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24/10/2025

आज के समय में हर कोई अपने वाहन में एलईडी लाइट लगवा रहा है। रात के समय इन एलईडी लाइट के कारण सामने से आ रहे वाहन चालक को कुछ दिखाई नहीं देता। जिस कारण हर रोज एक्सीडेंट हो रहे हैं, और बहुत सारे लोग हर रोज अपनी जान गवा रहे हैं। सरकार को चाहिए इन एलईडी लाइट का प्रयोग तुरंत बंद कर दिया जाए। ताकि एलईडी लाइट के कारण किसी और की जान ना जाए।

09/10/2025

जंग के मैदान में
चाहे वह बैलेट का हो या बुलेट का
हर प्रकार से अपने आप को तैयार करना है।
"मान्यवर साहब कांशीराम जी"

03/10/2025

बात पुरानी है।

मुगल अभी भारत मे पैर न जमा पाये थे। बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई जीती। लेकिन 4 साल बाद ही चल बसा।
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गद्दी पर हुमायूं आया। तब राज्य दिल्ली और पंजाब के थोड़े बहुत इलाकों पर था, और उसको टक्कर दे रहा था फरीद खान..

उर्फ शेरशाह सूरी.. वही, जिसने देश मे रुपया चलाया। चांदी का रुपहला सिक्का। और बाद के दौर मे रुपयों पर तस्वीर चाहे जिसकी भी आई। पर पहला चेहरा उसपे शेरशाह सूरी का था।
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बहरहाल, हुमायूं और शेरशाह के बीच बक्सर से 10 किमी दूर गंगा के किनारे चौसा नाम की जगह पर 26 जून 1539 को एक लड़ाई हुई।

यहां हुमायूं की शिकस्त और शेरशाह की मुकम्मल जीत हुई। हुमायूं की हालत पतली थी। हार के बाद वे काबुल की दिशा में मुंह करके भागे। पीछा किया गया। बचने के लिए गंगा की उफनती धारा में कूद गये।

गंगा की लहरें उन्हें निगलने को तैयार थीं। डूबते, अचेत बादशाह को दो हाथों ने निकाला। किनारे लेटाया।
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वो एक भिश्ती था। मुगल सेना में पानी ढ़ोने का काम करता था। चमड़े की मश्क में पानी भरते हुए उसने बादशाह को डूबते देखा। गंंगा में कूदा- लहरों से जूझते हुए हुमायूं को किनारे खींचा।

हुमायूं ने आंखें खोलीं।

माजरा समझकर कृतज्ञता से बोले- तूने मेरी जान बचाई भिश्ती। जो चाहे मांग ले। भिश्ती ने सिर खुजाया और बोला-

- बस हुजूर, एक नई मशक दिलवा दें। हुमायूं हंस पड़े।
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साल 1555 में, हुमायूं ने शेरशाह के वारिसों को हराकर दिल्ली की गद्दी फिर से हासिल की। और भिश्ती को ढुंढवाया।

वह अब भी पुरानी दिल्ली की गलियों में मशक लटकाए "पानी-पानी" चिल्ला रहा था।

बादशाह ने उसे दरबार में बुलाया और ऐलान किया- भिश्ती, तूने चौसा में मेरी जान बचाई थी। आज मैं तुझे एक दिन के लिए भारत का बादशाह बनाता हूं।
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भिश्ती की आंखें फटी की फटी रह गईं।
वह बादशाह बन गया?

जिसने जिंदगी भर औरों के लिए मशक भरने से ज्यादा कुछ जाना नहीं। उसके सर पर शाही पगड़ी धरी गई। दीवान-ए-खास में गद्दी पर बिठाया गया।
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सोचा- बादशाह तो बन गया, कुछ यादगार करना चाहिए। किनारे उसकी मशक धरी देखकर आइडिया आया। फरमान सुनाया,

"आज से सोने-चांदी के सिक्के बंद!
अब चमड़े के सिक्के चलेंगे!"

मशक को कैंची से काट-काटकर गोल टुकड़े बनाए गए। उन पर भिश्ती की मुस्कुराती तस्वीर चिपकवाई गई- प्रथम भिश्ती कॉइन तैयार थे।
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अगले कुछ घंटों में दिल्ली के बाजारों में हंगामा मच गया। व्यापारी चमड़े के सिक्कों को देखकर सिर पीटने लगे।

हलवाई बोला- ये सिक्के तो मेरे लड्डू से भी सस्ते लगते हैं! कपड़ेवाला चिल्लाया- ये चमड़ा मेरे कुत्ते ने चबा लिया। एक अनाजवाला गुस्से में बोला- इसके बदले तो मैं भूसा भी न लूं।

लोग चमड़े के सिक्कों को फेंकने लगे। दुकानें बंद होने लगीं, व्यापार ठप हो गया। दिल्ली की गलियों में भिश्ती बादशाह का मजाक गूंजने लगा।
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हुमायूं ने भी सर पीट लिया। मूर्ख को गद्दी पर बिठाने का नतीजा देख रहे थे। जैसे तैसे दिन गुजरा। भिश्ती से गुस्से में बोले- अरे, ये क्या तमाशा कर दिया? मेरे साम्राज्य की इकॉनमी को तूने चमड़े की मशक में डुबा दी।

भिश्ती ने सिर खुजाया और बोला- हुजूर, मैंने सोचा, चमड़ा सस्ता है। सबके पास होगा, तो सब अमीर हो जाएंगे!

और मेरी तस्वीर वाले सिक्के कितने प्यारे लगते हैं, ना?
हॉउ क्यूट!!
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इतिहास अपने को दोहराता है।

आज फिर अंग्रेजों की मशक ढोने वालों को एक दिन का राज मिला है। बाजार मंदा है, लोग उदास। रुपये की कीमत गिरी जा रही है।

असली राजा, याने प्रजातंत्र में प्रजा सिर धुन रही है। आज फिर भिश्ती ने अपनी छाप के सिक्के चलाये हैं। लिखा है-

राष्ट्राय स्वाहा!!!

29/09/2025

2006 की इस तस्वीर ने उस वक्त काफी सुर्खियाँ बंटोरी थी। जिसमें एक ब्रिटिश महिला नाइजीरियाई में एक बच्चे को पानी पिला रही है। जोकि बहुत ही कमजोर और भूखमरी की हालत में था। “सड़क से सफर शुरू करने वाला वही नाइजीरियाई अनाथ बच्चा आज विश्वविद्यालय का ग्रेजुएट बन गया है।
इंसानियत की सबसे बड़ी जीत यही है! एक नाइजीरियाई अनाथ बच्चा जिसे कभी एक दयालु ब्रिटिश महिला ने सड़कों से बचाया था। आज उसने शानदार ढंग से विश्वविद्यालय से स्नातक (ग्रेजुएशन) पूरा कर लिया है। इस अद्भुत उपलब्धि पर उसे दिल से बधाई।❤❤

27/09/2025

"मिलिट्री की वर्दी पहने खड़ा वो आदमी कौन है? उसने अटल जी को सैल्यूट नहीं किया।" देव साहब ने धीरे से अपने एक दोस्त के कान में फुसफुसाया। ये किस्सा कुछ यूं है कि साल 1999 में जब पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति स्थापित करने का एक बड़ा प्रयास करते हुए दिल्ली से लाहौर बस सेवा शुरू की थी। तब उस बस में दिल्ली से पाकिस्तान जाने वाले भारतीय डेलिगेशन में देव साहब भी थे।

खुद वाजपेयी जी ने देव साहब को लाहौर साथ चलने का न्यौता दिया था। देव साहब वैसे भी एक तरह से लाहौरी ही थे। उनकी पढ़ाई-लिखाई लाहौर से हुई थी। लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से उन्होंने इंग्लिश लिटरेचर में ग्रेजुएशन किया था। दिल्ली से लाहौर जाने तक देव साहब ने बस में सभी को लाहौर के अपने दिनों के कई किस्से सुनाए। और सबका मनोरंजन किया।

बस जब अटारी-वाघा बॉर्डर पहुंची तो वहां तत्कालीन पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ वाजपेयी जी के गले मिले। उसके बाद उन्होंने देव साहब से साथ में एक फोटो खिंचवाने की गुजारिश की। जिसे देव साहब ने बहुत सम्मान के साथ स्वीकार किया। लाहौर में जब अटल जी का सम्मान किया जा रहा था। तब देव साहब ने कुछ नोटिस किया। उन्होंने अपने दोस्त से धीरे से पूछा, "मिलिट्री की वर्दी पहने वो आदमी कौन है? उसने अटल जी को सैल्यूट नहीं किया।"

कुछ दिनों बाद खुलासा हुआ था कि वो परवेज मुशर्रफ थे। जिन्होंने अटल जी को सैल्यूट करने से इन्कार कर दिया था। बाद में नवाज शरीफ का तख्तापलट करने के बाद 2001 में जब परवेज मुशर्रफ पाकिस्तानी शासक की हैसियत से भारत आए थे। तो हमारे तत्कालीन एयर चीफ मार्शल ए.वाय.टिपनिस ने भी मुशर्रफ को सैल्यूट करने से इन्कार कर दिया था।

खैर, उस लाहौर यात्रा के दौरान देव साहब को अपने कॉलेज जाने का मौका भी मिला था। जब देव साहब गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर पहुंचे तो पुरानी यादों की वजह से उनकी आंखें नम हो गई थी। कॉलेज में उनका भव्य स्वागत किया गया था। देव साहब ने वहां के छात्रों व अध्यापकों संग अपने किस्से साझा किए।

उस स्वागत से बेहद भावुक हुए देव साहब ने अपने दोस्त जोकि उनके साथ लाहौर गए थे। उनसे कहा, हम सब एक ही हैं। लेकिन पाकिस्तान की आर्मी पाकिस्तान के लोगों को हमारा दोस्त नहीं बनने देना चाहती। इन लोगों को अपने वर्दीधारियों से होशियार रहना चाहिए।" देव साहब का इशारा तब परवेज मुशर्रफ की तरफ ही था।

27/09/2025

आज देश भर में चर्चा का विषय बन चुके पर्यावरणविद और समाजसेवी सोनम वांगचुक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। ये वही सोनम वांगचुक हैं। जिनका सपना था लद्दाख को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाना। जिनकी शिक्षा की सोच ने हजारों बच्चों का भविष्य बदला।

जिनके "आइस स्तूप" जैसे अनोखे प्रयोगों ने पूरी दुनिया में भारत का नाम ऊँचा किया।
लेकिन आज उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
क्यों? क्योंकि लद्दाख में चल रहे राज्य का दर्जा और छठे शेड्यूल की मांग वाले आंदोलन को लेकर सरकार ने सीधे-सीधे वांगचुक को हिंसा भड़काने का दोषी ठहरा दिया।

असलियत यह है कि—
पिछले कुछ दिनों से लद्दाख में भारी विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे।
आंदोलन में हिंसा भी भड़की और चार लोगों की मौत हो गई।
इसी पृष्ठभूमि में वांगचुक को कल दोपहर 2:30 बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करनी थी। लेकिन उससे पहले ही उन्हें पुलिस ने हिरासत में ले लिया।

अब सवाल यह उठता है—
क्या यह गिरफ्तारी सचमुच कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए है या फिर यह आवाज दबाने की कोशिश है?

वांगचुक का कहना है कि उन्हें बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
उनकी संस्था का FCRA का लाइसेंस भी रद्द कर दिया गया है।
और पूरे लद्दाख में कर्फ्यू जैसे हालात बने हुए हैं।

आज हर एक भारतीय को यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या अपने हक की आवाज़ उठाना गुनाह है?
क्या एक शिक्षक, वैज्ञानिक और पर्यावरण योद्धा को दोषी ठहराकर समस्या का हल निकाला जा सकता है?
या फिर यह मामला सिर्फ और सिर्फ एक संवेदनशील राज्य की आवाज को कुचलने का प्रयास है?

सोनम वांगचुक केवल लद्दाख की आवाज नहीं हैं।
वे भारत की अंतरात्मा की आवाज है।
उनकी गिरफ्तारी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—
क्या हम उस देश में रह रहे हैं।
जहाँ सच बोलने की कीमत जेल है?

✍️
आप इस घटना को किस नज़रिए से देखते हैं?
क्या वांगचुक दोषी हैं या फिर उन्हें राजनीतिक दबाव का शिकार बनाया गया है?

21/09/2025

प्रिय सवर्णजनो (All Glitter is not Gold) करेंगे आपकी मैरिट से मुकाबला लेकिन स्टार्टिंग लाइन तो एक रखिए। आपने 5000 सालों से दलित पिछड़ों को पढ़ने नहीं दिया। उन पर जाति व्यवस्था आधारित शोषण किया। दलित को सिर्फ 78 साल से पढ़ने का अधिकार मिला है। आपकी शिक्षा हमारी शिक्षा से 5000 साल अधिक है। हम 5000 साल नहीं कहते।

आप सिर्फ 5 साल मत पढ़िए। आने वाले 5 सालों तक दलित पिछड़ों आदिवासियों को पढ़ने दीजिए। आप घर पर बैठिए। हो सके तो खेत में हल चलाएं। मेहनत करें। मजदूरी करें। गटर की सफाई करें। बंधुआ मजदूर बनें। अत्याचार सहिए।

5 साल बाद तय करेंगे कि मैरिट किसके पास है। बोलो है हिम्मत। आइए हिम्मत दिखाइए वर्ना अपने अंधाचार्यों को बोलो कि आरक्षण और संविधान के नाम पर हो हल्ला करने के बजाय अपने चरित्र निर्माण पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करें।
धन्यवाद।

21/09/2025

जय भीम नमो बुद्धाय

21/09/2025

ये बात 1987 के दौर के चाईना की है। एक 74 वर्षीय रिक्शा चालक बाई फांगली घर लौटते वक्त सोच रहे थे कि अब काम से रिटायरमेंट लिया जाए। लेकिन तब ही उन्होने खेत में मजदूरी करते हुए बच्चों को देखा। उन्होंने उन बच्चों से मजदूरी करने का कारण पूछा, तो उन्होंने बताया की वो अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए मजदूरी कर रहे हैं।

ये बात सुनकर बूढ़े फांगली ने अपने रिटायरमेंट का प्लान कैंसिल कर दिया। उन्होंने तय किया कि अभी उन्हे बहुत कुछ करना है।

वह वापस तियानजिन गए। एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया। सादा भोजन किया। पुराने कपड़े पहने और दिन-रात मेहनत की। उन्होंने जो भी पैसा कमाया। सब गरीब बच्चों की पढ़ाई के खर्चों में लगा दिया।

लगभग दो दशकों तक उन्होंने अपनी हर चीज दूसरों के लिए दे दी। 2001 में जब वे लगभग 90 वर्ष के हो गए तब उन्होंने अपनी आखिरी दान राशि दी और छात्रों से कहा कि अब उनका शरीर और सहन नहीं कर सकता। तब तक उन्होंने कुल 3,50000 युआन दान किए थे जिससे 300 से अधिक बच्चों को पढ़ने का अवसर मिला।

2005 में उनका निधन हो गया। अपने लिए कोई संपत्ति नहीं छोड़ी। लेकिन एक ऐसी विरासत छोड़ गए जो सोने से भी अधिक कीमती थी। अवसर, सम्मान और आशा।

अगर एक व्यक्ति जिसके पास सिर्फ एक रिक्शा था। 300 जिंदगियाँ बदल सकता है — तो सोचिए? हमारे पास जो साधन हैं। उनसे आप और मैं क्या कर सकते हैं।

20/09/2025

चीन ने मात्र 110 दिनों में
समुद्र के नीचे दुनिया का सबसे चौड़ा अंडरवाटर
रोड़वे तैयार कर सबको चौंका दिया। इसे आधुनिक इंजीनियरिंग और तेज निर्माण क्षमता का बेहतरीन उदाहरण माना जाता है।

20/09/2025

"मैं एवरेस्ट पर चढ़ने के लिए ट्रेनिंग कर रही हूँ" — ये सुनकर दोस्तों ने भी हँसी उड़ा दी। लेकिन हौसले ने साथ नहीं छोड़ा।

59 की उम्र में केरल की दर्जी वसंथि चेरुवीत्तिल ने बिना किसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग के Everest Base Camp (5,364 मी.) की चढ़ाई तय की!

उन्होंने YouTube से ट्रैकिंग, फिटनेस और हिंदी सीखी। हर सुबह 3 घंटे चलना, शाम को 5-6 किमी वॉक। चार महीने की सख्त तैयारी ने उन्हें उनका सपना पूरा करने में मदद की।
न कोई गाइड, बस एक पोर्टर।
बर्फ, चढ़ाई, तंग रास्ते, और हर कदम पर सांसें थमती हुई — फिर भी डटी रहीं।
अपने सिलाई के पैसों से उन्होंने अपने सफर को फंड किया, और जाने से पहले बेटों को अपने जेवर सौंप दिए।
23 फरवरी 2024 को उन्होंने कसावु साड़ी में तिरंगा थामकर एवरेस्ट बेस कैंप फतह किया — एक पल जो इतिहास में दर्ज हो गया।
और अब?
उनका अगला सपना है — चीन की दीवार पर चढ़ना है।
उम्र नहीं, इरादे मायने रखते हैं। वसंथि जी एक सभी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।

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