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19/10/2024
16/09/2024

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@फ़ॉलोअर्स@हाइलाइटडी एस तिवारी देवAdv D S Tiwari

16/09/2024

1965 की एक गाँव की सर्दियों के समय की सुबह की तस्वीर जिसमें गाँव के लोग ठंड से बचने के लिए आग जलाकर उसके चारों ओर बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं। इस दृश्य में लोग अपने घरों के बाहर आग जलाकर ठंड से राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं। यह ग्रामीण जीवन का एक सामान्य और प्राचीन तरीका है, जो आज भी गाँवों में देखा जा सकता है। जहां लोग एक दूसरे के साथ मिलकर ठंड से लड़ते हैं और एक दूसरे का साथ देते हैं।
#इतिहासनामा @फ़ॉलोअर्स@हाइलाइटडी एस तिवारी देवAdv D S Tiwari

08/09/2024

जरा इसको पहचानो। ये अपने जमाने का लोकप्रिय आहार था जो भादो उतरते उतरते खाने के लिये तैयार हो जाता था। चलिये हम बताते हैं। आज से लगभग 4 दशक पहले हमारे क्षेत्र में बाढ़ हर साल आती थी। नतीजा यह होता था कि अक्सर धान की फसल या तो खराब हो जाती थी या बहुत कम होती थी। नतीजा यह होता था कि सावन बीतते बीतते लगभग हर परिवार की नजर इसी फसल पर होती थी। चूंकि यह फसल भादो उतरते उतरते भूख मिटाने के लिये तैयार हो जाती थी। इसको खाने के लिये तैयार करना भी आसान है।
इस फसल का नाम है टांगुन/सावां । यह अक्सर मक्के के खेत के चारो ओर बोई जाती थी। तब मकई के खेत में मचाना पड़ता था। मचान पर बैठने के लिये बच्चे बेहद उत्सुक होते थे। स्कूल से छूटते ही आधा तीहा खा कर मचान पर। जब मकई में बाल भूई आना शुरू होती थी तभी टांगुन/सावां में भी उसकी बाल निकल पड़ती थी। मकई के खेत में बोड़ा, सरपुतिया भी बोई जाती थी। इसी में पेंहटुल और फूट भी तैयार होता था। जैसे ही मकई में दाने पड़ते थे, खेत में ही पार्टी शुरू हो जाती थी। घर से क॔डा गोइठा आता था और आती थी लहसुन मिरचा वाली चटनी। खेत में ही अहरा सुलगता था। बाबा या पिताजी बाल (भुट्टा) भूजते थे और सबसे पहले बच्चों का ही नंबर लगता था। बच्चे सबहे पहले पेंहटुल पर जुटते थे। कच्चा पेंहटुल तो कडवा होता था लेकिन पका पेंहटुल खट्टा मीठा स्वाद देता था। जैसे ही टांगुन/सावां पकने लगती थी, रखवाली बढ़ चाती थी। इस टागुन/सावां पर सबसे पहला हमला सुग्गा (तोता) का होता था। फसल पकते ही एक ओर से बाल छपक कर घर लाकर उसे पैर से लतिया कर उसके दाने निकालै जाते थे और फिर इसका पीला चावल सीधे भदेली में।

आपके यहां क्या नाम है?
@फ़ॉलोअर्स@हाइलाइटडी एस तिवारी देव

26/08/2024

Happy Janmashtami 🙏

25/06/2023

पता नहीं आजकल युवा नेताओं को प्रोग्राम का पता कैसे चल जाता है, मुंडन से लेकर तेरहवीं तक सब में पहुंच जाते हैं l

22/08/2021

भाई बहन के अटूट प्रेम और आस्था के इस पावन पर्व पर आप सभी को "रक्षाबंधन"की हार्दिक शुभकामनाएं

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