SIDS
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#बुद्धपूर्णिमा
काम धाम कुछ न करो,
मूर्ति करेगी नौका पार ❌
बुद्ध सम कर्मठ बनो,
अन्य प्रयोजन सब बेकार।✅
-- मरासिम
21/05/2024
लो भईया हम भी कर दिहिन उंगली दिखाए की रसम पूरी।
बदलाव खातिर वोट दे आए
बा नी।
काउनो लिखी नाही तो हम
सोचीं हमाहु लिख देत बा...
मुंह मा जबान होई खातिर
बोलना पड़त बा। नहीं ता
लोग मुर्दा समझ लेइत हैं...
21/05/2024
लो भईया हम भी कर दिहिन उंगली दिखाए की रसम पूरी।
बदलाव खातिर वोट दे आए
बा नी।
काउनो लिखी नाही तो हम
सोचीं हमाहु लिख देत बा...
मुंह मा जबान होई खातिर
बोलना पड़त बा। नहीं तो
लोग मुर्दा समझ लेइत हैं...
वैक्सीन लगवा तो मूर्खता कर दी है,
वोट सही व्यक्ति को दे गलती सुधार लें 🙏🏿
#जनहितमाजारी
पापा ने वॉर रुकवा दी पापा पर
पापा का मणिपुर में जादू क्यों
नहीं चल रहा पापा? कहीं पापा
का डंका फट तो नहीं गया
पापा? पापा पापा तो हर जगह
मौजूद हैं पापा, पर पापा का पा
निकल गया पापा 😉
खुद इंसां ही इंसां का दुश्मन
दुश्मन पर नीर बहाए कौन?
मार्मिकता क्या,बस थोथी बातें
थोथेपन पर शोक मनाए कौन?
मरासिम क्या सीखा क्या जाना
सच कह कर सीस कटाए कौन?
तू बैठ किनारे देखा कर मंज़र
दानवों संग वक्त गंवाए कौन?
पी चिल्लम और दिख कुछ पागल
व्यर्थ समझदार कहलाए कौन?
मरासिम घूम बन कर बेगाना
बंसी बजा हो जाएं मौन।
-- मरासिम
ड्रोन पर भारी पतंग, देख सारे रह गए दंग, किसान नेता का निराला है ढंग, जंग में भी पंजाबी मस्त मलंग।
पर है खेद मुझको देख सत्ता के बेशरम रंग, भारत की धरती पर ये कैसा छाया हुड़दंग, है अश्रुपूर्ण मेरा अंग अंग, सत्ता के नशे ने काटी अन्नदाता की स्वच्छंद पतंग।
जनता भी है अवाक बैठी है राम संग, देख कर कर रही अनदेखा राम छल संग।
-- मरासिम
_injustice
हम भगवान को बचाएंगे is kalyug
बाकी कलयुग वलयुग कुछ नहीं है 😉
वो कमीज की आस्तीन चढ़ा,
पतंग उड़ाते हुए बोला - "हिन्दी, हिन्दू, हिदुस्तान "
मै बोला - आसमान से नीचे देख अंगूर खा या कद्दू, इत्ती सी लाइन में हम 14 शब्द #फारसी के बोल गये ।
वो बोला - कुर्सी पर बैठ या दुकान पर
पहले हवा खा फिर बात करेंगें ,
मैं - हवा हवाई ना कर
हलवाई के पास जाकर पहले इमरती ले कर आ...
अनार अमरूद अंजीर खाने की कोई इच्छा नहीं है
वो बोला - ये क्या बात हुई.?
मैं बोला - देख भाई फिर इत्ती से बात में हम 13 शब्द #अरबी के बोल गये ।
उसने कैंची, तमंचा, चाकू निकाल लिये...
मैं बोला - देख ये तीनों #तुर्की हैं,
अब तू बावर्ची बुला या बीबी ,
पहले कोरमा खा या कुल्फी, बहादुर है या अजब लुच्चा, पर तेरा कालीन अच्छा है।
वो बोला ये भी #तुर्की हैं...
मैने कहा - हां भई... हां, का, पर, हैं, को छोड कर सब #तुर्की ही हैं ।
मैने कहा - अटकल लगा, अखरोट खा, नगाड़ा बजा, गुंडा है तो मटरगश्ती कर, पटाखा चला वो बोला ये क्या हुई , मैने कहा ये #पश्तो हुई ।
वो रिक्शे पर बैठ सायोनारा गाने लगा...
मैने कहा ये दोनों #जापानी हैं,
उसने चाय उठाई... मैने कहा ये #चीनी है ।
वो अलमारी में रखे अन्नानास और गोदाम के काजू , गमले की गोभी,अचार, संतरा ,सलाद, साबुन और फीता पीपा ले कर मेज पर रख गया
मैने सबका बंडल बना कर बोला ये सब #पुर्तगाली हैं।
वो बोला तुरूप मारे हो या बम,
मै बोला - ये #डच है ।
वो झल्ला कर बोला फिर हिन्दी कहां है ?
मैने कहा - देख ये तूने अबतक जो कुछ कहा ये संस्कृत, अवधी, भोजपुरी, मैथली, राजस्थानी पंजाबी, गुजराती, गढवाली, बंगाली, तमिल, तेलगू ,उर्दू, मलयाली के साथ इस सुरम्य भारत की 121 भाषायें और लगभग 358 बोलियों की जो नदियां इकट्ठा होकर अपना समुद्र बनाती हैं ना, उनमें ये विदेशी धारायें भी समा कर हिन्दी का महासागर बनाती हैं ।
हिन्दी किसी की बपौती नहीं... धरोहर है हमारी ।
इसमें जितनी धारायें मिलती रहती हैं ये उतनी गहरी और व्यापक होती चली आ रही है। अब यदि हिन्दी की कहानी समझ आ गयी हो तो समझ, हिन्दुस्तान कितना रंगीन है ।
कितनी धारायें ! कितने कितने आयाम !
दुनिया में है कोई एैसा देश जहां पूरी दुनिया के रंग एक साथ महकते हों ?
देख ये हिन्दी की ही ताकत है
#विश्वहिंदीदिवस की शुभकामनाओं के साथ .... हिमालय के एक छोटे से गांव से ...अद्वैत .....................................................
धर्मांधता को आईना दिखाती हुई फेसबुक मित्र Adwet Bahuguna जी की एक कालजयी रचना... 🎉🎄👌
एक fb पोस्ट... किसी की मिली
जब पहली बार कर्ण को पता चला कि शस्त्र उठाना सूतों का अधिकार नही है।
ये गीत कैसा बना? आप सब की प्रतिक्रियाएं निवेदित हैं....
जीती स्पर्धा किन्तु कर्ण को, टीस मिली थी, प्यार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
शौर्य देख उस बालक का, था वीरों का धीरज डोला।
जब भेद दिया था लक्ष्य कर्ण ने, जन समूह मिलकर बोला।
है कौन भला नन्हा बालक, जिसने करतब दिखलाया है।
किसका सुत है ये लाल भला, जो धरा जीतने आया है।
है कौन भला जो चुपके से, आया है ठानी रार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
तब कोई बोला कर्ण है ये, ये तो अधिरथ का बेटा है।
हाँ तनिक विलक्षण बालक है, निज मित्रों बीच चहेता है।
इतना सुनते खुशिया भूले, हर ओर क्रोध का ज्वार उठा।
आक्रोश चरम पर था सब का, गुस्से का पारावार उठा।
सूतों के हाथों उठे धनुष की, सहन हमें टंकार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
उस जन समूह में ज्यादातर, जन गुस्सा आगबबूले थे।
क्रोधित होकर अपशब्द कहें, सारी मर्यादा भूले थे।
कहते बालक ने पाप किया, हर लिया क्षत्रियो के हक को।
कोई कहता दो हाथ काट, या मृत्युदण्ड दो बालक को।
कर सकता सूतपुत्र होकर, वीरों जैसा व्यवहार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
कुछ जन बोले उस जनसमूह में, भूल हुई अबकी छोड़ो।
देकर कुछ चेतावनी इसे, अब शस्त्रों से नाता तोड़ो।
है समय आज धनु पूजन का, पूजन अपनाया जायेगा।
है ये पूजन की जगह यहाँ, ना रक्त बहाया जायेगा।
हे सूतपुत्र धनुहा पूजन, तुम सब का है त्योहार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
देकर के चेतावनी कर्ण को, जन समूह ने समझाया।
अब कभी दोबारा ना करना, रथ हाको उससे बतलाया।
वीरता दिखाई बालक ने, ना वीरोचित सम्मान हुआ।
स्पर्धा जीता वीर कर्ण, फिर भी उसका अपमान हुआ।
फिर सारे जीवन वीर कर्ण, भूला ऐसा प्रतिकार नही।
तब समझा शस्त्र उठाने का, है सूतों को अधिकार नही।
डॉ. गोविन्द 'गजब'
रायबरेली 7388489558
मूर्तियाँ बोलती हैं।
खुद पर हुए अनंत दर्द की बात
खुद बनती हैं कई जुल्मों का हिसाब
बताती हैं उनके बनने से हुए जनता के कष्ट की दास्तां
कोसती हैं अपने वक्त के राजा को
कहती हैं जनता के पैसे के दुरुपयोग की कहानी
दिखाती हैं युगों युगों की मूर्खता का दर्पण
खोजती हैं कई सवालों के जवाब
बसती है एक रूह उनमें भी
जो करती हैं रुदन बेहिसाब
रोती हैं फफक फफक कर हर युग की देख दशा
कौन कहता है मूर्ति में नहीं दिखते जज़्बात?
मूर्तियाँ सच में बोलती हैं।
मरासिम
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