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14/05/2026

Paper Leak is a threat to internal social threat to future dreams of India.

14/05/2026

In a landmark May 2026 ruling (Padam Mehta v. State of Rajasthan), the Supreme Court of India declared that receiving primary education in one's mother tongue is a fundamental right under Article 19(1)(a) (freedom of speech and expression).Fundamental Right: The right to education in the mother tongue is an "intrinsic facet" of Article 19(1)(a) because it ensures comprehension, not just attendance.Constitutional Basis: The judgment aligns Article 19(1)(a), Article 21A (Right to Education), and Article 350A (facilities for mother-tongue instruction).Rajasthan Case: The Court directed the State of Rajasthan to introduce Rajasthani as a subject in all schools (private and government) and move toward using it as a medium of instruction, rejecting the notion that mother tongue is merely a "convenience".

13/05/2026

In recent judgement (May 2026)Supreme Court has ruled that caste-based abuses made inside a private residence, away from public view, do not constitute an offence under the Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act. The court emphasized that a "public view" is an essential requirement for invoking the Act

05/05/2026

हर हर महादेव ॐनमःशिवाय !!🔱🔱🔱 पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम। ।

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्। विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।।

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्। भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻ॐनमःशिवाय !!हर हर महादेव

15/04/2026

हमारे पीरटांड़ के उज्ज्वल पांडेय ने NDA में AIR 104 रैंक हासिल की, खुशी की लहर
गिरिडीह जिले के पीरटांड़ प्रखंड अंतर्गत बिशनपुर गांव निवासी उज्ज्वल पांडेय ने यूपीएससी NDA परीक्षा में पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया रैंक 104 हासिल की है।
उज्ज्वल पांडेय, उमेश कुमार पांडेय और सविता देवी के पुत्र हैं। वे दो भाई और दो बहनों में सबसे छोटे हैं।
उज्ज्वल ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गिरिडीह के ही एक विद्यालय से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने नियमित तैयारी करते हुए NDA परीक्षा में सफलता हासिल की।
इस उपलब्धि के साथ उज्ज्वल पांडेय का चयन भारतीय वायु सेना में फाइटर पायलट के रूप में हुआ है, जहां वे आगे चलकर फ्लाइंग ऑफिसर के पद पर अपनी सेवा देंगे। उज्जवल जी कि इस सफलता से उत्साहित छात्र-छात्राओं में भी राष्ट्र सेवा से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है।एजूडीप कंपीटीशन क्लासेस उज्जवल के उज्जवल भविष्य कि कामना करता है जय हिन्द🇮🇳🙏

14/04/2026

⚖️ इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने हाल ही में न्याय के सिद्धांत को मजबूती देते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें बलात्कार के आरोप में 11 साल जेल की सजा काट चुके एक व्यक्ति को ससम्मान बरी कर दिया गया। जस्टिस राजन रॉय और जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने इस मामले की गंभीरता से समीक्षा करते हुए पुलिस जांच की कार्यप्रणाली पर कड़े सवाल उठाए और इसे 'जांच की गंभीर चूक' करार दिया। अदालत ने पाया कि साल 2010 के इस संवेदनशील मामले में, जहाँ एक 14 साल की किशोरी के साथ दुष्कर्म का आरोप था, पुलिस वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाने में पूरी तरह विफल रही। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि मेडिकल जांच में पीड़िता के शरीर पर मानव वीर्य की पुष्टि होने के बावजूद जांच एजेंसी ने आरोपी के साथ उसका DNA मिलान करवाने की कोई कोशिश नहीं की, जो कि आरोपी के अपराध को साबित करने का सबसे पुख्ता वैज्ञानिक आधार हो सकता था।

निर्मल कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026 LiveLaw (AB) 187) के इस मामले में खंडपीठ ने निचली अदालत के 2018 के उस फैसले को पूरी तरह रद्द कर दिया, जिसमें आरोपी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में किसी व्यक्ति को केवल संदेह या अनुमान के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी खारिज कर दिया जिसमें ग्रामीणों और रिश्तेदारों को दिए गए पीड़िता के बयानों को 'डाइंग डिक्लेरेशन' के तौर पर स्वीकार करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब यह साबित नहीं हो सका कि पीड़िता की मृत्यु बलात्कार का परिणाम थी, तो ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट या पुलिस की गैर-मौजूदगी में दिए गए मौखिक बयानों को सजा का एकमात्र आधार बनाना न्याय की दृष्टि से "अत्यंत खतरनाक" होगा। इस फैसले के बाद कोर्ट ने अपीलकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है, जो एक दशक से भी ज्यादा समय जेल की सलाखों के पीछे काट चुका है।
Source: Livelaw , Google
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14/04/2026

The Supreme Court of India has reaffirmed that menstruation is a natural biological process and cannot be used as a basis to treat women as “untouchable.” This observation comes amid ongoing debates over practices that restrict women’s access to certain spaces or impose social exclusion during their periods.
The Court highlighted that such customs stem from outdated societal beliefs and are incompatible with a constitutional framework that upholds equality, dignity, and individual rights. It stressed that no biological condition can justify discrimination or denial of fundamental freedoms.
This remark is being viewed as a progressive step toward dismantling deep-rooted menstrual taboos. In many parts of society where restrictions still persist, the Court’s stance reinforces the need for awareness, inclusivity, and respect for women’s rights. It also strengthens the broader movement toward gender equality and menstrual health dignity in India.

13/04/2026

क्रॉस एग्जामिनेशन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय
➡️Tahsildar Singh vs State of UP (AIR 1959 SC 1012): इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि Evidence Act (भारतीय साक्ष्य अधिनियम) की धारा 145 (अब BSA की धारा 181) के तहत गवाह को उसके पहले के बयानों (जैसे पुलिस बयान) से कैसे टकराया (confront) जाए। यह स्थापित किया गया कि पुलिस बयानों (CrPC 162/BNSS 181) का उपयोग केवल विरोधाभास स्थापित करने के लिए किया जा सकता है, न कि साक्ष्य को पुष्ट करने के लिए।
➡️सुख सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुख्य परीक्षा (Examination-in-chief) के बिना गवाह की प्रति-परीक्षा (Cross-examination) नहीं की जा सकती।
गोपाल शरण बनाम सत्यनारायण: यदि कोई गवाह जिरह में भाग लेने से मना करता है, तो उसकी मुख्य गवाही का कोई कानूनी मूल्य नहीं रह जाता।

➡️स्टेट ऑफ केरल बनाम रघू: यह निर्णय जोर देता है कि जिरह में गवाह के बयानों में मौजूद विरोधाभासों का प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए।

➡️Sat Paul v. Delhi Administration (1976): इस मामले में Evidence Act की धारा 154 (होस्टाइल गवाह) की बारीकियों को परिभाषित किया गया। अदालत ने कहा कि किसी गवाह को प्रतिपरीक्षा की अनुमति केवल 'होस्टाइल' या 'प्रतिकूल' होने के आधार पर नहीं, बल्कि गवाह के बयानों में विसंगति या न्यायालय के विवेक पर दी जाती है।

➡️Profulla Kumar Sarkar vs Emperor (1931): यह एक क्लासिक केस है जो दर्शाता है कि प्रतिपरीक्षा का उद्देश्य गवाह की विश्वसनीयता को कैसे परखना है।

➡️State of UP vs Ram Kumar, 2000 में यह स्थापित किया है कि घायल चश्मदीद गवाह के बयानों में मामूली विसंगतियां या प्रतिपरीक्षा के दौरान मामूली विरोधाभास गवाह को पूरी तरह से अविश्वसनीय नहीं बनाते हैं।

13/04/2026

Caught Red handed during Taking Bribe of 10k

12/04/2026

सुप्रसिद्ध गायिका आशा भोंसले जी का जाना एक युग की समाप्ति है। उनके गीतों ने पीढ़ियों के दिलों को छुआ है और संगीत को एक नई ऊंचाई दी है। ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करें और शोक संतप्त परिवार को इस कठिन समय में संबल दें।
विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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