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03/05/2025
_*विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस विशेष*_
*बंधन में अभिव्यक्ति, ज़िम्मेदार मौन*
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
राष्ट्र के निर्माण में या चाहे राष्ट्र के सुनियोजित संचालन में, देश की संरचना गढ़ने में या चाहे देश की व्यवस्थाओं में, लोकतंत्र की स्थापना में या चाहे सुचारू समन्वय में, सत्ता पर नियंत्रण में या चाहे सत्ता के क्रियान्वयन में, व्यवस्था के पैनेपन में या चाहे अव्यवस्था के आघात में, जन की जागरुकता में या चाहे जन के मुखर होने में, हर भूमिका में प्रेस यानी मीडिया का अपना अतुलनीय महत्त्व है, जिसके साथ ही वैश्विक लोकतंत्र की असल स्थापना निहित है।
वैश्विक रूप से हर राष्ट्र का अपना एक मीडिया अनुशासन है, मीडिया की स्वीकार्यता भी है और महत्ती आवश्यकता भी। किंतु बीते कुछ दशकों में मीडिया की सुरक्षा भी चिंता का विषय बना हुआ है और उस पर होने वाले हमलों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है।
इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट की रिपोर्ट के अनुसार 'ड्यूटी के दौरान मारे गए मीडिया पेशेवरों की नवीनतम सूची के अनुसार वर्ष 2022 में 68 मीडिया कर्मचारी मारे गए थे। इनमें से बहुत कम मामलों की जाँच की गई है।'
साथ ही आईएफ़जे मीडिया के आपातकाल की ओर भी इशारा करता है, जिसके कारण 2022 में कम से कम 375 पत्रकार और मीडियाकर्मी सलाखों के पीछे गए हैं। पत्रकारों के लिए चीन तो दुनिया के सबसे बड़े जेलर के रूप में उभरा है।
ये आँकड़े यह भी दर्शाते हैं कि पूरी दुनिया में पत्रकारों की स्वतंत्रता कहीं न कहीं बाधित है।चाहे चीन में मीडिया पर हो रहे लगातार हमले हों, या हॉन्गकॉन्ग पर बाधित होती मीडिया की स्वतंत्र शामिल हो अथवा भारत में हो रही पत्रकारों की हत्याओं का ज़िक्र किया जाए, सभी जगह एक बात उभयनिष्ठ है कि पत्रकार और प्रेस विश्व भर में खतरों से खेल रहे हैं पर असुरक्षित रहकर।
अंतर्राष्ट्रीय संगठन और मीडिया 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की वर्षगाँठ मना रहा हैं। ऐसे कालखण्ड में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (IFJ) का कहना है कि प्रेस की स्वतंत्रता ने एक और कदम पीछे ले लिया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अन्य मानवाधिकारों की तरह परिचालन भी नहीं कर रही।
कुछ वर्ष पूर्व ही वियतनामी पुलिस ने बैंगकॉक, थाईलैंड में अपने घर से कथित अपहरण के तीन दिन बाद ब्लॉगर डुओंग वान थाई की हिरासत की पुष्टि की है। यानी विश्व के लगभग हर देश में पत्रकारों पर सत्ताई शिकंजा कंसा हुआ है, पत्रकार और मीडिया कहीं भी स्वतंत्र नहीं नज़र आती। जबकि प्रेस की स्वतंत्रता मज़बूत लोकतंत्र की आधारशिला है।
भारत ही नहीं अपितु विश्व के कई देशों में पत्रकारों पर खतरा बना हुआ है, हत्याएँ आम बात हो चली है। जान और माल की बली तो पत्रकारों की रोज़मर्रा की बात है, इसके चर्चे भी वैसे ही गौण हो जाया करते हैं, जैसे सऊदी के पत्रकार जमाल खशोगी, भारतीय पत्रकार गौरी लंकेश और उत्तरी आयरलैंड की पत्रकार लायरा मक्की की हत्याओं का ज़िक्र भी ग़ायब हो चुका है।
इसके अतिरिक्त भारत देश में पत्रकारों पर हर कभी होते हमलों ने एक बार फिर प्रेस की सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
सवालों का ढेर तो ऐसा है मानो पूरी पत्रकार बिरादरी ही बारूद के ढेर पर खड़ी हो।
पत्रकारों पर होते हमले, हत्याओं का दौर, दुर्घटनाओं का दलदल , फ़र्ज़ी केसों में फँसा कर बदले की मानसिकता, यही सब जब पत्रकारों के साथ घटित होता है, तब जाकर आवश्यकता पत्रकार सुरक्षा कानून की भी होती है।
बहरहाल, जब आज के दौर में हमला होता है लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर, तब प्रेस की आज़ादी संकट में नज़र आती है। सरकारों से आग्रह ही होता है कि कम से कम मीडिया को तो सुरक्षित रख पाने का प्रबंध हो, अन्यथा ढाक के तीन पात की तर्ज पर आम आदमी भी असुरक्षित होने लग जाएगा।
लोकतंत्र का मानद विपक्ष ही यदि कमज़ोर हो गया तो सत्ता का निरंकुश होना तय है, यहाँ न केवल सत्ता बल्कि राजनीति के अन्य आयाम भी मीडिया की सुरक्षा पर एकजुट नहीं हैं, जबकि विपक्ष की भूमिका का असल निर्वहन तो मीडिया के माध्यम से ही होता है। वैश्विक आलोक में असुरक्षित पत्रकार बिरादरी कैसे अपनी जनता के सवालों को सत्ता के शीश महल से पूछेगी? कैसे सत्ता पर एक नकेल जनता की रखी जाएगी, क्योंकि अधिकांश देशों में सत्ता को बेदखल करने की कोई व्यवस्था जनता के हाथ में नहीं है! नियत समय के लिए चुन लिए जाने पर सत्ताधीश स्वतः ही जनता के मौलिक अधिकारों का लगातार हनन करते रहे हैं पर जनता बेचारी केवल अपनी भड़ास बोलकर, धरने-प्रदर्शन करके या फिर मीडिया के माध्यम से ही निकाल सकती है। वह भी बंद हो गया तो फिर मदमस्त हाथी की तरह सत्ता का निरंकुश होना तय है। असल जनतंत्र की स्थापना के लिए मीडिया की वास्तविक भूमिका जन के स्वर को मुखर करने की है परंतु सुरक्षा के अभाव में मीडिया तंत्र भी मौन होकर बैठने लगा है और यह स्थिति आदर्श लोकतंत्र की स्थापना में बाधक है।
बात यदि भारत की करें तो आज मौजूदा हालात तो पूरे भारत में मीडिया की सुरक्षा और स्वतंत्रता को कहीं न कहीं कटघरे में खड़ा करने वाले ही हैं, बावजूद इसके, रात के बाद सुबह आएगी, उसकी उम्मीद नहीं छूटती। सरकारों से भी यही उम्मीद बनी रहती है कि मीडिया को स्वतंत्र करें, सुरक्षित करें। क्योंकि इसको करने से राष्ट्र की उत्तरोत्तर प्रगति सरल, सहज और सर्वमान्य होगी।
इसी के साथ, विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की अनंत शुभकामनाएँ।
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
पत्रकार एवं स्तंभकार
इन्दौर, मध्य प्रदेश
#विश्वप्रेसस्वतंत्रतादिवस #मीडीया #प्रेस #भारतीयपत्रकारिता
07/08/2022
*मैं राजेन्द्र माथुर हूँ*
हाँ! मैं राजेन्द्र माथुर हूँ।
मालवा भूमि पर 7 अगस्त, 1935 को मध्य प्रदेश के धार जिले में जन्म हुआ,
प्रारंभिक शिक्षा धार, मंदसौर एवं उज्जैन में हुई।
उच्च शिक्षा के लिए इंदौर आ गया,
जहाँ मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत हुई।
'नई दुनिया' के संपादक राहुल बारपुते जी से मेरी पहली मुलाक़ात देश के ख़्यात व्यंग्यकार शरद जोशी जी ने करवाई थी।
बाबा से अपनी पहली मुलाक़ात में समाचार पत्र के लिए कुछ लिखने की इच्छा जताई थी।
उसके बाद अगली मुलाक़ात में मैं अपने लेखों का बंडल लेकर ही बारपुते जी से मिला।
बाबा के अग्रलेख के बाद अनुलेख लिखने का सिलसिला लंबे समय तक चला।
सन् 1955 में 'नई दुनिया' की दुनिया से जुड़ने के बाद मैं 27 बरस तक 'नई दुनिया' परिवार का हिस्सा रहा।
मैं अंग्रेज़ी का जानकार रहा पर हिन्दी पत्रकारिता ने मुझे बेहद संजीदगी से स्वीकार कर लिया।
सन् 1965 में बदलाव करते हुए मैंने 'पिछला सप्ताह' नामक लेख लिखना प्रारंभ किया।
मैं गुजराती कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक के रूप में कार्यरत था, 1969 में अध्यापकी छोड़ पूरी तन्मयता के साथ 'नई दुनिया' की दुनिया में रम गया।
'पिछला सप्ताह' स्तंभ लिखना मैंने आपातकाल तक जारी रखा।
1975 के आपातकाल के दौरान सरकार ने जब प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का प्रयास किया, तब मैंने ‘शीर्षक’ के नाम से सरकारी प्रतिक्रिया की परवाह किए बिना धारदार आलेख लिखे।
सन् 1980 से मैंने 'कल, आज और कल’ शीर्षक से स्तंभ लिखना शुरु किया।
14 जून, 1980 को मैं प्रेस आयोग का सदस्य चुना गया।
इसके बाद सन् 1981 में मैंने 'नई दुनिया' के प्रधान संपादक के रूप में पदभार संभाला।
प्रेस आयोग का सदस्य बनने के पश्चात मैं टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संपादक गिरिलाल जी जैन के संपर्क में आ गया। उन्होंने मुझे दिल्ली आने का सुझाव दिया।
लंबे अरसे तक सोच-विचार करने के पश्चात मैंने दिल्ली का रुख किया।
सन् 1982 में नवभारत टाइम्स का प्रधान संपादक बन कर मैं दिल्ली पहुँच गया।
दिल्ली आने के पश्चात मैंने 'नवभारत टाइम्स' को दिल्ली, मुंबई से निकालकर प्रादेशिक राजधानियों तक पहुँचाने का काम किया।
'नवभारत टाइम्स' को हिन्दी पट्टी के पाठकों तक पहुँचाते हुए लखनऊ, पटना एवं जयपुर संस्करण प्रकाशित किए।
यही समय था, जब मुझे राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। और एडिटर्स गिल्ड का प्रधान सचिव भी बनाया गया।
मेरे लेखों के कई संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें प्रमुख हैं- गांधी जी की जेल यात्रा, राजेंद्र माथुर संचयन- दो खण्डों में, नब्ज़ पर हाथ, भारत : एक अंतहीन यात्रा, सपनों में बनता देश, राम नाम से प्रजातंत्र।
9 अप्रैल, 1991 की दोपहर मेरा बुलावा आया गया और मुझे शरीर छोड़कर शब्द देह का रूप धारण करना पड़ा।
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान, भारत
सम्पादक, मासिक साहित्य ग्राम
#मातृभाषा_उन्नयन_संस्थान #मातृभाषा #हिन्दीग्राम #साहित्यग्राम #ख़बरहलचल #संस्मय #राजेन्द्रमाथुर
#इन्दौर
06/07/2022
*आपका सुझाव-हिन्दी का विस्तार*
विगत 4 वर्षों से अधिक समय से हिन्दी भाषा के प्रचार और विस्तार के लिए कार्यरत मातृभाषा उन्नयन संस्थान आपके सहयोग से हिन्दी के प्रचार में नवाचार चाहता है। हमारा ध्येय है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा बने और जन-जन की भाषा बने हिन्दी।
उपरोक्त विषयान्तर्गत आपके हिन्दी आंदोलन के लिए सुझाव आमंत्रित आमंत्रित हैं।
हमें क्या करना चाहिए, कैसे हिन्दी भाषा का अत्यधिक प्रचार होगा? कैसे हिन्दी युवाओं को जोड़ेगी और किस तरह आन्दोलन गतिमान होगा?
इस विषय में आपके सुझाव या तो पोस्ट के कमेन्ट बॉक्स में दे सकते हैं अथवा [email protected] पर मेल कर भी सकते हैं।
https://www.facebook.com/2072681989650249/posts/3187285454856558/
*आपका सुझाव-हिन्दी का विस्तार*
विगत 4 वर्षों से अधिक समय से हिन्दी भाषा के प्रचार और विस्तार के लिए कार्यरत मातृभाषा उन्नयन संस्थान आपके सहयोग से हिन्दी के प्रचार में नवाचार चाहता है। हमारा ध्येय है कि हिन्दी भारत की राष्ट्रभाषा बने और जन-जन की भाषा बने हिन्दी।
उपरोक्त विषयान्तर्गत आपके हिन्दी आंदोलन के लिए सुझाव आमंत्रित हैं।
✍🏻 संस्थान को क्या करना चाहिए?
✍🏻 कैसे हिन्दी भाषा का अत्यधिक प्रचार होगा?
✍🏻 कैसे हिन्दी युवाओं को जोड़ेगी?
✍🏻 किस तरह आन्दोलन गतिमान होगा?
इस विषय में आपके सुझाव या तो पोस्ट के कमेन्ट बॉक्स में दे सकते हैं अथवा [email protected] पर मेल कर भी सकते हैं।
https://www.facebook.com/2072681989650249/posts/3187285454856558/
#हिन्दीग्राम #मातृभाषा #डॉअर्पणजैनअविचल #संस्मय #हिन्दी #इन्दौर
06/06/2022
*मासिक सोच विचार में प्रकाशित आलेख*
●●●●●●●●●●●●●●●●
वाराणसी से प्रकाशित मासिक सोच विचार पत्रिका में #डॉअर्पणजैनअविचल का आलेख *'नए दौर में नए तरीके से हो साहित्य पत्रकारिता'* ....
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान
https://www.facebook.com/109665883858598/posts/576622353829613/
*(डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' के फ़ेसबुक पेज को लाइक करके आप जुड़ सकते हैं)*
#डॉअर्पणजैनअविचल #डॉअर्पणजैन
16/11/2021
स्वतंत्रता का संघर्ष करती और आदर्शों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की जद्दोजहद करती पत्रकारिता अपने स्वरूप की अखण्डता प्राप्त करें, इसी के साथ राष्ट्रीय प्रेस दिवस की शुभकामनाएँ।
*डॉ.अर्पण जैन 'अविचल'*
#मातृभाषा_उन्नयन_संस्थान #संस्मय #मातृभाषा #संस्मय_प्रकाशन
19/09/2021
'वेब पत्रकारिता' का ककहरा
#डॉअर्पणजैनअविचल #वेबपत्रकारिता
14/08/2021
आज़ादी के अमृत महोत्सव की मंगलकामनाएँ
डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'
(राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान, भारत)
www.arpanjain.com
#आज़ादी #स्वाधीनतामहोत्सव #अमृतमहोत्सव #स्वतंत्रता #स्वतंत्रतादिवस #डॉअर्पणजैन #हिन्दीग्राम #मातृभाषा #अर्पणजैन
*राष्ट्र का यौवन और स्वाधीनता पर्व*
◆ *डॉ. अर्पण जैन अविचल*
दुश्मनों की तमाम चालों को विफ़ल करते हुए मंगल पांडे और खुदीराम बोस से लेकर भगत, आज़ाद, राजगुरु, सुभाष, झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तिलक, महात्मा गाँधी, सरदार पटेल आदि से लेकर स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी कोटिशः भारतीयों के अमर बलिदान और निःस्वार्थ राष्ट्रयज्ञ की आहुतियों के प्रबल पुण्य प्रताप से भारत के स्वाभिमान की अक्षुण्ण स्थापना का स्वप्न अगस्त माह की चौदह तारीख़ की मध्यरात्रि में पूर्ण हो पाया है और पंद्रह तारीख़ की सुबह भारत ने आज़ाद सुबह का सूरज देखा। निश्चित तौर पर उस क्षण का ध्यान मात्र भी रोमांच को अगणित गुना करके प्रत्येक भारतवंशी को रोमांचित कर देता है। आज भारत की स्वाधीनता अपने यौवन में पदार्पण करते हुए पचहत्तर वर्षीय अमृत महोत्सव मना रही है। इस स्वाधीनता संग्राम के साक्षी समय ने भी हरकारे की भूमिका का निर्वहन कर राष्ट्र देव की आराधना करते हुए यौवन में प्रवेश किया है।
बीते पचहत्तर वर्षों में भी राष्ट्रवासियों ने परम वैभव की स्थापना के लिए सैंकड़ो संघर्ष किए हैं और आज भी कई संघर्ष जारी हैं, जैसे अंग्रेज़ी क़ानून से छुटकारा, अंग्रेज़ियत और अंग्रेज़ी संस्कृति से मुक्ति के लिए संघर्ष, हिन्दी भाषा की राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापना, ग़रीबी, अशिक्षा और अनाचार से मुक्ति के लिए संघर्ष, भ्रष्टाचार, पथभ्रष्टता और मातृशक्ति के वाचिक बलात्कार से मुक्ति यानी माँ-बहनों की गालियों से मुक्ति कर सभ्य भारत के निर्माण के लिए संघर्ष, सशक्त और स्वस्थ भारत का नवनिर्माण, आर्थिक रूप से समृद्ध भारत की स्थापना और ऐसे बीसियों संघर्ष वर्तमान में भी लगातार जारी हैं, जिनका उद्देश्य राष्ट्र के यौवन की प्रबल ऊर्जा को प्रारब्ध के पुण्योदय से उत्कर्ष के शिखर तक पहुँचाना है।
पूर्व प्रधानमंत्री, भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी जी लिखते हैं कि 'भारत एक भूमि का टुकड़ा नहीं बल्कि जीता जागता राष्ट्रपुरुष है',
इससे परिलक्षित होता है कि राष्ट्र एक जनसमूह का शोर नहीं बल्कि जनमानस की भावनाओं और संवेदनाओं के कंधे पर संवार जागरण की ऊर्जा का स्त्रोत है।
राष्ट्र अपने यौवन में प्रवेश तो कर रहा है किंतु अब राष्ट्रवासियों को भी अपने कर्त्तव्यों को ध्यान में रखकर कार्य करना होगा। आज़ादी केवल हक़ ही नहीं बल्कि ज़िम्मेदारी भी है।
आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे भारतीयों की कर्त्तव्यनिष्ठा और प्रतिबद्धता की परीक्षा की घड़ी भी है।
हमने कई युद्ध, महामारी, कोरोना, आपातकाल, आर्थिक आपातकाल, सीमा पर तनाव भी देखे हैं तो गृह युद्ध का त्रास भी झेला है। किन्तु अब समय, समझदारी से राष्ट्रयज्ञ करने का है। भारत के नागरिक बेहद संजीदा और ज़िम्मेदार हैं। हम अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा का महोत्सव भी मनाना जानते हैं तो जागरुकता और ज़िम्मेदारी का टीका लगवाने से भी नहीं चूकते। इसीलिए यह राष्ट्र अन्य राष्ट्रों की तुलना में शीघ्रता से प्रगतिपथ पर अग्रसर है। आज राष्ट्रवन्दना के त्यौहार पर हम सभी संकल्प लें कि सदैव हक़ माँगने के साथ-साथ अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन भी करेंगे तभी राष्ट्र उन्नति के उत्तुंग शिखर पर सफलता का जयघोष कर सकेगा।
*आज़ादी के अमृत महोत्सव की मंगलकामनाएँ*
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
(राष्ट्रीय अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान, भारत)
www.arpanjain.com
#आज़ादी #स्वाधीनतामहोत्सव #अमृतमहोत्सव #स्वतंत्रता #स्वतंत्रतादिवस #डॉअर्पणजैन #हिन्दीग्राम #मातृभाषा #अर्पणजैन #दिल्ली #अर्पण
11/08/2021
*शहीद खुदीराम बोस*
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मात्र 18 वर्ष की अल्पायु में हाथों में गीता लेकर फाँसी पर चढ़ गए, ऐसे युवा क्रान्तिकारी खुदीराम बोस जी को कोटिशः नमन।
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
#क्रान्तिकारी #खुदीरामबोस #शहीदखुदीरामबोस #अर्पणजैन #डॉअर्पणजैन #मातृभाषा #हिन्दीग्राम
11/12/2020
*कैसे ज़्यादा प्रकाशित होगा आपका लेखन*
कुछ आवश्यक सुझाव, जिन्हें अपनाने से बढ़ेगा लेखक का प्रकाशकीय दायरा और ...
*क्या लिखें? क्यों लिखें? और कैसे भेजें?*
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
#शब्दग्राम #हिन्दीविमर्श #संस्मय #हिन्दीग्राम #डॉअर्पणजैन #मातृभाषा #हिन्दी #आलेख #हिंदी #ब्रांडिंग #लेखकीयलोकप्रियता
*(पसंद आने पर पृष्ठ को पसंद (लाइक) करना अथवा कमेंट करना न भूलें)*
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'* का आलेख पढ़ने के लिए क्लिक करें-
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=3418676528187487&id=1456499717738521
कैसे ज़्यादा प्रकाशित होगा आपका लेखन कैसे ज़्यादा प्रकाशित होगा आपका लेखन क्या लिखें? क्यों लिखें? और कैसे भेजें? ◆ डॉ. अर्पण जैन 'अविचल' वर्तमान दौर में हि...
14/06/2020
*एक युद्ध-अवसाद के विरुद्ध*
✍🏻 *डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
सम्पूर्ण विश्व में हाहाकार मचा हुआ है, कोविड 19। कोरोना अपना कहर बरपा रहा है। देश में लगभग 80 दिनों से लॉक डाउन है, कामकाज ठप्प है, कोरोना से बचना है, घर पर रहना है, इन्हीं हालातों में कामकाजी और नौकरीपेशा भी रोटी की तलाश में हैं। आर्थिक संकट हर दिशा में है, मानसिक अवसाद बढ़ने लगा है, लोग आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं। ऐसे काल में व्यक्तिशः जागरुकता आवश्यक है। हमें ज़िन्दगी को फिर से पटरी पर लाने के लिए लड़ना होगा, शुरुआत करनी होगी, नई शुरुआत आवश्यक है। मान लीजिए, जब आपने अपने काम की पहली शुरुआत की थी या फिर नौकरी की पहली शुरुआत की थी तो कैसे संकटों का सामना किया था, बस उसी को आधार मानकर फिर से शुरुआत कीजिए। यदि कर्ज़ है तो भी चिंता मत कीजिए, जितना कर्ज़ है यदि वो एक साल में दोगुना भी हो गया तो भी एक नहीं दो नहीं तीन या चार साल में समाप्त हो जाएगा, पर यह तब होगा जब हम ज़िन्दा रहेंगे। यदि कोरोना या अवसाद से हार गए तो कर्ज़, तकलीफ़ के साथ एक बदनामी परिवार के लिए भी छोड़ जाएँगे।
कम से कम अवसाद को ख़ुद पर हावी न होने दें, अपनी समस्याएँ साझा करें, अपने ख़ास मित्रों तक ज़रूर बताएँ कि क्या समस्या है? कैसे निपटेंगे? आदि। कभी अवसाद को मन पर हावी न होने दें, इससे आप हारेंगे नहीं बल्कि जिएँगे। जब हम ज़िन्दा रहेंगे तो हर समस्या से जूझकर समाधान तक ले आएँगे, पर हम ही न रहे तो फिर परिवार कैसे जिएगा!
अपना और अपने परिवार का सोचना होगा, हारना नहीं बल्कि जीतने के लिए मेहनत करनी होगी।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान विगत 1 जून 2020 से *एक युद्ध अवसाद के विरुद्ध* अभियान संचालित कर रहा है, जिसके माध्यम से हमारी मानवीय ज़िम्मेदारी है कि लोगों को अवसाद में जाने से बचाएँ। तनावमुक्ति हेतु प्रयास करें, और लोगों को सकारात्मक रखने का प्रयास करें। इसी अभियान में संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन 'अविचल', राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य एवं ओज के कवि मुकेश मोलवा जी, राष्ट्रीय सचिव गणतंत्र ओजस्वी जी, शिखा जैन जी, भावना शर्मा जी, कवि हिमांशु भावसार जी आदि सुधिजन सतत प्रयासरत हैं। हर सम्भव मदद कर रहे हैं, तनाव मुक्ति के लिए प्रयासरत हैं। आप भी जुड़ें, अपने आसपास के लोगों को अवसाद से मुक्त करने के लिए जुटे, उन्हें तनाव से बाहर निकालने का प्रयास करें। निश्चित तौर पर हम यह जंग भी जीतेंगे। मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास।
जय हिन्दी!
*डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'*
अध्यक्ष- मातृभाषा उन्नयन संस्थान
www.arpanjain.com
09893877455
#मातृभाषा #एकयुद्धअवसादकेविरुद्ध #हिन्दीग्राम
20/04/2020
*एक युद्ध- कोरोना के विरुद्ध*
जहाँ एक ओर सम्पूर्ण विश्व कोरोना महामारी की त्रासदी को झेल रहा है, ऐसे में प्रत्येक भारतीय का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वे कोरोना को हराने में अपनी भूमिका निभाएँ।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के माध्यम से आप भी संकल्प लीजिए कि घरों में रहकर लॉक डाउन का पूर्णतः पालन करेंगे।
*इस लिंक पर जाकर संकल्प लीजिए*
http://hindigram.com/?page_id=1849
संकल्प लेकर स्क्रीनशॉट 9406653005 व्हाट्सएप्प पर प्रेषित करें और अपना सहभागिता प्रमाणपत्र भी प्राप्त करें।
*** *संकल्प पत्र* ***
मैं.............................. *(अपना नाम बोलना है)*
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के माध्यम से प्रण लेता हूँ कि भारत सरकार द्वारा किए गए लॉक डाउन का पूर्णतः पालन करूँगा/ करूँगी।
इस दौरान मैं घर से बाहर नहीं निकलूँगा/ निकलूँगी और कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने हेतु भारत सरकार के सभी निर्देशों का पालन करूँगा/करूँगी।
साथ ही, सामाजिक दूरी यानी सोशल डिस्टेंस बनाए रखते हुए कार्य करूँगा/करूँगी।
कोरोना के बारे में कोई भी अपुष्ट या भ्रामक समाचार प्रेषित नहीं करूँगा/करूँगी।
चिकित्सकों, पुलिसकर्मियों एवं कोरोना योद्धाओं का सम्मान करेंगे, उनके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेंगे।
लॉक डाउन खुलने के बाद भी सावधानी बरतेंगे और कोरोना संबंधित किसी भी लक्षण के होने पर चिकित्सकीय परामर्श लेंगे।
*******************************
आइये इस महायज्ञ में एक आहुति आपकी भी डालिए
14/10/2019
*इंदौर की पत्रकारिता के युगपुरुष जयकृष्ण गौड़ जी ने ली अंतिम सांस*
इंदौर प्रेस क्लब के पूर्व अध्यक्ष, दैनिक स्वदेश के प्रधान संपादक रहें, श्री जयकृष्ण गौड़ जी का निधन हो गया है।अंतिम यात्रा कल सुबह 10.30 बजे निज निवास पी 40 गोल्फ लिंक के पास करुणा अपार्टमेंट कनाडिया, इंदौर से निकलकर तिलक नगर मुक्ति धाम जाएगी।
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