदि। इस माह में तामसिक भोजन से भी
बचना चाहिए जैसे मांस, मदिरा, लहसुन प्याज़ आदि।

इस मास में किए जाने वाले कार्य हैं वार्षिक श्राद्ध, मृत्यु तुल्य कष्ट से मुक्ति पाने के लिए रुद्राभिषेक, गर्भधान संस्कार, दान जप, पुंसवन संस्कार व सीमांत संस्कार हो सकता है।

इस मास में पुरुषोत्तम मास में भूमि पर शयन करना चाहिए, सादा और सात्विक भोजन करना चाहिये।

भागवत पुराण के 6 स्कंध में 15 अध्याय हैं।

पहले पांच अध्याय में हिरण्यकश्यप की कथा आती है। उसने एक बार ब्रह्मा जी की कठोर
तपस्या कर के उनसे ऐसा वरदान मांगा कि आप की बनाई गई सृष्टि के किसी भी महीने में न मरूं, न ऊपर मरूं न नीचे मरूं न बाहर मरूं न अंदर मरुं।

ब्रह्मा जी ने खुश हो कर तथास्तु कह दिया। उसी हिरण्यकशयप को मारने के लिए एवं भक्त प्रहलाद की रक्षा के लिए, नरसिंह अवतार ले कर इस अधिक मास में ही दुष्ट का संहार कर अधर्म का नाश किया था।

एक प्रसंग ऐसा भी मिलता है कि एक बार अधिक मास में क्षीर सागर में भगवान विष्णु के पास जा कर प्रार्थना की कि भगवान अगर मैं
इतना ही बुरा हूं तो मुझे बनाया ही क्यों ?

क्योंकि हर नक्षत्र, हर दिन, हर ग्रह का कोई न कोई स्वामी है परंतु मेरा कोई स्वामी न होने के कारण कोई भी इस
मास में शुभ कार्य नहीं करता। तब भगवान ने वरदान दिया कि आज
से तुम मेरे नाम से जाने जाओगे अर्थात पुरुषोत्तम के नाम से तथा इस माह में मेरी भक्ति करने वालों को असंख्य पुण्य की प्राप्ति होगी और वह भव सागर से मुक्ति पाएगा।

"मलमास" ,,,
हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीन वर्ष पर आने वाला अधिक मास !! इस वर्ष मलमास 16 मई से
13 जून तक है । अंग्रेजी कैलेंडर के हिसाब से 12 महीने होते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि
हिंदुओं की मान्यता के अनुसार प्रत्येक तीन साल में एक साल 13 महीनों का होता है ?

आपको यकीन भले न हो, लेकिन यह सच है।

चलिए हम आपको बताते हैं इससे जुड़ी सच्चाई।

हर तीसरे साल जो तेरहवां महीना
आता है, उस महीने को मलमास कहा जाता है।

अंग्रेजी में इस माह का जिक्र नहीं है, लेकिन हिंदुओं की मान्यता के अनुसार एक माह मलमास का होता है।

पौराणिक भारतीय ग्रंथ वायु-पुराण के अनुसार मगध सम्राट बसु द्वारा बिहार के राजगीर में 'वाजपेय यज्ञ' कराया
गया था। उस यज्ञ में राजा बसु के पितामह ब्रह्मा
सहित सभी देवी-देवता राजगीर पधारे थे। यज्ञ में पवित्र नदियों और तीर्थों के जल की जरूरत पड़ी थी। कहा जाता है कि ब्रह्मा के आह्वान पर ही
अग्निकुंड से विभिन्न तीर्थों का जल प्रकट
हुआ था। उस यज्ञ का अग्निकुंड ही आज
का ब्रह्मकुंड (राजगीर, बिहार) है।

उस यज्ञ में बड़ी संख्या में ऋषि-महर्षि भी आए थे।

पुरुषोत्तम मास, सर्वोत्तम मास में यहां अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष की प्राप्ति
की महिमा है। किंवदंती है कि भगवान ब्रह्मा से राजा हिरण्यकश्यपु ने वरदान मांगा था कि रात-दिन, सुबह-शाम और उनके द्वारा बनाए गए बारह मास में से किसी भी
मास में उसकी मौत न हो। इस वरदान को देने के बाद जब ब्रह्मा को अपनी भूल का अहसास हुआ, तब वे भगवान विष्णु के पास गए।

भगवान विष्णु ने विचारोपरांत हिरण्यकश्यपु के अंत के लिए तेरहवें महीने का निर्माण किया।

धार्मिक मान्यता है कि इस अतिरिक्त एक महीने को मलमास या अधिक
मास कहा जाता है।

वायु पुराण एवं अग्नि पुराण के अनुसार इस अवधि में सभी देवी-
देवता यहां आकर वास करते हैं।

इसी अधिक मास में मगध की पौराणिक नगरी राजगीर में प्रत्येक
ढाई से तीन साल पर विराट मलमास मेला लगता है।

इस माह में लाखों श्रद्धालु पवित्र नदियों प्राची, सरस्वती और वैतरणी के अलावा गर्म जलकुंडों, ब्रह्मकुंड, सप्तधारा, न्यासकुंड, मार्कंडेय कुंड, गंगा-यमुना कुंड, काशीधारा कुंड, अनंतऋषि कुंड, सूर्य-कुंड, राम-लक्ष्मण कुंड, सीता कुंड, गौरी कुंड और नानक कुंड में स्नान कर भगवान लक्ष्मी नारायण मंदिर में आराधना करते हैं।

वर्ष भर इन कुंडों में निरंतर उष्ण जल गिरता रहता है, इस जल का श्रोत अज्ञात है। राजगीर में इस अवसर पर भव्य
मेला भी लगता है।

राजगीर में मलमास के दौरान लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी में दिखती है
गंगा-यमुना संस्कृति की झलक।

मोक्ष की कामना और पितरों के उद्धार के लिए जुटते हैं श्रद्धालु।

इस माह विष्णु पुराण ज्ञान यज्ञ का आयोजन करके सत्‌, चित व आनंद
की प्राप्ति की जा सकती है।

कैसे पहुंचें राजगीर:-
सड़क परिवहन द्वारा राजगीर जाने के लिए पटना, गया, दिल्ली से बस सेवा उपलब्ध है।

इसमें बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम अपने पटना स्थित कार्यालय
से नालंदा एवं राजगीर के लिए टूरिस्ट बस एवं टैक्सी सेवा भी उपलब्ध
करवाता है।

इसके जरिए आप आसानी से राज‍गीर पहुंच सकते हैं। वहीं, दूसरी तरफ यहां पर वायु मार्ग
से पहुंचने के लिए निकटतम हवाई-अड्डा पटना है,जो राजगीर से करीब 107 किमी की दूरी पर है।

रेल मार्ग के लिए पटना एवं दिल्ली से सीधी रेल सेवा उपलब्ध है।

राजगीर जाने के लिए बख्तियारपुर से अलग रेल लाइन गई है, जो नालंदा
होते हुए राजगीर में समाप्त हो जाती है।

मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरूडध्वजः।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मंगलायतनो हरिः॥

भगवान् विष्णु मंगल हैं, गरुड वाहन वाले मंगल हैं, कमल के समान नेत्र वाले मंगल हैं, हरि मंगल के भंडार हैं। मंगल अर्थात् जो मंगलमय हैं, शुभ हैं,कल्याणप्रद हैं, जैसे समझ लें।

वंदना----
प्रवक्ष्याम्यधुना ह्येतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्।
नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्।।

प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।
गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभ नमोस्तु ते।।

याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।
हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम।।

प्रतीच्यां रक्ष मां विष्णो त्वामहं शरणं गत:।
मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्।।

उत्तरस्यां जगन्ननाथ भवन्तं शरणं गत:।
खड्गमादाय चर्माथ अस्त्रशस्त्रादिकं हरे।।

नमस्ते रक्ष रक्षोघ्र ऐशान्यां शरणं गत:।
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमनुघोष्यं च पङ्कजम्।।

प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्रेय्यां यज्ञशूकर।
चन्द्रसूर्य समागृह्य खड्गं चान्द्रमसं तथा।।

नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्।
वैजयन्ती सम्प्रगृह्य श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।।

वायव्यां रक्ष मां देव हयग्रीव नमोस्तुते।
वैनतेयं समरुह्य त्वन्तरिक्षे जनार्दन।।

मां रक्षस्वाजित सद नमस्तेस्त्वपराजित।
विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां तवं रसातले।।

अकूपार नमस्तुभ्यं महामीन नमोस्तु ते।
करशीर्षाद्यङ्गलीषु सत्य त्वं बाहुपञ्जरम्।।

कृत्वा रक्षस्व मां विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम।
एतदुक्तं शङ्काराय वैष्णवं पञ्जरं महत्।।

पुरा रक्षार्थमीशान्यां: कात्यायन्या वृषध्वज।
नाशयामास सा येन चामरं महिषासुरम्।।

दानव रक्तबीजं च अन्यांश्च सुरकण्टकान्।
एतज्जपन्नरो भक्तया शत्रून् विजयते सदा।।

समस्त चराचर प्राणियों का कल्याण करो प्रभु,,,,
अधर्म का नाश हो, धर्म की स्थापना हो,,,,
~~ॐ नमो नारायणाय
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय,

जयति पुण्य सनातन संस्कृति,,
जयति पुण्य भूमि भारत,,,

सदा सर्वदा सुमंगल,,
हर हर महादेव,,
ॐ विष्णवे नम:
जय भवानी,,,
जय श्री राम,,

*www.bhriguastrology.in*

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