Ankahi Baten..From-Lovi

Ankahi Baten..From-Lovi

Share

Digital Creator

25/12/2025
24/12/2025
21/12/2025

बुज़ुर्गों को प्रयोगशाला मत बनाइए…

थोड़ा रुकिए, दिल से सोचिए…
आज हमारे समाज में एक बेहद दर्दनाक चलन चुपचाप जड़ें जमा चुका है।
घर के बुज़ुर्ग बीमार होते नहीं कि हम घबरा जाते हैं।
एंबुलेंस बुलाते हैं,
जेब देखकर अस्पताल चुनते हैं—3 स्टार, 5 स्टार—
और बिना एक पल सोचे, उन्हें ICU के ठंडे दरवाज़ों के पीछे छोड़ आते हैं।
फिर कांपती आवाज़ में कहते हैं—
“डॉक्टर साहब, पैसे की चिंता मत कीजिए… बस इन्हें बचा लीजिए।”
यहीं से कहानी बदल जाती है।
आपकी लाचारी, आपकी ममता, आपकी उम्मीद—सब कुछ पढ़ लिया जाता है।
फिर शुरू होती है जांचों की बारिश।
हर दिन नई रिपोर्ट,
हर दिन नई दवाइयां,
हर दिन बीमारी का नया नाम।
और आप दिल को समझाते हैं—
“इलाज बहुत अच्छा चल रहा है।”
लेकिन सच क्या है?
80 साल का कमजोर शरीर,
हाथों में सुइयों का जाल,
सीने से लगी मशीनें,
और आंखों में एक सवाल—
“क्या मैं अपने लोगों को एक बार देख पाऊंगा?”
वह करवट भी नहीं बदल सकता,
दर्द कह नहीं सकता,
और ICU के नियम कहते हैं—
“मरीज से मिलना मना है।”
जिस शरीर ने आपको गोद में खिलाया,
जिसने आपकी पहली जीत पर आशीर्वाद दिया,
आज वही शरीर एक प्रयोगशाला बन चुका है।
नई दवाइयों के ट्रायल,
नई मशीनों की कसौटी—
और बीच में एक बूढ़ा इंसान,
जो सिर्फ शांति चाहता है।
ज़रा सोचिए…
आप किसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं—
शरीर को या अपने डर को?
हमारे धर्म, हमारी संस्कृति हमें सिखाती है कि
मृत्यु कोई अपराध नहीं है।
अपराध है—
किसी को तड़पाकर, अकेला छोड़कर मरने देना।
इसीलिए गांवों में आज भी,
जब बुज़ुर्ग अंतिम पड़ाव पर होते हैं,
तो उन्हें घर में रखा जाता है।
जहां अपनों की आवाज़ होती है,
जहां बच्चों की हंसी होती है,
जहां अपने लोग आसपास होते हैं।
अगर आखिरी समय में कुछ खाने का मन हो,
तो तुरंत दिया जाता है—
भले ही एक कौर ही क्यों न हो।
क्योंकि वह कौर पेट के लिए नहीं,
आत्मा की तसल्ली के लिए होता है।
शांत मन, तृप्त मन—
यही वह अवस्था है,
जिसमें आत्मा बिना डर, बिना पीड़ा आगे बढ़ती है।
अब बताइए—
क्या ICU में यह संभव है?
क्या सुइयों से छलनी शरीर से
आत्मा मुस्कुराकर निकलती है?
क्या मशीनों की बीप-बीप के बीच
मन को शांति मिलती है?
वहां इच्छा नहीं पूछी जाती,
वहां आदेश दिए जाते हैं।
वहां इंसान नहीं,
एक केस नंबर होता है।
आपका नाम केस नंबर 43 या फिर फाइल नंबर 43 हो जाता है...
यह बात अस्पतालों के खिलाफ नहीं है,
यह उस बेरहम व्यवस्था के खिलाफ है,
जो जीवन को आंकड़ों में और मृत्यु को बिल में बदल देती है।
चाहे आप किसी भी धर्म के हों—
हिंदू, मुस्लिम, जैन, ईसाई या सिख—
बुज़ुर्ग को बोझ मत समझिए।
उन्हें देवलोक जाने वाला यात्री समझिए।
अगर सेवा घर पर संभव नहीं है,
तो नर्स रखिए,
दवाइयां रखिए,
सुविधाएं जुटाइए—
लेकिन उन्हें अपनों से दूर मत कीजिए।
क्योंकि अंत में याद रखिए—
मृत्यु सबको आनी है,
लेकिन सम्मान के साथ विदाई
सिर्फ भाग्यशाली लोगों को मिलती है।
एक बार रुकिए…
सोचिए…
क्योंकि शायद कल,
उस बिस्तर पर
हम भी हो सकते हैं।

अब मुझे पता है कि बहुत लोग मुझसे सवाल करेंगे तो क्या हम अपने मां-बाप को उसी हाल में छोड़ दें.. हॉस्पिटल ही ना ले जाए... तेरे मां-बाप के साथ अगर ऐसा हो तो तू क्या करेगा??

जवाब:

नहीं भाई, मैं उन्हें तड़पते छोड़ूंगा नहीं…
मैं उन्हें तड़पने दूंगा भी नहीं।
मैं इलाज जरूर कराऊंगा,
लेकिन ऐसा इलाज नहीं
जो हर दिन नई सुई, नई मशीन
और नई पीड़ा दे।
अगर डॉक्टर साफ कह दें कि
अब ठीक होने की संभावना नहीं,
और ICU सिर्फ सांसें खींच रहा है—
तो मैं उन्हें मशीनों के बीच कैद नहीं रखूंगा।
मैं उन्हें घर लाऊंगा।
उनके पास बैठूंगा,
उनका हाथ थामूंगा,
उनसे बातें करूंगा,
उनकी आखिरी इच्छाएं पूरी करूंगा।
दर्द होगा तो दर्द की दवा दूंगा,
कमज़ोरी होगी तो पूरा सहारा दूंगा,
सेवा के लिए नर्स रखूंगा—
लेकिन उन्हें अकेले ICU में
एक “केस नंबर” बनाकर नहीं छोड़ूंगा।
क्योंकि मां-बाप को बचाना
सिर्फ शरीर बचाना नहीं होता,
मां-बाप को बचाना होता है
उनकी गरिमा, उनका सम्मान और उनकी शांति बचाना।
कभी-कभी
सबसे बड़ा प्रेम
मौत से लड़ना नहीं,
बल्कि दर्द से लड़ना होता है।
और अगर अपने मां-बाप को
सम्मान के साथ विदा करना
पाप है—
तो मैं वो पाप
पूरे होश में करना स्वीकार करूंगा.

21/12/2025

दुनिया उन्हीं का हालचाल पूछती है , जो पहले से ही खुश होते हैं… जो तकलीफ़ में होते हैं,उनके तो नंबर तक खो जाते हैं

Want your business to be the top-listed Media Company in Muzaffarpur?
Click here to claim your Sponsored Listing.

Category

Telephone

Website

Address


Muzaffarpur
843118