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04/11/2021
Happy Diwali
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 7:
सेना, नौसेना और वायुसेना से सम्बन्धित अपराधें के विषय में
धारा १३१ विद्रोह का दुष्प्रेरण का किसी सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक को कर्तव्य से विचलित करने का प्रयत्न करना
धारा १३२ विद्रोह का दुष्प्रेरण, यदि उसके परिणामस्वरूप विद्रोह हो जाए।
धारा १३३ सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अपने वरिष्ठ अधिकारी, जब कि वह अधिकारी अपने पद-निष्पादन में हो, पर हमले का दुष्प्रेरण।
धारा १३४ हमले का दुष्प्रेरण जिसके परिणामस्वरूप हमला किया जाए।
धारा १३५ सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा परित्याग का दुष्प्रेरण।
धारा १३६ अभित्याजक को संश्रय देना
धारा १३७ मास्टर की उपेक्षा से किसी वाणिज्यिक जलयान पर छुपा हुआ अभित्याजक
धारा १३८ सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा अनधीनता के कार्य का दुष्प्रेरण।
धारा १३८ क पूर्वोक्त धाराओं का भारतीय सामुद्रिक सेवा को लागू होना
धारा १३९ कुछ अधिनियमों के अध्यधीन व्यक्ति।
धारा १४० सैनिक, नौसैनिक या वायुसैनिक द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली पोशाक पहनना या प्रतीक चिह्न धारण करना।
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 6:
राज्य के विरूद्ध अपराधों के विषय में
धारा 120 भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना
धारा 121 क धारा 121 दवारा दण्डनीय अपराधों को करने का षडयंत्र
धारा 122 भारत सरकार के विरूद्ध युद्ध करने के आशय से आयुध आदि संग्रह करना
धारा 123 युद्ध करने की परिकल्पना को सुनकर बनाने के आशय से छुपाना
धारा 124 किसी विधिपूर्ण शक्ति का प्रयोग करने के लिए विवश करने या उसका प्रयोग अवरोपित करने के आशय से राट्रपति, राज्यपाल आदि पर हमला करना
धारा 124 क राजद्रोह
धारा 125 भारत सरकार से मैत्री सम्बंध रखने वाली किसी एशियाई शक्ति के विरूद्ध युद्ध करना
धारा 126 भारत सरकार के साथ शान्ति का संबंध रखने वाली शक्ति के राज्य क्षेत्र में लूटपाट करना
धारा 127 धारा 125 व 126 में वर्णित युद्ध या लूटपाट दवारा ली गयी सम्पत्ति प्राप्त करना
धारा 128 लोक सेवक का स्व ईच्छा राजकैदी या युद्धकैदी को निकल भागने देना
धारा 129 उपेक्षा से लोक सेवक का ऐसे कैदी का निकल भागना सहन करना
धारा १३० ऐसे कैदी के निकल भागने में सहायता देना, उसे छुडाना या संश्रय देना
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 5 क:
आपराधिक षडयन्त्र
धारा 120 क आपराधिक षडयंत्र की परिभाषा
धारा 120 ख आपराधिक षडयंत्र का दण्ड
भारतीय दण्ड संहिता
अध्याय 5:
दुष्प्रेरण के विषय में
धारा 107 किसी बात का दुष्प्रेरण
धारा 108 दुष्प्रेरक
धारा 108 क भारत से बाहर के अपराधों का भारत में दुष्प्रेरण
धारा 109 दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित कार्य उसके परिणामस्वरूप किया जाए और जहां तक कि उसके दण्ड के लिये कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं है
धारा 110 दुष्प्रेरण का दण्ड, यदि दुष्प्रेरित व्यक्ति दुष्प्रेरक के आशय से भिन्न आशय से कार्य करता है
धारा 111 दुष्प्रेरक का दायित्व जब एक कार्य का दुष्प्रेरण किया गया है और उससे भिन्न कार्य किया गया है
धारा 112 दुष्प्रेरक कब दुष्प्रेरित कार्य के लिये और किये गये कार्य के लिए आकलित दण्ड से दण्डनीय है
धारा 113 दुष्प्रेरित कार्य से कारित उस प्रभाव के लिए दुष्प्रेरक का दायित्व जो दुष्प्रेरक दवारा आशयित से भिन्न हो
धारा 114 अपराध किए जाते समय दुष्प्रेरक की उपस्थिति
धारा 115 मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण यदि अपराध नहीं किया जाता यदि अपहानि करने वाला कार्य परिणामस्वरूप किया जाता है
धारा 116 कारावास से दण्डनीय अपराध का दुष्प्रेरण अदि अपराध न किया जाए यदि दुष्प्रेरक या दुष्प्रेरित व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है, जिसका कर्तव्य अपराध निवारित करना हो
धारा 117 लोक साधारण दवारा या दस से अधिक व्यक्तियों दवारा अपराध किये जाने का दुष्प्रेरण
धारा 118 मृत्यु या आजीवन कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नहीं किया जाए
धारा 119 किसी ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना का लोक सेवक दवारा छिपाया जाना, जिसका निवारण करना उसका कर्तव्य है
यदि अपराध कर दिया जाय
यदि अपराध मृत्यु, आदि से दण्डनीय है
यदि अपराध नहीं किया जाय
धारा 120 कारावास से दण्डनीय अपराध करने की परिकल्पना को छिपाना
यदि अपराध कर दिया जाए - यदि अपराध नहीं किया जाए
भारतीय दण्ड संहिता
अध्याय 4:
साधारण अपवाद
धारा 76 विधि द्वारा आबद्ध या तथ्य की भूल के कारण अपने आप को विधि द्वारा आबद्ध होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा 77 न्यायिकत: कार्य करने हेतु न्यायाधीश का कार्य
धारा 78 न्यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य
धारा 79 विधि द्वारा न्यायानुमत या तथ्य की भूल से अपने को विधि द्वारा न्यायानुमत होने का विश्वास करने वाले व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य
धारा 80 विधिपूर्ण कार्य करने में दुर्घटना
धारा 81 कार्य जिससे अपहानि कारित होना संभाव्य है, किन्तु जो आपराधिक आशय के बिना और अन्य अपहानि के निवारण के लिये किया गया है
धारा 82 सात वर्ष से कम आयु के शिशु का कार्य
धारा 83 सात वर्ष से ऊपर किन्तु बारह वर्ष से कम आयु अपरिपक्व समझ के शिशु का कार्य
धारा 84 विकृतिचित्त व्यक्ति का कार्य
धारा 85 ऐसे व्यक्ति का कार्य जो अपनी इच्छा के विरूद्ध मत्तता में होने के कारण निर्णय पर पहुंचने में असमर्थ है
धारा 86 किसी व्यक्ति द्वारा, जो मत्तता में है, किया गया अपराध जिसमें विशेष आशय या ज्ञान का होना अपेक्षित है
धारा 87 सम्मति से किया गया कार्य जिसमें मृत्यु या घोर उपहति कारित करने का आशय हो और न उसकी सम्भव्यता का ज्ञान हो
धारा 88 किसी व्यक्ति के फायदे के लिये सम्मति से सदभवनापूर्वक किया गया कार्य जिससे मृत्यु कारित करने का आशय नहीं है
धारा 89 संरक्षक द्वारा या उसकी सम्मति से शिशु या उन्मत्त व्यक्ति के फायदे के लिये सद्भावनापूर्वक किया गया कार्य
धारा 90 सम्मति/उन्मत्त व्यक्ति की सम्मति/शिशु की सम्मति
धारा 91 एसे कार्यों का अपवर्णन जो कारित अपहानि के बिना भी स्वतः अपराध है
धारा 92 सम्मति के बिना किसी ब्यक्ति के फायदे के लिये सदभावना पूर्वक किया गया कार्य
धारा 93 सदभावनापूर्वक दी गयी संसूचना
धारा 94 वह कार्य जिसको करने के लिये कोई ब्यक्ति धमकियों द्धारा विवश किया गया है
धारा 95 तुच्छ अपहानि कारित करने वाला कार्य
निजी प्रतिरक्षा के अधिकार के विषय में
धारा 96 निजी प्रतिरक्षा में दी गयी बातें
धारा 97 शरीर तथा सम्पत्ति पर निजी प्रतिरक्षा का अधिकार
धारा 98 ऐसे ब्यक्ति का कार्य के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकृत आदि हो
धारा 99 कार्य, जिनके विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार
धारा 100 शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है
धारा 101 कब ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का होता है
धारा 102 शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा 103 कब सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है
धारा 104 ऐसे अधिकार का विस्तार मृत्यु से भिन्न कोई अपहानि कारित करने तक का कब होता है
धारा 105 सम्पत्ति की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का प्रारंभ और बने रहना
धारा 106 घातक हमले के विरूद्ध निजी प्रतिरक्षा के अधिकार जबकि निर्दोश व्यक्ति को अपहानि होने की जोखिम है
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 3:
दण्डों के विषय में -
धारा 53 दण्ड
धारा 53 क निर्वसन के प्रति निर्देश का अर्थ लगाना
धारा 54 लघु दण्डादेश का लघुकरण
धारा 55 आजीवन कारावास के दण्डादेश का लघुकरण
धारा 55 क समुचित सरकार की परिभाषा
धारा 56 निरसित
धारा 57 दण्ड अवधियों की भिन्ने
धारा 58 निरसित
धारा 59 निरसित
धारा 60 दण्डादिष्ट कारावास के कतिपय मामलों में संपूर्ण कारावास या उसका कोई भाग कठिन या सादा हो सकेगा
धारा 61 निरसित
धारा 62 निरसित
धारा 63 जुर्माने की रकम
धारा 64 जुर्माना न देने पर कारावास का दण्डादेश
धारा 65 जबकि कारावास और जुर्माना दोनों आदिष्ट किये जा सकते हैं, तब जुर्माना न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा 66 जुर्माना न देने पर किस भाॅंति का कारावास दिया जाय
धारा 67 जुर्माना न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माने से दण्डनीय हो
धारा 68 जुर्माना देने पर कारावास का पर्यवसान हो जाना
धारा 69 जुर्माने के आनुपातिक भाग के दे दिये जाने की दशा में कारावास का पर्यवसान
धारा 70 जुर्माने का छः वर्ष के भीतर या कारावास के दौरान में उदग्रहणीय होना
धारा 71 कई अपराधों से मिलकर बने अपराध के लिये दण्ड की अवधि
धारा 72 कई अपराधों में से एक के दोषी व्यक्ति के लिये दण्ड जबकि निर्णय में यह कथित है कि यह संदेह है कि वह किस अपराध का दोषी है
धारा 73 एकांत परिरोध
धारा 74 एकांत परिरोध की अवधि
धारा 75 पूर्व दोषसिद्धि के पश्च्यात अध्याय १२ या अध्याय १७ के अधीन कतिपय अपराधों के लिये वर्धित दण्ड
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 2:
साधारण स्पष्टीकरणI
धारा 6
संहिता में की परिभाषाओं का अपवादों के अध्यधीन समझा जाना।
इस संहिता में सर्वत्र, अपराध की हर परिभाषा, हर दण्ड उपबंध और हर ऐसी परिभाषा या दण्ड उपबंध का हर दृष्टांत, “साधारण अपवाद” शीर्षक वाले अध्याय में अन्तर्विष्ट अपवादों के अध्यधीन समझा जाएगा, चाहे उन अपवादों को ऐसी परिभाषा, दण्ड उपबंध या दृष्टांत में दुहराया न गया हो ।
दृष्टांत : (क) इस संहिता की वे धाराएं, जिनमें अपराधों की परिभाषाएं अन्तर्विष्ट हैं, यह अभिव्यक्त नहीं करती कि सात वर्ष से कम आयु का शिशु ऐसे अपराध नहीं कर सकता, किन्तु परिभाषाएं उस साधारण अपवाद के अध्यधीन समझी जानी हैं जिसमें यह उपबन्धित है कि कोई बात, जो सात वर्ष से कम आयु के शिशु द्वारा की जाती है, अपराध नहीं है ।
(ख) क, एक पुलिस ऑफिसर, वारण्ट के बिना, य को, जिसने हत्या की है, पकड़ लेता है । यहां क सदोष परिरोध के अपराध का दोषी नहीं है, क्योंकि वह य को पकड़ने के लिए विधि द्वारा आबद्ध था, और इसलिए यह मामला उस साधारण अपवाद के अन्तर्गत आ जाता है, जिसमें यह उपबन्धित है कि “कोई बात अपराध नहीं है जो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जाए जो उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध हो ।
धारा 7
एक बार स्पष्टीकृत पद का भाव
हर पद, जिसका स्पष्टीकरण इस संहिता के किसी भाग में किया गया है, इस संहिता के हर भाग में उस स्पष्टीकरण के अनुरूप ही प्रयोग किया गया है ।
धारा 8
लिंग
पुलिंग वाचक शब्द जहां प्रयोग किए गए हैं, वे हर व्यक्ति के बारे में लागू हैं, चाहे नर हो या नारी ।
धारा 9
वचन
जब तक कि संदर्भ से तत्प्रतिकूल प्रतीत न हो, एकवचन द्योतक शब्दों के अन्तर्गत बहुवचन आता है, और बहुवचन द्योतक शब्दों के अन्तर्गत एकवचन आता है ।
धारा 10
पुरूष, स्त्री
“पुरुष” शब्द किसी भी आयु के मानव नर का द्योतक है ; “स्त्री” शब्द किसी भी आयु की मानव नारी का द्योतक है ।
धारा 11
व्यक्ति
कोई भी कपनी या संगम, या व्यक्ति निकाय चाहे वह निगमित हो या नहीं, “व्यक्ति” शब्द के अन्तर्गत आता है ।
धारा 12
लोक
लोक का कोई भी वर्ग या कोई भी समुदाय “लोक” शब्द के अन्तर्गत आता है ।
धारा 13
निरसित
“क्वीन” की परिभाषा विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा निरसित ।
धारा 14
सरकार का सेवक
"सरकार का सेवक" शब्द सरकार के प्राधिकार के द्वारा या अधीन, भारत के भीतर उस रूप में बने रहने दिए गए, नियुक्त किए गए, या नियोजित किए गए किसी भी ऑफिसर या सेवक के द्योतक हैं ।
धारा 15
निरसित
ब्रिटिश इण्डिया” की परिभाषा विधि अनुकूलन आदेश, 1937 द्वारा निरसित ।
धारा 16
निरसित
“गवर्नमेंट आफ इण्डिया” की परिभाषा भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा निरसित ।
धारा 17
सरकार
“सरकार” केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य की सरकार का द्योतक है ।
धारा 18
भारत
“भारत” से जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ।]
धारा 19
न्यायाधीश
“न्यायाधीश” शब्द न केवल हर ऐसे व्यक्ति का द्योतक है, जो पद रूप से न्यायाधीश अभिहित हो, किन्तु उस हर व्यक्ति का भी द्योतक है,
जो किसी विधि कार्यवाही में, चाहे वह सिविल हो या दाण्डिक, अन्तिम निर्णय या ऐसा निर्णय, जो उसके विरुद्ध अपील न होने पर अन्तिम हो जाए या ऐसा निर्णय, जो किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा पुष्ट किए जाने पर अन्तिम हो जाए, देने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो,
अथवा जो उस व्यक्ति निकाय में से एक हो, जो व्यक्ति निकाय ऐसा निर्णय देने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो ।
दृष्टांत (क) सन् 1859 के अधिनियम 10 के अधीन किसी वाद में अधिकारिता का प्रयोग करने वाला कलक्टर न्यायाधीश है ।
(ख) किसी आरोप के संबंध में, जिसके लिए उसे जुर्माना या कारावास का दण्ड देने की शक्ति प्राप्त है, चाहे उसकी अपील होती हो या न होती हो, अधिकारिता का प्रयोग करने वाला मजिस्ट्रेट न्यायाधीश है ।
(ग) मद्रास संहिता के सन् 1816 के विनियम 7 के अधीन वादों का विचारण करने की और अवधारण करने की शक्ति रखने वाली पंचायत का सदस्य न्यायाधीश है ।
(घ) किसी आरोप के संबंध में, जिनके लिए उसे केवल अन्य न्यायालय को विचारणार्थ सुपुर्द करने की शक्ति प्राप्त है, अधिकारिता का प्रयोग करने वाला मजिस्ट्रेट न्यायाधीश नहीं है ।
धारा 20
न्यायालय
“न्यायालय” शब्द उस न्यायाधीश का, जिसे अकेले ही को न्यायिकत: कार्य करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, या उस न्यायाधीश-निकाय का, जिसे एक निकाय के रूप में न्यायिकत: कार्य करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, जबकि ऐसा न्यायाधीश या न्यायाधीश-निकाय न्यायिकत: कार्य कर रहा हो, द्योतक है ।
दृष्टांत :
मद्रास संहिता के सन् 1816 के विनियम 7 के अधीन कार्य करने वाली पंचायत[5], जिसे वादों का विचारण करने और अवधारण करने की शक्ति प्राप्त है, न्यायालय है ।
धारा 21
लोक सेवक
“लोक सेवक” शब्द उस व्यक्ति के द्योतक है जो एतस्मिन् पश्चात् निम्नगत वर्णनों में से किसी में आता है,
अर्थात् : 01 - पहले खंड का आलोप किया गया।
02 - भारत की सेना, नौ सेना या वायु सेना का हर आयुक्त ऑफिसर ;
03 - हर न्यायाधीश जिसके अन्तर्गत ऐसे कोई भी व्यक्ति आता है जो किन्हीं न्यायनिर्णयिक कॄत्यों का चाहे स्वयं या व्यक्तियों के किसी निकाय के सदस्य के रूप में निर्वहन करने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो ;]
04 - न्यायालय का हर ऑफिसर (जिसके अन्तर्गत समापक, रिसीवर या कमिश्नर आता है) जिसका ऐसे ऑफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह विधि या तथ्य के किसी मामले में अन्वेषण या रिपेर्ट करे, या कोई दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकॄत करे, या रखे, या किसी सम्पत्ति का भार सम्भाले या उस सम्पत्ति का व्ययन करे, या किसी न्यायिक आदेशिका का निष्पादन करे, या कोई शपथ ग्रहण कराए या निर्वचन करे, या न्यायालय में व्यवस्था बनाए रखे और हर व्यक्ति, जिसे ऐसे कर्तव्यों में से किन्हीं का पालन करने का प्राधिकार न्यायालय द्वारा विशेष रूप से दिया गया हो ;
05 - किसी न्यायालय या लोक सेवक की सहायता करने वाला हर जूरी-सदस्य, असेसर या पंचायत का सदस्य ;
06 - हर मध्यस्थ या अन्य व्यक्ति, जिसको किसी न्यायालय द्वारा, या किसी अन्य सक्षम लोक प्राधिकारी द्वारा, कोई मामला या विषय, विनिश्चित या रिपोर्ट के लिए निर्देशित किया गया हो ;
07 - हर व्यक्ति जो किसी ऐसे पद को धारण कर्ता हो, जिसके आधार से वह किसी व्यक्ति को परिरोध में करने या रखने के लिए सशक्त हो ;
08 - सरकार का हर ऑफिसर जिसका ऐसे ऑफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह अपराधों का निवारण करे, अपराधों की इत्तिला दे, अप्राधियों को न्याय के लिए उपस्थित करे, या लोक के स्वास्थ्य, क्षेम या सुविधा की संरक्षा करे ;
09 - हर ऑफिसर जिसका ऐसे ऑफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह सरकार की ओर से किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे, व्यय करे, या सरकार की ओर से कोई सर्वेक्षण, निर्धारण या संविदा करे, या किसी राजस्व आदेशिका का निष्पादन करे, या सरकार के धन-संबंधी हितों पर प्रभाव डालने वाले किसी मामले में अन्वेषण या रिपोर्ट करे या सरकार के धन संबंधी हितों से संबंधित किसी दस्तावेज को बनाए, अधिप्रमाणीकॄत करे या रखे, या सरकारी धन-संबंधी हितों की संरक्षा के लिए किसी विधि के व्यतिक्रम को रोके ;
10 - हर ऑफिसर, जिसका ऐसे ऑफिसर के नाते यह कर्तव्य हो कि वह किसी ग्राम, नगर या जिले के किसी धर्मनिरपेक्ष सामान्य प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति को ग्रहण करे, प्राप्त करे, रखे या व्यय करे, कोई सर्वेक्षण या निर्धारण करे, या कोई रेट या कर उद्गॄहीत करे, या किसी ग्राम, नगर या जिले के लोगों के अधिकारों के अभिनिश्चयन के लिए कोई दस्तावेज बनाए, अधिप्रमाणीकॄत करे या रखे ;
11 - हर व्यक्ति जो कोई ऐसे पद धारण कर्ता हो जिसके आधार से वह निर्वाचक नामावली तैयार करने, प्रकाशित करने, बनाए रखने, या पुनरीक्षित करने के लिए या निर्वाचन या निर्वाचन के लिए भाग को संचालित करने के लिए सशक्त हो ;
12 - हर व्यक्ति, जो - (क) सरकार की सेवा या वेतन में हो, या किसी लोक कर्तव्य के पालन के लिए सरकार से फीस या कमीशन के रूप में पारिश्रमिक पाता हो ;
(ख) स्थानीय प्राधिकारी की, अथवा केन्द्र, प्रान्त या राज्य के अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित निगम की अथवा कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथा परिभाषित सरकारी कम्पनी की, सेवा या वेतन में हो ।
दृष्टांत :
नगरपालिका आयुक्त लोक सेवक है ।
स्पष्टीकरण 1 - ऊपर के वर्णनों में से किसी में आने वाले व्यक्ति लोक सेवक हैं, चाहे वे सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हों या नहीं ।
स्पष्टीकरण 2 - जहां कहीं “लोक सेवक” शब्द आएं हैं, वे उस हर व्यक्ति के संबंध में समझे जाएंगे जो लोक सेवक के ओहदे को वास्तव में धारण किए हुए हों, चाहे उस ओहदे को धारण करने के उसके अधिकार में कैसी ही विधिक त्रुटि हो ।
स्पष्टीकरण 3 - “निर्वाचन” शब्द ऐसे किसी विधायी, नगरपालिक या अन्य लोक प्राधिकारी के नाते, चाहे वह कैसे ही स्वरूप का हो, सदस्यों के वरणार्थ निर्वाचन का द्योतक है जिसके लिए वरण करने की पद्धति किसी विधि के द्वारा या अधीन निर्वाचन के रूप में विहित की गई हो ।
धारा 22
जंगम सम्पत्ति
“जंगम सम्पत्ति” शब्दों से यह आशयित है कि इनके अन्तर्गत हर भांति की मूर्त सम्पत्ति आती है, किन्तु भूमि और वे चीजें, जो भू-बद्ध हों या भू-बद्ध किसी चीज से स्थायी रूप से जकड़ी हुई हों, इनके अन्तर्गत नहीं आता ।
धारा 23
सदोष अभिलाभ
सदोष अभिलाभ
सदोष हानि
सदोष अभिलाभ प्राप्त करना/सदोष हानि उठाना
धारा 24 बेईमानी से
धारा 25 कपटपूर्वक
धारा 26 विश्वास करने का कारण
धारा 27 पत्नी, लिपिक या सेवक के कब्जे में सम्पत्ति
धारा 28 कूटकरण
धारा 29 दस्तावेज
धारा 29 क इलेक्ट्रानिक अभिलेख
धारा 30 मूल्यवान प्रतिभूति
धारा 31 बिल
धारा 32 कार्यों का निर्देश करने वाले शब्दों के अन्तर्गत अवैध लोप आता है
धारा 33 कार्य, लोप
धारा 34 सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किये गये कार्य
धारा 35 जब कि ऐसा कार्य इस कारण अपराधित है कि वह अपराध्कि ज्ञान या आशय से किया गया है
धारा 36 अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम
धारा 37 किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक को करके सहयोग करना
धारा 38 अपराधिक कार्य में संपृक्त व्यक्ति विभिन्न अपराधों के दोषी हो सकेंगे
धारा 39 स्वेच्छया
धारा 40 अपराध
धारा 41 विशेष विधि
धारा 42 स्थानीय विधि
धारा 43 अवैध, करने के लिये वैध रूप से आबद्ध
धारा 44 क्षति
धारा 45 जीवन
धारा 46 मृत्यु
धारा 47 जीव जन्तु
धारा 48 जलयान
धारा 49 वर्ष, मास
धारा 50 धारा
धारा 51 शपथ
धारा 52 सद्भावनापूर्वक
धारा 52 क संश्रय
भारतीय दण्ड संहिता।
अध्याय 1-
उद्देशिका:
धारा 1 - संहिता का नाम और उसके प्रर्वतन का विस्तार
यह अधिनियम भारतीय दण्ड संहिता कहलाएगा, और
इसका विस्तार अब जम्मू-कश्मीर राज्य सहित सम्पूर्ण भारत पर होगा । (निरस्त किया जा चुका है।)
अनुच्छेद 370 के हटाए जाने पर भारतीये दंड संहिता संपूर्ण भारत पर लागू होगा जिसमे जम्मू और कश्मीर कि केंद्र शासित प्रदेश भी सामिल है | संविधान के अनुसूची 5 के तहत 109 क़ानून अब जम्मू और कश्मीर पर भी लागु होगा जिसमे भारतीये दंड संहिता के साथ साथ हिन्दू विवाह अधिनियम , व और भी क़ानून है|
धारा 2 - भारत के भीतर किए गये अपराधों का दण्ड
हर व्यक्ति इस संहिता के उपबन्धों के प्रतिकूल हर कार्य या लोप के लिए जिसका वह भारत के भीतर दोषी होगा, इसी संहिता के अधीन दण्डनीय होगा अन्यथा नहीं ।
धारा 3 - भारत से परे किए गये किन्तु उसके भीतर विधि के अनुसार विचारणीय अपराधों का दंड
भारत से परे किए गए अपराध के लिए जो कोई व्यक्ति किसी भारतीय विधि के अनुसार विचारण का पात्र हो, भारत से परे किए गए किसी कार्य के लिए उससे इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार ऐसा बरता जाएगा, मानो वह कार्य भारत के भीतर किया गया था ।
धारा 4 - राज्य-क्षेत्रातीत अपराधों पर संहिता का विस्तार
इस संहिता के उपबंध -
(1) भारत के बाहर और परे किसी स्थान में भारत के किसी नागरिक द्वारा ;
(2) भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी पोत या विमान पर, चाहे वह कहीं भी हो किसी व्यक्ति द्वारा, किए गए किसी अपराध को भी लागू है
स्पष्टीकरण - इस धारा में “अपराध” शब्द के अन्तर्गत भारत से बाहर किया गया ऐसा हर कार्य आता है, जो यदि भारत में किया जाता तो, इस संहिता के अधीन दंडनीय होता ।
दृष्टांत
क. जो भारत का नागरिक है उगांडा में हत्या करता है । वह भारत के किसी स्थान में, जहां वह पाया जाए, हत्या के लिए विचारित और दोषसिद्द किया जा सकता है ।
धारा 5 - कुछ विधियों पर इस अधिनियम द्वारा प्रभाव न डाला जाना
इस अधिनियम में की कोई बात भारत सरकार की सेवा के ऑफिसरों, सैनिकों, नौसैनिकों या वायु सैनिकों द्वारा विद्रोह और अभित्यजन को दण्डित करने वाले किसी अधिनियम के उपबन्धों, या किसी विशेष या स्थानीय विधि के उपबन्धों, पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
भारतीय दण्ड संहिता।
भारतीय दण्ड संहिता (Indian Penal Code, IPC) भारत के अन्दर भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा व दण्ड का प्रावधान करती है। किन्तु यह संहिता भारत की सेना पर लागू नहीं होती। अनुच्छेद ३७० हटने के बाद जम्मू एवं कश्मीर में भी अब भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) लागू है.
भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन् 1860 में लागू हुई। इसके बाद इसमे समय-समय पर संशोधन होते रहे (विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद)। पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही लागू किया। लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन अन्य ब्रिटिश उपनिवेशों (बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि) में भी लागू की गयी थी। लेकिन इसमें अब तक बहुत से संशोधन किये जा चुके है।
भारत का संविधान |
भारत का संविधान सभा द्वारा 26 जनवरी 1950 को आंशिक रूप से संपूर्ण देश में लागू कर दिया गया था| संविधान दो प्रकार के होते हैं, एक लिखित संविधान और दूसरा अलिखित| विश्व का प्रथम लिखित संविधान संयुक्त राज्य अमेरिका का है, और संसार का सबसे बड़ा लिखित संविधान भारत का है| वर्तमान में, भारत का संविधान 465 अनुच्छेद जो 25 भागों और 12 अनुसूचीयों में लिखित है| जिस समय संविधान लागू हुआ था, उस समय 395 अनुच्छेद, 8 अनुसूची और 22 भाग थे। संविधान में समय– समय पर कई संशोधन किए जाते हैं|
संविधान क्या होता है |
किसी भी देश का संविधान उस देश की राजनीतिक व्यवस्था, न्याय व्यवस्था तथा नागरिकों के हितों की रक्षा करने का एक मूल माध्यम होता है| जिसके माध्यम से उस देश के विकास की दिशा का निर्धारण होता है| संविधान, किसी भी देश का मौलिक कानून है, जो सरकार के विभिन्न अंगों की रूपरेखा और मुख्य कार्य का निर्धारण करता है।
संविधान शब्द सम और विधान दो शब्दों से मिलकर बना है| सम का अर्थ बराबर और विधान का अर्थ नियम कौर कानून होता है, अर्थात वह नियम जो सभी नागरिको पर एक सामान लागू होता है, संविधान कहलाता है| संविधान को इंग्लिश में Constitution कहते है| संविधान किसी देश की नीतियों और सिद्धांतो का वह संग्रह होता है, जिसके आधार पर उस देश की शासन व्यवस्था को संचालित किया जाता है|
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