KALKI AVTAR
HINDU
27/10/2017
कल्कि को विष्णुका भावी अवतार माना गया है। पुराणकथाओं के अनुसार कलियुग में पाप की सीमा पार होने पर विश्व में दुष्टों के संहार के लिये कल्कि अवतार प्रकट होगा।
युग परिवर्तनकारी भगवान श्री कल्कि के अवतार का प्रयोजन विश्वकल्याण बताया गया है। भगवान का यह अवतार ‘‘निष्कलंक भगवान’’ के नाम से भी जाना जायेगा। श्रीमद्भागवतमहापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित है। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा विस्तार से दी गई है जिसमें यह कहा गया है कि "सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा। वह देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।"
सम्भल ग्राम मुख्यस्य ब्राह्मणस्यमहात्मनः भवनेविष्णुयशसः कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।।
भगवान श्री कल्कि निष्कलंक अवतार हैं। उनके पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा। उनके भाई जो उनसे बड़े होंगे क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ और कवि नाम के नाम के होंगे। याज्ञवलक्य जी पुरोहित और भगवान परशुराम उनके गुरू होंगे। भगवान श्री कल्कि की दो पत्नियाँ होंगी - लक्ष्मी रूपी पद्मा और वैष्णवी शक्ति रूपी रमा। उनके पुत्र होंगे - जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक।
भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य एवं ज्योतिमय होता है। उनके स्परूप की कल्पना उनके परम अनुग्रह से ही की जा सकती है। भगवान श्री कल्कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक हैं। शक्ति पुरूषोत्तम भगवान श्री कल्कि अद्वितीय हैं। भगवान श्री कल्कि दुग्ध वर्ण अर्थात् श्वेत अश्व पर सवार हैं। अश्व का नाम देवदत्त है। भगवान का रंग गोरा है, परन्तु क्रोध में काला भी हो जाता है। भगवान पीले वस्त्र धारण किये हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। भगवान पूर्वाभिमुख व अश्व दक्षिणामुख है। भगवान श्री कल्कि के वामांग में लक्ष्मी (पद्मा) और दाएं भाग में वैष्णवी (रमा) विराजमान हैं। पद्मा भगवान की स्वरूपा शक्ति और रमा भगवान की संहारिणी शक्ति हैं। भगवान के हाथों में प्रमुख रूप से नन्दक व रत्नत्सरू नामक खड्ग (तलवार) है। शाऽं्ग नामक धनुष और कुमौदिकी नामक गदा है। भगवान कल्कि के हाथ में पांचजन्य नाम का शंख है। भगवान के रथ अत्यन्त सुन्दर व विशाल हैं। रथ का नाम जयत्र व गारूड़ी है। सारथी का नाम दारूक है। भगवान सर्वदेवमय व सर्ववेदमय हैं। सब उनकी विराट स्वरूप की परिधि में हैं। भगवान के शरीर से परम दिव्य गंध उत्पन्न होती है जिसके प्रभाव से संसार का वातावरण पावन हो जाता है। ग्रन्थों[1]में अवतारों की कई कोटि बतायी गई है जैसे अंशाशावतार, अंशावतार, आवेशावतार, कलावतार, नित्यावतार, युगावतार इत्यादि।[2]
जो भी सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को व्यक्त करता है वे सभी अवतार[3] कहलाते हैं। व्यक्ति से लेकर समाज के सर्वोच्च स्तर तक सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को व्यक्त करने के क्रम में ही विभिन्न कोटि के अवतार स्तरबद्ध होते है। अन्तिम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त को व्यक्त करने वाला ही अन्तिम अवतार के रूप में व्यक्त होगा। अब तक हुए अवतार, पैगम्बर, ईशदूत इत्यादि को हम सभी उनके होने के बाद, उनके जीवन काल की अवधि में या उनके शरीर त्याग के बाद से ही जानते हैं।
परन्तु भविष्य अर्थात आने वाले कल के लिए कल्पित एक मात्र महाविष्णु के 24 अवतारों में 24वाँ तथा प्रमुख अवतारों में दसवाँ और अन्तिम कल्कि अवतार के विषय में जो परिकल्पना है, वह निम्नलिखित रूप से है- नाम रूप – 'कल्कि पुराण' हिन्दुओं के विभिन्न धार्मिक एवं पौराणिक ग्रन्थों में से एक है।[4]
विष्णु के अन्य अवतारों की तरह कल्कि का वर्णन भी वेदों में नहीं मिलता। लेकिन पुराणों में कल्कि अवतार का विस्तार से वर्णन हैं। विष्णु पुराण और भगवत पुराण दोनों में ही कल्कि अवतार का उल्लेख आया हैं। कल्कि पुराण तो पूरी तरह से इसी अवतार पर केंद्रित हैं। लगभग सभी पुराणों के अनुसार कल्कि का जन्म एक ब्राह्मण विष्णुयश के घर पर होगा। कल्कि भगवन शिव के भक्त होंगे और उनके गुरु परशुराम होंगें।
कल्कि पुराण में ”कल्कि“ अवतार के जन्म व परिवार की कथा इस प्रकार कल्पित है- ”शम्भल नामक ग्राम में विष्णुयश नाम के एक ब्राह्मण निवास करेंगे, जो सुमति नामक स्त्री के साथ विवाह करेंगें दोनों ही धर्म-कर्म में दिन बिताएँगे। कल्कि उनके घर में पुत्र होकर जन्म लेंगे और अल्पायु में ही वेदादि शास्त्रों का पाठ करके महापण्डित हो जाएँगे। बाद में वे जीवों के दुःख से कातर हो महादेव की उपासना करके अस्त्रविद्या प्राप्त करेंगे जिनका विवाह बृहद्रथ की पुत्री पद्मादेवी के साथ होगा।“
जिस प्रकार सामान्य व्यावहारिक रूप में भविष्य में जन्म लेने वाले किसी भी व्यक्ति का नाम निश्चित करना असम्भव है उसी प्रकार उसके माता-पिता, जन्म स्थान और पत्नी को भी निश्चित करना असम्भव है। ध्यान देने योग्य यह है कि सभी अवतार, पैगम्बर, ईशदूत इत्यादि राजतन्त्र व्यवस्था काल में आये थे।[5] जब कल्कि पुराण लिखा गया होगा तब राजतन्त्र व्यवस्था थी इसलिए भविष्य के कल्कि की कथा पूर्णतया उसी शैली में ही है जिस शैली में अन्य अवतारों की कथा है। विश्वमन के अंश की अनुभूति किसी भी व्यक्ति से व्यक्त हो सकती है जिसका प्रक्षेपण या प्रस्तुतिकरण उस समय और व्यक्ति की अपनी संस्कृति के माध्यम से ही होता है। फिर भी कल्कि कथा के भी कुछ न कुछ अर्थ तो अवश्य है।
सम्भल-
कल्कि अवतार के कलियुग में हिन्दुस्तान के सम्भल में होने पर सभी हिन्दू सहमत हैं परन्तु सम्भल कहाँ है इसमें अनेक मतभेद हैं। कुछ विद्वान सम्भल को उड़ीसा, हिमालय, पंजाब, बंगाल और शंकरपुर में मानते हैं। कुछ सम्भल को चीन के गोभी मरूस्थल में मानते हैं जहाँ मनुष्य पहुँच ही नहीं सकता। कुछ वृन्दावन में मानते हैं। कुछ सम्भल को मुरादाबाद (उ0प्र0) जिले में मानते हैं जहाँ कल्कि अवतार मन्दिर भी है।
विचारणीय विषय ये है कि ”सम्भल में कल्कि अवतार होगा या जहाँ कल्कि अवतार होगा वही सम्भल होगा।“ सम्भल का शाब्दिक अर्थ समान रूप से भला या शान्ति करना या शान्ति होना अर्थात जहाँ शान्ति व अमन हो या शान्ति फैलाने वाला हो, होता है। कल्कि पुराण में सम्भल में 68 तीर्थो का वास बताया गया है। कलियुग में केवल सम्भल ही एक मात्र ऐसा तीर्थ स्थान होगा जो कल्याण दायक और शान्ति प्रदान करने वाला होगा। तीर्थ का अर्थ- पवित्र स्थान, दर्शन, दिल, मन, हृदय, घाट, तालाब, पानी का स्थान, अमर जीवन दाता जल, लोगों के आने जाने और जमघट के स्थान के अर्थ में होता है।
ब्राह्मण पिता विष्णुयश और माता सुमति- कल्कि पुराण के अनुसार कल्कि अवतार के पिता व माता का नाम विष्णुयश व सुमति होगा, जो नाम नहीं बल्कि गुणों को निर्देशित करता है। ब्राह्मण अर्थात जो वेद, पुराण और शुद्ध परम चैतन्य को जानता हो। विष्णु अर्थात परमेश्वर, सर्वव्यापक ईश जो सब स्थानों में उपस्थित है, ब्रह्माण्ड को पैदा करने वाला सृष्टा। यश अर्थात स्तुति या प्रशंसा करने वाला। इस प्रकार पिता विष्णुयश का अर्थ हुआ, ऐसा पिता जो सर्वव्यापक परमात्मा की स्तुति एवं प्रशंसा करने वाला व सबका भला करने वाला हितैषी है। इसी प्रकार सुमति का अर्थ होता है- सुन्दर या अच्छा मत या विचार रखना। कल्कि अवतार की पत्नी - कल्कि पुराण में[6]
”कल्कि“ अवतार के विषय में कहा गया है कि- ”उनका विवाह बृहद्रथ की पुत्री पद्मादेवी के साथ होगा।“ परन्तु कटरा-जम्मू (भारत) में वैष्णों देवी की कथा के सम्बन्ध में बिकने वाली पुस्तिका, इन्टरनेट पर उपलब्ध कथा और गुलशन कुमार कृत ”माँ वैष्णों देवी“ प्रदर्शित फिल्म पर आधारित कथा के अनुसार ”त्रिकुटा ने श्रीराम से कहा- उसने उन्हें पति रूप में स्वीकार किया है। श्रीराम ने उसे बताया कि उन्होंने इस अवतार में केवल सीता के प्रति निष्ठावान रहने का वचन लिया है लेकिन भगवान श्रीराम ने उसे आश्वासन दिया कि कलियुग में वे कल्कि के रूप में प्रकट होगें और उससे विवाह करेगें।“
श्रीरामचरितमानस के किष्किन्धाकाण्ड[7] में एक देवी का वर्णन मिलता है। इन्होंने हनुमानजी तथा अन्य बानर बीरों को जल व फल दिया था तथा उन्हें गुफा से निकालकर सागर के तट पर पहुँचाया था। ये देवी स्वयंप्रभा हैं। यही देवी माता वैष्णव के रूप में प्रतिष्ठित हैं। कलयुग के अंतिम चरण में भगवान का कल्कि अवतार होगा। तब ये कल्कि भगवान दुष्टों को दंडित करेंगे और धरती पर धर्म की स्थापना करेंगे।[8] तथा देवी स्वयंप्रभा से श्रीरामावतार में दिए गए वचनानुसार विवाह करेंगे। अर्थात वैष्णों देवी जो युगों से पिण्ड रूप में हैं उन्हें कल्कि अवतार एक साकार रूप प्रदान करेंगे जो ”माँ वैष्णो देवी“ के साकार रूप ”माँ कल्कि देवी“ होगीं। (पूर्ण विवरण के लिए देखें-माता वैष्णों देवी श्राइन बोर्ड पब्लिकेशन)[9]
शरीर रूप -
महर्षि व्यास रचित और ईश्वर के आठवें अवतार श्री कृष्ण के मुख से व्यक्त श्रीमद्भगवद्गीता में भी अवतार के होने का प्रमाण मिलता है। यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः। अभियुत्थानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (श्रीमद्भगवद्गीता, अ0-4, श्लोक-7) अर्थात हे भारत! जिस काल में धर्म की हानि होती है और अधर्म की अधिकता होती है। उस काल में ही मैं अपनी आत्मा को प्रकट करता हूँ। इस प्रकार कल्कि अवतार का शरीर मानव का ही होगा जिससे आत्मा का रूप प्रकट होगा और कृष्ण रूप होगा। कर्म रूप – कल्कि महाअवतार सफेद घोड़े पर सवार होकर हाथ में तलवार लेकर समस्त बुराईयों का नाश करेगें। किसी भी धर्म शास्त्रों में विचारों के निरूपण के लिए प्रतीकों का प्रयोग किया जाता रहा है क्योंकि विचार की कोई आकृति नहीं होती। इस प्रकार कल्कि अवतार के अर्थ को स्पष्ट करने पर हम पाते हैं कि सफेद घोड़ा अर्थात शान्ति का प्रतीक या अहिंसक मार्ग, तलवार अर्थात ज्ञान अर्थात सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त जिससे सभी का मानसिक वध होगा। अगर हम इन प्रतीकों को उसी रूप में लें तो क्या आज के एक से एक विज्ञान आधारित शस्त्र अर्थात औजार के युग में तलवार से कितने लोगों का वध सम्भव है और वह व्यक्ति कितना शारीरिक शक्ति से युक्त होगा, यह विचारणीय विषय है?
परिणाम सिर्फ एक है केवल मानसिक वध जो मात्र सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त से ही सम्भव है। और पिछले अवतारों द्वारा शारीरिक व आर्थिक कारणों का प्रयोग कर धर्म स्थापना हो चुका है। कल्कि पुराण कथा रचनाकार तब ये सोच भी नहीं पाये होगें कि भविष्य में दृश्य पदार्थ विज्ञान आधारित दृश्य काल और निराकार संविधान आधारित एक नई व्यवस्था भी आ जायेगी और उस वक्त राजा और राजतन्त्र नहीं होगा तब कल्कि अवतार किसका वध करेगें? दव्य या विश्व रूप - कल्कि अवतार के गुणो के अनुसार कर्म करने के सत्य रूप को एक कदम बढ़ाते हुये तथा अनेक कर्म के प्रतीक अनेक हाथो वाला दिखाया गया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि कल्कि अवतार द्वारा एक कर्म सम्पन्न होगा और उसके कारण अनेक हाथों से कर्म होने लगेगें अर्थात वे यह कहने में सक्षम होगें कि ”मैं अनेक हाथों से कर्म कर रहा हूँ और सभी मेरे ही कर्मज्ञान से कर्म को कर रहें हैं।“
सार्वभौम सत्य ज्ञान के शास्त्र ”गीता“ के बाद सार्वभौम कर्मज्ञान की आवश्यकता है जो कल्कि अवतार के कार्यो का ही एक चरण है।
ज्ञान रूप - अन्तिम सार्वभौम सत्य-सिद्धान्त का ज्ञान ही अन्तिम अवतार का ज्ञान रूप होगा, जिसके निम्न कारण होगें। 1. प्रकृति के तीन गुण- सत्व, रज, तम से मुक्त होकर ईश्वर से साक्षात्कार करने के ”ज्ञान“ का शास्त्र ”श्रीमदभगवद्गीता या गीता या गीतोपनिषद्“ उपल्ब्ध हो चुका था परन्तु साक्षात्कार के उपरान्त कर्म करने के ज्ञान अर्थात ईश्वर के मस्तिष्क का ”कर्मज्ञान“ का शास्त्र उपलब्ध नहीं हुआ था अर्थात ईश्वर के साक्षात्कार का शास्त्र तो उपलब्ध था परन्तु ईश्वर के कर्म करने की विधि का शास्त्र उपलब्ध नहीं था। मानव को ईश्वर से ज्यादा उसके मस्तिष्क की आवश्यकता है। 2. प्रकृति की व्याख्या का ज्ञान का शास्त्र ”श्रीमदभगवद्गीता या गीता या गीतोपनिषद्“ तो उपलब्ध था परन्तु ब्रह्माण्ड की व्याख्या का तन्त्र शास्त्र उपलब्ध नहीं था। 3. समाज में व्यष्टि (व्यक्तिगत प्रमाणित) धर्म शास्त्र (वेद, उपनिषद्, गीता, बाइबिल, कुरान इत्यादि) तो उपलब्ध था परन्तु समष्टि (सार्वजनिक प्रमाणित) धर्म शास्त्र उपलब्ध नहीं था जिससे मानव अपने-अपने धर्मो में रहते और दूसरे धर्म का सम्मान करते हुए राष्ट्रधर्म को भी समझ सके तथा उसके प्रति अपने कत्र्तव्य को जान सके। 4. शास्त्र-साहित्य से भरे इस संसार में कोई भी एक ऐसा मानक शास्त्र उपलब्ध नहीं था जिससे पूर्ण ज्ञान की उपलब्धि हो सके साथ ही मानव और उसके शासन प्रणाली के सत्यीकरण के लिए अनन्त काल तक के लिए मार्गदर्शन प्राप्त हो सके। 5. ईश्वर को समझने के अनेक भिन्न-भिन्न प्रकार के शास्त्र उपलब्ध थे परन्तु अवतार को समझने का शास्त्र उपलब्ध नहीं था।
कल्कि अवतार के गुरू –
कल्कि पुराण के अनुसार ”भगवान परशुराम, भगवान विष्णु के दसवें अवतार कल्कि के गुरू होगें और उन्हें युद्ध की शिक्षा देगें। वे ही कल्कि को भगवान शिव की तपस्या करके दिव्य शस्त्र प्राप्त करने के लिए कहेंगे।“ अदृश्य काल के व्यक्तिगत प्रमाणित काल में व्यक्तिगत प्रमाणित अदृश्य प्राकृतिक चेतना से युक्त सत्य आधारित सतयुग में छठवें अवतार – परशुराम अवतार तक अनेक असुरी राजाओं द्वारा राज्यों की स्थापना हो चुकी थी परिणामस्वरूप ऐसे परिस्थिति में एक पुरूष की आत्मा अदृश्य प्राकृतिक चेतना द्वारा निर्मित परिस्थितियों में प्राथमिकता से वर्तमान में कार्य करना, में स्थापित हो गयी और उसने कई राजाओं का वध कर डाला और असुरों तथा देवों के सह-अस्तित्व से एक नई व्यवस्था की स्थापना की। जो एक नई और अच्छी व्यवस्था थी। इसलिए उस पुरूष को कालान्तर में उनके नाम पर परशुराम अवतार से जाना गया तथा व्यवस्था ”परशुराम परम्परा“ के नाम से जाना गया जो साकार आधारित ”लोकतन्त्र का जन्म“ था, इसी साकार आधारित लोकतन्त्र व्यवस्था को श्रीराम द्वारा प्रसार हुआ था और इसी के असफल हो जाने पर द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के द्वारा समाप्त कर निराकार लोकतन्त्र व्यवस्था की नींव डाली थी जा भगवान बुध द्वारा मजबूती पायी और वर्तमान में निराकार संविधान आधारित लोकतन्त्र सामने है। इसी व्यवस्था की पूर्णता के लिए कल्कि अवतार होंगे। जो मात्र शिव तन्त्र की समझ से ही हो सकता है अर्थात यही शिव का अस्त्र है तथा लोकतन्त्र को समझने के कारण परशुराम कल्कि के गुरू होगें।
कल्कि अवतार मन्दिर -
महाविष्णु के 24 अवतारों में 24वाँ तथा प्रमुख अवतारों में दसवाँ और अन्तिम कल्कि अवतार ही एक मात्र ऐसे अवतार हैं जिनके अवतरण से पूर्व ही सिद्धपीठों में मूर्तिया स्थापित हो रही है। यूँ तो जहाँ-जहाँ विष्णु के अवतारों को मन्दिर में स्थान दिया गया है वहाँ-वहाँ अन्य अवतारों के साथ कल्कि अवतार की भी प्रक्षेपित (अनुमानित) मूर्ति प्रतिष्ठित है। परन्तु विषेश रूप से निम्न स्थानों पर कल्कि भगवान का मन्दिर निर्मित है। 1.सम्भल (मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत) में जहाँ कल्कि अवतार होना है, वहाँ पर कल्कि भगवान का मन्दिर निर्मित है। जहाँ प्रत्येक वर्ष अक्टुबर-नवम्बर माह में ”कल्कि महोत्सव“ भी धूम-धाम से मनाया जाता है।
2.गुलाबी नगरी-जयपुर (राजस्थान, भारत) की बड़ी चैपड़ से आमेर की ओर जानेवाली सड़क हवा महल के सामने भगवान कल्कि का प्राचीन मन्दिर अवस्थित है। जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने पुराणों में वर्णित कथा के आधार पर कल्कि भगवान के मन्दिर का निर्माण सन् 1739 ई. में दक्षिणायन शिखर शैली में कराया था। संस्कृत विद्वान आचार्य देवर्षि कलानाथ शास्त्री के अनुसार, सवाई जय सिंह संसार के ऐसे पहले महाराजा रहें हैं जिन्होंने जिस देवता का अभी तक अवतार हुआ नहीं, उसके बारे में कल्पना कर कल्कि भगवान की मूर्ति बनवाकर मन्दिर में स्थापित करायी। सवाई जयसिंह के तत्काली दरबारी कवि श्रीकृष्ण भट्ट ”कलानिधि“ ने अपने ”कल्कि काव्य“ में मन्दिर के निर्माण और औचित्य का वर्णन किया है, तद्नुसार ऐसा उल्लेख है कि सवाई जयसिंह ने अपने पौत्र ”कल्कि प्रसाद“ (सवाई ईश्वरी सिंह के पुत्र) जिसकी असमय मृत्यु हो गई थी, उसकी स्मृति में मन्दिर स्थापित कराया। श्वेत अश्व की प्रतिमा संगमरमर की खड़े रूप में है जो बहुत ही सुन्दर, आकर्षक और सम्मोहित है। अश्व के चबुतरे पर लगे बोर्ड पर अंकित है- ”अश्व श्री कल्कि महाराज-मान्यता- अश्व के बाएँ पैर में जो गड्ढा सा घाव है, जो स्वतः भर रहा है, उसके भरने पर ही कल्कि भगवान प्रकट होगें।“
3.मथुरा (उत्तर प्रदेश, भारत) के गोवर्धन स्थित श्री गिरिराज मन्दिर परिसर में कल्कि भगवान का मन्दिर स्थापित है जहाँ के बोर्ड पर कलियुग की समाप्ति की सूचना अंकित है साथ ही श्रीकृष्ण को कल्कि का ही अवतार बताया गया है।
4.वाराणसी (उत्तर प्रदेश, भारत) में दुर्गाकुण्ड स्थित दुर्गा मन्दिर परिसर में हनुमान मन्दिर के साथ कल्कि भगवान का मन्दिर दिनांक 19 अक्टुबर, 2012 (शारदीय नवरात्र) को स्थापित किया गया है।
5. अन्य स्थानों श्री कल्कि विष्णु मन्दिर, अजमेरी गेट, दिल्ली; श्री कल्कि मन्दिर, मादीपुर, पंजाबी बाग, दिल्ली; ललीता माँ मन्दिर, नैमिषारण्य तीर्थ, सीतापुर (उ0प्र0); काली मन्दिर, कालीघाट, कोलकाता; श्री योगमाया मन्दिर, महरौली, दिल्ली; श्री विष्णुपाद मन्दिर, गया धाम, गया (बिहार); श्री कालका जी मन्दिर, निकट नेहरू प्लेस, नई दिल्ली; अमृत परिसर, बृज घाट, गढ़ गंगा; श्री गौरीशंकर मन्दिर, चाँदनी चैक, दिल्ली; ईस्काॅन मन्दिर, ईस्ट आॅफ कैलास, नई दिल्ली; श्री हनुमान मन्दिर करोड़ीमल कालेज परिसर (हंसराज काॅलेज हास्टल के सामने), दिल्ली; श्री कल्कि मन्दिर, वैष्णों देवी, बाणगंगा, कटरा, जम्मू; श्री लक्ष्मी नारायण संस्थान, बंसत विहार, नई दिल्ली; श्री हनुमान मन्दिर (निकट रीगल सीनेमा) कनाॅट प्लेस, नई दिल्ली, श्री कल्कि मन्दिर, मरघट वाले हनुमान जी, रिंग रोड, यमुना बाजार, दिल्ली.6, श्री कल्कि विशाल मन्दिर, दिल्ली-जयपुर हाइवे रोड, मानेसर, (गुड़गाँव, हरियाणा) इत्यादि में भी कल्कि अवतार की मूर्ति स्थापित है।
6.श्री कल्कि मन्दिर वसुंधरा, कल्कि चैक, धापासी गाविस. 7, काठमाण्डु और सम्भलपुरी कल्कि तीर्थ धाम, नेपाल प्रजापति अंचल, प्यूठान सारी गाविस.1, नेपाल में भी कल्कि भगवान की मूर्ति स्थापित हो चुकी है। कल्कि भगवान के नाम पर नेपाल में विश्व का पहला सरकारी बैंक ”श्री कल्कि बैंक“ खुल चुका है।
7.कल्कि अवतार व कल्कि माता से सम्बन्धित वर्तमान समय में कथा, गीत, कल्कि चालीसा, कल्कि गायत्री मन्त्र, कल्कि मन्त्र-यन्त्र-तन्त्र, स्तुति, फिल्म इत्यादि भी बन चुके हैं। ”कल्कि पीठ“, ”कल्कि पीठाधीश्वर“, ”कल्कि अवतार फाउण्डेशन इण्टरनेशनल“, ”श्री कल्कि बाल वाटिका“ इत्यादि की भी स्थापना भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा की जा चुकी है।
8.राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात की त्रिवेणी संगम स्थल राजस्थान के वांगड़ अंचल (दक्षिण में जनजाति बहुल बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिले में) के डूंगरपुर जिले के साबला गांव में हरि मंदिर है जहां कल्कि अवतार की पूजा हो रही है। हरि मंदिर के गर्भगृह में श्याम रंग की अश्वारूढ़ निष्कलंक मूर्ति है, जो लाखों भक्तों की श्रद्धा और विश्वास का केंद्र है। भगवान के भावी अवतार निष्कलंक भगवान की यह अद्भुत मूर्ति घोड़े पर सवार है। इस घोड़े के तीन पैर भूमि पर टिके हुए हैं जबकि एक पैर सतह से थोड़ा ऊँचा है। मान्यता है कि यह पैर धीरे-धीरे भूमि की तरफ झुकने लगा है। जब यह पैर पूरी तरह जमीन पर टिक जाएगा तब दुनिया में परिवर्तन का दौर आरंभ हो जाएगा।
संत मावजी रचित ग्रंथों एवं वाणी में इसे स्पष्ट किया गया है। यहां बाकायदा कई मंदिर बने हुए हैं, जिनमें विष्णु के भावी अवतार कल्कि की मूर्तियां स्थापित हैं और इनकी रोजाना पूजा-अर्चना भी होती है। संत मावजी महाराज के अनुयायी पिछले पौने तीन सौ वर्षों से ज्यादा समय से इस भावी अवतार की प्रतीक्षा में जुटे हुए हैं। संत मावजी महाराज लाखों लोगों की आस्थाओं से जुडे बेणेश्वर धाम के आद्य पीठाधीश्वर रहे हैं। भक्तों की मान्यता है कि वे जिस देवता की पूजा कर रहे हैं वे ही कलयुग में भगवान विष्णु के कल्कि अवतार के रूप में अवतरित होंगे और पृथ्वी का उद्धार करेंगे। इन्हीं निष्कलंक अवतार के उपासक होने से संत मावजी के भक्त अपने उपास्य को प्रिय ऐसी ही श्वेत वेश-भूषा धारण करते हैं। निष्कलंक सम्प्रदाय के विश्व पीठ हरि मंदिर सहित वागड़ अंचल और देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित निष्कलंक धामों में भी इसी स्वरूप की पूजा-अर्चना जारी है।
देश के विभिन्न हिस्सों में फैले लाखों माव भक्तों द्वारा अपने उपास्य के रूप में इन्हीं निष्कलंक भगवान का पूजन-अर्चन किया जाता रहा है। विभिन्न निष्कलंक धाम मंदिर के स्वरूप में हैं जबकि निष्कलंक सम्प्रदाय के विश्व पीठ हरि मंदिर पर न तो कोई गुम्बद है और न ही मंदिर की आति, बल्कि यह गुरु आश्रम के रूप में ही अपनी प्राचीन शैली में बना हुआ है। निष्कलंक सम्प्रदाय के मंदिर साबला, पुंजपुर, वमासा, पालोदा, शेषपुर, बांसवाड़ा, फतेहपुरा, घूघरा, पारडा, इटिवार, संतरामपुर आदि गांवों में अवस्थित हैं। इन सभी मंदिरों में शंख, चक्र, गदा, पद्म सहित श्वेत घोड़े पर सवार भावी अवतार निष्कलंक भगवान की चतुर्भुज मूर्तियां हैं। मावजी की पुत्रवधू जनकुंवरी ने ही बेणेश्वर धाम पर सर्वधर्म समभाव के प्रतीक विष्णु मंदिर का निर्माण करवाया। इसके बारे में मावजी की वाणी में स्पष्ट कहा गया है- सब देवन का डेरा उठसे, निकलंक का डेरा रहेसे, अर्थात मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर आदि सब टूट जाएंगे, लेकिन कलियुग में अवतार लेने वाले निष्कलंक भगवान का एक मंदिर रहेगा जहां सभी धर्मों के लोगों को आश्रय प्राप्त होगा। सभी लोग इसे प्रेम से अपना मानेंगे।
9.मावजी महाराज का जन्म साबला गांव में विक्रम संवत् 1771 में माघ शुक्ल पंचमी को हुआ। इसके बाद लीलावतार के रूप में मावजी का प्राकट्य संवत् 1784 में माघ शुक्ल एकादशी को हुआ। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का लीलावतार माना जाता है। संत मावजी की स्मृति में आज भी बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर जिलों के बीच माही, सोम एवं जाखम नदियों के बीच विशाल टापू पर बेणेश्वर में हर साल माघ पूर्णिमा पर दस दिन का विशाल मेला भरता है। इसे आदिवासियों का महाकुंभ भी कहा जाता है। स्वयं मावजी महाराज की भविष्यवाणी के अनुसार ”संतन के सुख करन को, हरन भूमि को भार, ह्वै हैं कलियुग अन्त में निष्कलंक अवतार“ अर्थात् सज्जनों को सुख प्रदान करने और पृथ्वी के सिर से पाप का भार उतारने के लिए कलियुग के अंत में भगवान का निष्कलंक अवतार होगा। संत मावजी महाराज ने स्पष्ट लिखा है- ”श्याम चढ़ाई करी आखरी गरुड़ ऊपर असवार, दुष्टि कालिंगो सेंधवा असुरनी करवा हाण, कलिकाल व्याप्यो घणो, कलि मचावत धूम, गौ ब्राह्मण नी रक्षा करवा बाल स्त्री करवा प्रतिपाल…।“
मावजी की वाणी में कहा गया है कि निष्कलंक अवतार के साथ एक चैतन्य पुरुष रहेगा जो दैत्य-दानवों व चैदह मस्तकधारी कालिंगा का नाश कर चारों युगों के बंधनों को तोड़ कर सतयुग की स्थापना करेगा। इस पुरुष की लम्बाई 32 हाथ लिखी हुई है। यह अवतार गौ, ब्राह्मण प्रतिपाल होगा तथा धर्म की स्थापना करेगा। इसके बाद सर्वत्र शांति, आनन्द और समृद्धि का प्रभाव होगा। निष्कलंक अवतार के स्वरूप में बारे में संत मावजी के चैपड़ों में अंकित है- ”धोलो वस्त्र ने धोलो शणगार, धोले घोडीले घूघर माला, राय निकलंगजी होय असवार…बोलो देश में नारायण जी नु निष्कलंकी नाम, क्षेत्र साबला, पुरी पाटन ग्राम।“ इसमें साबला पुरी पाटन ग्राम का नाम अंकित है।
कल्कि अवतार और अन्य स्वघोषित कल्कि अवतार -
कल्कि अवतार के इस पद पर अनेक स्वघोषित दावेदार हैं जो समय-समय पर भविष्यवाणियों के अनुसार स्वयं को सिद्ध करने की कोशिश और कल्कि अवतार के सम्बन्ध में अनेक भविष्यवाणी करते रहते हैं जिन्हें इन्टरनेट (google.com, youtube.com इत्यादि) पर ”कल्कि अवतार (KALKI AVATAR) सर्च कर देखा जा सकता है परन्तु यह जानना चाहिए कि काल और युग परिवर्तन से परिचय कराने के लिए युगानुसार आत्मतत्व को व्यक्त करना पड़ता है। उसी सार्वभौम सत्य को युगानुसार योग कराया जाता है केवल भीड़ इकट्ठा हो जाने से कुछ भी नहीं होता। अवतारों को पहचानने के लिए सबसे मूल विषय यह होता है कि वह नया क्या दे रहा है जो उस समय के समाज के बहुमत मानव के शान्ति, एकता, स्थिरता व विकास को प्रभावित करता हो। सार्वभौम सत्य को व्यक्त करने वाला प्रत्येक मानव शरीरधारी अवतार ही है परन्तु युग के सर्वोच्च स्तर के सार्वभौम सत्य को व्यक्त करने वाला युगावतार कहलाता है।
जानिये शिव लिंग का रहष्य मय जानकारी।
Note- (हम सब ने देखा है लोग पोष्ट करते है दो फ़ोटो वहाँ होता है ईक गरीब बच्चा और शिव लिंग और स्टाटस मे लिख़ते है । दूध की जरूरत कीस को है हम सब सजि़ब हो या अनपढ़ वापस कमेन्ट लिख़ते है
1-गरीब को
2गरीब को.......
3-" 4-" "" " "
अरे मंदीर मे अर्पण करने के लिए हम कच्चा दुध ईस्तेमाल करते है जरा ये वताओ ज्यादा कच्चा दुध खाने से गाय का बछडा खुद मास, पेचिस (Dysentry) का शिकार होता है अरे वो तो ईक वच्चा है और उन से कहिये क्या आप ने कभी पीलाया है अब दुध से ज्यादा फायदेमंद प्रशाद मे होता है वो निशुल्क है उसकी समावेशिसा क्यों नहीं।सब हैवान गिराने मे तुले हुवे है। )
शिवलिंग भाग -1
#शिवलिंग पर #दूध #क्यों चढ़ाते है :-
पौराणिक : आयुर्वेद कहता है कि वात-पित्त-कफ इनके
असंतुलन से बीमारियाँ होती हैं और श्रावण के महीने
में वात की बीमारियाँ सबसे ज्यादा होती हैं. श्रावण के
महीने में ऋतू परिवर्तन के कारण शरीर मे वात
बढ़ता है. इस वात को कम करने के लिए
क्या करना पड़ता है ?
ऐसी चीज़ें नहीं खानी चाहिएं जिनसे वात बढे, इसलिए
पत्ते वाली सब्जियां नहीं खानी चाहिएं !
और उस समय पशु क्या खाते हैं ?
सब घास और पत्तियां ही तो खाते हैं. इस
कारण उनका दूध भी वात को बढाता है ! इसलिए
आयुर्वेद कहता है कि श्रावण के महीने में (जब
शिवरात्रि होती है !!) दूध नहीं पीना चाहिए.
इसलिए श्रावण मास में जब हर जगह शिव रात्रि पर
दूध चढ़ता था तो लोग समझ जाया करते थे कि इस
महीने मे दूध विष के सामान है, स्वास्थ्य के लिए
अच्छा नहीं है, इस समय दूध पिएंगे तो वाइरल
इन्फेक्शन से बरसात की बीमारियाँ फैलेंगी और वो दूध
नहीं पिया करते थे !
इस तरह हर जगह शिव रात्रि मनाने से पूरा देश
वाइरल की बीमारियों से बच जाता था !
तो बताओ अब तो मानोगे ना कि वो शिव रात्रि पर दूध
चढाना समझदारी है ?
निःसंदेह ! ऋतुओं के खाद्य
पदार्थों पर पड़ने वाले प्रभाव को ignore
करना तो बेवकूफी होगी.
ज़रा गौर करो, हमारी परम्पराओं के पीछे
कितना गहन विज्ञान छिपा हुआ है ! ये इस देश
का दुर्भाग्य है कि हमारी परम्पराओं को समझने के
लिए जिस विज्ञान की आवश्यकता है वो हमें
पढ़ाया नहीं जाता और विज्ञान के नाम पर जो हमें
पढ़ाया जा रहा है उस से हम अपनी परम्पराओं
को समझ नहीं सकते !
जिस संस्कृति की कोख से मैंने जन्म लिया है
वो सनातन (eternal) है, विज्ञान को परम्पराओं
का जामा इसलिए पहनाया गया है ताकि वो प्रचलन
बन जाए और हम हींदू समाज वादी सदा वैज्ञानिक जीवन।
अब सब मील कऱ बोलो
हर हर महादेव
08/10/2015
शिवलिंग भाग 2 अऩमोल रहष्य उजागऱ करते है।
शिवलिंगका सही असली अर्थ जानिए ...
Note -(जो लोग भाग १,२,३ सेयर नहीं कऱ रहें है वो अर्ध ज्ञान भरे हुवे हैं)
लिंग के नाम पर अनेख भ्रांतियों को तोड़ता ये लेख ,
लिंग के सही अर्थ को समझाता ये लेख जरुर पढ़े अपने मित्रो को भी बतलाए।।
लोग शिवलिंग की पूजा की आलोचना करते है..
छोटे छोटे बच्चो को बताते है कि हिन्दू लोग लिंग और योनी की पूजा करते है..
बेवकुफो को संस्कृत का ज्ञान नहीं होता है..
और छोटे छोटे बच्चो को हिन्दुओ के प्रति नफ़रत पैदा करके उनको आतंकी बना देते है…
इसका अर्थ इस प्रकार है..
पहले भाषा का ज्ञान ले......
लिंग ___/!!
लिंग का संस्कृत भाषा में चिन्ह ,प्रतीक अर्थ होता है…
जबकी जनर्नेद्रीय (मानव अंग ) को संस्कृत भाषा मे (शिशिन) कहा जाता है..
शिवलिंग >>>
शिवलिंग का अर्थ शिव का प्रतीक….
" शिवलिंग " शब्द में ' लिंग ' शब्द दो शब्दों से बना है, " लीन + गा (गति) " अर्थात, शिव में लीन होकर ही मनुष्य को गति प्राप्त होता है;
यानी, शिव के निराकार स्वरूप में ध्यान-मग्न आत्मा सद्गति को प्राप्त होती है, उसे परब्रह्म की प्राप्ति होती है।
तात्पर्य यह है कि हमारी आत्मा का मिलन परमात्मा के साथ कराने का माध्यम-स्वरूप है, शिवलिंग!
शिवलिंग साकार एवं निराकार ईश्वर का 'प्रतीक' मात्र है, जो परमात्मा - आत्म-लिंग का द्योतक है।
शिवलिंग शाश्वत-आत्मा का स्वरूप है, जो न जल से प्रभावित होता है, न अग्नि से, न पृथ्वी से, न किसी अस्त्र-शस्त्र से... जो अजित है, अजेय है!
शिव और शक्ति का पूर्ण स्वरूप है, शिवलिंग।
>>पुरुषलिंग का अर्थ पुरुष का प्रतीक
इसी प्रकार स्त्रीलिंग का अर्थ स्त्री का प्रतीक और
नपुंसकलिंग का अर्थ है ..नपुंसक का प्रतीक —-
अब यदि जो लोग पुरुष लिंग को मनुष्य के जनेन्द्रिय समझ कर आलोचना करते है..तो वे बताये ”स्त्री लिंग ”’के अर्थ के अनुसार स्त्री का लिंग होना चाहिए…
और खुद अपनी औरतो के लिंग को बताये फिर आलोचना करे—-
”शिवलिंग”’क्या है >>>>>
शून्य, आकाश, अनन्त, ब्रह्माण्ड और निराकार परमपुरुष का प्रतीक होने से इसे लिंग कहा गया है।
स्कन्दपुराण में कहा है कि आकाश स्वयं लिंग है।
शिवलिंग वातावरण सहित घूमती धरती तथा सारे अनन्त ब्रह्माण्ड ( क्योंकि, ब्रह्माण्ड गतिमान है ) का अक्स/धुरी (axis) ही लिंग है।
शिव लिंग का अर्थ अनन्त भी होता है अर्थात जिसका कोई अन्त नहीं है नाही शुरुवात |
—-
शिवलिंग का अर्थ लिंग या योनी नहीं होता ..
दरअसल ये गलतफहमी भाषा के रूपांतरण और मलेच्छों द्वारा हमारे पुरातन धर्म ग्रंथों को नष्ट कर दिए जाने तथा अंग्रेजों द्वारा इसकी व्याख्या से उत्पन्न हुआ हो सकता है|
खैर…..
जैसा कि हम सभी जानते है कि एक ही शब्द के विभिन्न भाषाओँ में अलग-अलग अर्थ निकलते हैं|
उदाहरण के लिए………
यदि हम संकृति के एक शब्द “सूत्र” को ही ले लें तो…….
सूत्र मतलब डोरी/धागा गणितीय सूत्र कोई भाष्य अथवा लेखन भी हो सकता है| जैसे कि नासदीय सूत्र ब्रह्म सूत्र इत्यादि |
उसी प्रकार “अर्थ” शब्द का भावार्थ : सम्पति भी हो सकता है और मतलब (मीनिंग) भी |
ठीक बिल्कुल उसी प्रकार शिवलिंग के सन्दर्भ में लिंग शब्द से अभिप्राय चिह्न, निशानी, गुण, व्यवहार या प्रतीक है।
धरती उसका पीठ या आधार है और सब अनन्त शून्य से पैदा हो उसी में लय होने के कारण इसे लिंग कहा है तथा कई अन्य नामो से भी संबोधित किया गया है जैसे : प्रकाश स्तंभ/लिंग, अग्नि स्तंभ/लिंग, उर्जा स्तंभ/लिंग, ब्रह्माण्डीय स्तंभ/लिंग (cosmic pillar/lingam)
ब्रह्माण्ड में दो ही चीजे है : ऊर्जा और प्रदार्थ |
हमारा शरीर प्रदार्थ से निर्मित है और आत्मा ऊर्जा है|
इसी प्रकार शिव पदार्थ और शक्ति ऊर्जा का प्रतीक बन कर शिवलिंग कहलाते है |
ब्रह्मांड में उपस्थित समस्त ठोस तथा उर्जा शिवलिंग में निहित है. वास्तव में शिवलिंग हमारे ब्रह्मांड की आकृति है. (The universe is a sign of Shiva Lingam.)
शिवलिंग भगवान शिव और देवी शक्ति (पार्वती) का आदि-आनादी एकल रूप है तथा पुरुष और प्रकृति की समानता का प्रतिक भी अर्थात इस संसार में न केवल पुरुष का और न केवल प्रकृति (स्त्री) का वर्चस्व है अर्थात दोनों सामान है
अब बात करते है योनि शब्द पर —-
मनुष्ययोनि ”पशुयोनी”पेड़-पौधों की योनि”’पत्थरयोनि”’ >>>>
योनि का संस्कृत में प्रादुर्भाव ,प्रकटीकरण अर्थ होता है..
जीव अपने कर्म के अनुसार विभिन्न योनियों में जन्म लेता है..
कुछ धर्म में पुर्जन्म की मान्यता नहीं है ..इसीलिए योनि शब्द के संस्कृत अर्थ को नहीं जानते है
जबकी हिंदू धर्म मे 84 लाख योनी यानी 84 लाख प्रकार के जन्म है
अब तो वैज्ञानिको ने भी मान लिया है कि धरती मे ८४ लाख प्रकार के जीव (पेड, कीट,जानवर,मनुष्य आदि) है….
मनुष्य योनी >>>>पुरुष और स्त्री दोनों को मिलाकर मनुष्य योनि होता है..अकेले स्त्री या अकेले पुरुष के लिए मनुष्य योनि शब्द का प्रयोग संस्कृत में नहीं होता है। जय श्री पशुपति नाथ।
04/11/2014
भारतीय सन्दर्भ में गौ माता का विशेष महत्त्व है। समृद्धि और संस्कृति को जोड़ती है। भुक्ति-मुक्ति दायित्व है। राम, राष्ट्र और रोटी को जोड़ती है। गौ माता के बारे में गीता प्रेस गोरखपुर ने कल्याण का गौअंक एवं गौसेवा अंक प्रकाशित कर चिरस्मरणीय योगदान किया है। किसी भी गौ रक्षक, गौ सेवक के लिए इन्हे पढ़ जाना बहुत बड़ा प्रशिक्षण है।
दो तथ्यों का उल्लेख करता हूँ। मनुष्य के और गौ के गर्भ काल में केवल एक सप्ताह का अंतर है। किसी का नौ महीना 6 दिन, किसी का नौ महीना 13 दिन। बकरी का गर्भ काल 6 माह, भैस का एक वर्ष होता है|
मनुष्य के माँ का दूध और गाय का दूध तत्वों की दृष्टि से लगभग समान है। बकरी का दूध हल्का सुपाच्य किन्तु कम पौष्टिक है। भैस का दूध गरिष्ट अधिक वसा युक्त है। गाय के दूध की तुलना में कुछ तत्व भैस के दूध में नहीं है।
हैदराबाद के श्री सहदेव दास की गाय के बारे में लिखी पुस्तक बहुत बोधप्रद है। विगत 200 वर्षो में गोवंश का ह्रास तेजी से हुआ है। बाजारवाद ने तो हद ही कर दी है। आधुनिक टेक्नोलॉजी ने पशु शक्ति को ही ख़ारिज कर दिया-उसमे बैल भी गए ।
बाजारवादी नीतियों ने आस्थाहीनता के कारण मांस निर्यात की बढ़ोतरी को विकास में शामिल कर लिए। खेती और ढुलाई से पशु शक्ति बाहर हो गई। मोटे अनाज और मिश्रित फसल से चारा मिलता था। महीन अनाज और नगदी फसल में चारे पर मार पर जाती है|
गोचर जमींनो को शहरीकरण और अवैध कब्ज़ा बहुतांश लील गया है। सामाजिक आश्रय के आभाव में वृद्धाश्रय की तरह गौशालाएं बढ़ी है और व्यपारिक निगाहे अधिक पैनी हुई है अनैतिकता की हद तक।
इन कारणों से गौ रक्षा और गौ सेवा के सामने गंभीर चुनौती है। प्रकृति विरुद्ध बाजारवादी नीतियों का संवेदनशील मनोविज्ञान एवं सामाजिक पारस्परिकता एवं व्यवहार में मानवीयता घटी है। व्यक्तिवाद, उपभोगवाद बढ़ा है। मनुष्य की उदारता और आंतरिक अमीरी घटी है|
इस नुकसान की भरपाई कठिन है। बहुत समय लेगी। इस नुकसान को नहीं समझा गया है आंकने और परिमार्जन की बात तो दूर।
गौरक्षा और उसके सामाजिक दायित्व के निर्वहन के लिए जरुरी है की सत्ता की कृषि, सिचाई, ढुलाई, ऊर्जा, स्वास्थ्य, पर्यावरण की नीतिया देशी हो और गौमाता के अनुकूल हो|
गौशाला और गौमाता से संबंध अनेक विध रचनात्मक प्रयोग गौरक्षा के सन्दर्भ में आवश्यक है, उपयोगी है। मगर समस्या के समाधान के लिए पर्याप्त नहीं है।
इस दृष्टि से सार्वजनिक क्षेत्र में गौमाता के बारे में आस्था के अधिष्ठान पर रहना जरुरी है। साथ ही सम्पूर्ण गौवंश हत्या बंदी एवं उससे संबंधित और उससे उतपन्न चुनौतियों के समाधान के लिए समाज की समझ और सहभागिता और संघर्ष जरुरी रहेगी|
गौ माता हम सब पर अपनी कृपा बनाए रखें.
धर्म, संस्कृति, स्वास्थ्य और स्वाभिमान के लिए आप भी हमारे साथ 7300 से अधिक स्वदेशी मित्रो वाले 'मेरा मन स्वदेशी' Android App से जुड़ सकते है. डाउनलोड करने के लिए लिंक क्लिक करें http://goo.gl/fVxRJi.
रावण सीता को समझा समझा कर हार गया था पर सीता ने रावण की तरफ एक बार देखा तक नहीं ,
तब मंदोदरी ने उपाय बताया कि तुम राम बन के सीता के पास जाओ वो तुम्हे जरूर देखेगी...
रावण ने कहा - मैं ऐसा कई बार कर चुका हू
मंदोदरी - तब क्या सीता ने आपकी ओर देखा
रावण - "मैं खुद सीता को नहीं देख सका...क्योंकि मैं जब-जब राम बनता हूँ मुझे परायी नारी अपनी माता और अपनी पुत्री सी दिखती है......"
अपने अंदर राम को ढूंढे, और उनके चरित्र पर चलिए आपसे भूलकर भी भूल नहीं होगी
जय श्री राम
13/09/2014
पुराणों में कल्कि अवतार के कलियुग के अंतिम चरण में आने की भविष्यवाणी की गई है। अभी कलियुग का प्रथम चरण ही चल रहा है लेकिन अभी से ही कल्कि अवतार के नाम पर पूजा-पाठ और कर्मकांड शुरू हो चुके हैं। कुछ संगठनों का दावा है कि कल्कि अवतार के प्रकट होने का समय नजदीक आ गया है और कुछ का दावा है कि कल्कि अवतार हो चुका है। जो यह कहते हैं कि कल्कि अवतार हो चुका है, उनके दावों में कितना दम है यह जानने का हम प्रयास करेंगे।
आप ये तारीखें याद रखें : कलयुग की शुरुआत 3000 विक्रम संवत् पूर्व अर्थात 2942 ईसा पूर्व में हुई। 3114 विक्रम संवत् पूर्व अर्थात 3056 ईसा पूर्व को भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। इसके बाद कोई बड़ी घटना है तो वह है भगवान बुद्ध का जन्म। बुद्ध के पूर्व ही जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी का जन्म हुआ था। महावीर स्वामी का जन्म 1797 विक्रम संवत पूर्व अर्थात 1739 ईसा पूर्व बिहार के वैशाली क्षेत्र के कुण्डग्राम में हुआ था।
बुद्ध के बाद ही कल्कि अवतार होने की बात कही जाती है। पौराणिक इतिहास के अनुसार गौतम बुद्ध का काल 1760 विक्रम संवत् पूर्व से 1680 वि.पू. होने का मत स्थिर किया गया है।
मथुरावासियों के इतिहास अनुसार 1710 विक्रम संवत पूर्व बुद्ध मथुरा आए थे अर्थात 1652 ईसा पूर्व, जबकि इतिहास में पढ़ाया जाता है कि ईसा से 563 वर्ष पूर्व बुद्ध का जन्म हुआ था यानी कि अंग्रेज इतिहाकार भारतीय इतिहास को 11सौ (1100) वर्ष नीचे खींचकर लाकर उसे भ्रमित करने का प्रयास करते हैं। इसका मतलब उन्होंने भारतीय इतिहास के 1 हजार वर्षों के पन्ने फाड़ दिए और भारतीयों को वही पढ़ाया, जो वे चाहते थे। उन्होंने हिन्दू धर्म के साथ-साथ ही बौद्ध धर्म के भी गौरवशाली इतिहास को मिटाने का प्रयास किया। यही दो धर्म ऐसे थे जिनसे मुगल, अंग्रेज और ईसाइयत को खतरा महसूस होता था। खैर!
वर्तमान में भगवान कल्कि के नाम पर उत्तरप्रदेश में संभल ग्राम में एक मंदिर बना है। उनके नाम पर दिल्ली आदि क्षेत्रों में ऑडियो, वीडियो, सीडी, पुस्तक आदि साहित्य सामग्री का विकास कर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। उनके नाम की आरती, चालीसा, पुराण आदि मिलते हैं। शंकराचार्यों के अनुसार कलयुग में दो ही अवतार हैं- बुद्ध और कल्कि।
कल्कि अवतार को लेकर हिन्दुओं में यह भ्रम और मतभेद क्यूं हैं? क्योंकि हिन्दुओं के इतिहास को मुगलों और अंग्रेजों के काल में लगभग नष्ट कर दिया गया था। तो फिर इतिहास कैसे पता चले? इतिहास के पन्नों को अब खुदाई और बचे हुए अवशेषों के आधार पर जाना जाता है। इसके अलावा इतिहास का स्रोत है- जैन और बौद्ध धर्मग्रथों के अलावा चीनी, नेपाली, बर्मा, मलेशिया, इंडोनेशिया आदि पूर्वी देशों के इतिहास ग्रंथ।
इसके अलावा मथुरा, काशी, वृंदावन, हरिद्वार, ऋषिकेश, कांची आदि पवित्र नगरियों में बैठे पंडों और पुरोहितों के पास संरक्षित वे पौथी-पानड़े जो उन्होंने हजारों वर्षों से सुरक्षित रखे हैं। उनकी पौथियों के इतिहास से यह पता चला कि अंग्रेज जो इतिहास लिख गए, वह पूरी तरह से झूठ पर आधारित है। फिर हमारे जेएनयू के विद्वानों ने जो लिखा उस पर क्या कहें? वे तो हमसे ज्यादा पढ़े लिखे हैं बुद्धिमान हैं। अंग्रेजों ने ईसा पूर्व के संपूर्ण इतिहास को भ्रमित करने के लिए तथ्यों और संदर्भों के साथ छेड़छाड़ की। फिर उन्होंने गुप्त काल के वह पन्ने भी फाड़ दिए जिसे पढ़कर भारतीय गौरव का अनुभव करें। फिर बाद के इतिहासकारों ने अनुसरण करते हुए पूरी तरह अनजाने में ही सही समाज में एक झूठा इतिहास प्रचारित कर दिया। बाद में अंग्रेज ऐसे लोगों के हाथों में सत्ता दे गए जो किसी भी धर्म पर विश्वास नहीं करते थे लेकिन वे धर्म का उपयोग करना अच्छी तरह जानते थे।
पुराणों और भारत के धार्मिक इतिहास को जानने वाले जानकार मानते हैं कि भगवान कृष्ण के पूर्व 'अवतार' जैसा शब्द प्रचलन में तो था लेकिन विष्णु, शिव आदि के अवतार होते हैं, यह नहीं था। भगवान कृष्ण के बाद जब धर्म का पतन होना शुरु हुआ तो धर्म को पुन: स्थापित करने के लिए अवतारवाद को स्थापित किया गया। वेदव्यास ने कुछ ही पुराण लिखे थे। अधिकतर पुराण बौद्धकाल में ही लिखे गए हैं कुछ मध्यकाल में लिखें गए। सबसे दुखदाई बात यह कि पुराणों में मध्यकाल और फिर अंग्रेज काल में संसोधित कराया गया था। उसे भ्रमित करने वाले बनाया गया।
पुराणों में विष्णु के 10 अवतार बताए गए हैं- मत्स्य, क्रुमु, वाराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। कल्कि अवतार भगवान विष्णु के 10 अवतारों में अंतिम हैं, जोकि भविष्य में जन्म लेकर कलयुग का अंत करके सतयुग का प्रारंभ करेगा।
स्कंद पुराण के दशम अध्याय में स्पष्ट वर्णित है कि कलियुग में भगवान श्रीविष्णु का अवतार श्रीकल्कि के रुप में सम्भल ग्राम में होगा।
'अग्नि पुराण' के सौलहवें अध्याय में कल्कि अवतार का चित्रण तीर-कमान धारण किए हुए एक घुड़सवार के रूप में किया हैं और वे भविष्य में होंगे। कल्कि पुराण के अनुसार वह हाथ में चमचमाती हुई तलवार लिए सफेद घोड़े पर सवार होकर, युद्ध और विजय के लिए निकलेगा तथा बौद्ध, जैन और म्लेच्छों को पराजित कर सनातन राज्य स्थापित करेगा। पुराणों की यह धारणा की कोई मुक्तिदाता भविष्य में होगा सभी धर्मों ने अपनाई।
इसके विपरीत कुछ अन्य पुराण और बौद्धकाल के कवियों की कविता और गद्य में ऐसा उल्लेख व गुणगान मिलता है कि कल्कि अवतार हो चुका है। 'वायु पुराण' (अध्याय 98) के अनुसार कल्कि अवतार कलयुग के चर्मोत्कर्ष पर जन्म ले चुका है। इसमें विष्णु की प्रशंसा करते हुए दत्तात्रेय, व्यास, कल्की विष्णु के अवतार कहे गए हैं, किन्तु बुद्ध का उल्लेख नहीं हुआ है। इसका मतलब यह कि उस काल में या तो बुद्ध को अवतारी होने की मान्यता नहीं मिलती थी या फिर बुद्ध के पूर्व कल्कि अवतार हुआ होगा।
मत्स्य पुराण के द्वापर और कलियुग के वर्णन में कल्कि के होने का वर्णन मिलता है। बंगाली कवि जयदेव (1200 ई.) और चंडीदास के अनुसार भी कल्कि अवतार की घटना हो चुकी है अतः कल्कि एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हो सकते हैं।
बौद्धकाल में जहां हिन्दू पुराणों के साथ छेड़खानी की गई, वहीं मध्यकाल में इसके कई पन्ने नष्ट कर इसको विरोधाभाषी बनाया गया। लेकिन बौद्ध ग्रंथों और जैन पुराणों में इतिहास की सही जानकारी संरक्षित है।
जैन पुराणों में एक कल्कि नामक भारतीय सम्राट का वर्णन मिलता है। जैन विद्वान गुणभद्र नौवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लिखते हैं कि कल्किराज का जन्म महावीर के निर्वाण के 1 हजार वर्ष बाद हुआ। जिनसेन ‘उत्तर पुराण’ में लिखते हैं कि कल्किराज ने 40 वर्ष राज किया और 70 वर्ष की आयु में उसकी मृत्यु हुई।
कल्किराज अजितान्जय का पिता था, वह बहुत हिंसक और क्रूर शासक था जिसने दुनिया का दमन किया और निग्रंथों के जैन समुदाय पर अत्याचार किए। गुणभद्र के अनुसार उसने दिन में एक बार दोपहर भोजन करने वाले जैन निग्रंथों के भोजन पर भी टैक्स लगा दिया था, जिससे वे भूखे मरने लगे।
तब निग्रंथों को कल्कि की क्रूर यातनाओं से बचाने के लिए एक दैत्य का अवतरण हुआ जिसने वज्र (बिजली) के प्रहार से उसे मार दिया ओर अनगिनत युगों तक असहनीय दर्द और यातनाएं झेलने के लिए 'रत्नप्रभा नामक' नर्क में भेज दिया।
प्राचीन जैन ग्रंथों के अनुसार 'कल्कि' एक ऐतिहासिक सम्राट था जिसका शासनकाल महावीर की मृत्यु के 1 हजार साल बाद हुआ यानी कि महावीर स्वामी का जन्म यदि प्राचीन काल निर्धारण अनुसार मानें तो 1797 विक्रम संवत पूर्व अर्ताथ महावीर के एक हजार वर्ष बाद यानी 797 विक्रम संवत पूर्व कल्कि हुए थे अर्थात 739 ईसा पूर्व।
अब यदि हम अंग्रेजों द्वारा लिखे इतिहास का काल निर्धारण मानें तो महावीर स्वामी का जन्म 599 ईसा पूर्व हुआ था। इसका मतलब महावीर के 1 हजार वर्ष बाद कल्कि हुए थे यानी कि तब भारत में गुप्त वंश का काल था। मौर्य और गुप्तकाल को भारत का स्वर्णकाल माना जाता है। गुप्तकाल के बाद ही भारत में बौद्ध और जैन धर्म का पतन होना शुरू हो गया था। आधे भारत पर राज्य करने वाले बौद्ध और जैनों का शासन आखिर हर्षवर्धन के काल तक समाप्त होकर शून्य क्यों हो गया?
तब क्या हम यह मानें कि गुप्त वंश के पतन के बाद ही कल्कि का अवतार हुआ जिसने शक, कुषाण आदि को ही नहीं मार भगाया बल्कि जिसने बौद्ध और जैनों के प्रभुत्व को भी समाप्त कर दिया?
यदि हम प्राचीन तारीख निर्धारण के अनुसार कल्कि का जन्म 739 ईसा पूर्व मानते हैं तो इसका मतलब कि जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ (877-8777 ईसा पूर्व) ईसा पूर्व के बाद कल्कि का जन्म हुआ होगा। पार्श्वनाथ के काल में जैन धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था और निश्चित ही तब हिन्दुओं के लिए जैन धर्म एक खतरा जान पड़ा होगा।
क्या हूण शासक मिहिरकुल थे कल्कि? यदि गुप्त काल के बाद कल्कि का होना मानें तो गुप्तों के बाद हूणों ने भारत पर कब्जा कर लिया था। जैन ग्रंथों में वर्णित कल्कि का समय और कार्य हूण सम्राट मिहिरकुल के साथ समानता रखता है अतः कल्किराज ओर मिहिरकुल (502-542 ई.) के एक होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
इतिहासकार केबी पाठक ने सम्राट मिहिरकुल हूण की पहचान कल्कि के रूप में की गई है। वे कहते हैं कि मिहिरकुल का दूसरा नाम कल्किराज था। जैन ग्रंथों ने कल्किराज के उत्तराधिकारी का नाम अजितान्जय बताया है। मिहिरकुल हूण के उत्तराधिकारी का नाम भी अजितान्जय था।
चीनी यात्री बौद्ध भिक्षु ह्वेनसांग मिहिरकुल की मृत्यु के लगभग 100 वर्ष बाद भारत आया। उसके द्वारा लिखित 'सी यू की' नामक ग्रंत में भारत का वर्णन है। वह कहता है कि मिहिरकुल की मृत्यु के समय भयानक तूफान आया और ओले बरसे, धरती कांप उठी तथा चारों ओर गहरा अंधेरा छा गया।
बौद्ध संतों ने कहा कि अनगिनत लोगों को मारने और बुद्ध के धर्म को उखाड़ फेंकने के कारण मिहिरकुल गहरे नर्क में जा गिरा, जहां वह अंतहीन युगों तक सजा भोगता रहेगा।
इतिहास में मिहिरकुल हूण कल्कि की तरह श्रेष्ठ घुड़सवार और धनुर्धर के रूप में विख्यात है तथा कल्किराज (मिहिरकुल हूण) ने भी कल्कि की तरह जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का दमन किया था। उसने भारत से बौद्ध धर्म को उखाड़कर बाहर फेंक दिया और शक्य मुनियों को जंगल में ही रहने पर मजबूर कर दिया। क्यों उसने बौद्ध धर्म को भारत से उखाड़ फेंका?
इस संबंध में एक कहानी है कि मिहिरकुल बौद्ध धर्म अपनाना चाहता था। इस इच्छा से उनने बौद्धा के सर्वोच्च धर्मगरु को संदेश भेजा की आप मुझे बौद्ध धर्म के संबंध में जानकारी दें और बताएं कैसे मोक्ष पाया जा सकता हैं। उस सर्वोच्च गुरु ने खुद संदेश न भेजकर और न आकर एक भिक्षु को भेजा और कहा कि आप इससे सीख लें। मिहिरकुल ने इसे अपना अपमान समझा और शपथ ली की भारत से शाक्यों को नामोनिशान मिटा दूंगा।
कल्कि पुराण में लिखा भी हैं कि कल्कि आएंगे और अनिश्वरवादी धर्मों (जैन और बौद्ध) का नाश कर देंगे। क्या मिहिरकुल ने ऐसा नहीं किया था?
कश्मीरी ब्राह्मण विद्वान कल्हण के अनुसार मिहिरकुल वैदिक धर्म का अनुयायी था। वह अनीश्वरवादियों के विरुद्ध लड़ाई लड़ता था। कल्हण ने 'राजतरंगिणी' नामक ग्रंथ में मिहिरकुल का वर्णन शिवभक्त के रूप में किया है। कल्हण कहता है कि मिहिरकुल ने कश्मीर में मिहिरेश्वर शिव मंदिर का निर्माण करवाया।
हूणों के शासन से पहले कश्मीर ही नहीं, वरन पूरे भारत में बौद्ध धर्म प्रबल था। भारत में बौद्ध धर्म के अवसान और सनातन धर्म के संरक्षण एवं विकास में मिहिरकुल हूण की एक प्रमुख भूमिका है। मिहिरकुल का शासन ईरान से लेकर बर्मा और कश्मीर से लेकर श्रीलंका तक था।
कुछ विद्वानों के अनुसार मिहिरकुल को कल्कि मानना इसलिए ठीक नहीं होगा, क्योंकि
हूण तो विदेशी आक्रांता थे। उनको तो इतिहास में विधर्मी माना गया है। 'विधर्मी' का अर्थ होता है ऐसे व्यक्ति जिसने या जिसके पूर्वजों ने हिन्दू धर्म को त्यागकर दूसरों का धर्म अपना लिया हो।
लेकिन ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार हूण विदेशी नहीं थे। उन्हें प्राचीनकाल में यक्ष कहा जाता था। वे सभी धनाढ्य लोग थे। हूण, कुषाण और शक सभी मूलत: भारतीय ही थे। ये सभी भारत से निकलकर बाहर गए और फिर पुन: भारत में आकर राज करने लगे।
इतिहासकारों के अनुसार वराह हूण और कुषाण लगभग 360 ई. में भारत के पश्चिमोत्तर में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरे थे। उन्होंने पंजाब से मालवा तक अपना शासन स्थापित कर लिया था। श्वेत हूण भी 5वीं शताब्दी में पश्चिमोत्तर भारत के शासक थे। 500 ई. लगभग जब तोरमाण ओर मिहिरकुल के नेतृत्व में जब हूणों ने मध्यभारत में साम्राज्य स्थापित किया, तब वे वैदिक धर्म और संस्कृति का एक हिस्सा थे, जबकि गुप्त सम्राट बालादित्य बौद्ध धर्म का अनुयायी था। इससे पहले मौर्य वंश भी बौद्ध धर्म के अनुयायी थे अतः हूणों और गुप्तों का टकराव दो भारतीय ताकतों का टकराव था।
भारत के प्रथम शक्तिशाली हूण सम्राट तोरमाण के शासनकाल के पहले ही वर्ष का अभिलेख मध्यभारत के एरण नामक स्थान से वाराह मूर्ति से मिला है। हूणों के देवता वाराह थे।
कालांतर में हूणों से संबंधित माने जाने वाले गुर्जरों के प्रतिहार वंश ने मिहिरभोज के नेतृत्व में उत्तर भारत में अंतिम हिन्दू साम्राज्य का निर्माण किया और हिन्दू संस्कृति के संरक्षण में हूणों जैसी प्रभावी भूमिका निभाई।
तोरमाण हूण की तरह गुर्जर-प्रतिहार सम्राट मिहिरभोज भी वाराह का उपासक था और उसने आदि वाराह की उपाधि भी धारण की थी। जाटों, गुर्जर-प्रतिहारों ने 7वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक अरब आक्रमणकारियों से भारत और उसकी संस्कृति की जो रक्षा की उससे सभी इतिहासकार परिचित हैं।
समकालीन अरब यात्री सुलेमान ने गुर्जर सम्राट मिहिरभोज को भारत में इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन करार दिया था, क्योंकि भोज राजाओं ने 10वीं सदी तक इस्लाम को भारत में घुसने नहीं दिया था। मिहिरभोज के पौत्र महिपाल को आर्यवृत्त का महान सम्राट कहा जाता था। गुर्जर संभवतः हूणों और कुषाणों की नई पहचान थी।
अतः हूणों और उनके वंशज गुर्जरों ने हिन्दू धर्म और संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, इस कारण से इनके सम्राट मिहिरकुल हूण औरमिहिरभोज गुर्जर को समकालीन हिन्दू समाज द्वारा अवतारी पुरुष के रूप में देखा जाना आश्चर्य नहीं होगा। निश्चित ही इन सम्राटों ने हिन्दू समाज को बाहरी और भीतरी आक्रमण से निजाद दिलाई थी इसलिए इनकी महानता के गुणगान करना स्वाभाविक ही था। लेकिन मध्यकाल में भारत के उन महान राजाओं के इतिहास को मिटाने का भरपूर प्रयास किया गया जिन्होंने यहां के धर्म और संस्कृति की रक्षा की। फिर अंग्रेजों ने उनके इतिहास को विरोधामासी बनाकर उन्होंने बौद्ध सम्राटों को महान बनाया। सचमुच सम्राट मिहिरकुल सम्राट अशोक से भी महान थे।
संदर्भ : मत्स्य पुराण, वायु पुराण, उत्तर पुराण आदि।
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