Badlav
About Us
Badlav established on 15th September 2015 is registered under the Societies Registration Act, 1860 having 12A and 80G certificates.
Badlav is aimed at uplifting beggars, our greater objective than just charity is to provide them a platform and with all the resources which will support them in rebuilding themselves and live a life of dignity by doing dignified work. Badlav is aimed at uplifting beggars, one of the most marginalized strata of society, and usually not covered under any major Government upliftment scheme. Our grea
13/06/2026
बदलाव टीम ने हाल ही में दिल्ली और हरियाणा में एक एक्सपोज़र विज़िट किया। इस दौरान टीम को दिल्ली स्थित I Am Wellbeing, Manzil Mystics, Dance Out of Poverty , GOONJ, Salaam Baalak Trust तथा हरियाणा के रेवाड़ी में SRI (Self Reliant India) के कार्यों को निकटता से समझने और उनसे सीखने का अवसर मिला।
इस यात्रा ने बच्चों के मनोसामाजिक विकास, पुनर्वास, शिक्षा तथा वंचित, सड़क से जुड़े और भीख माँगने की स्थिति में संलग्न बच्चों के लिए सामुदायिक-आधारित हस्तक्षेपों को समझने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान किए।
यात्रा के दौरान I Am Wellbeing के साथ संवाद के माध्यम से संवेदनशील परिस्थितियों में रह रहे बच्चों के लिए मनोवैज्ञानिक सहयोग एवं कला-आधारित हस्तक्षेपों के महत्व को समझा। Manzil Mystics Foundation से यह जानने का अवसर मिला कि संगीत किस प्रकार शिक्षा, आत्मविश्वास निर्माण और कौशल विकास का प्रभावी माध्यम बन सकता है, वहीं Dance Out Of Poverty ने नृत्य को आत्म-अभिव्यक्ति, सहभागिता और सामाजिक समावेशन के एक सशक्त उपकरण के रूप में प्रस्तुत किया।
Goonj Processing Centre के भ्रमण के दौरान संसाधनों के वर्गीकरण, पुनः उपयोग (Reuse) और Green by Goonj जैसी सतत विकास पहलों को समझा। Salaam Baalak Trust के डे-केयर सेंटर एवं आवासीय गृहों के दौरे ने सड़क से जुड़े बच्चों के लिए बाल संरक्षण प्रणालियों, आवासीय देखभाल मॉडल, पुनर्स्थापन प्रक्रियाओं तथा कानूनी अनुपालनों की बेहतर समझ विकसित की। वहीं रेवाड़ी में Self Reliant India के कार्यों को देखकर यह जाना कि किस प्रकार सरकरी स्कूल मे पढ़ रहे बच्चों को जवाहर नवोदय विद्यालय जैसे गुणवत्तापूर्ण आवासीय विद्यालयों में प्रवेश के लिए तैयार किया जाता है।
इस एक्सपोज़र विज़िट ने हमें यह महसूस कराया कि आपसी सीख, सहयोग और नवाचारी सामुदायिक दृष्टिकोण ही बच्चों के लिए सार्थक अवसरों का निर्माण करने और सामाजिक प्रभाव को मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
02/06/2026
आज में मिलिए श्याम मिश्रा से। श्याम मिश्रा (परिवर्तित नाम) की कहानी संघर्ष, धैर्य और पुनर्वास की एक ऐसी यात्रा है जो यह साबित करती है कि आशा अमर है।
युवावस्था में पारिवारिक परिस्थितियों और मनमुटाव के कारण वे अपना गाँव छोड़कर लखनऊ आ गए। जीवनयापन के लिए उन्होंने रिक्शा चलाया, लेकिन समय के साथ आर्थिक कठिनाइयाँ, पारिवारिक विछोह और बढ़ती उम्र ने उन्हें सड़क पर ला खड़ा किया। धीरे-धीरे वे भीख मांगकर अपना गुज़ारा करने लगे और परिवर्तन चौक सहित शहर के फुटपाथ ही उनका आशियाना बन गए।
साल 2019 में श्याम जी बदलाव से जुड़े। शुरुआत में विश्वास बनाना आसान नहीं था, लेकिन निरंतर संवाद, सहयोग और साथ ने उनके जीवन में परिवर्तन की नींव रखी। पुनर्वास की प्रक्रिया के दौरान उन्होंने मूंगफली बेचकर अपनी आजीविका से जुड़ने का प्रयास किया और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाए।
बढ़ती उम्र और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को देखते हुए उन्हें आवश्यक देखभाल और संरक्षण उपलब्ध कराया गया। पिछले 6.5 वर्षों से अधिक समय तक वे बदलाव के साथ रहे, जहाँ उन्हें केवल आश्रय ही नहीं बल्कि सम्मान, सुरक्षा और परिवार जैसा वातावरण मिला।
इस दौरान बदलाव ने उन्हें विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से भी जोड़ा। उनका आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज़ बनवाए गए ताकि वे अपने अधिकारों और सरकारी सुविधाओं से जुड़ सकें।
और फिर वर्षों की तलाश, संवाद और प्रयासों के बाद वह पल आया जिसका इंतज़ार सभी को था। 1 जून 2026 को बदलाव की टीम ने श्याम मिश्रा जी को 46 वर्षों बाद उनके पैतृक गाँव, जनपद सुल्तानपुर, उनके परिवार के बीच सकुशल पहुँचाया।
जब वर्षों बाद परिवार की आँखों में अपने खोए हुए सदस्य को देखने की खुशी और श्याम जी के चेहरे पर घर लौटने की संतुष्टि दिखाई दी, तब यह केवल एक पुनर्वास नहीं था—यह रिश्तों, पहचान और सम्मान की पुनर्स्थापना थी।
बदलाव के लिए पुनर्वास का अर्थ केवल सड़क से आश्रय तक पहुँचाना नहीं, बल्कि व्यक्ति को उसके अधिकारों, सम्मान और अपने लोगों से पुनः जोड़ना है।
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Azim Premji Foundation GOONJ Lucknow Municipal Corporation LivingMyPromise PRAVAH
30/05/2026
वर्ष 2016 में बदलाव ने एक ऐतिहासिक पहल करते हुए भीख मांगने का काम छोड़कर सम्मानजनक आजीविका की ओर बढ़े 9 व्यक्तियों का पहला सम्मान समारोह आयोजित किया था। यही आयोजन आगे चलकर पिछले साल हुए "बदलावोत्सव" के रूप में एक प्रेरणा बन गया।
आज, उस छोटे से प्रयास से शुरू हुई यात्रा ने एक बड़ा स्वरूप ले लिया है। अब तक बदलाव ने 592+ से अधिक व्यक्तियों को भीख मांगने की परिस्थितियों से बाहर निकालकर पुनर्वास, पुनर्स्थापन और सम्मानजनक जीवन की मुख्यधारा से जोड़ा जा चुका है।
यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि 592 से अधिक नई आशाओं, नए अवसरों और आत्मसम्मान से भरे जीवन की कहानियाँ हैं। हर बदली हुई ज़िंदगी हमें यह विश्वास दिलाती है कि सही सहयोग, संवेदनशीलता और अवसर मिलें तो परिवर्तन संभव है।
21/05/2026
आज में मिलिए आसिफा (बदला हुआ नाम) से। 58 वर्षीय आसिफा, लखनऊ के दुबग्गा क्षेत्र की निवासी हैं। अशिक्षा, आर्थिक तंगी और बड़े परिवार की जिम्मेदारी के कारण उनका जीवन लंबे समय तक भीख मांगने और छोटे-मोटे घरेलू कामों पर निर्भर रहा। रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।
लेकिन कठिन परिस्थितियों के बावजूद, आसिफा ने कभी हार नहीं मानी। उनके भीतर हमेशा यह इच्छा रही कि वे सम्मान के साथ जीवन जिएं और भीख पर निर्भरता खत्म कर सकें।
इसी दौरान उनका संपर्क बदलाव से हुआ। काउंसलिंग और मार्गदर्शन के माध्यम से उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया गया और उनकी क्षमता के अनुसार आजीविका के विकल्प तलाशे गए।
उनकी उम्र, परिस्थिति और रुचि को ध्यान में रखते हुए उन्हें फल और जूस से जुड़े छोटे व्यवसाय के लिए प्रेरित किया गया। बदलाव के सहयोग से उन्होंने दुबग्गा चौराहा और आसपास के अस्पतालों के पास फल और जूस का ठेला शुरू किया।
आज आसिफा सफलतापूर्वक अपना स्टॉल चला रही हैं। इस काम से उन्हें नियमित आय मिलने लगी है, जिससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है और भीख पर उनकी निर्भरता समाप्त हो गई है।
आज आसिफा न केवल अपने परिवार का सहारा बनी हैं, बल्कि अपने समुदाय के लिए भी एक प्रेरणा हैं।
उनकी कहानी यह संदेश देती है कि बदलाव की शुरुआत किसी भी उम्र में हो सकती है—अगर साथ हो सही अवसर, सहयोग और हौसला।
GOONJ Azim Premji Foundation LivingMyPromise PRAVAH Lucknow Municipal Corporation Ministry of Social Justice and Empowerment, Government of India
20/05/2026
आज में मिलिए सलीम (बदला हुआ नाम) से। 35 वर्षीय सलीम, सीतापुर के निवासी हैं। वे जन्म से ही पैरों से दिव्यांग हैं और चलने-फिरने के लिए ट्राइसाइकिल का सहारा लेते हैं। सात भाई-बहनों में सबसे बड़े होने के कारण पिता के निधन के बाद पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
परिवार का सहारा बनने के लिए वे लखनऊ आए और मेहनत से जीवन चलाने लगे। उन्होंने पान मसाले की एक छोटी दुकान शुरू की, जिससे किसी तरह घर चल रहा था। लेकिन कोविड-19 लॉकडाउन ने उनका यह छोटा व्यवसाय पूरी तरह बंद कर दिया। हालात इतने कठिन हो गए कि उन्हें मजबूरी में भीख मांगनी पड़ी।
इसी संघर्ष के बीच उनका संपर्क बदलाव से हुआ। काउंसलिंग और मार्गदर्शन के माध्यम से उनके तनाव, जिम्मेदारियों और संघर्षों को समझा गया। उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, आत्मसम्मान के साथ जीवन फिर से बनाया जा सकता है।
उनकी स्किल मैपिंग के बाद, उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए ट्राइसाइकिल आधारित छोटे व्यवसाय की योजना बनाई गई। शुरुआत में उन्होंने ट्राइसाइकिल पर गुब्बारे और खिलौने बेचने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी आय स्थिर होने लगी और आत्मविश्वास भी वापस आने लगा।
बाद में उन्होंने फिर से पान मसाले का काम शुरू किया, जिससे उनकी आमदनी और बेहतर हो गई। आज सलीम न केवल आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं, बल्कि अपने परिवार का सहारा भी बने हुए हैं। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि शारीरिक सीमाएँ किसी व्यक्ति के सपनों को नहीं रोक सकतीं—अगर साथ हो हौसला, सही अवसर और सहयोग।
Azim Premji Foundation GOONJ Lucknow Municipal Corporation ComMutiny - The Youth Collective LivingMyPromise
18/05/2026
आज में मिलिए रमेश कुमार गुप्ता (नाम बदला हुआ) से। उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के 46 वर्षीय रमेश कुमार गुप्ता कभी एक स्थिर और सम्मानजनक जीवन जीते थे। उन्होंने लगभग 25 वर्षों तक इंजन फैक्ट्री और होटलों में काम किया और खाना बनाने व हॉस्पिटैलिटी का अच्छा अनुभव हासिल किया।
माता-पिता के निधन और परिवार के बंटवारे के बाद उन्होंने अपनी जमीन बेचकर एक छोटा होटल शुरू किया। लेकिन वैवाहिक विवाद और तलाक ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। इसके बाद रोज़गार की तलाश उन्हें शहर ले आई।
उन्होंने कई बार जीवन को दोबारा खड़ा करने की कोशिश की, लेकिन एक गंभीर सड़क दुर्घटना में पैर टूट गया और लंबे इलाज में उनकी सारी जमा पूंजी खत्म हो गई। फिर कोविड-19 महामारी ने उनका छोटा व्यवसाय भी बंद करवा दिया।
धीरे-धीरे स्वास्थ्य समस्याएँ बढ़ती गईं—डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट की बीमारी और पैर का लगातार दर्द। परिवार का सहारा न होने के कारण मजबूरी में उन्हें मंदिरों के बाहर बैठकर भीख मांगनी पड़ी।
इसी कठिन दौर में उनका संपर्क बदलाव से हुआ और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपने दर्द, डर और असफलताओं को साझा किया। धीरे-धीरे उनके भीतर फिर से उम्मीद जागने लगी।
उन्होंने साझेदारी में फूड कार्ट शुरू करने की कोशिश की, लेकिन एक और दुर्घटना में उनका पैर फिर टूट गया। यह उनके लिए बहुत बड़ा झटका था। लेकिन इस बार उन्होंने हार नहीं मानी।काउंसलिंग और सहयोग ने उन्हें यह समझाया कि रुकावटें असफलता नहीं होतीं। स्वास्थ्य में सुधार के बाद उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार एक शाकाहारी फूड कार्ट शुरू किया।
आज रमेश कुमार गुप्ता नियमित रूप से अपना वेज फूड कार्ट चला रहे हैं, आत्मनिर्भर हैं और सम्मान के साथ जीवन जी रहे हैं।
उनकी कहानी हमें यह सिखाती है— “पैर भले ही टूट जाए, लेकिन अगर हिम्मत कायम रहे, तो ज़िंदगी फिर से खड़ी की जा सकती है।”
GOONJ ComMutiny - The Youth Collective Azim Premji Foundation LivingMyPromise PRAVAH Lucknow Municipal Corporation National Institute of Social Defence - NISD
15/05/2026
आज में मिलिए रोहित (बदला हुआ नाम) से। 35 वर्षीय रोहित, लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के निवासी हैं। बचपन से ही एक जेनेटिक बीमारी के कारण उनके पैरों में विकलांगता रही, जो समय के साथ और गंभीर होती गई। लगातार घाव और चलने-फिरने में कठिनाई ने उनके जीवन को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया।
माँ के निधन और पिता के पुनर्विवाह के बाद उन्हें परिवार से अपेक्षित सहयोग नहीं मिला। उपेक्षा और पारिवारिक तनाव के कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ा।
नाई का काम सीखने के कारण उन्होंने खुद का छोटा काम शुरू किया और धीरे-धीरे जीवन संभलने लगा। लेकिन बढ़ती शारीरिक समस्याओं और पैरों के घावों के कारण उन्हें अपना काम बंद करना पड़ा। इलाज और रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए मजबूरी में उन्हें भीख मांगनी पड़ी।
उन्होंने हार नहीं मानी। फुटपाथ पर छोटी दुकान शुरू करने की कोशिश की, लेकिन तबीयत और बिगड़ती गई। बिना किसी पारिवारिक सहारे के उनका जीवन संघर्षों से भर गया।
इसी दौरान उन्हें बदलाव के बारे में पता चला और वे पुनर्वास केंद्र पहुँचे। यहाँ उन्हें चिकित्सीय सहायता, काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहयोग मिला। समूह सत्रों और मार्गदर्शन ने उनके अंदर फिर से उम्मीद जगाई।
उनकी शारीरिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें छोटे स्तर पर व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया गया। आज रोहित अपनी ट्राइसाइकिल के सहारे पान, मसाला और छोटे सामान बेचकर आजीविका चला रहे हैं। इसके साथ ही वे पुनर्वास केंद्र में अन्य लोगों के बाल काटने में भी सहयोग करते हैं।
आज उनका जीवन पहले से कहीं अधिक स्थिर और सकारात्मक है। आत्मनिर्भरता और लोगों से जुड़ाव ने उनके भीतर आत्मविश्वास फिर से जगा दिया है।
रोहित कहते हैं—
“अगर शरीर साथ दे और काम का सहारा मिल जाए, तो हम भी अच्छा जीवन जी सकते हैं।”
उनकी कहानी यह दिखाती है कि सही सहयोग, अवसर और हौसले के साथ कोई भी व्यक्ति कठिन परिस्थितियों से निकलकर सम्मानजनक जीवन की ओर बढ़ सकता है
GOONJ Azim Premji Foundation Lucknow Municipal Corporation PRAVAH LivingMyPromise ComMutiny - The Youth Collective National Institute of Social Defence - NISD
14/05/2026
आज में मिलिए डिम्पल (बदला हुआ नाम) से। 25 वर्षीय डिम्पल, लखनऊ की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” की परंपरा चली आ रही है। आज भी वे अपने बच्चों के साथ शहर के किनारे एक झोपड़ी में बिना मूलभूत सुविधाओं के जीवन जीने को मजबूर हैं।
शिक्षा, पोषण और स्थायी रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने उनके जीवन को बेहद कठिन बना दिया था। बरसात के दिनों में झोपड़ी में पानी भर जाता, भोजन का संकट खड़ा हो जाता और बीमारी के समय उचित इलाज भी नहीं मिल पाता।
इन परिस्थितियों ने डिम्पल को भीतर से तोड़ दिया था। वे खुद को असहाय महसूस करती थीं, लेकिन उनके मन में एक सपना था—अपने बच्चों को बेहतर जीवन देना।
जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं और संघर्ष को समझा गया। धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया गया और उन्हें यह एहसास दिलाया गया कि परिस्थितियाँ स्थायी नहीं होतीं।
उनकी स्थिति और क्षमता को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। शुरुआत भले छोटी थी, लेकिन धीरे-धीरे यह उनके लिए स्थायी आय का माध्यम बनने लगा।
आज डिम्पल अपने परिवार की जरूरतों को बेहतर तरीके से पूरा कर पा रही हैं। उनकी भीख पर निर्भरता कम हो रही है और वे सम्मानजनक व आत्मनिर्भर जीवन की ओर बढ़ रही हैं। डिम्पल की कहानी यह बताती है कि सही समय पर मिला सहयोग और अवसर किसी भी जीवन में नई आशा जगा सकता है।
Azim Premji Foundation GOONJ Lucknow Municipal Corporation ComMutiny - The Youth Collective PRAVAH National Institute of Social Defence - NISD Ministry of Social Justice and Empowerment, Government of India LivingMyPromise
13/05/2026
में आज मिलिए गुड़िया (बदला हुआ नाम) से। 22 वर्षीय गुड़िया, लखनऊ के घैला गाँव की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं। यह समुदाय आज भी गांव के किनारों पर झोपड़ियों में सीमित संसाधनों के साथ जीवन जीने को मजबूर है। पक्का घर, बिजली और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएँ आज भी उनके लिए एक सपना हैं।
बचपन से ही गुड़िया चौराहों और शहरों में भीख मांगकर परिवार का खर्च चलाने में लगी रहीं। उनके समुदाय में शिक्षा और जागरूकता की कमी इतनी गहरी है कि कई लोगों ने इसे अपनी नियति मान लिया है।
शादी के बाद उनके पति फूल, गजरा और रेडियम पट्टी बेचने का काम करने लगे, लेकिन सीमित पूंजी के कारण आमदनी स्थिर नहीं हो पाती थी। जब कमाई कम पड़ती, तो गुड़िया को फिर से सड़कों पर जाकर भीख मांगनी पड़ती।
वह कहती हैं— “हमें ऐसा जीवन अच्छा नहीं लगता, लेकिन मजबूरी में करना पड़ता है।”
इसी दौरान जब उनका संपर्क बदलाव से हुआ तब बदलाव न उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने और उन्हें बेहतर जीवन की दिशा दिखाने का प्रयास किया ।
उनकी मौजूदा आजीविका को ध्यान में रखते हुए फूल, गजरा और सजावट के काम को व्यवस्थित करने में सहयोग दिया गया। धीरे-धीरे उन्होंने अपने पति के साथ इस काम को मजबूती से आगे बढ़ाना शुरू किया।
आज गुड़िया अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन की ओर कदम बढ़ा रही हैं। उनकी आय में सुधार हुआ है, भीख पर निर्भरता कम हो रही है और आत्मनिर्भरता की राह मजबूत हो रही है।
गुड़िया की कहानी यह दिखाती है कि सही सहयोग, मार्गदर्शन और अवसर मिल जाएँ, तो पीढ़ियों से चली आ रही मजबूरियों को भी बदला जा सकता है।
Azim Premji Foundation PRAVAH GOONJ Lucknow Municipal Corporation ComMutiny - The Youth Collective National Institute of Social Defence - NISD LivingMyPromise
12/05/2026
आज में जानिए जमुना (बदला हुआ नाम) को। 35 वर्षीय जमुना, लखनऊ के घैला क्षेत्र की निवासी हैं और नट समुदाय से आती हैं, जहाँ पीढ़ियों से “मांगकर खाने” और पशुपालन की परंपरा चली आ रही है। शिक्षा और जागरूकता की कमी के कारण उनका समुदाय आज भी सामाजिक रूप से पिछड़ा हुआ है।
जमुना बताती हैं कि उनके समुदाय में बच्चों को सही अवसर नहीं मिल पाते और वे कम उम्र से ही पारंपरिक कामों में लग जाते हैं।
वह कहती हैं—
“कभी-कभी लगता है कि हम इंसान ही नहीं हैं… कोई हमें काम नहीं देता।”
इन कठिन परिस्थितियों के बीच भी जमुना के मन में एक सपना था—अपने बच्चों को वह जीवन देना, जो उन्हें कभी नहीं मिला।
बदलाव से जुड़ने के बाद काउंसलिंग के माध्यम से उनकी भावनाओं, संघर्षों और सपनों को समझा गया। उनकी मेहनत और अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य बनाने की इच्छा को नई दिशा दी गई।
उनकी रुचि और अनुभव को ध्यान में रखते हुए उन्हें बकरी पालन से जोड़ा गया। बदलाव के सहयोग से उन्होंने यह काम शुरू किया, जिससे उन्हें सम्मानजनक और स्थायी आय मिलने लगी।
आज जमुना न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं, बल्कि “बदलावशाला” में बच्चों को पढ़ाने का काम भी कर रही हैं।
वह अपने समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं ताकि आने वाली पीढ़ियाँ उसी संघर्ष में न फँसे रहें।
आज जमुना की पहचान सिर्फ संघर्षरत महिला की नहीं, बल्कि एक शिक्षिका, आत्मनिर्भर महिला और अपने समुदाय की प्रेरणा के रूप में बन चुकी है।
Azim Premji Foundation GOONJ LivingMyPromise Lucknow Municipal Corporation PRAVAH ComMutiny - The Youth Collective
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