Mission RAS
Civil service
26/05/2026
पंजाब के एक छोटे से गांव से निकला युवक… जिसने लाखों आंखों में रोशनी भर दी और पद्मश्री से सम्मानित हुआ। पंजाब के एक छोटे से गांव से निकला एक साधारण युवक… जिसने जीवन में कुछ पाने का नहीं, बल्कि समाज को कुछ लौटाने का संकल्प लिया। तप, त्याग, करुणा और सेवा की उस साधना ने उसे जन जन की श्रद्धा का केंद्र बना दिया। वही युवक आज संत स्वामी ब्रह्मदेव के रूप में जन-जन के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
कल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों स्वामी ब्रह्मदेव को पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया जाना केवल एक संत का सम्मान नहीं बल्कि उस जीवन-दर्शन की स्वीकृति है जिसमें सेवा ही साधना है और मानवता ही सबसे बड़ा धर्म।
पंजाब के मोगा जिले की निहाल सिंह वाला तहसील के छोटे से गांव रौंता से निकले इस युवक ने संन्यास का मार्ग चुना लेकिन समाज से दूरी नहीं बनाई। उन्होंने पूजा-पाठ के साथ-साथ पीड़ित मानवता की पीड़ा को समझा। वर्ष 1963 में अमृतसर के एक अंध विद्यालय को देखकर उनके मन में संकल्प जगा कि जीवन को सेवा के ऐसे ही कार्य में समर्पित करना है।
शिक्षा पूर्ण करने के बाद वर्ष 1978 में वे राजस्थान के श्रीगंगानगर पहुंचे। यहीं से शुरू हुई एक ऐसी सेवा-यात्रा, जिसने हजारों परिवारों की तकदीर बदल दी। सीमित साधनों, जनसहयोग और अटूट विश्वास के साथ शुरू हुआ श्री जगदंबा अंध विद्यालय। वर्ष 1980 में इसकी औपचारिक आधारशिला रखी गई। शुरुआत केवल एक बच्चे और एक शिक्षक से हुई लेकिन आज यह संस्थान एक विशाल वटवृक्ष बन चुका है।
बीते साढ़े चार दशकों में इस संस्थान ने सात हजार से अधिक दृष्टिबाधित बच्चों को शिक्षा दी है। मूक-बधिर बच्चों के लिए भी चार दशकों से विद्यालय संचालित हो रहा है। यहां बच्चों को केवल पढ़ाया नहीं गया, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनना सिखाया गया। उनके हाथों में हुनर दिया गया, आत्मविश्वास दिया गया और समाज में सम्मानपूर्वक जीने की ताकत दी गई। आज अनेक बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में नई मिसाल बन चुके हैं।
लेकिन स्वामी ब्रह्मदेव की सेवा यहीं नहीं रुकी। उन्होंने महसूस किया कि कई लोग जन्म से अंधे नहीं थे बल्कि आर्थिक अभाव के कारण इलाज नहीं करा सके और धीरे-धीरे उनकी आंखों की रोशनी चली गई। इसी सोच से वर्ष 1993 में श्री जगदंबा आई हॉस्पिटल की स्थापना हुई। तब से लेकर अब तक साढ़े चार लाख से अधिक जरूरतमंदों के मोतियाबिंद ऑपरेशन कर उनकी आंखों की रोशनी बचाई जा चुकी है।
यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं बल्कि साढ़े चार लाख परिवारों की लौटी हुई उम्मीद, मुस्कान और जीवन का उजाला है।
स्वामी ब्रह्मदेव ने समाज को मरणोपरांत नेत्रदान की प्रेरणा भी दी। उन्होंने समझाया कि मृत्यु के बाद भी इंसान किसी और की दुनिया रोशन कर सकता है। वर्षों से संस्था के माध्यम से नेत्रदान और नेत्र प्रत्यारोपण का कार्य समाज में नई संवेदना और चेतना जगाता रहा है।
उनका जीवन सादगी और निस्वार्थ सेवा का उदाहरण है। कथा-कीर्तन से जो चढ़ावा आता है, वह उसे समाजसेवा में लगा देते हैं। न प्रचार की चाह, न प्रसिद्धि की लालसा। आज भी वही सादा जीवन, वही सरल वेशभूषा और वही विनम्रता। पद्मश्री मिलने के बाद भी उन्होंने इस सम्मान का श्रेय स्वयं को नहीं, बल्कि प्रभु की कृपा और जनता के नि:स्वार्थ सहयोग को दिया। यही महानता उन्हें और ऊँचा बनाती है।
स्वामी ब्रह्मदेव को मिला पद्मश्री सम्मान केवल एक व्यक्ति का सम्मान नहीं है। यह उन हजारों दृष्टिबाधित बच्चों की मुस्कान का सम्मान है जिन्हें शिक्षा मिली, उन लाखों आंखों की रोशनी का सम्मान है जिनमें फिर से उजाला लौटा, और उस विचारधारा का सम्मान है जिसमें सेवा, करुणा और मानवता सर्वोपरि हैं।
पंजाब के रौंता गांव से निकलकर राजस्थान की धरती पर मानवता का दीप जलाने वाले इस संत पर आज पूरा देश गर्व कर रहा है। उनकी कहानी बताती है कि असली रोशनी वहीं होती है, जहां दिखावा नहीं, केवल समर्पण होता है।
ऐसे संत, कर्मयोगी और मानवता के उपासक स्वामी ब्रह्मदेव को पद्मश्री सम्मान पर हार्दिक बधाई और शत-शत नमन। 🙏
राज-ममता कार्यक्रम का संबंध किससे है?
A) अनाथ बच्चों को मां का प्यार देना
B) पिछड़े वर्ग की लड़कियों की शादी पर आर्थिक सहायता उपलब्ध करवाना
C) मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत करना
D) अनाथ बच्चों हॉस्टल उपलब्ध करवाना
Celebrating my 8th year on Facebook. Thank you for your continuing support. I could never have made it without you. 🙏🤗🎉
10/03/2026
राजस्थान में कुप्रथाओं पर सर्वप्रथम रोक लगाने वाली रियासत
सती प्रथा - बूंदी (1822) राजा राम मोहन राय, 1829 लार्ड बैंटिक, महाराजा विष्णु सिंह
दास प्रथा - कोटा, बूंदी (1822)
कन्या वध प्रथा - बूंदी (1833), कोटा (1834) विलकिंसन के प्रयास से, रामसिंह द्वितीय
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समाधी प्रथा - जयपुर(1844) लुडलो के प्रयास से, रामसिंह द्वितीय
मानव व्यापार - जयपुर (1847)
डाकन प्रथा - उदयपुर (1853) कैप्टन बुक द्वारा , महाराजा स्वरूप सिंह
बाल विवाह - जोधपुर (1855)
सागड़ी प्रथा/बंधुआ मजदूरी - जयपुर (1861)
08/03/2026
*भारत ने इंग्लैंड को हराया*
*भारत फाइनल में पहुंचा*
स्वांगिया माता मंदिर जैसलमेर
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07/02/2026
Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Rakesh Kumar, Anika Satna
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