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26/05/2026

#रिमांड क्या होता है?
#अपराधिक मामलों में Remand (रिमांड) का मतलब होता है — #किसी आरोपी को जाँच या न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अदालत के आदेश से पुलिस या जेल की अभिरक्षा में भेजना।
#जब पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करती है और 24 घंटे के भीतर जाँच पूरी नहीं हो पाती, तब उसे मजिस्ट्रेट के सामने पेश करके रिमांड मांगी जाती है।
रिमांड के मुख्य प्रकार
1. Remand (पुलिस रिमांड)
इसमें आरोपी पुलिस की हिरासत में रहता है।
पुलिस उससे पूछताछ, बरामदगी, साक्ष्य जुटाने आदि का कार्य करती है।
मुख्य बातें
#मजिस्ट्रेट की अनुमति आवश्यक होती है।
प्रारम्भिक 15 दिनों के भीतर ही दी जा सकती है।
आरोपी को पुलिस #थाने/कस्टडी में रखा जाता है।
2. Remand (न्यायिक रिमांड)
इसमें आरोपी को #जेल भेज दिया जाता है और वह #न्यायिक अभिरक्षा में रहता है।
#मुख्य बातें
आरोपी जेल में रहता है, पुलिस हिरासत में नहीं।
पुलिस पूछताछ सीधे नहीं कर सकती।
#गंभीर अपराधों में अक्सर न्यायिक रिमांड दी जाती है।
BNSS में प्रावधान
पहले यह प्रावधान की धारा 167 में था, अब

के स्थान पर में धारा 187 लागू होती है।
रिमांड की अवधि
#प्रारम्भिक कुल पुलिस रिमांड सामान्यतः 15 दिन तक।
उसके बाद न्यायिक रिमांड।
#जाँच पूरी करने की अधिकतम अवधि:
सामान्य अपराध: 60 दिन
#गंभीर अपराध (10 वर्ष/आजीवन/मृत्युदंड): 90 दिन
यदि समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं होती, तो आरोपी को “डिफॉल्ट बेल” का अधिकार मिल सकता है।
#सरल उदाहरण
मान लीजिए चोरी के मामले में पुलिस ने किसी व्यक्ति को पकड़ा और अभी सामान बरामद करना बाकी है, तो पुलिस अदालत से Remand मांग सकती है।
लेकिन यदि पूछताछ पूरी हो गई और केवल मुकदमा चलना बाकी है, तो आरोपी को Remand में जेल भेजा जाता है।



✍️⚖️🧑‍🎓
Om Prakash Shandilya

21/05/2026

Pocket Senior #परिवाद

Photos from Pocket Senior's post 21/05/2026

Om Prakash Shandilya

20/05/2026

जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई
प्रभु! श्री राम जी कि कृपा आप हमेशा बनी रहे.........
🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂🎂

Om Prakash Shandilya

18/05/2026

परिवाद का मुकदमा आसानी से कैसे खत्म करवाया जा सकता है
#परिवाद #हाईकोर्ट

18/05/2026
17/05/2026

08/02/2026

यदि पुलिस अधिकारी FIR दर्ज करने से मना करे (BNSS 2023 के तहत विस्तृत विश्लेषण)

भारत में अपराधों की रिपोर्टिंग और न्याय पाने का पहला कदम एफआईआर (FIR – First Information Report) दर्ज करना है। किसी भी नागरिक के लिए यह महत्वपूर्ण अधिकार है, विशेषकर जब मामला संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) का हो। संज्ञेय अपराध ऐसे अपराध होते हैं जिनमें पुलिस बिना कोर्ट की अनुमति के सीधे जांच शुरू कर सकती है। हालाँकि, कई बार पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना कर देते हैं। ऐसे में नए भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNSS 2023) ने स्पष्ट प्रक्रियाएँ और अधिकार दिए हैं ताकि नागरिक को न्याय मिल सके और पुलिस जवाबदेह रहे। नीचे इसका विस्तृत विवरण दिया गया है।

✅ 1. FIR दर्ज करने का कर्तव्य (Duty to Register FIR – Sec 173(1) BNSS)

BNSS 2023 के अनुसार, यदि कोई संज्ञेय अपराध घटित होता है तो पुलिस अधिकारी पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है। यह पुलिस का प्राथमिक दायित्व है। यदि कोई नागरिक अपराध की जानकारी देता है, तो पुलिस जांच प्रारंभ करने के लिए FIR दर्ज करने से मना नहीं कर सकती।

महत्त्वपूर्ण बिंदु:

प्रारंभिक जांच (Preliminary Enquiry) केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सज़ा 3 से 7 वर्ष के बीच हो और उसके लिए DSP (Deputy Superintendent of Police) की अनुमति आवश्यक हो।
सामान्य संज्ञेय अपराधों में किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं है, और सीधे FIR दर्ज की जानी चाहिए।
FIR दर्ज करने से इनकार करना कानून का उल्लंघन है।
✅ 2. शून्य FIR (Zero FIR – Sec 173(2) BNSS)

कई बार पीड़ित को यह स्पष्ट नहीं होता कि अपराध किस थाने के क्षेत्र में हुआ है। ऐसी स्थिति में BNSS 2023 ने ‘Zero FIR’ का प्रावधान किया है। इसका अर्थ है कि पीड़ित किसी भी पुलिस स्टेशन में जाकर अपराध की रिपोर्ट दर्ज कर सकता है।

Zero FIR की विशेषताएँ:

थाना क्षेत्र की परवाह किए बिना FIR दर्ज की जाएगी।
बाद में इसे संबंधित क्षेत्र के थाना में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
शिकायतकर्ता को FIR की मुफ्त प्रति उपलब्ध कराई जाएगी।

यह प्रावधान विशेष रूप से महिलाओं, बच्चों, वंचित वर्गों, और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।

✅ 3. एसपी के पास शिकायत (Escalation to Superintendent of Police – Sec 173(4) BNSS)

यदि थाना प्रभारी (SHO) FIR दर्ज करने से मना करता है, तो नागरिक लिखित शिकायत एसपी (Superintendent of Police) को कर सकता है। एसपी को कानूनन अधिकार है कि:

FIR दर्ज करने का आदेश दे।
मामले की जांच का आदेश दे।
थाना प्रभारी की लापरवाही पर कार्यवाही करे।

यह प्रक्रिया नागरिक को न्याय पाने की अगली वैधानिक राह देती है।

✅ 4. मजिस्ट्रेट से राहत (Magistrate Intervention – Sec 175 BNSS जैसे प्रावधान)

यदि एसपी भी कार्यवाही नहीं करता है, तो नागरिक मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर सकता है। मजिस्ट्रेट शिकायत पर संज्ञान लेकर पुलिस को FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने का आदेश दे सकता है। यद्यपि BNSS 2023 में स्पष्ट रूप से धारा 175 का उल्लेख नहीं मिलता, यह अधिकार पुराने CrPC की धारा 156(3) के समान है।

यह उपाय न्याय प्रणाली का तीसरा स्तर है, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

✅ 5. उच्च न्यायालय में रिट याचिका (High Court Remedy – Article 226 of the Constitution)

यदि थाना और एसपी दोनों FIR दर्ज करने से मना करें, और मजिस्ट्रेट भी राहत न दे, तो नागरिक सीधे उच्च न्यायालय में रिट याचिका दायर कर सकता है।

संभावित राहतें:

FIR दर्ज करने का निर्देश।
जांच की निगरानी का आदेश।
पीड़ित को मुआवजा प्रदान करने का निर्देश।
पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश।

उच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की अंतिम सुरक्षा प्रदान करता है।

✅ 6. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी पर दंड (Penalties for Police Refusal – Sec 199(c) BNSS)

BNSS 2023 में पुलिस अधिकारियों के लिए दंड का प्रावधान भी किया गया है। यदि कोई पुलिस अधिकारी जानबूझकर FIR दर्ज करने से इनकार करता है, तो:

उसे 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।
साथ में आर्थिक दंड भी लगाया जा सकता है।

यह प्रावधान पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित करता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है।

✅ 7. पुलिस अधिकारी के विरुद्ध अपराध (Offences Against Police – Sec 121 BNSS)

पुलिस के कार्य में बाधा डालने या उन्हें घायल करने वाले अपराधों के लिए भी BNSS ने कठोर दंड का प्रावधान किया है। यदि कोई व्यक्ति पुलिस को उनकी ड्यूटी निभाने से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, तो:

उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है।
साथ में जुर्माना भी लगाया जाएगा।

यह प्रावधान पुलिस के सम्मान और सुरक्षा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।

🔑 व्यावहारिक पहलू और सुझाव
FIR दर्ज न होने पर:
तुरंत उच्च अधिकारी से संपर्क करें, लिखित शिकायत दें, और शिकायत की रसीद या कॉपी लें।
Zero FIR का प्रयोग करें:
क्षेत्रीय अस्पष्टता की स्थिति में किसी भी थाना में जाकर शिकायत करें।
डिजिटल प्लेटफॉर्म:
कई राज्यों में ऑनलाइन FIR सुविधा भी उपलब्ध है। इसका उपयोग करें।
कानूनी सहायता लें:
वकील या विधिक सेवा प्राधिकरण से मदद लेकर उच्च न्यायालय या मजिस्ट्रेट से राहत लें।
FIR की कॉपी:
FIR की मुफ्त कॉपी अवश्य लें, जो भविष्य में सबूत के रूप में उपयोगी होगी।
✅ निष्कर्ष

BNSS 2023 ने नागरिकों को FIR दर्ज कराने का स्पष्ट और प्रभावी अधिकार दिया है। पुलिस का दायित्व है कि संज्ञेय अपराधों की रिपोर्ट तुरंत दर्ज करे। Zero FIR जैसे प्रावधान नागरिकों के लिए राहत का रास्ता खोलते हैं। SHO द्वारा मना करने पर एसपी, मजिस्ट्रेट और उच्च न्यायालय तक शिकायत का अधिकार है। साथ ही पुलिस अधिकारियों की लापरवाही पर दंड का प्रावधान न्याय प्रणाली को मजबूत बनाता है।

यह कानून न केवल अपराध की रिपोर्टिंग में मदद करता है बल्कि पुलिस की जवाबदेही, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और न्याय की उपलब्धता को सुनिश्चित करता है। नागरिकों को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए और कानून द्वारा प्रदत्त सभी राहत उपायों का उपयोग करना चाहिए।

✅ 1. FIR क्या है?

FIR (First Information Report) अपराध की प्राथमिक जानकारी है जिसे पुलिस संज्ञेय अपराध की स्थिति में दर्ज करती है।

✅ 2. पुलिस पर FIR दर्ज करने का क्या दायित्व है?

पुलिस को संज्ञेय अपराध की शिकायत मिलते ही FIR दर्ज करनी होती है, बिना किसी अनुमति के।

✅ 3. Preliminary Enquiry कब की जा सकती है?

Preliminary enquiry केवल तब की जा सकती है जब अपराध की सजा 3 से 7 वर्षों के बीच हो और DSP की अनुमति ली जाए।

✅ 4. Zero FIR क्या है?

Zero FIR वह प्रक्रिया है जिसमें पीड़ित किसी भी थाने में जाकर FIR दर्ज करा सकता है, भले ही अपराध का क्षेत्र अस्पष्ट हो।

✅ 5. SHO FIR दर्ज न करे तो क्या करें?

SHO के मना करने पर शिकायत लिखित रूप में एसपी (Superintendent of Police) को दी जा सकती है।

✅ 6. यदि एसपी भी कार्यवाही न करे तो क्या उपाय है?

मजिस्ट्रेट के पास आवेदन कर FIR दर्ज कराने का आदेश लिया जा सकता है।

✅ 7. उच्च न्यायालय से क्या राहत मिल सकती है?

उच्च न्यायालय FIR दर्ज कराने का आदेश, जांच की निगरानी और मुआवजे का निर्देश दे सकता है।

✅ 8. FIR दर्ज न करने पर पुलिस अधिकारी को क्या सजा हो सकती है?

पुलिस अधिकारी को 6 महीने से 2 वर्ष तक की कैद और जुर्माना हो सकता है।

✅ 9. पुलिस की ड्यूटी में बाधा डालने पर क्या दंड है?

जो व्यक्ति पुलिस को ड्यूटी से रोकने के लिए चोट पहुँचाता है, उसे 5 से 10 वर्ष तक की सजा और जुर्माना हो सकता है।

✅ 10. FIR की कॉपी लेने का क्या लाभ है?

FIR की कॉपी भविष्य में सबूत के रूप में काम आती है और शिकायत की पुष्टि करती है।
🖋️Om Prakash Shandilya Advocate High court

Om Parkash Shandilya
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