Badal Raj Bansal

Badal Raj Bansal

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राष्ट्रीय सचिव समाजवादी छात्रसभा

पूर्व प्रत्याशी जिला पंचायत सदस्य समाजवादी पार्टी

23/01/2026

एक घने जंगल के बीच एक शांत सरोवर था। उस सरोवर में एक सफ़ेद, शांत और ज्ञानी हंस रहता था। वह दिनभर ध्यान करता, मीठे वचन बोलता और सभी जीवों की निःस्वार्थ सेवा करता। जंगल के प्राणी उसे “संत” मानते थे।
उसी जंगल पर राज करता था एक काला कऊआ, जो चालाक तो था, पर भीतर से ईर्ष्या और अहंकार से भरा हुआ। उसे यह बात चुभती थी कि लोग उसे राजा मानते हैं, फिर भी सम्मान हंस को अधिक देते हैं।
एक दिन कऊआ सभा बुलाकर बोला:
"यह हंस तो सिर्फ़ दिखावा करता है। कौन जाने इसके मन में क्या छिपा है? यह संत कैसे हो सकता है?"
सभा में सन्नाटा छा गया।
हंस शांति से बोला:
"राजन, यदि मेरे आचरण में कोई दोष हो तो बताइए, मैं सुधार करूँगा। पर बिना कारण चरित्र पर प्रश्न उठाना स्वयं चरित्र की कमजोरी दिखाता है।"
कऊआ के पास कोई उत्तर न था।
तभी एक बूढ़ा कछुआ बोला:
"महाराज, हंस का जीवन ही उसका प्रमाण है। जो दूसरों के लिए जीता है, वही सच्चा संत होता है। और जो ईर्ष्या करता है, वह स्वयं अपने पद को छोटा करता है।"

हंस की लोकप्रियता से कऊआ का अहंकार और अधिक भड़क उठा। उसे लगा कि जब तक हंस जंगल में रहेगा, तब तक लोग उसे सच्चा राजा नहीं मानेंगे।
एक दिन क्रोध में आकर कऊआ ने दरबार में घोषणा कर दी:
"आज से यह हंस इस जंगल में नहीं रहेगा। इसे तुरंत जंगल से निकाल दिया जाए!"
कई जानवर डर गए, कुछ चुप रहे, और कुछ भ्रम में पड़ गए।
सैनिक पशु हंस के पास पहुँचे और बोले:
"राजा का आदेश है, आपको जंगल छोड़ना होगा।"
हंस शांत भाव से बोला:
"जहाँ सत्य होता है, वहाँ रहने के लिए स्थान की आवश्यकता नहीं होती। मैं चला जाऊँगा, पर सत्य यहीं रहेगा।"
हंस सरोवर छोड़कर पास के पहाड़ों की ओर चला गया।
🌿 कुछ समय बाद…

हंस के जाने के बाद जंगल में बदलाव आने लगा।
अब कोई विवाद सुलझाने वाला न था,
कमज़ोरों की सहायता करने वाला कोई न रहा,
और कऊआ का व्यवहार और कठोर होता गया।
जानवरों को तब समझ आया कि उन्होंने क्या खो दिया।
एक दिन सभी प्राणी मिलकर कऊआ के पास गए और बोले:
"महाराज, हमें आपका राज चाहिए, पर हंस जैसा न्याय और करुणा भी चाहिए। कृपया हंस को वापस बुलाइए।"
कऊआ का सिर झुक गया। उसे पहली बार अपने अहंकार पर लज्जा हुई।
अंत में…
कऊआ स्वयं पहाड़ों पर गया और हंस से बोला:
"मुझसे भूल हुई। मैंने सत्ता के नशे में सत्य को निकाल दिया। कृपया लौट आइए।"
हंस मुस्कराया:
"जब राजा का हृदय बदल जाए, तभी राज्य सच में सुरक्षित होता है।"
हंस लौट आया — और जंगल में फिर से शांति लौट आई।

04/01/2026

कहानी: दो रास्ते, एक बाप
एक छोटे से गाँव में हरिराम नाम का एक ईमानदार और मेहनती किसान रहता था। उसकी दुनिया उसके दो बेटे थे—रामू और श्याम। दोनों एक ही घर में पले-बढ़े, लेकिन सोच और रास्ते बिल्कुल अलग थे।
हरिराम ने दोनों को एक-सी सीख दी—
“बेटा, मेहनत और ईमानदारी से कमाया गया एक रुपया भी बहुत कीमती होता है।”
रामू, बड़ा बेटा, बाप की बातों को दिल से मानता था। खेत में बाप का हाथ बँटाता, कम में खुश रहता और दूसरों की मदद करता।
श्याम, छोटा बेटा, शहर के सपने देखता था। उसे जल्दी अमीर बनना था—मेहनत से नहीं, शॉर्टकट से।
समय बीता। श्याम शहर चला गया। शुरुआत में उसके पैसे आए, चमक-दमक दिखी। गाँव में लोग कहते—
“देखो हरिराम का बेटा कितना सफल है।”
पर हरिराम की आँखें खुश नहीं थीं। वह जानता था कि जो मेहनत से नहीं आता, वह टिकता भी नहीं।
कुछ साल बाद श्याम गलत संगत और लालच के कारण मुसीबत में फँस गया। कर्ज, पुलिस और बदनामी—सब एक साथ आ गए। मजबूर होकर वह टूटा-हारा घर लौटा।
उसी वक्त रामू ने खेती को नए तरीके से सँवारा था। कमाई भले ज़्यादा नहीं थी, लेकिन घर में सुकून था, सम्मान था।
श्याम रोते हुए बाप के पैरों में गिर पड़ा—
“बाबा, मैंने आपकी बात नहीं मानी।”
हरिराम ने दोनों बेटों को पास बिठाया और कहा—
“मैंने तुम्हें दो रास्ते नहीं दिखाए थे, बेटा। रास्ता एक ही था—ईमानदारी का। फर्क बस इतना है कि किसी ने उसे चुना, किसी ने नहीं।”
उस दिन श्याम ने समझा—
सफलता पैसे से नहीं, संस्कार से मापी जाती है

04/01/2026

18/12/2025

पहले जंगल काटे…. वहाँ शहर बसाते गए….!!!

फिर बचे कुचे जंगलों को पिकनिक स्पॉट बना डाला…

जानवरों को लगातार परेशान करोगे…

तो यही हाल होंगे….!!!

18/12/2025

जब निर्णय जनता के हित में न होकर स्वार्थ, रिश्वत, दबाव, सिफारिश या सत्ता के दुरुपयोग से लिए जाएँ, वही आज का भ्रष्टाचार है।

04/10/2025

यूपी के रायबरेली जनपद के
ऊंचाहार की यह दर्दनाक घटना पूरे समाज को झकझोर देने वाली है। ऊंचाहार आए दलित युवक हरिओम को भीड़ ने बिना किसी जांच-पड़ताल, बिना पुलिस को सूचना दिए, शक के आधार पर बेरहमी से पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया। यह केवल एक बेटे, पति, पिता या भाई की हत्या नहीं, बल्कि मानवता की हत्या है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि भीड़ को किसने अधिकार दिया किसी के गले पर पैर रखकर उससे अपराध कबूल करवाने का?

इस घटना से हमें सबक लेना होगा—यदि कोई संदिग्ध व्यक्ति दिखे तो उसे पीटने या सजा देने का हक जनता को नहीं, बल्कि कानून और पुलिस को है। हिंसा में शामिल होना या मूक दर्शक बने रहना, दोनों ही अपराध के बराबर है। हरिओम अब लौटकर नहीं आएंगे, लेकिन इस "हेट क्राइम" की सजा दोषियों को जरूर मिलनी चाहिए। हम सबको प्रण लेना होगा कि ऐसी घटनाओं का हिस्सा न बनें, बल्कि विरोध करके तुरंत पुलिस को सूचना दें।

निर्दोष हरिओम को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि। 🙏🕯️

17/09/2025

भगवान श्री विश्वकर्मा जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं

14/09/2025

जय अखिलेश

28/08/2025

सभी देशवासियों को ऋषि पंचमी की हार्दिक शुभकामनाऐं

28/07/2025

मथुरा के बरसाना में चले लाठी डंडे: जमकर हुई ईंट पत्थरों की बरसात; युवती सहित कई लोग हुए घायल

#वायरलपोस्ट२०२५シ #मथुरा #बरसाना

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