Koti Devi Devta
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24/05/2026
सोमवार को ही भगवान शिव की पूजा
करना अधिक लाभदायक है ।
सप्ताह के सातों दिन किसी न किसी ईश्वर की पूजा, भक्ति और व्रत के लिए होता हैं पर सोमवार का दिन हिन्दू धर्म परमपराओं के अनुसार भगवान शिव को समर्पित होता है. माना जाता है कि शिवजी की भक्ति हर पल ही शुभ होती है. सच्चे मन से पूजा की जाए तो शिव अपने भक्तों पर जल्द ही प्रसन्न हो जाते है. क्यों सोमवार को ही शिवजी की पूजा करना अधिक लाभदायक होता है? आइए जानते हैं इससे जुड़ी खास बातें-
सोमवार के दिन रखा जाने वाला व्रत सोमेश्वर व्रत के नाम से जाना जाता है. इसके अपने धार्मिक महत्व होते हैं. इसी दिन चन्द्रमा की पूजा भी की जाती है. हमारे धर्मग्रंथों में सोमेश्वर शब्द के दो अर्थ होते हैं. पहला अर्थ है – सोम यानी चन्द्रमा. चन्द्रमा को ईश्वर मानकर उनकी पूजा और व्रत करना. सोमेश्वर शब्द का दूसरा अर्थ है- वह देव, जिसे सोमदेव ने भी अपना भगवान माना है. उस भगवान की सेवा-उपासना करना, और वह देवता हैं "भगवान शिव"
पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत और पूजा से ही सोमदेव ने भगवान शिव की आराधना की. जिससे सोमदेव निरोगी होकर फिर से अपने सौंदर्य को पाया. भगवान शंकर ने भी प्रसन्न होकर दूज यानी द्वितीया तिथि के चन्द्रमा को अपनी जटाओं में मुकुट की तरह धारण किया।
यही कारण है कि बहुत से साधू-संत और धर्मावलंबी इस व्रत परंपरा में शिवजी की पूजा-अर्चना भी करते आ रहे हैं क्योंकि इससे भगवान शिव की उपासना करने से चन्द्रदेव की पूजा भी हो जाती है. धार्मिक आस्था व परंपरा के चलते प्राचीन काल से ही सोमवार व्रत पर आज भी कई लोग भगवान शिव और पार्वती की पूजा करते आ रहे हैं परन्तु यह चंद्र उपासना से ज्यादा भगवान शिव की उपासना के लिए प्रसिद्ध हो गया. भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा कर सुख और कामनापूर्ति होती है।
भगवान शिव से जुड़ी रोचक बातें
*‘शिव का द्रोही मुझे स्वप्न में भी पसंद नहीं।’- भगवान राम*
हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं। शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है।
आज से १५ से २० हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। इस दौरान भगवान शंकर ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान बनाया।
भगवान विष्णु ने समुद्र को और ब्रह्मा ने नदी के किनारे को अपना स्थान बनाया था। पुराण कहते हैं कि जहां पर शिव विराजमान हैं उस पर्वत के ठीक नीचे पाताल लोक है, जो भगवान विष्णु का स्थान है। शिव के आसन के ऊपर वायुमंडल के पार क्रमश: स्वर्ग लोक और फिर ब्रह्माजी का स्थान है, जबकि धरती पर कुछ भी नहीं था। इन तीनों से सब कुछ हो गया।
वैज्ञानिकों के अनुसार तिब्बत धरती की सबसे प्राचीन भूमि है और पुरातनकाल में इसके चारों ओर समुद्र हुआ करता था। फिर जब समुद्र हटा तो अन्य धरती का प्रकटन हुआ और इस तरह धीरे-धीरे जीवन भी फैलता गया।
सर्वप्रथम भगवान शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदि देव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ। शिव को *‘आदिनाथ’* भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है। इस *‘आदिश’* शब्द से ही *‘आदेश’* शब्द बना है। नाथ साधु जब एक–दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।
भगवान शिव के अलावा ब्रह्मा और विष्णु ने संपूर्ण धरती पर जीवन की उत्पत्ति और पालन का कार्य किया। सभी ने मिलकर धरती को रहने लायक बनाया और यहां देवता, दैत्य, दानव, गंधर्व, यक्ष और मनुष्य की आबादी को बढ़ाया।
महाभारत काल
ऐसी मान्यता है कि महाभारत काल तक देवता धरती पर रहते थे। महाभारत के बाद सभी अपने-अपने धाम चले गए। कलयुग के प्रारंभ होने के बाद देवता बस विग्रह रूप में ही रह गए अत: उनके विग्रहों की पूजा की जाती है।
पहले भगवान शिव थे रुद्र
वैदिक काल के रुद्र और उनके अन्य स्वरूप तथा जीवन दर्शन को पुराणों में विस्तार मिला। वेद जिन्हें रुद्र कहते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं। वराह काल के पूर्व के कालों में भी शिव थे। उन कालों की शिव की गाथा अलग है।
देवों के देव महादेव
देवताओं की दैत्यों से प्रतिस्पर्धा चलती रहती थी। ऐसे में जब भी देवताओं पर घोर संकट आता था तो वे सभी देवाधिदेव महादेव के पास जाते थे। दैत्यों, राक्षसों सहित देवताओं ने भी शिव को कई बार चुनौती दी, लेकिन वे सभी परास्त होकर शिव के समक्ष झुक गए इसीलिए शिव हैं देवों के देव महादेव। वे दैत्यों, दानवों और भूतों के भी प्रिय भगवान हैं।
भगवान शिव ने क्यों मार दिए थे विशालकाय मानव…
ब्रह्मा ने बनाए विशालकाय मानव
सन् २००७ में नेशनल जिओग्राफी की टीम ने भारत और अन्य जगह पर २० से २२ फिट मानव के कंकाल ढूंढ निकाले हैं। भारत में मिले कंकाल को कुछ लोग भीम पुत्र घटोत्कच और कुछ लोग बकासुर का कंकाल मानते हैं।
हिन्दू धर्म के अनुसार सतयुग में इस तरह के विशालकाय मानव हुआ करते थे। बाद में त्रेतायुग में इनकी प्रजाति नष्ट हो गई। पुराणों के अनुसार भारत में दैत्य, दानव, राक्षस और असुरों की जाति का अस्तित्व था, जो इतनी ही विशालकाय हुआ करती थी।
भारत में मिले इस कंकाल के साथ एक शिलालेख भी मिला है। यह उस काल की ब्राह्मी लिपि का शिलालेख है। इसमें लिखा है कि ब्रह्मा ने मनुष्यों में शांति स्थापित करने के लिए विशेष आकार के मनुष्यों की रचना की थी। विशेष आकार के मनुष्यों की रचना एक ही बार हुई थी। ये लोग काफी शक्तिशाली होते थे और पेड़ तक को अपनी भुजाओं से उखाड़ सकते थे। लेकिन इन लोगों ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और आपस में लड़ने के बाद देवताओं को ही चुनौती देने लगे। अंत में भगवान शंकर ने सभी को मार डाला और उसके बाद ऐसे लोगों की रचना फिर नहीं की गई।
भगवान शिव का धनुष पिनाक
शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था। देवी और देवताओं के काल की समाप्ति के बाद इस धनुष को देवरात को सौंप दिया गया था।
उल्लेखनीय है कि राजा दक्ष के यज्ञ में यज्ञ का भाग शिव को नहीं देने के कारण भगवान शंकर बहुत क्रोधित हो गए थे और उन्होंने सभी देवताओं को अपने पिनाक धनुष से नष्ट करने की ठानी। एक टंकार से धरती का वातावरण भयानक हो गया। बड़ी मुश्किल से उनका क्रोध शांत किया गया, तब उन्होंने यह धनुष देवताओं को दे दिया।
देवताओं ने राजा जनक के पूर्वज देवरात को दे दिया। राजा जनक के पूर्वजों में निमि के ज्येष्ठ पुत्र देवरात थे। शिव-धनुष उन्हीं की धरोहरस्वरूप राजा जनक के पास सुरक्षित था। इस धनुष को भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथों से बनाया था। उनके इस विशालकाय धनुष को कोई भी उठाने की क्षमता नहीं रखता था। लेकिन भगवान राम ने इसे उठाकर इसकी प्रत्यंचा चढ़ाई और इसे एक झटके में तोड़ दिया।
भगवान शिव का चक्र
चक्र को छोटा, लेकिन सबसे अचूक अस्त्र माना जाता था। सभी देवी-देवताओं के पास अपने-अपने अलग-अलग चक्र होते थे। उन सभी के अलग-अलग नाम थे। शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।
यह बहुत कम ही लोग जानते हैं कि सुदर्शन चक्र का निर्माण भगवान शंकर ने किया था। प्राचीन और प्रामाणिक शास्त्रों के अनुसार इसका निर्माण भगवान शंकर ने किया था। निर्माण के बाद भगवान शिव ने इसे श्रीविष्णु को सौंप दिया था। जरूरत पड़ने पर श्रीविष्णु ने इसे देवी पार्वती को प्रदान कर दिया। पार्वती ने इसे परशुराम को दे दिया और भगवान कृष्ण को यह सुदर्शन चक्र परशुराम से मिला।
त्रिशूल
इस तरह भगवान शिव के पास कई अस्त्र-शस्त्र थे लेकिन उन्होंने अपने सभी अस्त्र-शस्त्र देवताओं को सौंप दिए। उनके पास सिर्फ एक त्रिशूल ही होता था। यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। त्रिशूल ३ प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें ३ तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा पाशुपतास्त्र भी भगवान् शिव का अस्त्र है।
भगवान शिव का सेवक वासुकी
शिव को नागवंशियों से घनिष्ठ लगाव था। नाग कुल के सभी लोग शिव के क्षेत्र हिमालय में ही रहते थे। कश्मीर का अनंतनाग इन नागवंशियों का गढ़ था। नागकुल के सभी लोग शैव धर्म का पालन करते थे। नागों के प्रारंभ में ५ कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।
नाग वंशावलियों में *‘शेषनाग’* को नागों का प्रथम राजा माना जाता है। शेषनाग को ही *‘अनंत’* नाम से भी जाना जाता है। ये भगवान विष्णु के सेवक थे। इसी तरह आगे चलकर शेष के बाद वासुकी हुए, जो शिव के सेवक बने। फिर तक्षक और पिंगला ने राज्य संभाला। वासुकी का कैलाश पर्वत के पास ही राज्य था और मान्यता है कि तक्षक ने ही तक्षकशिला (तक्षशिला) बसाकर अपने नाम से *‘तक्षक’* कुल चलाया था। उक्त पांचों की गाथाएं पुराणों में पाई जाती हैं।
उनके बाद ही कर्कोटक, ऐरावत, धृतराष्ट्र, अनत, अहि, मनिभद्र, अलापत्र, कम्बल, अंशतर, धनंजय, कालिया, सौंफू, दौद्धिया, काली, तखतू, धूमल, फाहल, काना इत्यादि नाम से नागों के वंश हुए जिनके भारत के भिन्न-भिन्न इलाकों में इनका राज्य था।
अमरनाथ के अमृत वचन किस नाम से सुरक्षित…
अमरनाथ के अमृत वचन
शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए ११२ ध्यान सूत्रों का संकलन है।
योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव *‘विज्ञान भैरव तंत्र’* और *‘शिव संहिता’₹ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं- ‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। -मेरुतंत्र
भगवान शिव ने अपना ज्ञान सबसे पहले किसे दिया…...
भगवान शिव के शिष्य
शिव तो जगत के गुरु हैं। मान्यता अनुसार सबसे पहले उन्होंने अपना ज्ञान सप्त ऋषियों को दिया था। सप्त ऋषियों ने शिव से ज्ञान लेकर अलग-अलग दिशाओं में फैलाया और दुनिया के कोने-कोने में शैव धर्म, योग और ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। इन सातों ऋषियों ने ऐसा कोई व्यक्ति नहीं छोड़ा जिसको शिव कर्म, परंपरा आदि का ज्ञान नहीं सिखाया गया हो। आज सभी धर्मों में इसकी झलक देखने को मिल जाएगी। परशुराम और रावण भी शिव के शिष्य थे।
शिव ने ही गुरु और शिष्य परंपरा की शुरुआत की थी जिसके चलते आज भी नाथ, शैव, शाक्त आदि सभी संतों में उसी परंपरा का निर्वाह होता आ रहा है। आदि गुरु शंकराचार्य और गुरु गोरखनाथ ने इसी परंपरा और आगे बढ़ाया।
सप्त ऋषि ही शिव के मूल शिष्य
भगवान शिव ही पहले योगी हैं और मानव स्वभाव की सबसे गहरी समझ उन्हीं को है। उन्होंने अपने ज्ञान के विस्तार के लिए ७ ऋषियों को चुना और उनको योग के अलग-अलग पहलुओं का ज्ञान दिया, जो योग के ७ बुनियादी पहलू बन गए। वक्त के साथ इन ७ रूपों से सैकड़ों शाखाएं निकल आईं। बाद में योग में आई जटिलता को देखकर पतंजलि ने ३०० ईसा पूर्व मात्र २०० सूत्रों में पूरे योग शास्त्र को समेट दिया। योग का 8वां अंग मोक्ष है। ७ अंग तो उस मोक्ष तक पहुंचने के लिए है।
भगवान शिव के गणों के नाम
भगवान शिव गण
भगवान शिव की सुरक्षा और उनके आदेश को मानने के लिए उनके गण सदैव तत्पर रहते हैं। उनके गणों में भैरव को सबसे प्रमुख माना जाता है। उसके बाद नंदी का नंबर आता और फिर वीरभ्रद्र। जहां भी शिव मंदिर स्थापित होता है, वहां रक्षक (कोतवाल) के रूप में भैरवजी की प्रतिमा भी स्थापित की जाती है। भैरव दो हैं- काल भैरव और बटुक भैरव। दूसरी ओर वीरभद्र शिव का एक बहादुर गण था जिसने शिव के आदेश पर दक्ष प्रजापति का सर धड़ से अलग कर दिया। देव संहिता और स्कंद पुराण के अनुसार शिव ने अपनी जटा से *‘वीरभद्र’* नामक गण उत्पन्न किया।
इस तरह उनके ये प्रमुख गण थे- भैरव, वीरभद्र, मणिभद्र, चंदिस, नंदी, श्रृंगी, भृगिरिटी, शैल, गोकर्ण, घंटाकर्ण, जय और विजय। इसके अलावा, पिशाच, दैत्य और नाग-नागिन, पशुओं को भी शिव का गण माना जाता है। ये सभी गण धरती और ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं और प्रत्येक मनुष्य, आत्मा आदि की खैर-खबर रखते हैं।
भगवान शिव के द्वारपाल
भगवान शिव के द्वारपाल
कैलाश पर्वत के क्षेत्र में उस काल में कोई भी देवी या देवता, दैत्य या दानव शिव के द्वारपाल की आज्ञा के बगैर अंदर नहीं जा सकता था। ये द्वारपाल संपूर्ण दिशाओं में तैनात थे।
इन द्वारपालों के नाम हैं- नंदी, स्कंद, रिटी, वृषभ, भृंगी, गणेश, उमा-महेश्वर और महाकाल। उल्लेखनीय है कि शिव के गण और द्वारपाल नंदी ने ही कामशास्त्र की रचना की थी। कामशास्त्र के आधार पर ही कामसूत्र लिखा गया था।
भगवान शिव पंचायत को जानिए
भगवान शिव पंचायत
पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है। देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में ५ देवता शामिल थे।
ये ५ देवता थे :
१. सूर्य,
२. गणपति,
३. देवी,
४. रुद्र और
५. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
भगवान शिव के पार्षद
भगवान शिव पार्षद
जिस तरह जय और विजय विष्णु के पार्षद हैं उसी तरह बाण, रावण, चंड, नंदी, भृंगी आदि शिव के पार्षद हैं। यहां देखा गया है कि नंदी और भृंगी गण भी है, द्वारपाल भी है और पार्षद भी।
भगवान शिव के प्रतीक चिह्न
भगवान शिव चिह्न
वनवासी से लेकर सभी साधारण व्यक्ति जिस चिह्न की पूजा कर सकें, उस पत्थर के ढेले, बटिया को शिव का चिह्न माना जाता है। इसके अलावा रुद्राक्ष और त्रिशूल को भी शिव का चिह्न माना गया है। कुछ लोग डमरू और अर्ध चंद्र को भी शिव का चिह्न मानते हैं। हालांकि ज्यादातर लोग शिवलिंग अर्थात शिव की ज्योति का पूजन करते हैं।
भगवान शिव की जटाएं हैं। उन जटाओं में एक चंद्र चिह्न होता है। उनके मस्तष्क पर तीसरी आंख है। वे गले में सर्प और रुद्राक्ष की माला लपेटे रहते हैं। उनके एक हाथ में डमरू तो दूसरे में त्रिशूल है। वे संपूर्ण देह पर भस्म लगाए रहते हैं। उनके शरीर के निचले हिस्से को वे व्याघ्र चर्म से लपेटे रहते हैं। वे वृषभ की सवारी करते हैं और कैलाश पर्वत पर ध्यान लगाए बैठे रहते हैं। माना जाता है कि केदारनाथ और अमरनाथ में वे विश्राम करते हैं।
भस्मासुर से बचकर यहां छिप गए थे शिव
भगवान शिव की गुफा
शिव ने एक असुर को वरदान दिया था कि तू जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा। इस वरदान के कारण ही उस असुर का नाम भस्मासुर हो गया। उसने सबसे पहले शिव को ही भस्म करने की सोची।
भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शंकर वहां से भाग गए। उनके पीछे भस्मासुर भी भागने लगा। भागते-भागते शिवजी एक पहाड़ी के पास रुके और फिर उन्होंने इस पहाड़ी में अपने त्रिशूल से एक गुफा बनाई और वे फिर उसी गुफा में छिप गए। बाद में विष्णुजी ने आकर उनकी जान बचाई।
माना जाता है कि वह गुफा जम्मू से 150 किलोमीटर दूर त्रिकूटा की पहाड़ियों पर है। इन खूबसूरत पहाड़ियों को देखने से ही मन शांत हो जाता है। इस गुफा में हर दिन सैकड़ों की तादाद में शिवभक्त शिव की अराधना करते हैं।
भगवान राम ने किया था भगवान शिव से युद्ध : सभी जानते हैं कि राम के आराध्यदेव शिव हैं, तब फिर राम कैसे शिव से युद्ध कर सकते हैं? पुराणों में विदित दृष्टांत के अनुसार यह युद्ध श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के दौरान लड़ा गया।
यज्ञ का अश्व कई राज्यों को श्रीराम की सत्ता के अधीन किए जा रहा था। इसी बीच यज्ञ का अश्व देवपुर पहुंचा, जहां राजा वीरमणि का राज्य था। वीरमणि ने भगवान शंकर की तपस्या कर उनसे उनकी और उनके पूरे राज्य की रक्षा का वरदान मांगा था। महादेव के द्वारा रक्षित होने के कारण कोई भी उनके राज्य पर आक्रमण करने का साहस नहीं करता था। जब यज्ञ का घोड़ा उनके राज्य में पहुंचा तो राजा वीरमणि के पुत्र रुक्मांगद ने उसे बंदी बना लिया। ऐसे में अयोध्या और देवपुर में युद्ध होना तय था।
महादेव ने अपने भक्त को मुसीबत में जानकर वीरभद्र के नेतृत्व में नंदी, भृंगी सहित अपने सारे गणों को भेज दिया। एक और राम की सेना तो दूसरी ओर शिव की सेना थी। वीरभद्र ने एक त्रिशूल से राम की सेना के पुष्कल का मस्तक काट दिया। उधर भृंगी आदि गणों ने भी राम के भाई शत्रुघ्न को बंदी बना लिया। बाद में हनुमान भी जब नंदी के शिवास्त्र से पराभूत होने लगे तब सभी ने राम को याद किया। अपने भक्तों की पुकार सुनकर श्रीराम तत्काल ही लक्ष्मण और भरत के साथ वहां आ गए। श्रीराम ने सबसे पहले शत्रुघ्न को मुक्त कराया और उधर लक्ष्मण ने हनुमान को मुक्त करा दिया। फिर श्रीराम ने सारी सेना के साथ शिव गणों पर धावा बोल दिया। जब नंदी और अन्य शिव के गण परास्त होने लगे तब महादेव ने देखा कि उनकी सेना बड़े कष्ट में है तो वे स्वयं युद्ध क्षेत्र में प्रकट हुए, तब श्रीराम और शिव में युद्ध छिड़ गया।
भयंकर युद्ध के बाद अंत में श्रीराम ने पाशुपतास्त्र निकालकर कर शिव से कहा, ‘हे प्रभु, आपने ही मुझे ये वरदान दिया है कि आपके द्वारा प्रदत्त इस अस्त्र से त्रिलोक में कोई पराजित हुए बिना नहीं रह सकता इसलिए हे महादेव, आपकी ही आज्ञा और इच्छा से मैं इसका प्रयोग आप पर ही करता हूं’, ये कहते हुए श्रीराम ने वो महान दिव्यास्त्र भगवान शिव पर चला दिया।
वो अस्त्र सीधा महादेव के ह्वदयस्थल में समा गया और भगवान रुद्र इससे संतुष्ट हो गए। उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक श्रीराम से कहा कि आपने युद्ध में मुझे संतुष्ट किया है इसलिए जो इच्छा हो वर मांग लें। इस पर श्रीराम ने कहा कि ‘हे भगवन्, यहां मेरे भाई भरत के पुत्र पुष्कल सहित असंख्य योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए है, कृपया कर उन्हें जीवनदान दीजिए।’ महादेव ने कहा कि ‘तथास्तु।’ इसके बाद शिव की आज्ञा से राजा वीरमणि ने यज्ञ का अश्व श्रीराम को लौटा दिया और श्रीराम भी वीरमणि को उनका राज्य सौंपकर शत्रुघ्न के साथ अयोध्या की ओर चल दिए।
ब्रह्मा, विष्णु और शिव का जन्म एक रहस्य है। तीनों के जन्म की कथाएं वेद और पुराणों में अलग-अलग हैं, लेकिन उनके जन्म की पुराण कथाओं में कितनी सच्चाई है और उनके जन्म की वेदों में लिखी कथाएं कितनी सच हैं, इस पर शोधपूर्ण दृष्टि की जरूरत है।
यहां यह बात ध्यान रखने की है कि ईश्वर अजन्मा है।
अलग-अलग पुराणों में भगवान शिव और विष्णु के जन्म के विषय में कई कथाएं प्रचलित हैं। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव को स्वयंभू माना गया है जबकि विष्णु पुराण के अनुसार भगवान विष्णु स्वयंभू हैं।
शिव पुराण के अनुसार एक बार जब भगवान शिव अपने टखने पर अमृत मल रहे थे तब उससे भगवान विष्णु पैदा हुए जबकि विष्णु पुराण के अनुसार ब्रह्मा भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए जबकि शिव भगवान विष्णु के माथे के तेज से उत्पन्न हुए बताए गए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार माथे के तेज से उत्पन्न होने के कारण ही शिव हमेशा योगमुद्रा में रहते हैं।
भगवान शिव के जन्म की कहानी हर कोई जानना चाहता है। श्रीमद् भागवत के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु और ब्रह्मा अहंकार से अभिभूत हो स्वयं को श्रेष्ठ बताते हुए लड़ रहे थे, तब एक जलते हुए खंभे से जिसका कोई भी ओर-छोर ब्रह्मा या विष्णु नहीं समझ पाए, भगवान शिव प्रकट हुए।
यदि किसी का बचपन है तो निश्चत ही जन्म भी होगा और अंत भी। *विष्णु पुराण* में शिव के बाल रूप का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार ब्रह्मा को एक बच्चे की जरूरत थी। उन्होंने इसके लिए तपस्या की। तब अचानक उनकी गोद में रोते हुए बालक शिव प्रकट हुए। ब्रह्मा ने बच्चे से रोने का कारण पूछा तो उसने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया कि उसका नाम *‘ब्रह्मा’* नहीं है इसलिए वह रो रहा है।
तब ब्रह्मा ने शिव का नाम *‘रुद्र’* रखा जिसका अर्थ होता है ‘रोने वाला’। शिव तब भी चुप नहीं हुए इसलिए ब्रह्मा ने उन्हें दूसरा नाम दिया, पर शिव को नाम पसंद नहीं आया और वे फिर भी चुप नहीं हुए। इस तरह शिव को चुप कराने के लिए ब्रह्मा ने ८ नाम दिए और शिव ८ नामों (रुद्र, शर्व, भाव, उग्र, भीम, पशुपति, ईशान और महादेव) से जाने गए। शिव पुराण के अनुसार ये नाम पृथ्वी पर लिखे गए थे।
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24/05/2026
भगवान श्रीकृष्ण के रहस्य विश्व (विराट) स्वरूप
इस रूप का विस्तृत वर्णन श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय ११ में है, जिसमें भगवान कृष्ण अर्जुन को कुरुक्षेत्र युद्ध में विश्वरूप दर्शन कराते हैं। यह युद्ध कौरवों तथा पाण्डवों के बीच राज्य को लेकर हुआ था। इसके संदर्भ में वेदव्यास कृत महाभारत ग्रंथ प्रचलित है। परंतु विश्वरूप दर्शन राजा बलि आदि ने भी किया है। भगवान श्री कृष्ण नें गीता में कहा है
"पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥
अर्थात्- हे पार्थ! अब तुम मेरे अनेक अलौकिक रूपों को देखो। मैं तुम्हें अनेक प्रकार की आकृतियों वाले रंगो को दिखाता हूँ। विश्वरूप अर्थात् विश्व (संसार) और रूप। अपने विश्वरूप में भगवान संपूर्ण ब्रह्मांड का दर्शन एक पल में करा देते हैं। जिसमें ऐसी वस्तुऐं होती हैं जिन्हें मनुष्य नें देखा है परंतु ऐसी वस्तुऐं भी होतीं हैं जिसे मानव ने न ही देखा और न ही देख पाएगा।
संजय को हुए थे विश्वरूप दर्शन:-- महाभारत में संजय को दिव्यदृष्टि प्राप्त हुई जिससे वह कुरुक्षेत्र का हाल धृतराष्ट्र को कहने लगा। कुरुक्षेत्र में विश्वरूप का दर्शन करने का सौभाग्य अर्जुन को मिला।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्॥
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥
अर्थात- संजय धृतराष्ट्र के समक्ष भगवान विराट के स्वरूप का वर्णन करता है-- अनगिनत नेत्रों से युक्त प्रभु नारायण अनेक दर्शनों से संपन्न हैं। कई प्रकार के दिव्य अस्त्र शस्त्र धारण कियें हैं, दिव्य आभूषण तथा अद्भुत सुगंध से युक्त प्रभु सुशोभित हैं। अनेक अश्चर्यों से युक्त हैं। सीमारहित (असीमित आकार वाले) तथा किसी एक दिशा में नहीं भगवान सभी दसों दिशाओं की ओर मुख किये हैं। कदाचित् प्रभु विश्वरूप से उत्पन्न प्रकाश की बराबरी आकाश में अनगिनत सूर्योदय हो तब उनसे निकला प्रकाश ही कर पाएँ।
शुक्लयजुर्वेदीय रुद्राष्टाध्यायी के द्वितीय अध्याय (पुरूसुक्त) में लिखा है--
हरि: ॐ सहस्त्रशीर्षापुरुष:सहस्त्राक्ष:सहस्त्रपात्॥ सभूमिगूँसर्वतस्पृत्त्वात्त्यतिष्ठ्ठद्दशांगुलम्॥१॥ पुरुषऽएवेदगूँसर्वंयद्भूतंयच्चभाव्यम्॥ उतामृतत्वस्येशानोयदन्नेनातिरोहति॥२॥ एतावानस्यमहिमातोज्यायाँश्चपूरुष:॥ पादोस्यविश्वाभूतानित्रिपादस्यामृतन्दिवि॥३॥
इन तीन प्रारंभिक ऋचाओं में बताया गया है, सभी लोकों में व्याप्त महानारायण (विश्वरूप) सर्वात्मक होने से अनंत सिरों, आखों तथा पैरों वाले हैं। वह पाँच तत्वों (भूमि, जल, वायु, अग्नि, आकाश) से बने समस्त व्यष्टि और समष्टि ब्रह्मांड को सब ओर से व्याप्त कर नाभि से दस अंगुल परिमित देश का अतिक्रमण हृदय में अंतर्यामी रूप में स्थित हैं।
जो यह वर्तमान तथा अतीत जगत् है तथा जो भविष्य में होने वाला जगत् है जो जगत् के बीज अथवा परिणामभूत वीर्य से नर, पशु, वृक्ष आदि के रूप में प्रकट होता है, वह सब अमृतत्व (मोक्ष) के स्वामी महानारायण पुरुष का ही विस्तार है।
इस महानारायण पुरुष की इतनी सब विभूतियाँ हैं अर्थात् भूत भविष्य वर्तमान में विद्यमान सब कुछ उसी की महिमा का एक अंश है। वह विराट् पुरुष तो इस संसार से अतिशय अधिक है। इसीलिये यह सारा विराट् जगत् उसका चतुर्थांश है। इस परमात्मा का अवशिष्ट तीन पाद अपने अमृतमय (विनाशरहित) प्रकाशमान स्वरूप में स्थित है।
ॐ नमो स्त्वनंताय सहस्त्रमूर्तये, सहस्त्रपादा क्षिशिरोरूहावहे।
सहस्त्र नाम्ने पुरूषाय शाश्वते, सहस्त्रकोटि युगधारिणे नमः॥
अर्थात्- हे अनंत हजारों स्वरूपों वाले हजारों पैरों, अखों, हृदयों तथा हजारों भुजाओं वाले। हजारों नाम वाले शाश्वत महापुरुष सहस्त्रकोटि युगों के धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। इस प्रकार इस श्लोक में भगवान का स्वरूप प्रदर्शित किया गया है।
श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार स्वरूप वर्णन:-गीता में बताया गया है, भगवान में अदिति के १२ पुत्र (द्वादशादित्य), ८ वसु, ११ रूद्र, दोनो अश्विनीकुमार, ४९ मरुद्गण, स्वर्ग, नरक, मृत्युलोक आदि सभी लोक तथा १४ भुवन, इंद्र तथा सभी देवता, अनेकों सूर्य, अनेकों ब्रह्मा, शिव, इसके साथ ही अनेक शक्तिशाली अज्ञात प्राणी भी समाहित हैं।
उनमें भीष्म, कौरव, द्रोणाचार्य सहित सचराचर ब्रह्मांड समाहित है। भगवान अर्जुन से कहते हैं कि पार्थ! मेरे शरीर में उस एक अल्प स्थान में समाहित सम्पूर्ण ब्रह्मांड का तथा तुम जो देखना चाहो उसका दर्शन करो। भगवान विश्वरूप अनगिनत हाथ तथा अस्त्र वाले हैं। उनके हाथों में शंख, सुदर्शन चक्र, गदा, धनुष तथा नंदक तलवार शोभायमान हैं।
विश्व के हर जीव, मनुष्य, मुनी, विभिन्न देवता आदि उनके अंदर हैं। उनमें कौरव, पाण्डव तथा समस्त कुरुक्षेत्र दिखाई दे रहा है। केवल दिव्य दृष्टि का उपयोग कर एक धन्य मानव उस अद्भुत स्वरूप का दर्शन कर सकता है तथा प्रभु के परम् भक्तों में ही उस स्वरूप को देखने की क्षमता है। परंपिता का यह स्वरूप साधारण मानव के लिये अत्यंत भयावह है।
उद्देश्य:- महाभारत आदि ग्रंथों में इस स्वरूप की कथाओं से यह उद्देश्य बाहर आता है कि मानव स्व साक्षात्कार करे। उसे यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि इस अगाध ब्रह्मांड के समक्ष उसका क्या स्थान है। विश्व के आडब्बरों को छोंड़कर वह स्वयं को प्रभु में देखे। भगवद्भक्ति में अहंकार का स्थान नहीं।
लक्ष्मी जी को हुए थे विश्वरूप दर्शन :-- एक कथा के अनुसार महर्षि भृगु के घर एक रूपवती कन्या का जन्म हुआ जिसका नाम लक्ष्मी रखा गया। वह कन्या भगवान विष्णु की कथा सुनकर बड़ी हुई थी। उसे नारायण से प्रेम हो गया तथा उसने नारायण को मन से पति स्वीकार लिया था।
लक्ष्मी नें हजारों वर्षों तक तपस्या की उस दौरान देवराज इंद्रविष्णु के रूप में लक्ष्मी के समक्ष आए और वरदान माँगने को कहा, लक्ष्मी ने विश्वरूप दर्शन कराने का आग्रह किया।
अंत में भगवान विष्णु ने लक्ष्मी को अपने विराटरूप का दर्शन कराया तथा लक्ष्मी और नारायण का विवाह हुआ।कई पुराणों में माता लक्ष्मी के प्रभु से रूठने तथा समुद्र में समाने की कथा वर्णित है। जो समुद्र मंथन से बाहर निकलीं।
नारद जी को हुए थे विश्वरूप दर्शन- देव ऋषि नारद पूर्वजन्म में गंधर्व थे। एक बार ब्रह्मलोक में एक सभा बुलाई गई जिसमें कई देवता भगवन्नाम संकीर्तन के लिये एकत्र हुए। वहाँ नारद भी अपनी स्त्रियों के साथ पधारे। भगवान के संकीर्तन सभा में भगवन्नाम छोड़कर विनोद करते नारद को ब्रह्मा ने शूद्र होने का श्राप दिया। इस कारण नारद जी का जन्म शूद्र कुल में हो गया। इनके जन्म पश्चात ही पिता की मृत्यु हो गई। माता दासी का कार्य कर नारद जी का भरण पोषण करती थी।
एक समय इनके ग्राम में कुछ महात्माओं का आगमन हुआ तथा वे चतुर्मास्य व्यतीत करने के लिये वहीं रुक गए। नारद जी बचपन में भी सुशील थे तथा खेल कूद छोड़कर उन महात्माओं की मन से सेवा करते थे तथा वहीं अपना दिन व्यतीत करते थे, तन्मयतापूर्वक भगवत्कथा सुना करते थे। महात्माओं की सेवा से इनके पूर्वजन्म के पाप धुल गए।
महात्माओं ने जाते जाते नारद को भगवन्नाम संकीर्तन का उपदेश दिया। सर्पदंश से नारद की माता का भी स्वर्गवास हो गया। भिक्षुक की भाँति भोजन के लिये किसी के घर के सामने खड़ा रहता तब भोजन प्राप्त होती थी, पंचवर्षीय नारद इन कष्टों को भगवान की इच्छा समझकर टालते थे। नारद को अन्य बालक भी सताते थे। नारद ने महात्माओं के विधि अनुसार जाप किया तब प्रभु विष्णु ने उन्हें अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिया।
तत्पश्चात इन्हें प्रभु के दर्शन नहीं हुए। अंत में उन्होंने कठिन तपस्या की तब जाकर भगवान विष्णु नें उन्हें अपने विश्वरूप का दर्शन कराया और कहा कि-
"नारद! अगले जन्म में तुम ब्रह्मा के मानस पुत्र तथा मेरे पार्षद के रूप में जन्म लोगे, तब तुम हर दिन मेरा दर्शन करोगे।"
अगले जन्म में नारद भगवान विष्णु के अवतार के रूप में ब्रह्मा के मानस पुत्र हुए।
राजा बलि जी को हुए थे विश्वरूप दर्शन - भगवान ने बलि के ऊपर कृपा कर उसे भी विश्वरूप का दर्शन कराया।
पूर्वजन्म में राजा बलि एक दुष्ट धूतकर्मा था जो जूआ खेला करता था। एक दिन जूए से प्राप्त धन लेकर एक वैश्या के घर की ओर दौड़ा जा रहा था, एक ठोकर से बेहोश हो भूमि में गिर पड़ा। इस घटना के पश्चात उसमें शिव भक्ति जागी तथा उसने शिव का पूजन किया।
मृत्यु के उपरांत यम ने उसे नर्क की यातना भोगने का आदेश दिया। शिव के आशीर्वाद से उसे तीन घड़ी के लिये स्वर्ग का राज्य मिला। उसने कल्पवृक्ष, ऐरावत आदि को मुनियों को दान में दिया। इस दानी भाव से उसे मुक्ति मिली तथा अगले जन्म में भगवान विष्णु के परम् भक्त प्रह्लाद के पौत्र के रूप में जन्म लिया।
श्रीमद् भागवत के अनुसार शुक्राचार्य के बहकावे से बलि ने स्वर्ग पर अधिपत्य कर लिया। सभी देवता भगवान विष्णु के पास गए तब विष्णु ने वामनावतार लिया।
वे अदिति के पुत्र तथा इंद्र के भाई थे। वे द्वादश आदित्यों में बारहवें थे। उनका स्वरूप एक बौने ब्राह्मण का था तथा हाथ में लकड़ी का छत्ता तथा दूसरे हाथ में कमंडलु सुशोभित था। बलि अश्वमेध यज्ञ कर रहा था। सभी मुनि महात्माओं को यत्किंचित् दान देता था। भगवान वामन बलि के पास जाकर तीन पग भूमि माँगते हैं। बलि आश्चर्य में हो सोचता है कि तीन पग भूमि में यह क्या करेंगे??
तभी शुक्राचार्य आते हैं, वे बलि को सूचित करते हैं कि यह छोटा ब्राह्मण साक्षात् परम् ब्रह्म परमात्मा है परंतु बलि दान देने से नहीं कतराता। अंत में शुक्राचार्य संकल्प पात्र के छिद्र में कीट बनकर बैठ जाते हैं। जब बलि दान संकल्प के लिये संकल्प पात्र से जल गिराने का प्रयास करता है तब उसमें से जल की एक बूँद भी नहीं गिरती।
भगवान वामन एक कुश के टुकड़े को उस छिद्र में डालते हैं जिससे शुक्राचार्य काने हो जाते हैं और वहाँ से प्रस्थान करते हैं। बलि का दान संकल्प पूर्ण होता है तत्पश्चात् बलि वामन से आग्रह करते हैं कि वे तीन पग भूमि नाप लें। भगवान का आकार बढ़ता जाता है अंत में भगवान विराट स्वरूप (विश्वरूप) धारण करते हैं तथा अपना एक पद आकाश की ओर बढ़ाते हैं। नारायण का पैर सरलता से स्वर्ग आदि लोक को पार करता हुआ ब्रह्मलोक में पहुँच गया। वहाँ ब्रह्मा ने पादप्रक्षालन किया जिसके जल से तारणी गंगा प्रवाहित हुईं।
भगवान का एक पाद नागलोक, सुतल, रसातल आदि लोकों को पार कर पाताल में पहुंच जाता है। भगवान ने दो पद में ही बलि का सारा राज्य नाप दिया। प्रभु बलि से प्रश्न करते है, "हे बलि! अब तुम मुझे बताओ कि मैं अपना एक पैर कहाँ रखूँ?" तब बलि कहता है, "हे पालनहार! आप अपने चरणकमल को मेरे मस्तक पर रखकर मुझे अनुग्रहित करें।
और प्रभु नें अपना एक पैर बलि के मस्तक पर रखा तथा उसे सुतल लोक में स्थान दिया। बलि प्रभु का नित दर्शन करना चाहते थे इस कारण वे भी बलि के साथ सुतल लोक चले गए। अभी तक उनका अंश राजा बलि के द्वारपाल के रूप में सुतल लोक में स्थापित हैं।
माता यशोदा जी को हुए थे विश्वरूप दर्शन- माता यशोदा को भी अन्य रूप में कन्हैया (कृष्ण) ने विश्वरूप का दर्शन कराया था।
एक दिन भगवान बालकृष्ण ने मिट्टी खा लिया। बलदऊ तथा कृष्ण के मित्रों ने यह बात माता यशोदा को बताया। माता ने कृष्ण से पुछा "कान्हाँ! क्या तुमने मिट्टी खाई?" कृष्ण ने कहा "नही मैया, नहीं खाई।" माता ने बलदाऊ से पूछा तो उन्होंने माता को सत्य से अवगत कराया।
माता ने कृष्ण को मुँह खोलने को कहा। अनजान कृष्ण ने मुँह खोला। माता यशोदा कृष्ण के मुख से अंदर मिट्टी के कण ढूँढने लगीं, परंतु उनको उस बालक के मुँह में अगणित (जिसको गिनना असंभव हो) ब्रह्मांड, अगणित ब्रह्मा, विष्णु, महेश, मुनि, देवता, मानव, आकाशगंगा तथा कई प्रकार के अनदेखी वस्तुऐं दिखाई देने लगीं।
भागवत में लिखा है कि माता यशोदा ने कृष्ण के मुख में स्वयं को कृष्ण के मुँह को देखते देखा। प्रभु के इस प्रकार के विश्वरूप दर्शन होने के बाद भी माता यशोदा की निश्छल ममता कृष्ण पर बरसती रही। इस घटनाक्रम के बाद भी परमात्मा श्री कृष्ण उन्हें एक बालक ही प्रतीत होता था।
दुर्योधन को हुए थे विश्वरूप दर्शन- महाभारत में दुर्योधन का विश्वरूप दर्शन वर्णित है।
कुरुक्षेत्र के युद्ध के पूर्व भगवान श्री कृष्ण शांतिदूत के रूप में हस्तिनापुर गए। वहाँ उनका सत्कार हुआ। राजसभा में भगवान ने दुर्योधन से कहा, "दुर्योधन! तुम चाहो तो यह महायुद्ध टल सकता है। राजन्! तुम युधिष्ठिर को अपना आधा राज्य दे दो, या तो उन्हें पाँच गाँव ही दे दो, मैं उन्हें समझाऊँगा।" परंतु दुर्योधन ने पाण्डवों को सूई की नोक के बराबर भूमि देने से इंकार कर दिया।
उसने भगवान को बंदी बनाने का असफल प्रयास किया। भगवान ने उसे भयभीत करने हेतु विश्वरूप से साक्षात्कार कराया। उसे हजारों सूर्य का तपन महसूस हुआ, कर्ण, धृतराष्ट्र, शकुनि, भीष्म सब में उसे कृष्ण दिखने लगा तथा इससे वह अत्यंत भयभीत हो उठा।
इस प्रकार प्रभु ने दुर्योधन को भी विश्वरूप दर्शन कराया।
अर्जुन को हुए थे विश्वरूप दर्शन- कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन को भी प्रभु ने विश्वरूप से अवगत कराया।
अर्जुन ने युद्ध में अपने विपरीत अपने ही संबंधियों को पाया जिससे असमंजस में पड़ गया कि वह धर्म कर रहा है कि अधर्म। प्रभु श्री कृष्ण जो उनके सारथि के रूप में वहाँ उपस्थित थे उन्होनें अर्जुन को भगवद्गीता कह सुनाया। प्रभु ने कहा कि "हे पार्थ! तुम्हें अपने प्रिय जनों की मृत्यु का भय है न? तो सुन लो, मनुष्य का केवल शरीर ही नष्ट होता है परंतु उसके अंदर की आत्मा न आग से जल सकती है न ही शस्त्रो से छिन्नभिन्न होती है। जिस प्रकार मानव वस्त्र बदलता है उसी प्रकार आत्मा भी शरीर बदलती है।
"नैनं छिंदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥"
गीता के विश्वरूप दर्शन योग नामक ११वें अध्याय में भगवान द्वारा अर्जुन को विश्वरूप दर्शन देने के विषय में विस्तारपूर्वक बताया गया है।
अर्जुन द्वारिकाधीश से उनके अद्भुत रूप के दर्शन हेतु आग्रह करते हैं। भगवान कृष्ण नें अर्जुन को दिव्यदृष्टि दी क्योकी इस दिव्य स्वरूप का दर्शन साधारण नेत्रों से असंभव है। भगवान ने कहा, "पार्थ! सावधान हो जाओ। तुम मेरे अनेक रूपों को देखो, ब्रह्मांड को देखो, जो देखना चाहो वह मुझमे देखो, स्वयं को मुझमें देखो।"
अर्जुन नें विश्वरूप में कीटों से लेकर हर प्रकार के जीवों को देखा। भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि सभी को देखा तथा हजारों त्रिदेवों को देखा। अर्जुन भगवान के इस विशाल स्वरूप को देखकर भगवान से चतुर्भुज स्वरूप में आने के लिये प्रार्थना करने लगा।
अर्जुन बोले "हे जगत्पिता! मैं आपमें सचराचर ब्रह्मांड का दर्शन कर रहा हूँ। मैं आपमें मुनिवरों, देवताओं, कमलासन पर विराजित ब्रह्मा, सपरिवार महादेव तथा दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ। आपको अगणित भुजाओं, नेत्रों, पेटों, मुखों वाला देख रहा हूँ।
हे परात्पर ब्रह्म! न मुझे आपका अंत दिख रहा है, न ही मध्य तथा न ही आदि (प्रारंभ) दिख रहा है। मैं आपको हजारों सूर्यों से अधिक प्रकाशमय गदा, चक्र, शंख आदि से युक्त देख रहा हूँ।
आपको प्रारंभ तथा समाप्ति से रहित, सूर्य तथा चंद्र रूपी नेत्रों वाले, सारे जगत् को आपके तेज से संतृप्त होते हुए देख रहा हूँ।
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