Dilkash Daur

Dilkash Daur

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urdu ghazal, sahyeri ke is safar me apki humrah 'Farha Anwar' ki ek chhoti si koshish.

04/06/2020

शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है
बशीर बद्र

26/05/2020

यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें

इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो

13/05/2019

हम सब

एक इत्तिफ़ाक़ के

मुख़्तलिफ़ नाम हैं

मज़हब

मुल्क

ज़बान

इसी इत्तिफ़ाक़ की अन-गिनत कड़ियाँ हैं

अगर पैदाइश से पहले

इन्तिख़ाब की इजाज़त होती

तो कोई लड़का

अपने बाप के घर में पैदा होना पसंद नहीं करता

निदा फ़ाज़ली

14/02/2019

इस तअल्लुक़ में नहीं मुमकिन तलाक़

ये मोहब्बत है कोई शादी नहीं

अनवर शऊर

Happy valentine's day

22/01/2019

मेरा मज़हब इश्क़ का मज़हब जिस में कोई तफ़रीक़ नहीं

मेरे हल्क़े में आते हैं 'तुलसी' भी और 'जामी' भी
क़ैशर शमीम

23/12/2018

मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था

मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे
लियाक़त जाफ़री

22/12/2018

मज़हबी बहस मैं ने की ही नहीं

फ़ालतू अक़्ल मुझ में थी ही नहीं
अकबर इलाहाबादी

21/12/2018

देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार

रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

06/11/2018

Wishing you a memorable Diwali

07/10/2018

मिरे हर अमल को सराह कर ये अज़िय्यतें न दिया करो
मिरी जान तुम भी अजीब हो तुम्हें रूठना भी तो चाहिए
अाग़ा सरोश

04/10/2018

बुरा न मान 'ज़िया' उस की साफ़-गोई का

जो दर्द-मंद भी है और बे-अदब भी नहीं

03/10/2018

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं

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