Jaswant Singh Rathore
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Actor | Standup comedian | Mimic | singer
(कहने का मतलब..हम जहां पर खडे हो जाते है Entertainment वहीं से शुरू हो जाता है )🎤
India’s Laughter Champion | comedy circus | Kapil sharma show | Bollywood | Pollywood | Movies | Live comedy Shows 🎬🎭✈️
Part - 2
Welcome to Jungle Mimicry 😃🎤❤️
22/06/2026
बैसाखियों के सहारे चलने से बेहतर है कि आप अपनी गति से गिरते सँभलते आगे बढ़ें 🙌🏻
21/06/2026
डैडी,
आज आपको हम सब से बिछड़े पूरे सात साल हो गए।
लेकिन ऐसा एक भी दिन नहीं गुज़रा जब आपकी मौजूदगी महसूस न हुई हो। कहते हैं कि इंसान चला जाता है, लेकिन उसकी सीख, उसकी आदतें और उसके संस्कार हमेशा साथ रहते हैं। शायद इसी वजह से आप आज भी मेरे साथ हैं।
कहीं पढ़ा था कि बाप की असली कीमत तब समझ आती है जब इंसान खुद ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाने लगता है। बचपन में अक्सर लगता था कि बाप प्यार नहीं करता, क्योंकि एक मिडिल क्लास बाप अपने प्यार का इज़हार कम और अपनी फिक्र ज़्यादा करता है। दुर्भाग्य से जब तक औलाद उस प्यार की भाषा समझती है, तब तक बाप सिर्फ तस्वीरों में रह जाता है।
डैडी, आपकी वो हलवाई की दुकान, जहाँ आप मुझे ज़बरदस्ती भेजा करते थे, आज उसकी एक-एक बात याद आती है। तब वो दुकान लगती थी, आज समझ आता है कि वही मेरा पहला एक्टिंग इंस्टीट्यूट था। वहीं लोगों को देखना, उनकी बातें सुनना, उनके हाव-भाव समझना सीखा था, जो आज स्टेज पर मेरे काम आता है।
आप सुबह छह बजे से लेकर रात ग्यारह बजे तक काउंटर पर खड़े रहते थे। शायद वहीं से मुझे भी घंटों स्टेज पर खड़े रहने की ताकत मिली।
आप चाहते थे कि मैं दुकानदार बनूँ।
रसगुल्ले तो मैं नहीं बेच पाया, लेकिन आज हँसगुल्ले ज़रूर बेच रहा हूँ।
हाँ, एक बात की माफ़ी चाहता हूँ... मैं आज भी पूरा दुकानदार नहीं बन पाया। क्योंकि आपकी ही तरह मैं भी यही मानता हूँ कि गल्ले में पैसे आने से पहले ग्राहक के चेहरे पर मुस्कान आनी चाहिए।
वाक़ई...
सारा ज़माना एक तरफ़,
और कंधे पर बाप का हाथ एक तरफ़।
Happy Father’s Day, Daddy ❤️
Part - 1
Welcome to jungle mimicry 🎤
19/06/2026
पहली तस्वीर पंजाब के उस कलाकार के साथ जिसने पंजाब मे सबसे पहले ये साबित किया कि अच्छा एक्टर एक अच्छा सटैंडअप कामेडियन भी होता है और एक अच्छा कामेडियन एक बेहतरीन एक्टर भी..
Happy Birthday Ghuggi bhaji ❤️ 🎂
19/06/2026
जंगल जंगल बात चली है पता चला है
हमारे बचपन के हीरोज की एक फ़िल्म आ रही है “welcome to jungle” तो मैंने सोचा
क्यों ना चाहने वालों के लिए हम भी कुछ नया लेकर आयें
coming soon.. Sunday
बिजली कट स्पेशल 😃
18/06/2026
सनी - थैंक्यू महेश भट अंकल आपने इतने सालों बाद मुझे मैसेज किया देखो मैं खुद ही चला आया..कुछ काम था ?
महेश - अरे बेटा मैं तुम्हें क्यूँ बुलाऊँगा मैंने तो सनी लियोन को मैसेज किया था गलती से तुम्हें चला गया 😜🤣😬
14/06/2026
एक ज़माना था जब लुधियाना की हर रेहड़ी, पान की दुकान और रिक्शे पर मिथुन दादा, सनी पाजी, सुनील शेट्टी या अजय देवगन मुस्कुराते दिखाई देते थे। फोटो देखकर ही पता चल जाता था कि मालिक कोई परवासी भाई है।
स्कूल के दिनों में सिंगल स्क्रीन सिनेमा में फ़िल्म देखने जाता था तो आधे से ज़्यादा दर्शक परवासी भाई होते थे। फ़िल्म शुरू होने से पहले विज्ञापन पर भी ऐसी सीटियाँ बजती थीं जैसे हीरो की एंट्री हो गई हो। और फ़िल्म ख़त्म होते ही सामने वाली मार्केट से ऑडियो कैसेट की बिक्री शुरू हो जाती थी।
फिर वक़्त बदला। सिंगल स्क्रीन ख़त्म हो गए, हाथों में मोबाइल आ गया और भोजपुरी सिनेमा का दौर आ गया।
आज सुबह साइकिलिंग करते हुए जिम जा रहा था तो देखा—जिन रेहड़ियों पर कभी सनी देओल और मिथुन दादा हुआ करते थे, वहाँ अब पवन सिंह और निरहुआ विराजमान हैं।
मॉल का एसी, रीक्लाइनर सीट और 4K स्क्रीन सब अपनी जगह... लेकिन अपना वाला मज़ा भी कोई चीज़ होती है। इसलिए अब फ़िल्में मोबाइल में देखी जाती हैं।
लुधियाना में जो दो-चार सिंगल स्क्रीन बचे हैं, वहाँ भी ज़्यादातर भोजपुरी फ़िल्में ही लगती हैं।
और भोजपुरी सिनेमा के पोस्टरों की सबसे बड़ी खूबसूरती ये है कि ये कहानी नहीं छुपाते।
हॉलीवुड वाले दो मिनट का ट्रेलर बनाते हैं...
भोजपुरी वाले एक पोस्टर में ही पूरी कथा, उपकथा, क्लाइमैक्स और अगले पार्ट का टीज़र तक बता देते हैं!
मुझे लगता है वो दिन दूर नहीं जब किसी OTT पर अलग से लिखा होगा—
"Netflix Presents:
भोजपुरी डबिंग मूवीज़ 🤣😀👌
जसवंत सिंह राठौर
11/06/2026
लॉकडाउन — जिसने मेरा लॉक खोला
लॉकडाउन का समय हर इंसान के लिए अलग-अलग यादें और भावनाएँ लेकर आया होगा। लेकिन मैं इतना ज़रूर कहूँगा कि लॉकडाउन वो दौर था जिसने मेरा लॉक खोला — मेरी सोच का, मेरी रचनात्मकता का और मेरे आत्मविश्वास का।
स्कूल में एक बात पढ़ी थी कि मुश्किल वक़्त में कमजोर लोग बिखर जाते हैं और मेहनती लोग निखर जाते हैं। शायद ये मेहनत मुझे अपने बुज़ुर्गों से विरासत में मिली थी। लॉकडाउन ने मुझे दुनिया से नहीं, खुद से मिलवाया।
स्कूल के दिनों में टीवी पर मूवर्स एंड शेकर्स देखा करता था। तब लगता था कि बॉलीवुड में अगर कोई कलाकार अपने व्यंग्य और हास्य से सत्ता और व्यवस्था से टक्कर लेने का साहस रखता है, तो वो शेखर सुमन जी हैं।
फिर कॉलेज के दिनों में जब द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज देखते थे, तब एक ही सपना होता था — कभी शेखर सुमन जी के सामने परफॉर्म करने का। वो सपना 2022 में जाकर पूरा हुआ। पाँच स्टैंडिंग ओवेशन और शेखर जी की तारीफ़ के बाद मेरी दुकान सचमुच चल निकली। शायद मुझे सिर्फ़ उनके शब्दों के आशीर्वाद की ही कमी थी।
तब मुझे समझ आया कि मुंबई किसी शहर का नाम नहीं है। मुंबई आपके अंदर छिपे हुए टैलेंट का नाम है।
फिर भी मुझे हमेशा लगता था कि देश को गाली-गलौज वाली या भौंडी कॉमेडी की नहीं, बल्कि ऐसी कॉमेडी की ज़रूरत है जो हँसाने के साथ कुछ सोचने पर भी मजबूर करे। ऐसी कॉमेडी, जो शेखर जी के पास हमेशा रही। मैं अक्सर सोचता था कि वो अब ऐसा क्यों नहीं कर रहे?
यही बात मैं सनी देओल और बॉबी देओल के बारे में भी सोचता था। कुछ साल पहले जिनका करियर मुश्किल दौर से गुजर रहा था, उन्होंने लॉकडाउन के बाद ऐसी वापसी की कि पूरा देश फिर उनका मुरीद हो गया। धर्मेन्द्र जी की विरासत को उन्होंने नई ऊँचाई दी।
फिर मेरे पहले टीवी जज, राकेश बेदी जी जिन्होंने 2006 में मुझे "जस्ट वन" का नाम दिया था, उन्होंने भी 70 से अधिक उम्र में ऐसी वापसी की कि साल की सबसे बड़ी फिल्म धुरंधर का ज़्यादा श्रेय अपने नाम कर लिया। उन्होंने साबित कर दिया कि आपका समय ज़रूर आता है, लेकिन समय पर ही आता है।
आज जब टीवी चैनलों में टीआरपी की अंधी दौड़ लगी हुई है और सालों से घिसी-पिटी कॉमेडी परोसी जा रही है — वही कॉमेडी जिसे करने से मैं कई बार मना कर चुका हूँ — तब उस भीड़ के बीच फिर एक शेर की दहाड़ सुनाई देती है। वो आवाज़ है शेखर सुमन जी की।
सिर्फ़ यूट्यूब जैसे छोटे माने जाने वाले प्लेटफ़ॉर्म से उन्होंने ऐसी गूँज पैदा की है कि बड़े-बड़े चैनल भी बेचैन हैं।
उनकी सफलता मुझे इसलिए भी खुशी देती है क्योंकि मेरा हमेशा से मानना रहा है कि स्टैंड-अप का मतलब सिर्फ़ खड़े होकर कॉमेडी करना नहीं होता। स्टैंड-अप का मतलब अपनी सोच, अपने मूल्यों और अपने किरदार के लिए स्टैंड लेना भी होता है। और शेखर जी ने यही किया है।
ये सिर्फ़ एक लेख नहीं, उन सभी लोगों के लिए एक गारंटी सर्टिफिकेट है जो भीड़ देखकर अपना रास्ता नहीं बदलते, जो बुरे वक़्त में खुद को और बेहतर बनाते हैं, और जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते।
क्योंकि शेर भूखा मर सकता है, लेकिन घास नहीं खाता।
शेखर जी, दिल से प्यार और सम्मान। ❤️
जसवंत सिंह राठौर 🙏
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