Dhananjay LLB
कानून की जानकारी सुसंगत तरीके से प्रा?
12/03/2022
17/09/2020
😀😀😀
बहुत अच्छी कहानी है....
एक दादा जी के दो पोते थे। एक का नाम “प्राइवेट” और दूसरे का नाम “सरकारी” था।
एक दिन दादा जी के मोबाइल की ब्राइटनेस कम हो गई। दादा जी “सरकारी” के पास गए और बोले, "बेटा मोबाइल में देखो क्या समस्या है, कुछ दिखाई नहीं दे रहा।"
“सरकारी” बोला :- "दादा जी थोड़ा इंतजार कीजिए, मुझे पिता जी (सरकार) ने काफी काम दिए हैं, थोड़ा सा फुर्सत मिलते ही आपका काम करता हूं।"
दादा जी में इतना धैर्य कहां था कि इंतजार करते।
दादा जी पहुंचे “प्राइवेट” के पास, “प्राइवेट” बड़े फुर्सत में बैठा था। उसने दादा जी को पानी पिलाया, चाय मंगवाई और पूछा, दादा जी बताइए क्या सेवा करूं?
दादा जी उसके व्यवहार से बहुत खुश हुए और उसको अपनी समस्या बताई।
“प्राइवेट” बोला, दादा जी आप निश्चिंत हो के बैठिए, मैं अभी देखता हूं।
उसने मोबाइल की ब्राइटनेस बढ़ा दी और बोला –
“लीजिए दादा जी, मोबाइल का बल्ब फ्यूज हो गया था, मैंने नया लगा दिया है। बल्ब 500 रूपये का है।”
(हालांकि बल्ब फ्यूज नहीं था, तथापि दादा जी उसकी जी-हुजूरी से इतने गदगद थे, कि उन्हें “प्राइवेट” की इस चालबाजी और अपने ठगे जाने का ख्याल भी नहीं आया)
दादा जी ने खुशी-खुशी 500 रूपये उसको बल्ब के दे दिए।
कुछ देर बाद दादा जी से उनका बड़ा बेटा, जिसका नाम 'निजी_आयोग' था, मिलने आया।
दादा जी ने बातों-बातों में “सरकारी” के निकम्मेपन और “प्राइवेट” की कार्य कुशलता की तारीफ करते हुए आज की पूरी घटना बता दी।
'निजी_आयोग' भोले-भाले दादा जी के साथ हुए अन्याय को समझ गया।
'निजीआयोग' ने “प्राइवेट” से संपर्क किया तो उसने 100 रूपये चाचा (निजी आयोग) के हाथ में रख दिए और बोला-
“दादा जी और पिता जी के सामने मेरी थोड़ी जमकर तारीफ कर देना।”
अगले दिन 'निजी_आयोग' ने दादा जी और पिता जी को “प्राइवेट” के गुणों का बखान कर दिया।
पिताजी एकदम धृतराष्ट्र के माफिक जन्मांध थे, गुस्से में आकर बोले - "इस निकम्मे “सरकारी” को घर से बाहर निकालो, आज से पूरे घर की देखभाल “प्राइवेट” करेगा!"
“सरकारी” अवाक है, निःशब्द है, उसके मुंह से बोल नहीं फूट पा रहा है। वह अपनी सामर्थ्य और उपयोगिता दादा जी एवं पिता जी को समझाना चाहता है, परंतु सामने से बोलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। डर रहा है कि कहीं घर से निकालने के साथ ही उसे भी राष्ट्र विरोधी और राष्ट्र-द्रोही न घोषित कर दिया जाए
दरवाजे के पीछे से “प्राइवेट” मुस्कुरा रहा है।
#टीचर्स_डे पर बेस्ट पूरा ज़रूर देखना 😆
एनकाउंटर (मुठभेड़)
1- एनकाउंटर का अर्थ 2- एनकाउंटर के प्रकार
3- एनकाउंटर में निम्न तरीके अपनाए जाने चाहिए
4- एनकाउंटर और भारतीय विधि व्यवस्था
क- दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उपबन्ध
क- भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत प्रावधान
5- लोकतंत्र में एनकाउंटर की प्रासंगिकता
1-एनकाउंटर का अर्थ- एनकाउंटर का सामान्य अर्थ होता है, 'मुठभेड़' जो एक तरह का दो गुटों के बीच हिंसात्मक संघर्ष है।
पुलिस या किसी अन्य सशस्त्र बल द्वारा किसी अपराधी या आतंकवादी को मार गिराना पुलिस एनकाउंटर कहलाता है ।
2-पुलिस एनकाउंटर के प्रकार - आमतौर पर पुलिस एनकाउंटर दो प्रकार के होते हैं-
पहला- जिसमें कोई खतरनाक अपराधी पुलिस या सुरक्षाबलों की कस्टडी से भागने की कोशिश करता है,और पुलिस या सुरक्षाबलों को उसे रोकने या पकड़ने के लिए बन्दुख का प्रयोग करना पड़ता है ।
दुसरा- एनकाउंटर का दुसरा प्रकार वह होता है ।जब पुलिस किसी अपराधी को पकड़ने जाती है,और वह पुलिस से बचने के लिए भागता है। इसके अलावा पुलिस पर हमला करने पर भी पुलिस एनकाउंटर कर सकती हैं ।
3- एकाउंटर में निम्न तरीके अपनाए जाने चाहिए-
१- पुलिस को हथियारों के प्रयोग से बचना चाहिए,
२-पहले रुकने की चेतावनी दी जानी चाहिए,
३- चेतावनी पर नहीं रुकने पर हवाई फायर करना चाहिए,
४- इस पर भी अपराधी नहीं रुकता है तो पहले पैर में गोली
गोली मारनी चाहिए,
५- स्थिति नियंत्रण में न आने पर शरिर के अन्य हिस्सों में गोली
मारनी चाहिए ।
4- एनकाउंटर और भारतीय विधि व्यवस्था- भारतीय -संविधान में कहीं भी एनकाउंटर शब्द का जिक्र नहीं किया गया है। संविधान में जिवन का अधिकार अनुच्छेद 21केअन्तर्गत दिया गया है, जिसके अन्तर्गत किसी व्यक्ति के अधिकार को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया अनुसार ही वंचित किया जा सकता है,अन्यथा नहीं ।
अनुच्छेद 21-प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण- किसी व्यक्ति को ,उसके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जायेगा अन्यथा नहीं ।
मेंनका गांधी बनाम भारत संघ( ए०आई०1978 एस०सी० 597) के वाद में उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित किया गया है कि अनुच्छेद 21केवल कार्यपालिका कृत्यो के विरुद्ध बल्कि विधायिका के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है। विधान मण्डल द्वारा पारित किसी विधि के अधिन विहित प्रक्रिया जो किसी व्यक्ति उसके प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता से वंचित करती है, उचित ॠजु ,और युक्तियुक्त अर्थात् नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए ।
पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ
(ए०आई०आर०1997 एस०सी०) के वाद में पीटीशनर ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के अधिन लोकहित वाद फाइल करके न्यालयय से प्रार्थना किया कि इम्फाल पुलिस द्वारा नकली मुठभेड जिसमें दो व्यक्ति मारे गये थे की जांच के आदेश दें ,तथा दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध समुचित कार्यवाही का निर्देश दे तथा मृतक के परिजनों को प्रतिकर प्रदान करें। उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि पुलिस मुठभेड़ में किसी व्यक्ति को जान से मार डालना, अनुच्छेद 21में प्रदत्त जिवन के अधिकार का सरासर उल्लंघन है ।और इन मामलों में सम्प्रभु की उन्मुक्ति का सिद्धांत लागू नहीं होता है । और सरकार इसके लिए दायी है। न्यायालय ने प्रत्येक मृतक के परिजनों को एक-एक लाख रुपए नुकसानी प्रदान करने का आदेश दिया । और कहा कि ऐसे मामलों में 'इंटरनेशनल कान्वेंट इन सिविल एण्ड पोलिटिकल राईट 1966' के अनुच्छेद 9 ( 5) जो ऐसे व्यक्तियों को प्रतिकर प्रदान करता है, भारत में भी लागू किया जा सकता है।
पी०यु०सी०एल० बनाम के महाराष्ट्र राज्य ( 2014) के वाद में पुलिस मुठभेड़ में हुई मौतों एवं गम्भीर रूप से घायल होने की घटनाओं की जांच के लिए दिशानिर्देश जारी किए गए हैं। और सुप्रिम कोर्ट द्वारा कहा गया है कि,इन दिश निर्देशों का पालन सम्पुर्ण प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए मानक प्रक्रिया के तौर पर किया जायेगा।
तत्कालिन मुख्य न्यायाधीश आर०एम०लोढा और आर० एफ० नरिमन ने कहा कि पुलिस मुठभेड़ में किसी व्यक्ति के मारे जाने से कानुन के शासन और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता आहत होती है।
जारी किए गए दिशानिर्देश-
१-जब कभी पुलिस को आपराधिक गतिविधियों के बारे में
कोई खुफिया जानकारी या सुराग मिलता है तो इसे केश
डायरी के रुप में लिखित या इलैक्ट्रोनिक रुप में संक्षिप्त
तौर पर रखना चाहिए लेकिन उसमें संदिग्ध के
ब्यौरे अथवा उसकी सम्भावित गतिविधियों के ठिकानों का
जिक्र नहीं किया जाना चाहिए ।यदि इस प्रकार की
खुफिया जानकारी अथवा सुराग वरिष्ठ अधिकारी को
प्राप्त होती है तो उसे भी इसी प्रकार रखा जाना चाहिए कि
संदिग्ध की गतिविधियों के बारे में या उसके लोकेशन के
बारे में किसी को पता न चले ।
२- किसी खुफिया जानकारी या सुराग मिलने के बाद यदि मुठभेड़ होती है, और पुलिस बन्दुख का प्रयोग करती है ,तथा उसमें किसी की जान जाती है,तो एक प्राथमिकी दर्ज कराई जानी चाहिए । और इसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के तहत न्यायालय में अग्रसारित किया जाना चाहिए।
३ - मुठभेड़ की जांच स्वतंत्र एजेंसी द्वारा करायी जानी चाहिए।
४- पुलिस फायरिंग के कारण हाने वाली सभी मौतों के मामले
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 157 के तहत् मजिस्ट्रेट से
जांच कराती जानी चाहिए। उसके बाद रिपोर्ट उस न्यायिक
मजिस्ट्रेट को भेंजी जानी चाहिए, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता
की धारा 190 के तहत अधिकृत हो ।
५- मुठभेड़ की सुचना मानवाधिकार आयोग को तुरंत देनी
चाहिए।
६- घायल को तुरंत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जानी
चाहिए ।
७- अविलम्ब रुप से प्रथम सुचना रिपोर्ट , केश डायरी,
पंचनामा और स्केच आदि को शीघ्र सम्बन्धित न्यायालय में
भेजा जाना चाहिए ।
८- घटना की जांच पुरी होने के बाद रिपोर्ट धारा 173 के तहत
न्यायालय में भेजी जानी चाहिए ।
९- मौत की स्थिति में निकटस्थ परिजनों को यथाशीघ्र सुचित
किया जाना चाहिए ।
१०- पुलिस फायरिंग में मौतों की स्थिति में सभी मामलों ब्यौरा
पुलिस महानिदेशक द्वारा छमाही ब्यौरा मानवाधिकार
आयोग को भेजा जाना चाहिए।
११- जांच में मुठभेड़ अपराध की श्रेणी में आता है तो ऐसे पुलिस अधिकारी को तुरंत निलंबित कर दिया जाना चाहिए।
१२- मुठभेड़ में मारे गये व्यक्ति के आश्रितों को जहांं तक
मुआवजा देने की बात हो तो दण्ड प्रक्रिया संहिता की
धारा 357 पर अमल किया जाना चाहिए ।
१३- मुठभेड़ से सम्बन्धित अधिकारी को जांच के लिए आत्म
समर्पण कर देना चाहिए।
१४- घटना की जानकारी तुरंत परिजनों को दी जानी चाहिए ।
१५- घटना के तुरंत बाद सम्बन्धित अधिकारियों को न तो
कोई पुरस्कार और न ही पदोन्नति दिया जाना चाहिए जब
तक कि उनकी वीरता संदेह से परे साबित न हो जाय ।
१६- पीड़ित के परिजन सत्र न्यायालय में शिकायत कर सकते
हैं और ऐसे शिकायत का निपटारा सत्र न्यायालय द्वारा
गुण - दोष के आधार पर किया जायेगा।
और सुप्रिम कोर्ट द्वारा यह आदेश भी दिया गया कि मुठभेड़ में मारे गये ,और गम्भीर रूप में घायलों से जुड़े सभी मामलों में
संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत उपरोक्त मानको का सारतःरूप से पालन किया जाना चाहिए।
क- दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उपबन्ध-
धारा 46- गिरफ्तारी कैसे की जायेगी- (1) गिरफ्तारी करने में पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति जो गिरफ्तारी कर रहा है, गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति के शरीर को वस्तुतः छुएगा या
परिरूध्द करेगा, जब जब तक उसनेे वचन या कर्म द्वारा अपने को अभिरछा समर्पित न कर दिया हो। [परन्तु जहां किसी स्त्री को गिरफ्तार किया जाना है , वहां जब तक कि परिस्थितियों इसके विपरित उपदर्शित न हो, गिरफ्तारी की मौखिक सुचना पर अभिरक्षा में उसके समर्पण कर देने की उपधारणा की जायेगी और जब तक कि परिस्थितियों में अन्यथा अपेक्षित न हो,या जब तक पुलिस अधिकारी महिला ने हो, तब तक पुलिस अधिकारी महिला को गिरफ्तार करने के लिए उसके शरीर को नहीं छुएगा।]
(2) यदि ऐसा व्यक्ति अपने गिरफ्तार किए जाने के प्रयास का बलात प्रतिरोध करता है,या गिरफ्तारी से बचने का प्रयत्न करता है,तो ऐसे पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति गिरफ्तारी करने गिरफ्तारी करने के लिए आवश्यक सब संसाधनों को उपयोग में ला सकता है।
(3) इस धारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति का जिस पर मृत्यु या आजिवन कारावास से दण्डनिय अपराध का अभियोग नहीं है, मृत्यु कारित करने का अधिकार नहीं देती है।
(4)-असाधारण परिस्थितियों के सिवाय कोई स्त्री सुर्यास्त के पश्चात् और सुर्योदय से पहले गिरफ्तारी नहीं की जायेगी,और जहां ऐसी असाधारण परिस्थितियां विद्यमान है, वहां स्त्री। पुलिस अधिकारी लिखित में रिपोर्ट करके, ऐसे प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट की पुर्व अनुज्ञा अभिप्राप्त करेगी, जिसकी स्थानिय अधिकारिता के भीतर अपराध किया गया है ,या गिरफ्तारी की जानी है।
यहां पर धारा 46 की उपधारा ( 2) व( 3) महत्वपूर्ण है। उपधारा 2 के अनुसार गिरफ्तार किया जाने वाला व्यक्ति गिरफ्तारी का बलात अर्थात बलपूर्वक विरोध करता है तो गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी आवश्यकतानुसार बल और अन्य साधनों का प्रयोग कर सकता है। और उपधारा 3 के अनुसार गिरफ्तार किया जाने वाले व्यक्ति का जिस पर मृत्यु या आजिवन कारावास से दण्डनिय अपराध का अभियोग नहीं है, मृत्यु कारित करने का अधिकार नहीं देती है।
उपरोक्त दोनों धाराओं का विश्लेषण करने पर यह विवक्षित अर्थ निकलता है कि जिस व्यक्ति पर मृत्यु या आजिवन कारावास का अभियोग है,और वह गिरफ्तारी का बलात अर्थात बलपूर्वक विरोध करता है तो गिरफ्तारी करने वाला पुलिस अधिकारी आवश्यकतानुसार बल का प्रयोग कर सकता है। और स्थिति अनियंत्रित होने पर उसका एनकाउंटर कर सकता है ।
ख- भारतीय दण्ड 1860 संहिता के अंतर्गत प्रावधान-
भारतीय दण्ड संहिता1860 के अध्याय 4 जो साधारण अपवाद से सम्बन्धित है । जिसमें प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार धारा 96 से लेकर 106 दिया गया है । धारा 96 के अनुसार," कोई बात अपराध नहीं है, जो प्राइवेट प्रतिरक्षा के प्रयोग में की जाती है।" और धारा 100 व 103 में उन परिस्थितियों का वर्णन किया गया है, जिसमें कोई व्यक्ति प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार आक्रमणकारी व्यक्ति की मृत्यु कारित कर सकता है । यह अधिकार आम आदमी के साथ -साथ पुलिस को भी प्राप्त है। और कोई पुलिस अधिकारी धारा100 व 103 की परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को एनकाउंटर कर सकता है ।
धारा 100. शरिर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने पर कब होता है- शरिर की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार पुर्ववर्ती धारा में वर्णित निर्बधनों के अधीन रहते हुए, हमलावार की स्वेच्छा मृत्यु कारित करने या कोई अन्य अपहानि करने तक है, यदि वह अपराध, जिसके कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपशचात प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात-
पहला- ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मृत्य
होगा,
दुसरा- ऐसा हमला जिससे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर
उपहति होगा,
तीसरा- बलातसंग करने के आशय से किया गया हमला
चौथा- प्रकृति विरुद्ध काम तृष्णा की तृप्ति के आशय से किया
गया हमला ,
पांचवां-व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से किया गया
हमला ।
छठा- इस आशय से किया गया हमला कि किसी व्यक्ति का
ऐसी परिस्थितियों में सदोष परिरोध किया जाय, जिनसे
उसे युक्तियुक्त यह आशंका कारित हो कि वह अपने को
छुड़वाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त
नहीं कर सकेगा,
सातवां- तेजाब फेंकने का कार्य या प्रयास करना जिससे
युक्तियुक्त रूप से आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे
कृत्य का परिणाम घोर छति होगा ।
धारा 103.कब समप्ति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार मृत्यु कारित करने तक का होता है-सम्पति की प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार, धारा 99 में वर्णित निर्बधनों के अधीन दोषकर्ता की मृत्यु या अन्य अपहानि स्वेच्छया कारित करने तक का है, यदि वह अपराध जिसके किए। जाने के,या किए जाने के प्रयत्न के कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है, एतस्मिनपशचात प्रगणित भांतियों में से किसी भी भांति का है, अर्थात-
पहला- लूट
दुसरा-रात्रौ गृह -भेदन
तीसरा- अग्नि द्वारा रिष्टि ,जो किसी ऐसे निर्माण, तम्बु या
जलयान को की गई है, जो मानव आवास के रूप में
या सम्पति की अभिरक्षा के स्थान के रूप में उपयोग
में लाया जाता है।
चौथा- चोरी,रिष्टि या गृह अतिचार ,जो ऐसी परिस्थितियों में
किया गया है, जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह आशंका
कारित हो कि यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा के ऐसे अधिकार
का प्रयोग न किया गया तो परिणाम मृत्यु या घोर
उपहति होगा ।
5- लोकतंत्र में एनकाउंटर की प्रासंगिकता
आधुनिक काल में लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार जनता के प्रतिनिधि के रूप में शासन चलाती है। अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को परिभाषित करने हुए कहा है कि" लोकतंत्र जनता का शासन,जनता द्वारा, जनता के लिए है।" लोकतंत्र की मुख्य विशेषता शक्तियों का पृथक्करण है। जिसमें शासन की शक्तियां तीन भागों में विभाजित होती है-
पहला- विधायिका
दुसरा- कार्यपालिका
तीसरा- न्यायपालिका
शासन की तीनों शक्तियां अपने क्षेत्र में स्वतंत्र है। विधायिका का काम है विधि बनाना, कार्यपालिका का काम है विधायिका द्वारा बनाई गई विधि को लागू करना, और न्यायपालिका का काम है विधि के अनुसार न्याय करना । चुंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है , इसलिए भारतीय संविधान में शक्तिपृथक्करण के सिद्धांत को अपनाते हुए सरकार तीनों अंगों के क्षेत्रों और शाक्तियों का वर्णन किया गया है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि ये तीनों शक्तियां एक दुसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण न करें ।
मध्य काल में पुलिस स्टेट की व्यवस्था थी , जिसमें स्वतंत्र न्यायपालिका का आभाव था । उस समय शासन द्वारा अपने विरोधियों का सत्ता का लाभ उठाते हुए बहुत ही निर्मम तरीके से दमन किया जाता था। इस परिस्थिति से उबरने के लिए लोगों द्वारा काफी संघर्ष और बलिदान देना पड़ा,जिसके बाद लोकतंत्र की स्थापना की जा सकी है । पुलिस द्वारा बढ़ती हुई एनकाउंटर की समस्या उसी मध्य काल के पुलिस स्टेट की तरफ ले जायेंगी, जिसमें सत्यता बैठे हुए लोग किसी भी व्यक्ति को एनकाउंटर में मार सकते हैं, क्योंकि पुलिस पर उनका पुरा नियंत्रण रहता है। और यह स्थिति लोकतंत्र के लिए एक घातक समस्या है क्योंकि एनकाउंटर की बढ़ती हुई संख्या न्यायपालिका के क्षेत्र का अतिक्रमण है । बढ़ती हुई अपराध की समस्या का एकमात्र हल एनकाउंटर नहीं है,इस प्रवृत्ति का दुरूपयोग शासन द्वारा अपने विरोधियों को कुचलने में किया जा सकता है।
न्यायालय में देरी होने का विकल्प भी एनकाउंटर नहीं है, हमारी न्यायपालिका न्याय करने में सक्षम है। हमें न्यायपालिका की समस्याओं को ढुढकर उन्हें दुर करने की जरुरत है। न की पुलिस को न्यायपालिका की जगह खड़े करने की।
लोकतंत्र में एनकाउंटर को केवल एक बुराई के रूप स्वीकार करना चाहिए, हमें नैतिक रुप से इसका समर्थन नहीं करना चाहिए ।
गांव की पूरी की पूरी युवा आबादी, घोर लंपटई की गिरफ्त में है। पढ़ाई -लिखाई से नाता टूट चुका है।
देश-दुनिया की कुल समझ व्हाट्सएप से बनी है। दिन भर फेक न्यूज़ मे घूमते रहते हैं । वहां पाकिस्तान माफ़ी मांगता है और चीन थरथर कांपता है। दहेज में बाइक मिली है, भले ही तेल महंगा हैं, धान-गेंहू बेच, एक लीटर भरा ही लेते हैं और गांव में एक बार फटफटा लेते हैं।
अपने से ज्यादा दूसरे के कामों मे ज्यादा झाँक ताँक करते हैं । हमेशा इसी चक्कर मे रहते हैं कि कैसे दूसरों का नुक़सान कर दें या दूसरे को नीचा दिखा दें , इसी मे अपनी जीत समझते हैं ।
गंवई माफिया और छुटपुटिये नेता उनका इस्तेमाल करते हैं। उन्हें आखेट कर किसी न किसी जातीय - धार्मिक सेनाओं के पदाधिकारी बना कर, अपनी गिरफ्त में रखते हैं।
हमारे गांव से अक्सर कुछ युवाओं के फ्रेंड रिक्वेस्ट आते हैं। उनकी हिस्ट्री देखिए तो सिर पर रंगीन कपड़ा बांधे ,जयकारा लगाते, मूर्ति विसर्जन या किसी आयोजन में नशा करते फोटो मिलेगी। सुबह गुटका और शाम दारू से गुज़रती हैं ।
यह है नई पीढ़ी!
इसी पर है देश का भविष्य।
एक बीमार समाज।
ऐसी पीढ़ी अपने बच्चों को कहां ले जा रही?जमीन-जायदाद इतनी नहीं कि ठीक से घर चला सकें या बीमारी पर इलाज हो। तो इनके लिए बेहतर जीवन क्या है? ये किसी औघड़ सेना के सचिव हैं, तो किसी धार्मिक संगठनों में फंसा दिए गए हैं।
इनकी पीढियां अब उबरने वाली नहीं। दास बनने को अभिशप्त हैं ये। इन्हें हम जैसों की बातें सबसे ज्यादा बुरी लगती हैं। इनका कोई स्वप्न नहीं। घमण्ड इतना कि IAS , PCS उनकी जेब में होते हैं।
एक अपाहिज बाप के जवान बेटे को दिनभर चिलम और नशा करते देख कर टोका था, तो उसकी मां बोली-"हमार बेटा, जवन मन करी उ करी, केहू से मांग के न त पियत?"
अब ऐसे मर रहे समाज में जान फूंकना आसान काम नहीं है?
शिक्षा बिना बात का असर नहीं हो सकता।
अब सवाल उठता है कि जिस समाज को सचेतन ढंग से बर्बाद किया गया हो, शिक्षा से वंचित किया गया हो तो यह सचेतन गुलाम बनाने का कृत्य है। यह अमानवीय भी है,और शातिराना भी।
गुलाम बाहुल्य समाज, दुनियाभर में निम्न ही रहेगा,बेशक कुछ की कुंठाएं तृप्त हों।
फिलहाल ये उबरने से रहे।
Vinod Mall सर की पोस्ट Anjani Kumar Pandey भईया जी के माध्यम से साभार🙏🙏
#कानून_की_इस_धारा_के_तहत_मिल_सकती_है #सजा-ए-मौत.
हम अक्सर सुनते और पढ़ते हैं कि हत्या के मामले में अदालत ने आईपीसी यानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत मुजरिम को हत्या का दोषी पाया है. ऐसे में दोषी को सज़ा-ए-मौत या फिर उम्रकैद की सजा दी जाती है. लेकिन धारा 302 के बारे में अभी भी काफी लोग नहीं जानते. आइए संक्षेप में जानने की कोशिश करते हैं कि क्या है भारतीय दण्ड संहिता यानी इंडियन पैनल कोड और उसकी धारा 302.
क्या भारतीय दण्ड संहिता
भारतीय दण्ड संहिता यानी Indian Penal Code, IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा औ दण्ड का प्राविधान करती है. लेकिन यह जम्मू एवं कश्मीर और भारत की सेना पर लागू नहीं होती है. जम्मू एवं कश्मीर में इसके स्थान पर रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती है.
अंग्रेजों ने बनाई थी भारतीय दण्ड संहिता
भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन् 1862 में लागू हुई थी. इसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे. विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इसमें बड़ा बदलाव किया गया. पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही अपनाया. लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के अधीन आने वाले बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू कर दिया गया था.
भारतीय दंड संहिता की धारा 302
आईपीसी की धारा 302 कई मायनों में काफी महत्वपूर्ण है. कत्ल के आरोपियों पर धारा 302 लगाई जाती है. अगर किसी पर हत्या का दोष साबित हो जाता है, तो उसे उम्रकैद या फांसी की सजा और जुर्माना हो सकता है. कत्ल के मामलों में खासतौर पर कत्ल के इरादे और उसके मकसद पर ध्यान दिया जाता है. इस तरह के मामलों में पुलिस को सबूतों के साथ ये साबित करना होता है कि कत्ल आरोपी ने किया है. आरोपी के पास कत्ल का मकसद भी था और वह कत्ल करने का इरादा भी रखता था.
कई मामलों में नहीं लगती धारा 302
हत्या के कई मामले मामलों में इस धारा को इस्तेमाल नहीं किया जाता. यह ऐसे मामले होते हैं जिनमें किसी की मौत तो होती है पर उसमें किसी का इरादतन दोष नहीं होता. ऐसे केस में धारा 302 की बजाय धारा 304 का प्रावधान है. इस धारा के तहत आने वाले मानव वध में भी दंड का प्रावधान है.
आईपीसी की धारा 299 में है मानव वध की परिभाषा
भारतीय दंड संहिता की धारा 299 में अपराधिक मानव वध को परिभाषित किया गया है. अगर कोई भी आदमी किसी को मारने के इरादे से या किसी के शरीर पर ऐसी चोटें पहुंचाने के इरादे से हमला करता है जिससे उसकी मौत संभव हो, या जानबूझकर कोई ऐसा काम करे जिसकी वजह से किसी की मौत की संभावना हो, तो ऐसे मामलों में उस कार्य को करने वाला व्यक्ति आपराधिक तौर पर 'मानव वध’ का अपराध करता है.
धारा 299 में कुछ स्पष्टीकरण
1. कोई व्यक्ति किसी विकार रोग या अंग शैथिल्य से ग्रस्त दूसरे व्यक्ति को शारीरिक क्षति पहुंचाता है और इस से उस व्यक्ति की मौत हो जाती है, तो यह समझा जाएगा कि पहले व्यक्ति ने दूसरे की हत्या की है.
2. जिस मामले शारीरिक क्षति की वजह से किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है, और अगर मारे गए व्यक्ति को उचित चिकित्सा सहायता मिलने पर बचाया जा सकता था, तो भी यह माना जाएगा कि उस व्यक्ति की हत्या की गई है.
भारतीय दंड संहिता के तहत धारा 299 के अलावा धारा 300 में भी हत्या के मामलों को परिभाषित किया गया है. जिनका विवरण अदालती कार्रवाई के दौरान मिल जाता है. लेकिन हत्या के मामलों में धारा 302 को सबसे अधिक गंभीर और मजबूत मानी जाती है. जिसके तहत दोषी को दंडित किया जाता है.
आज PRIVATISATION को कुछ लोग यह कहकर सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं कि इससे Facility और Quality में बदलाव आएगा ,यानी कि "सरकारी" की तुलना में "प्राइवेट" काॅलेज, अस्पताल अच्छे और उच्च मानक वाले होंगे ।
तो इसका मतलब गरीब को अच्छी शिक्षा और अच्छा स्वास्थ्य से वंचित कर दिया जाएगा ,इससे समानता बढेगी या असमानता?
"समानता " और "जीवन की अधिकार "की गारंटी देने वाला संविधान वाला देश में " सबको एक समान शिक्षा " और "अच्छी चिकित्सा" का ना मिल पाना कितना औचित्यपूर्ण होगा???
क्या इसके जगह यह नहीं होना चाहिए था की "सरकारी संस्थाओं " के गुणवत्ता उच्च मानक का किया जाता ?
इतिहास साक्षी रहा है कि ,जब भी समाज में असमानता बढ़ी है अस्थिरता बढ़ी है ।
मेरा निजी मत यह है कि हर काल में समाज जाती-धर्म से परे "दो " वर्गों में विभाजित रहा है - अमीर और गरीब !
आज भी भारत के 64% संपत्ति देश के 1% लोगों के हाथों में है ।
सनद रहे "अमीर" तब तक सुरक्षित है जब तक "गरीब"को यकीन है कि एक दिन वो भी "अमीर" बनेगा ।
✒🤐
जाने क्यों वकील काले कोट और सफेद बैंड पहनते हैं?
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स्थानीय अदालतों में कई बदलाव होने के बावजूद आज भी एक आम आदमी को न्याय प्राप्त करने में कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है| विडंबना यह है कि अदालत की स्थापना जन सामान्य को न्याय दिलाने के उद्येश्य से ही की गयी थी|
वकील काले कोट क्यों पहनते हैं..
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मुझे यकीन है कि कई लोग इस बात से अनजान होंगे कि वकील काले कोट क्यों पहनते हैं और सफेद बैंड क्यों लगाते हैं|यहां तक कि कुछ वकीलों को भी इस बात की जानकारी नहीं होगी कि क्यों वे काले कोट और सफेद बैंड पहनते हैं| आइए हम आपको इसके पीछे का कारण बताते हैं|
इसके बारे में विभिन्न स्पष्टीकरण दिए गए हैं लेकिन इसके पीछे की कहानी बहुत समय पहले सन् 1327 से शुरू होती है जब एडवर्ड तृतीय ने रॉयल कोर्ट में भाग लेने के लिए ड्रेस कोड के आधार पर न्यायाधीशों के लिए वेशभूषा तैयार करवाई थी। लेकिन ब्रिटेन में 13 वीं सदी के अंत में इस पेशे की संरचना को सख्ती से जजों के बीच विभाजित किया गया था। सार्जेंट अपने सिर पर एक सफेद बाल वाले विग पहनते थे और सेंट पेल्सकैथेड्रल में प्रैक्टिस करते थे| वकीलों को चार भागों स्टूडेंट,प्लीडर, बेंचर एवं बैरिस्टर में विभाजित किया गया था जो जजों का स्वागत करते थे और वे मूलतः शाही घराने या अभिजात्य परिवार के निवासी होते थे| उस समय सुनहरे कपड़े पर लाल और भूरे रगों से तैयार गाउन फैशन बन गया था|
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1600 में इस पैटर्न में बदलाव आया और 1637 में प्रिवी काउंसिल ने फैसला सुनाया कि समाज के अनुसार वकीलों को कपड़े पहनने चाहिए| इस प्रकार वकीलों द्वारा पूरी लंबाई की गाउन पहनने की प्रवृत्ति की शुरूआत हुई| 1685 में परिधान के रूप में रोब्स को अपनाया गया था जो राजा चार्ल्स द्वितीय के निधन के कारण शोक का प्रतीक था| ऐसा माना जाता था कि गाउन और विग न्यायाधीशों और वकीलों को अन्य व्यक्तियों से अलग करती है|
इसके अलावा, 1694 में क्वीन मैरी द्वितीय की चेचक से मृत्यु होने पर उसके पति राजा विलियम तृतीय ने सभी न्यायाधीशों और वकीलों को सार्वजनिक शोक की निशानी के रूप में काले गाउन पहन कर अदालत में इकट्ठा होने का आदेश दिया।
लेकिन इस आदेश को कभी रद्द नहीं किया गया जिसके कारण आज भी यह प्रथा चल रही है| हालांकि, वकीलों को भी यह पहनावा पसंद आया और उन्होंने इसे वर्दी के रूप में अपनाया क्योंकि यह उन्हें अदालत में एक अलग पहचान देती है|
भारत में अधिवक्ता अधिनियम 1961 के तहत सभी अदालतों के सभी अधिवक्ताओं के लिए सफेद बैंड के साथ काले कोट पहनना अनिवार्य कर दिया गया जो उन्हें एक शांत और सम्मानजनक स्वरुप प्रदान करता है| यह वकीलों में अनुशासन लाता है और न्याय के लिए लड़ने के प्रति विश्वास का निर्माण करता है| यह ड्रेस कोड वकीलों को अन्य पेशेवरों से अलग करने में भी उपयोगी है।
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वकीलों और न्यायाधीशों द्वारा काले कोट और सफेद बैंड पहनने का दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि काले रंग एक ऐसा रंग है जिस पर कोई अन्य रंग चित्रित नहीं किया जा सकता है| इसका मतलब यह है कि न्यायाधीश द्वारा दिया गया निर्णय अंतिम है और उसे बदला नहीं जा सकता है। वकीलों के लिए इसका मतलब यह है कि वे अपनी राय, विचार और कानूनी प्रक्रियाओं की व्याख्या करते समय अपने विवेक से समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं।
#वकील_सफेद_बैंड_क्यों_लगाते_हैं|
वकीलों द्वारा पहने जाने वाले सफेद कॉलर बैंड के पीछे भी कुछ इतिहास है। 1640 में, कुछ वकील शर्ट के कॉलर को छिपाने के लिए लिनन के सादे बैंड का प्रयोग करते थे। ये बैंड मूल रूप से चौड़े होते थे और लेस के साथ बांधे जाते थे। 1860 तक, ये बैंड दो आयतों के रूप में परिवर्तित हो गए थे जो आधुनिक बैरिस्टर के कॉलर बैंड के समान थे| इसके अलावा एक अन्य सिद्धांत के अनुसार यह माना जाता था कि ये दो आयतकार बैंड मोजेज की टेबलेट (tablet of Mosses) का प्रतिनिधित्व करती है जिसे अब वर्तमान समय में डॉक्टरों, पादरियों और शायद इसीलिए विद्वत्ता के सूचक के रूप में जाना जाता है| दूसरी ओर सफेद पवित्रता (शांति) और पारदर्शिता का सूचक है जिसका मतलब है कि न्यायाधीश का निर्णय अंतिम और हर पहलू में शुद्ध है|
(क्रेडिट गोज टू कानून से जानकारी फेसबुक पेज)
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