Manoj kumar mishra

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जिनसे उम्मीदें समाप्त हो जाती हैं उनसे फिर कोई भी शिकायतें नहीं रहतीं...

25/02/2026

नमस्कार

23/02/2026

अमृतलाल नागर का जन्म 17 अगस्त 1916 को हुआ था। उनका निधन 23 फ़रवरी 1990 को हुआ था।

अमृतलाल नागर : लोकजीवन के महाकाव्यकार और रंगचेतना के संवाहक

हिंदी साहित्य के विराट परिदृश्य में अमृतलाल नागर का नाम एक ऐसे रचनाकार के रूप में दर्ज है, जिसने शब्दों के माध्यम से भारतीय समाज की बहुरंगी आत्मा को पकड़ा। वे केवल उपन्यासकार नहीं थे—वे लोकजीवन के इतिहासकार, संस्कृति के व्याख्याकार और रंगचेतना के प्रखर प्रवक्ता थे। उनकी रचनाएँ पढ़ते हुए लगता है जैसे पूरा समय, पूरा समाज और उसकी धड़कनें हमारे सामने जीवित हो उठी हों।

लोक और इतिहास का महागीत

नागर जी की लेखनी का सबसे बड़ा गुण था—लोकजीवन की गहरी समझ। उनका उपन्यास "मानस का हंस" गोस्वामी तुलसीदास के जीवन के माध्यम से भक्ति, समाज और मनुष्य के द्वंद्व को महाकाव्यात्मक विस्तार देता है। वहीं "नाच्यो बहुत गोपाल" में उन्होंने ब्रज संस्कृति, लोकविश्वास और मानवीय विडंबनाओं को अद्भुत जीवंतता से चित्रित किया।

उनकी कृतियाँ इतिहास को केवल तिथियों में नहीं बाँधतीं; वे उसे मनुष्य के अनुभवों, संघर्षों और स्मृतियों में ढाल देती हैं। यही कारण है कि नागर का साहित्य दस्तावेज़ भी है और संवेदना का सागर भी।

भाषा : बोलियों की मिठास और जीवन की गंध

अमृतलाल नागर की भाषा हिंदी की विविध बोलियों से सिक्त है। अवधी, ब्रज, खड़ी बोली—सब उनके यहाँ स्वाभाविक रूप से बहती हैं। वे पात्रों को उनकी अपनी आवाज़ देते हैं। उनके संवादों में जीवन की सहजता है, हास्य है, व्यंग्य है और करुणा भी। उनकी रचनाएँ यह प्रमाणित करती हैं कि साहित्य की असली ताकत उसकी भाषा की जीवन्तता में है—और नागर जी ने हिंदी को यह जीवन्तता भरपूर दी।

रंगमंच और भारतेन्दु नाट्य अकादमी से संबंध

अमृतलाल नागर का व्यक्तित्व केवल कथा-साहित्य तक सीमित नहीं रहा। वे रंगमंच से गहरे रूप में जुड़े थे और मानते थे कि नाटक समाज की सामूहिक चेतना का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। लखनऊ की सांस्कृतिक धरती से उनका विशेष संबंध रहा, जहाँ उन्होंने रंगकर्मियों को प्रेरित किया और नाट्य-चेतना के विकास हेतु संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष रहते हुए भारतेन्दु नाट्य केन्द्र की स्थापना करवाई और प्रथम निदेशक राज बिसरिया जी को बनने के लिए प्रेरित किया। और भारतेन्दु नाट्य अकादमी के प्रथम अध्यक्ष मनोनीत हुए। अकादमी हिंदी रंगमंच के प्रशिक्षण और संवर्धन की अग्रणी संस्था है, और नागर जी इसके बौद्धिक-सांस्कृतिक वातावरण से जुड़े रहे। उनकी दृष्टि में नाट्यशिक्षा केवल अभिनय की तकनीक नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की समझ विकसित करने की प्रक्रिया है।

नागर जी के विचारों और मार्गदर्शन ने अकादमी के विद्यार्थियों और रंगकर्मियों को यह सिखाया कि साहित्य और रंगमंच एक-दूसरे के पूरक हैं—कहानी मंच पर जीवित होती है और मंच साहित्य को नया जीवन देता है।

समाज का सजग साक्षी

नागर जी का साहित्य सामाजिक विषमताओं, मानवीय संघर्षों और सांस्कृतिक संक्रमणों का साक्षी है। वे किसी विचारधारा के प्रचारक नहीं, बल्कि जीवन के निष्पक्ष व्याख्याकार थे। उनके यहाँ हास्य और करुणा साथ-साथ चलते हैं—मानो वे कहना चाहते हों कि मनुष्य की कहानी केवल आँसू नहीं, मुस्कान भी है।

विरासत और प्रासंगिकता

आज जब समाज तेज़ बदलावों के दौर से गुजर रहा है, अमृतलाल नागर की रचनाएँ हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का निमंत्रण देती हैं। वे याद दिलाती हैं कि संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं, वर्तमान की चेतना भी है।

साहित्य और रंगमंच—दोनों के बीच सेतु बनकर नागर जी ने जो योगदान दिया, वह हिंदी जगत के लिए अमूल्य धरोहर है। वे उन विरल रचनाकारों में हैं जिन्होंने शब्दों में समाज की आत्मा को दर्ज किया और मंच पर उसकी गूँज सुनने की आकांक्षा भी जगाई। अमृतलाल नागर का अवदान हिंदी साहित्य और भारतीय रंगपरंपरा के इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। साहित्य में विशेष योगदान हेतु आपको भारत सरकार द्वारा पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था।

07/02/2026

गुरु की बातें जब समझ में आने लगती है, तब अध्ययन आरम्भ होता है। - मनोज कुमार मिश्रा / केबीथ्री इंडिया

04/02/2026

उड़ीसा का प्रसिद्ध लोकनाट्य प्रहलादनाटकम भारतीय लोकनाट्य परंपरा का एक सशक्त और जीवंत रूप है, जो विशेष रूप से दक्षिण उड़ीसा के और आसपास के क्षेत्रों में प्रचलित है। प्रहलादनाटकम लोकनाट्य भागवत पुराण की कथा है — भक्त प्रह्लाद, असुरराज हिरण्यकश्यप और भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार पर आधारित है। इसकी प्रस्तुति केवल नाटकीय प्रदर्शन नहीं होती, बल्कि धार्मिक अनुष्ठान, सामुदायिक उत्सव और भक्ति-साधना का संयुक्त रूप होती है। इसमें लोकविश्वास, क्षेत्रीय संस्कृति और वैष्णव भक्ति का गहरा समन्वय दिखाई देता है।

ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जाए तो प्रहलादनाटकम की परंपरा कई शताब्दियों पुरानी मानी जाती है। विद्वानों का मत है कि यह वैष्णव भक्ति आंदोलन के प्रभाव में विकसित हुआ। मंदिरों, सामाजिक उत्सवों और धार्मिक मेलों के साथ इसका गहरा संबंध रहा है। कई स्थानों पर इसे नरसिंह जयंती, वार्षिक मंदिर उत्सव या ग्राम-देवता के पर्व पर अनिवार्य रूप से खेला जाता है। यह नाट्य धार्मिक कथा को जनसाधारण तक पहुँचाने का माध्यम भी रहा है, जिस समय लिखित ग्रंथों तक सबकी पहुँच नहीं थी।

यदि एक वास्तविक प्रदर्शन का संदर्भ लें तो भारतीय विद्या भवन, भुवनेश्वर में लुप्तप्राय लोककला के लिए प्रतिमाह होने वाले उत्सव में नाटक प्रहलादनाटकम का मंचन देखने का अवसर मिला। प्रस्तुति प्रायः रात्रि में आरंभ होता है यह मंचन आरम्भ काल में साप्ताहिक मंचन होता था, प्रतिदिन मंचन जहाँ समाप्त होता था अगले दिवस कथा उससे ही आगे बढ़ती थी। अब कई बार मंचन पूरी रात चलता है साथ ही 2 घण्टे का नाटक बना लिया है आधुनिक अवस्था में नाटक देखने की दर्शकों की क्षमता छोटी हो गई है। जब मंदिर प्रांगण या खुले मैदान में चारों ओर दर्शक बैठते हैं तब बीच में प्रदर्शन स्थल बनाया जाता है। यहां कंक्रीट का खुला मंच बना है पीछे लगा पेड़ प्रकृति के साक्षात्कार का उत्तम दर्शक दिखता रहा। नाटक का प्रारंभ मंगलाचरण और वंदना से होता है, जिसमें गणेश, माता सरस्वती, भगवान विष्णु और भगवान नरसिंह की स्तुति गाई गई। तदोपरांत गायक-मंडली कथा की भूमिका बाँधती है। कथा क्रमशः पद्यात्मक संवाद, गीत, अभिनय और देहगतियों के माध्यम से आगे बढ़ती है।

प्रहलादनाटकम की प्रमुख विशेषता इसकी पद्य और संगीत प्रधान शैली है। संवाद छंदों में रचे हैं और उन्हें गाकर या गेय लय में बोला जाता है। वाद्ययंत्रों में मृदंग, झांझ, करताल और हारमोनियम का प्रयोग होता है। यहाँ संगीत केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि मनोभावों को तीव्र बनाता है — जैसे प्रह्लाद की भक्ति के प्रसंगों में कोमल राग, और हिरण्यकश्यप के क्रोध या युद्ध दृश्यों में तीव्र ताल।

अभिनय शैली अत्यंत नाटकीय और लोकाभिमुख होती है। कलाकार मुखर स्वर, बड़ी देह-भंगिमाओं और स्पष्ट मुद्राओं का उपयोग करते हैं ताकि दूर बैठे दर्शक भी भाव को समझ सकें। मंचन में यथार्थवादी सज्जा की अपेक्षा प्रतीकात्मकता अधिक होती है — एक स्तंभ, सिंहासन या शस्त्र ही दृश्य का संकेत देने के लिए पर्याप्त होता है। उपरोक्त शैली लोकनाट्य की सहजता और गतिशीलता को बनाए रखती है।

वेशभूषा और रूप-सज्जा प्रहलादनाटकम का आकर्षक पक्ष है। हिरण्यकश्यप का भव्य मुकुट और दैत्य रूप, प्रह्लाद का सरल वैष्णव वेश, देवताओं की अलंकृत पोशाक और विशेष रूप से नरसिंह का विशाल मुखौटा और उग्र रूप — दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है। नरसिंह अवतार का दृश्य प्रस्तुति का चरम बिंदु होता है। जब कलाकार स्तंभ को चीरकर नरसिंह के रूप में प्रकट होता है, द्रुत गति में वादन और ऊर्जस्वित अभिनय के साथ पूरा वातावरण रोमांचित और भक्तिमय हो उठता है।

प्रहलादनाटकम लोकनाट्य की एक और महत्वपूर्ण विशेषता सामुदायिक सहभागिता है। कलाकार प्रायः स्थानीय लोग होते हैं, जो परंपरागत रूप से इस कला को सीखते और आगे बढ़ाते हैं। दर्शक भी प्रस्तुति में सक्रिय भाग लेते हैं — जयघोष, भजन और प्रतिक्रियाओं के माध्यम से। हमें बताया गया कि जब नाटक गांवों में साप्ताहिक मंचन में होता है तब 30 प्रकार से हिरण्यकश्यप द्वारा प्रहलाद को विष्णु भक्ति से दूर करने के लिए दण्ड देता है। जिसमें प्रहलाद गाँव में हिरण्यकश्यप से दूर भागता है तब इसमें एक बार छत के नीचे फेंक देते है। जनता नीचे अपनी गोद में प्रहलाद को पकड़कर सुरक्षित करती है ऐसे ही प्रत्येक अवसर में दर्शक हिरण्यकश्यप के क्रोध से बचाते हैं। इस प्रकार मंच और दर्शक के बीच दूरी कम हो जाती है और एक सामूहिक रंगानुभव निर्मित होता है।

नाट्यशास्त्रीय दृष्टि से भी प्रहलादनाटकम रोचक है, क्योंकि इसमें लोकधर्मी अभिनय, संगीत, वाचिकता और अनुष्ठानिकता का सुंदर संयोजन मिलता है। यह शास्त्रीय रंगमंच की औपचारिकता से मुक्त होकर सीधे जनजीवन से जुड़ता है। इस प्रकार प्रहलादनाटकम उड़ीसा की लोकनाट्य परंपरा का एक प्रवाहमान, भक्ति-संपृक्त और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण नाट्यरूप है, जो कथा, संगीत, अभिनय और समुदाय — सभी को एक सूत्र में बाँधकर जीवंत रंगानुभूति प्रदान करता है।

यह अवसर भारतेन्दु नाट्य अकादमी के छात्रों के पारंपरिक नाट्य प्रशिक्षण कार्यक्रम में मुख्य प्रशिक्षक सत्यव्रत राउत जी के हेतु बनसे से हुआ।
Ministry of Culture, Government of India Sangeet Natak Akademi Department of Culture, Uttar Pradesh

03/02/2026

03/02/2026

प्रहलाद नाटकम
के मंचन का समालोचना लेख कल प्रस्तुत होगा।

Photos from Manoj kumar mishra's post 03/02/2026

नाट्यशास्त्र भारतीय रंगपरंपरा का आधारभूत ग्रंथ है, जिसमें ‘नाट्य’ को एक समग्र और जीवंत कला के रूप में परिभाषित किया गया है। नाट्य केवल नाटक या अभिनय भर नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के विविध रूपों, भावों और स्थितियों का कलात्मक अनुकरण है। भरतमुनि के अनुसार नाट्य लोकजीवन का दर्पण है, जो संसार के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, प्रेम-क्रोध, वीरता और करुणा जैसे अनेक भावों को मंच पर सजीव रूप में प्रस्तुत करता है। इस प्रकार नाट्य मनुष्य के अनुभव जगत को कलात्मक ढंग से व्यक्त करने का माध्यम बनता है।

नाट्यशास्त्र में नाट्य की उत्पत्ति का आधार ‘नाट्यवेद’ की कल्पना है। कथा के अनुसार ब्रह्मा ने चारों वेदों से तत्व ग्रहण करके नाट्यवेद की रचना की—ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस का तत्व लिया गया। इस कारण नाट्य को पंचम वेद कहा गया, जो सभी वर्गों के लोगों के लिए सुलभ है। इसका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि शिक्षा देना और जीवन के आदर्शों की स्थापना करना भी है।

नाट्य की संरचना में अभिनय का विशेष महत्व है। नाट्यशास्त्र में अभिनय को चार भागों में विभाजित किया गया है—आंगिक, वाचिक, आहार्य और सात्त्विक। आंगिक अभिनय शरीर की गति और मुद्राओं से, वाचिक अभिनय संवाद और स्वर से, आहार्य अभिनय वेशभूषा और सज्जा से तथा सात्त्विक अभिनय आंतरिक भावों की सच्ची अभिव्यक्ति से संबंधित है। इन सबके समन्वय से नाट्य पूर्णता प्राप्त करता है।

भरतमुनि ने नाट्य का अंतिम लक्ष्य ‘रस’ की निष्पत्ति को माना है। जब दर्शक मंच पर प्रस्तुत भावों से तादात्म्य स्थापित कर आनंद की अनुभूति करता है, तब रस उत्पन्न होता है। यही रस नाट्य की आत्मा है और नाट्यकला की सफलता का मापदंड भी। इस प्रकार नाट्यशास्त्र के अनुसार नाट्य एक ऐसी समन्वित कला है, जो शिक्षा, मनोरंजन और भावानुभूति—तीनों का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है और मानव जीवन को सौंदर्यबोध तथा संवेदनात्मक गहराई प्रदान करती है।

प्रहलादनाटकं के मंचन के पूर्व और उत्तरार्ध की छवियाँ
भारतीय विद्या भवन, द्वारा आयोजित लुप्तप्राय लोक नाट्य मंचन की सन्ध्या दिनांक 19 जनवरी 26, भुवनेश्वर, उड़ीसा

29/01/2026

जोश को होश में रखने के लिए कलाकार को अनुशासन में रहना चाहिए

20/01/2026

यहाँ पाया जाता हूँ

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