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31/07/2025

!! मेरी तितली !!

मेरी प्यारी तितली रानी खेले मेरे घर आँगन में]
बंधे घुँगरू पहने पायल छम छम करती डोले पुरे आँगन में !

नाम है उसका तितली उड़ते फिरे मेरे घर आँगन में]
रंग है उसके तितली जैसे, जिसे देख माँ बार बार हंस जाती]
माँ की तितली रोज सुबह नन्हे हाथो से रोज उसे खूब जगती !

भोली भली जुगनू सी दप दप करती और रोशन हो उठती]
नहीं दुखती मन किसी का, सबको खूब हर्षाति]
रोतो को हंसती, सोतो को खूब जगती !

देख उसकी भोली सूरत माँ का मन दुलराता]
उसकी मीठी बातो से शहद भी शर्मा जाता]
माँ का खूब हाथ बटाती, सबके काम कराती!
चंचल, अविरल, बलखाती बहती रहती,
मेरे घर आँगन में स्वच्छ नदी की धारा सी !

देख उसकी भोली सूरत माँ का मन दुलराता,
बेटी मेरी पड़ती रहे बढ़ती रहे,
पहुंचे उच्च शिखर पर, बस माँ का मन बार बार यही दोहराता !

अक्सर माँ का मन घबड़ाता है, देख जगत के अनाचारों को,
कैसे उसकी भोली बेटी पार करेगी जगत के गलियारों को !

माँ का मन अकुला जाता सोच सोच के इन अनाचारों को,
माँ का मन तो ऐसा ही है,
नहीं जानती उसकी बेटी नहीं कोई कोमल सी अबला है,
वो तो दुर्गा है, वो तो अम्बा है,
चढ़ मुंडो पर नृत्य करती वो तो जगदम्बा है !

माँ का मन तो ऐसा है पलकों से बह आता पानी,
सोच सोच के कब उड़ जाएगी ये चिडिए छोड़ के इस घर का दाना पानी !

माँ की ममता सदा चाहती, बने स्वालम्बी मेरी तितली रानी,
बने कही की अफसर वो,
करे देश के काम बड़े, ऐसी हो मेरी तितली रानी !

माँ की ममता यही चाहती, रंग बिखेरे पुरे जग में,
भर दे खुशियों से हर घर आँगन को जहाँ बने अफसर मेरी तितली रानी !

22/03/2021

चला गगन में उड़ने को मैं,
ढूंड रहा था पंख मैं ऐसे,
जो ले चले जहाँ से ऊँचे।

मैं था तब नन्हा बच्चा,
नहीं जानता था तेज हवा के झोके वो,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।

पहुच चुका था खुले क्ष्तििज में,
जहाँ रूका मैं, था बहुत थका मैं,
लगा मुझे न रूक पाउंगा इस,
इस धरा के ऊँचे,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।

पंहुचा था क्षितिज में ऊँचा,
जाना था अभी और भी ऊँचा,
हुये थे मेरे पंख भी भारी,
रूकना थ अब यहाँ पर भारी,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे,
जो ले जाते और भी ऊँचे।

लगा के ताकत रोके था मैं,
नहीं हटूगां नहीं गिरूगा,
संशय मन में अभी था कुछ भाारी,
क्या रूक पाऊंगा, क्या टिक पाऊंगा,
ये विषमताये थी मुझ पर भारी।
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।

अब नहीं उठा पा रहा था बोझ इन पंखो का,
कन्धे हुये थे मेरे भारी,
क्यो की पंख भी हो चले थे भारी,
ढंूड रहा था पंख मै ऐसे।

तब लगा मुझे की अब तो स्वयम ही उडना है।
नहीं तो लो चला मैं इस क्षितिज के नीचे,
क्यो उडू मैं पंखो मैं, हटा दिये तब उन पंखो को,
हो गया था मैं स्वावलम्बी, भार हटा था मेरे कंधे से,
अब क्षितिज में उड़ने को, स्वतंत्र हुआ था इन पंखो से,
अभ्यस्त हुआ था आज मैं बिना पंखो के उड़ने में । ...............भारत सिंह तोमर।

19/10/2020

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06/12/2017
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