Progressive Advocate Jamui
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20/08/2023
बिहार वार काउंसिल के वरिष्ठ सदस्य गण,जिला जज एवं जिला जजशिप के सभी सम्मानित न्यायाधीश एवं पदाधिकारी गण की गरिमामय उपस्थित में जिला विधिज्ञ संघ जमुई के अध्यक्ष सह बिहार वार परिषद सदस्य शर्मा चन्द्रशेखर उपाध्याय एवं महासचिव
अमित कुमार द्वारा "जमुई की सभ्यता एवं संस्कृति की एक झलक "पुस्तक का लोकार्पण किया गया ।
19/08/2023
जमुई की सभ्यता एवं संस्कृति की एक झलक पुस्तक का विमोचन करते हुए महासचिव अमित कुमार।
भाग-12
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गाँव में एक प्रथा प्रचलित है।"वैना" बाँटने का। घर में कोई उत्सव या पूजा होता है तो पूजा सम्पन्नोपरान्त टोला-मोहल्ल में जाति- गोतिया,सगे -सम्बंधी और दोस्त-मित्र के घर विशेष रूप से प्रसाद पहुँचाना होता।इसे हीं वैना बोलते हैं। वैना-पिहानी का रस्म बहुत हीं पुराना है।
इसी रस्म को पूरा करने के लिये सविता विभा को साथ लेकर घर से बाहर निकली हैं। साथ में प्रसाद का थैला लिये प्रभात भी है। सविता पहले अपनी जेठानी गायत्री के घर गयी और उनका पैर छुई। विभा और प्रभात भी उनके पाँव लगे।पर गायत्री कुछ नहीं बोली, न हीं उन लोगों को बैठने कही। अचानक इन लोगों के आने से वह और कुण्ठित हो उठी। वह इन लोगों के परिवार से जली-भुनी रहती थी। उन लोगों का रहन-सहन एवं खान- पान अच्छा नहीं लगता था।घृणित भाव से भरी रहतीथी।देवरानी को देखकर अन्दर हीं अन्दर जलती थी। कूढ़ती थी। और बात-बात पर अपने भाग्य को दोष देती थी। कर्म में खोट निकालती थी। जेठानी के इस व्यवहार से सविता पहले स्तब्ध रही फिर साहस कर बोली-"क्या हमलोगों से नाराज हैं दीदी!"
गायत्री कठोर शब्द में बोली- "इसमें नाराज की क्या बात है?जव तुमलोग रिस्ता पहले हीं समाप्त कर दिए हो। एक दूसरे के घर आना-जाना नहीं है। उठना-बैठना नहीं है तो किस मुख से बातचीत करूँ। और तुम से वैना-पिहानी चलायूँ। "तुम लोग के अन्दर कुछ और रहता है, दिखावा कुछ और करते हो। गायत्री कुछ क्षण रूक कर फिर बोली-
देवर जी को बचपन से हीं पढ़ाया- लिखाया,योग्य वनाया।नौकरी लगवाने मैं मालिक ने नेता-लीडर के कितने वार चरण धूल फाँके तव जाकर नौकरी लगी। लेकिन उस दिन का तनिक भी ख्याल नहीं रखा।पिता-तुल्य ज्येष्ठ भ्राता के मरन मुख भी देखने नहीं आये। इससे अधिक और कृतघ्न क्या हो सकता है। कितनी आशा और भरोसा भाई से करते थे लेकिन सब पर पानी फेर दिया।उस दिन अपना नहीं थे।
आज अपना वनाने आई हो। उलाहना भरी लहजों में कही।
पति को याद करती हुई गायत्री अपना मुख आँचल से ढक ली और सिसकने लगी।
सविता पति के पक्ष को रखती हुयी बोली-"नहीं दीदी! आप ऐसा नहीं कह सकती हैं। वे स्वभाव से ऐसे नहीं हैं। अभी भी आप सबों का बहुत याद करते हैं लेकिन आदमी समय और परिस्थिति का दास होता है।जैसे चमकते सूर्य को जव वादल ढक लेता है तो शक्ति सम्पन्न सूर्य भी विवश हो जाता है।वे दम्मा और क्षय रोग से प्रभावित होने के कारण कभी भी सुख चैन की स्थिति में नहीं रहे। आज भी खाट पर हीं पड़े हैं।कहीं घुमना-फिरना नहीं करते। सिर्फ दवा के बल पर जीवित हैं। इस बीमारी के कारण पैसे का सब दिन किल्लत वनी रही है। उपर से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का बहुत बड़ा बोझ रहा है।
गायत्री इस पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की और अपने भाग्य को कोषती हुई वहाँ से उठकर चली गई। उनके पुत्र- बहु बगैरह भी चुपचाप खड़ी रही।किसी ने कुछ नहीं बोला
और सब अपने-अपने मुँह फेर लिये। सविता जेठानी और उनके परिवार के इसप्रकार के व्यवहार से काफी लज्जित और अप्रतिष्ठित हो रही थी। सम्मान के स्थान पर अपमान का होना कितना असहनीय होता है। लेकिन सविता सहन करना हीं उचित समझी और बहाँ से चुपचाप बाहर चली आई। मन खिन्न हो जाने के कारण वह और के घर जाना नहीं चाहती थी। इसलिए अपने घर को सीधे लौट चली। उसी गली के चौराहा पर छोटे-छोटे बहुत सारे बच्चे गोली -कत्ती खेल रहे थे। इसमें अधिकांश बारह से चौदह वर्ष के होगें। कुछ तमशवीन सयाने लड़के भी थे। वह विभा को बार-बारघूर रहे थे।असभ्य और उदण्ड लग रहे थे। तन पर अच्छे वस्त्र नहीं थे।मैला-कुचैला धारण किये,सभी धूल धूसरित था। बात-बात पर आपस में लड़ रहेथे।माँ-वहन का नाम लेकर एक दूसरे को गाली-गलौज दे रहे थे।कमजोर दव जा रहा था।बड़ों की दवंगता बढ़ते जा रही थी। बराबरी बालों के बीच मारपीट होता तव तमशवीन लड़के उस दोनों को छुड़ा देते। बच्चे के मुँह से इसप्रकार अप्रिय और अपभ्रंश शब्द सुनकर एवं हरकत देखकर सबिता अचम्भित थी। बच्चों के तन और मन दोनों प्रदूषित थे। गाँव में बहुत अच्छे विद्यालय भवन वने हैं लेकिन पढ़ने लिखने का माहौल नहीं है। माँ-बाप का भी ध्यान बच्चों के शिक्ष के प्रति नहीं दिख रहा था।बच्चों में संस्कार नहीं डाला गया है।असभ्य तरीके से रहने को लोग यहाँ यादी थे।सविता को इसमें बच्चों का दोष कम और माता-पिता का दोष अधिक
अनुभव कर रही थी। शिक्षा का पूर्ण आभाव था। विद्या की कमी के कारण उदण्डता और गरीबी थी। नासमझ के कारण एक दूसरे से घृणा और द्वेष करते थे। अपनों के बीच यह और अधिक था। अब सविता को समझ में आ गई थी कि- उसके पति गाँव छोड़कर सपरिवार शहर में क्यों रहते थे और फिर जल्दी लौटना क्यों चाह रहे हैं। आज गाँव में रहते तो इसका परिवार भी इसी प्रकार कुण्ठित हो जाता।
यह सब सोचती हुई एवं गाँव-गली तथा समाज की दुर्दशा देखती- सुनती हुई सविता अपने घर को लौट आई।
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वकील की काबिलियत
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पैसे काले कोर्ट की नहीं,वकीलों की काबिलियत को दी जाती है। प्रश्न है अच्छे और काबिल वकीलों की पहचान का तो यह तगमा संघ के गुरू या सिनियर वकीलों के द्वारा हीं दिया जाना चाहिए क्योंकि एक अधिवक्ता या वकील अपना प्रेक्टिस एक संघ से हीं शुरू करता है और पाँच-दस वर्ष साथ रहकर बिधि की सभी विधा में निपुणता प्राप्त कर स्वंय अपना सिरिस्ता वनाते हैं। लेकिन आजकल ऐसा नहीं हो रहा है और आये दिन वकीलों की भद्द पिट रही है। इसके लिए जिम्मेदार संघ भी होते हैं। क्योंकि कॅलेज में बिधि की पढ़ाई होती है। विधा तो लोग संघ में हीं सीखते हैं। इसलिए संघ हीं इसका सर्टिफिकेट जारी करे। संघ के अध्यक्ष और महासचिव को एक सिनियर मेम्बर की एक कमिटि वनाकर प्रतिवर्ष दस जूनियर वकील को जाँच-परखकर काबिलियत का प्रमाणपत्र प्रदान करना चाहिए। इससे संघ की मर्यादा और महत्ता भी वढ़ेगा साथ हीं एक योग्य वकील के टीम गठित होगें। ऐसा पूरे देश के संघ या वार द्वारा कार्यक्रम आयोजित करना चाहिए।
यदि मेरा विचार अच्छा लगा हो तो इस पर कमेंट जरूर करेगें। अनिल कुमार वर्मन अधिवक्ता।
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