Nitish kumar
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राजनीतिक विज्ञान से स्नातक,विज्ञान का पूर्वती छात्र, इतिहास व पुरातत्व में रुचि,प्रकृति प्रेमी,गाँव में रहना प्रसंद,शहर में रहना मजबूरी,विभिन्न मुद्दे पर लिखना पसंद,डिबेट करना और भाषण देने का शौक
न जाने कहां गए वो दिन.....बचपन का दशहरा
मैंने इस लेख को 2 साल पहले लिखा था। आज भी आप इस लेख को पढ़कर अपने बचपन के दशहरा को याद कर सकते है।
यदि हम अभी और आज से 10-15 साल पहले के दशहरा में तुलना करें तो काफी अंतर पाते हैं। उत्साह तब जो था अब नहीं है,आधुनिकता की इस दौड़ में कुछ तो पीछे छूट रहा है।
मुझे याद है, बचपन के दिनों में हम एक दो महीना पहले से ही दशहरा की तैयारी करना शुरू कर देते थे। माँ से पूछा करते थे कितना दिन बचा हैं? जब तक दशहरा आ नहीं जाता था तब तक दिन गिनते रहते थे। हम सब एक-एक दिन गिन कर दशहरे का इंतजार करते। स्कूल भी 3-4 पूजा तक बंद हो जाता था। सबसे ज्यादा उत्सुकता नए कपड़ों को लेकर और मेला में खिलौना खरीदने को लेकर रहती थी। पहले से खिलौनों का लिस्ट बनाकर रख लेते थे। यदि पहले से बाजार जाते थे तो देखकर रखते थे कौन लेना हैं? दाम भी पूछ लिया करते थे? मम्मी को बोलकर रखते थे मुझे रिमोट वाला कार लेना है। बंदूक लेना है। हेलीकॉप्टर लेना है।
हमारे बिहार में दशहरा में नए कपड़े पहनने का एक चलन हैं। कपड़े की खरीदारी करने की हमारी इतनी उत्सुकता होती थी, कि पूछिए मत, दशहरा से 10 दिनों पहले से ही मम्मी के नाक में दम कर दिया करते थे। कब बाजार जाना है, कब बाजार जाना है, कि रट लगाकर,माँ के नाक में दम कर दिया करते थे। माँ पापा को बोला करती थी। फुलकाहा में कपड़ा नहीं लेते थे क्योंकि उस समय अच्छा कपड़ा नहीं मिलता था और दशहरा में अच्छा कपड़ा तो लेना ही था। फिर एक दिन कपड़ा खरीदने जाने का प्रोग्राम बनता था,और सभी लोग के लिए एक साथ बाजार(फारबिसगंज) जा कर कपड़ों की खरीदारी किया जाता था। खासकर कपड़ा दशमी के रोज ही आता था। दशमी के रोज 2 बजे तक कपड़ा आता था उससे पहले यदि मेला जाना भी होता था तो पुराने कपड़े में। दशमी के रोज कपड़ा आने के बाद फिर सब आदमी तैयार होते थे।
दशहरा के दशमी के रोज सुबह से ही चहल-पहल
बैल को घर मे ही रख दिया जाता था ताकि बैलगाड़ी से मेला जाने के लिए। उस समय बैलगाड़ी का चलन था। । घर के सभी लोग बैलगाड़ी से ही मेला जाते थे। वैसे भी हमारे गाँव में पक्की सड़क नहीं था,किसी किसी बार कीचड़ व बाढ़ का पानी भी रहता था जिनके कारण बैलगाड़ी से ही ज्यादातर लोग जाया करते थे।
मेला जाने से पहले दादा से रुपया लेते ,फिर दादी से।कुछ भी मिल जाये। अंत मे माँ से रुपया लेकर ही मेला जाने के लिए तैयार होते थे। मेला पहुँचने के बाद बैलगाड़ी को मेला से काफी दूर ही लगा दिया जाता था। क्योंकि काफी भीड़ होता था। कई बैलगाड़ी रास्ते मे लगा रहता था। मंदिर में पहले पूजा करते थे उनके बाद खिलौना खरीदने का बारी आता था। जब लिस्ट के अनुसार खिलौना नहीं खरीद दिया जाता था तो खूब रोते थे। रोते रोते घर आते थे। मिल जाता था तब खुशी खुशी आते और सो जाते थे फिर सुबह सब अपना-अपना खिलौना निकाल के सबको दिखाते थे आंगन में।
अब बच्चे खिलौना नहीं लेते हैं और बिकता भी नहीं हैं खिलौना...आज के बच्चे भी मोबाइल से ही जुड़े हैं,उस समय सिंपल फ़ोन में गाँव में नहीं होता था। अभी दशहरा को आने को महीना दिन भी नहीं बचा है लेकिन पहले जैसा उत्साह नहीं है। पहली पूजा से लेकर दशमी तक हरेक घर में जाकर ढोल बजाया जाता,ढोल की आवाज दशहरा का एहसास दिलाता था।
अब वैसा माहौल ही नहीं हैं।
लगता एकयुग का अंत ही हो गया।
12/10/2023
Nitish Kumar के फेसबुक वॉल से
हमलोगों के कई वर्षों के संघषों व अथक प्रयासों का परिणाम है अमरौरी में पक्की सड़क.......
आखिरकार हमलोगों के प्रयासों का अब अंतिम रूप से फल मिला है। आजादी के इतने वर्ष बाद भी अमरौरी में पक्की सड़क नहीं थी। पहली बार अमरौरी में पक्की सड़क का निर्माण हुआ है। इस खुशी को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।
बदलेंगे युवा,करेंगे प्रयास,बदलेगी गाँव की सूरत
याद रखना बेहतरीन दिनों के लिए,
बुरे दिनों से संघर्ष करना पड़ता है।
30/05/2023
रानीगंज वृक्षवाटिका,अररिया
30/05/2023
Good news
जोगबनी से दानापुर पटना के लिए ट्रेन चलने में इतना विलम्ब क्यों??
28/05/2023
09/05/2023
छात्रों के मुद्दे से विभाग को अवगत करवाने के लिए धन्यवाद नेताजी।
खान सर पहले से एसएससी,रेलवे,दरोगा,बिहार एसएससी की तैयारी करवाते है और अब यूपीएससी, बीपीएससी का बैच ला रहे है। उन्होंने कपिल शर्मा के शो में बर्तन मांजने वाली और बालू ढोने वाला के बारे में बताया जोकि उनके एसएससी,रेलवे के बैच में पढ़ रहे थे नाकि यूपीएससी या बीपीएससी ..अभी तक सही से यूपीएससी और बीपीएससी का बैच शुरू भी नहीं हुआ है।
खान सर वीडियो में कही भी नहीं बोले है कि यूपीएससी या बीपीएससी का वो छात्र/छात्रा था या थी। अब यूपीएससी और बीपीएससी का शुरू ही कर रहे है तो उन छात्रों को कोई यूपीएससी या बीपीएससी से जोड़कर कैसे बोल सकता है...मैंने कई छात्रों को जॉब करके पढ़ते देखा है। कई छात्र तो कई कोचिंग में गार्ड का काम करते है और उसी कोचिंग में पढ़ा करते है। मैं खुद जिस कोचिंग में पढ़ता था उसी कोचिंग में एक लड़का गार्ड का काम करता था और फिर एक बैच में बैठकर पढ़ भी लेता था। इसमें कोई दो राय नहीं है कि खान सर बहुत कम फी लेते है। उनका एक सब्जेक्ट का फी 150-200 होता है। खान सर के चलते अन्य कोचिंग वाले को भी फी कम करना पड़ता है। अब कम फी पर यूपीएससी का बैच ला चुके है जिनमे दृष्टि जैसे संस्थान में पढ़ाने वाले शिक्षक मणिकांत सर,राजेश मिश्रा सर पढ़ाएंगे।
खान सर का आप विरोधी हो सकते है,उनकी बातों से आप असहमत हो सकते है लेकिन खान सर ने जो शिक्षा जगत में क्रांति ला दिया है उनको नजरअंदाज नहीं कर सकते है। पहले 15-20 हजार रुपया एसएससी ,रेलवे की तैयारी का लिया जाता था अब 3k तक में ही हो जाता है। दृष्टि जैसे संस्थान के शिक्षक से यदि अब कोई 7500 में पढ़ लेगा इनमें क्या दिक्कत है?
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