Save Journalism
a organization who are standing
20/06/2026
वरिष्ठ पत्रकार Dibang ने भी अपना यूट्यूब चैनल शुरू कर दिया है।
टीवी की शोर-शराबे वाली बहसों से अलग, उनकी पहचान तथ्यों, तर्क और गहन विश्लेषण के लिए रही है। Dibang उन चुनिंदा पत्रकारों में हैं जो किसी मुद्दे को सिर्फ़ सुर्खियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भों के साथ समझाने की कोशिश करते हैं।
ऐसे समय में जब सूचना की भीड़ में तथ्य अक्सर खो जाते हैं, अनुभवी और तार्किक पत्रकारों का डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आना लोकतंत्र और जनचर्चा दोनों के लिए सकारात्मक संकेत है।
यदि आप शोर नहीं, तर्क सुनना चाहते हैं, तो उनका नया यूट्यूब चैनल देख सकते हैं। लिंक कमेंट बॉक्स में देख सकते है।
पत्रकारिता को बचाइए, असहमति को अपराध मत बनाइए
“न्यूज़क्लिक” मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला केवल एक मीडिया संस्थान या उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को राहत देने वाला निर्णय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता और कानून के दुरुपयोग पर एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी भी है।
अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस मामले को आगे बढ़ाना “कानूनी प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग (Gross Abuse of the Process of Law)” था। FIR में लगाए गए आरोपों से न तो धोखाधड़ी सिद्ध होती थी और न ही आपराधिक न्यासभंग। विदेशी निवेश, शेयर मूल्यांकन और निवेश समझौते अपने-आप में किसी आपराधिक साजिश का प्रमाण नहीं माने जा सकते।
लेकिन सवाल केवल कानूनी नहीं है।
सवाल यह है कि वर्षों तक चली जांच, छापे, आरोपों की सुर्खियां, मीडिया ट्रायल और सार्वजनिक बदनामी की कीमत कौन चुकाएगा?
जब किसी मीडिया संस्थान को कटघरे में खड़ा किया जाता है, तब केवल मालिक या संपादक ही प्रभावित नहीं होते। उसके साथ काम करने वाले पत्रकारों, कैमरापर्सनों, संपादकीय कर्मियों और उनके परिवारों की आजीविका भी दांव पर लग जाती है।
लोकतंत्र में सरकार से असहमति रखना अपराध नहीं है। पत्रकारिता का काम सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि सवाल पूछना है। यदि असहमति को अपराध और आलोचना को साजिश के रूप में देखा जाएगा, तो सबसे बड़ा नुकसान लोकतंत्र को होगा।
दिल्ली हाई कोर्ट का यह फैसला याद दिलाता है कि जांच एजेंसियों की शक्तियां असीमित नहीं हैं और कानून का इस्तेमाल किसी विचार, संस्था या असहमति को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।
इसे बचाना केवल पत्रकारों की नहीं, हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
23/05/2026
कॉकरोचों का पहला असर सुप्रीम कोर्ट पर…
याद है न, कुछ महीने पहले NCERT की 8वीं की किताब में “ज्यूडिशियल करप्शन” वाले अंश पर सुप्रीम कोर्ट कितना तम-तमाया था!
इतना कि किताब लिखने वाले तीनों एक्सपर्ट्स को लगभग “बिरादरी से बाहर” करने जैसा आदेश दे दिया गया था। कहा गया कि इन्होंने “जानबूझकर” न्यायपालिका को भ्रष्ट दिखाने की कोशिश की। लेकिन अब वही सुप्रीम कोर्ट अपने पुराने आदेश से पीछे हट गया है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की खंडपीठ ने पिछला आदेश रिकॉल कर लिया है। अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि केंद्र और राज्य सरकारों के शैक्षिक संस्थान खुद तय करेंगे कि वे इन विशेषज्ञों के साथ काम करना चाहते हैं या नहीं।
सबसे अहम बात, कोर्ट ने अपने पुराने आदेश में विशेषज्ञों की “मंशा” पर की गई टिप्पणियां भी हटा दी हैं।
मतलब साफ है… शायद यह एहसास हुआ कि असहमति या आलोचना को “षड्यंत्र” बताना न्यायिक गरिमा के अनुरूप नहीं था। उम्मीद है आने वाले दिनों में अदालत से सिर्फ “न्याय” ही नहीं, बल्कि “भाषाई संयम” भी देखने को मिलेगा।
19/05/2026
SAVE JOURNALISM
यूरोप दौरे के दौरान जब नीदरलैंड और नॉर्वे के पत्रकारों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भारत में प्रेस की आज़ादी, अल्पसंख्यकों की स्थिति और लोकतांत्रिक अधिकारों पर सीधे सवाल पूछे, तो प्रधानमंत्री ने इन सवालों पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया।
बाद में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय को सफाई जारी करनी पड़ी।
❓सवाल क्या था?
सवाल यह था कि आखिर भारत, जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है, वह Press Freedom Index में लगातार नीचे क्यों जा रहा है?
पत्रकारों और स्वतंत्र मीडिया पर दबाव क्यों बढ़ रहा है? और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता क्यों बढ़ रही है?
📌भारत सरकार का जवाब क्या था?
विदेश मंत्रालय ने भारत की लोकतांत्रिक परंपरा, विविधता और मजबूत संस्थाओं का हवाला दिया। कहा गया कि भारत में मीडिया स्वतंत्र है और लोकतंत्र मजबूत है।
⚠️लेकिन असली सवाल अब भी बाकी है…
अगर सब कुछ ठीक है, तो भारत Press Freedom Index में 157वें स्थान पर क्यों है?
आलोचनात्मक पत्रकारिता को “एंटी-नेशनल” बताने का माहौल क्यों बनता है?
और सत्ता से सवाल पूछना इतना असहज क्यों हो गया है?
✅होना क्या चाहिए था?
एक लोकतांत्रिक देश में सवालों से बचना नहीं, उनका जवाब देना चाहिए।
सरकार को आलोचना से डरने के बजाय उसे लोकतंत्र की ताकत मानना चाहिए। मजबूत लोकतंत्र वही होता है जहाँ पत्रकार बिना डर सवाल पूछ सकें और सत्ता जवाब देने को तैयार हो।
लोकतंत्र की असली परीक्षा तालियों से नहीं, सवालों से होती है।
मूक-बधिरों को न्याय से जोड़ने की दिशा में ऐतिहासिक पहल। ‘संकेत संवाद मध्यस्थता केन्द्र’ का *ई-लोकार्पण 16 मई सुबह 11 बजे* भारत के मुख्य न्यायाधिपति न्यायमूर्ति सूर्यकान्त द्वारा जबलपुर से वर्चुअली किया जाएगा। इंदौर के तुकोगंज, भोपाल महिला थाना, जबलपुर लॉर्डगंज, रीवा बिछिया थाना और सीधी कोतवाली सहित पांच केंद्र एक साथ शुरू होंगे। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल, इंदौर पुलिस कमिश्नर सहित पांच जिलों के पुलिस कप्तान कार्यक्रम में शामिल रहेंगे।
#संकेत_संवाद_मध्यस्थता_केंद्र
#मूकबधिर_न्याय_पहल
ोकार्पण_2026
#सुलभ_न्याय
नव नियुक्त NCLT अध्यक्ष अनुपिंदर सिंह ग्रेवाल का बड़ा बयान..
"सीनियर काउंसिल को मामलों की मेंशनिंग की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जूनियर वकीलों को आगे बढ़ने के अधिक अवसर मिलने चाहिए।"
ग्रेवाल ने न्यायिक व्यवस्था में युवा अधिवक्ताओं की भागीदारी बढ़ाने पर जोर देते हुए कहा कि जूनियर्स को प्रोत्साहित करना समय की जरूरत है।
क्या न्यायपालिका में यह बदलाव नई पीढ़ी के वकीलों के लिए बड़ा अवसर साबित होगा?
14/05/2026
बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल से ममता बनर्जी के वकील के रूप में नामांकन, बार रजिस्ट्रेशन और कानूनी प्रैक्टिस से जुड़े सभी रिकॉर्ड मांगे हैं।
कलकत्ता हाईकोर्ट में बैरिस्टर ड्रेस में उनकी मौजूदगी के बाद यह विवाद और गहरा गया है। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ममता बनर्जी सक्रिय रूप से विधिक प्रैक्टिस से जुड़ी रही हैं?
राजनीति और कानून के इस नए विवाद पर सबकी नजरें टिकी हैं।
14/05/2026
देवास पटाखा फैक्ट्री ब्लास्ट में एक दर्जन से अधिक बेगुनाहों की मौत के बाद अवैध फैक्ट्री संचालक अनिल मालवीय और सांसद महेंद्र सोलंकी की पुरानी तस्वीर वायरल। कई शिकायतों के बावजूद कार्रवाई नहीं होने पर प्रशासन और राजनीतिक संरक्षण पर गंभीर सवाल।
14/05/2026
BJP नेता दिनेश बिंवाल ने आज पत्रकारों से कहा, 'NEET पेपर लीक केस में बड़े लोगों को बचाया जा रहा है.'
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13/05/2026
NEET पेपर लीक मामले में बड़ा खुलासा : राजस्थान के सीकर से BJP से जुड़े कथित नेता दिनेश बिंवाल की गिरफ्तारी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ,आरोप है कि दिनेश बिंवाल ने करीब 30 लाख रुपए में पेपर खरीदा और फिर उसे कई ग्रुप्स में आगे फैलाया।
देश की सबसे महत्वपूर्ण परीक्षाओं में से एक NEET में इस तरह की धांधली लाखों मेहनती छात्रों के भविष्य पर सीधा हमला है।
अब सवाल सिर्फ गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क, राजनीतिक संरक्षण और शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता का है। छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों पर सख्त कार्रवाई जरूरी है।
तस्वीर - इंटरनेट से साभार
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