The Message
तुममें कुछ लोग तो ऐसे ज़रूर ही रहने चाहिएँ जो नेकी की तरफ़ बुलाएँ भलाई का हुक्म दें और बुराइयों से रोकते रहें।[3:104]
अमन का पैगाम इन्सानियत के नाम
‘‘हे नबी![सल्ल०] कहो, हे किताब वालो, आओ एक ऐसी बात की ओर जो हमारे और तुम्हारे बीच समान है। यह कि हम अल्लाह के सिवाए किसी की बन्दगी न करें, उसके साथ किसी को शरीक... न ठहराएं, और हममें से कोई अल्लाह के सिवाए किसी को अपना रब (उपास्य) न बना ले। इस दावत को स्वीकार करने से यदि वे मुँह मोड़ें तो साफ़ कह दो, कि गवाह रहो, हम तो मुस्लिम (केवल अल्लाह की बन्दगी करने वाले) हैं।’’ कुरान आले इमरान 3:64
23/06/2026
इस हदीस का मतलब: यह हदीस बताती है कि रसूलुल्लाह ﷺ को अल्लाह तआला ने हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत की ख़बर पहले ही दे दी थी। जब हज़रत जिब्रील (अलैहिस्सलाम) ने कर्बला की मिट्टी दिखाकर बताया कि हुसैन (रज़ि.) इसी सरज़मीन में शहीद किए जाएंगे, तो रसूलुल्लाह ﷺ अपने प्यारे नवासे की आने वाली मुसीबत और शहादत को याद करके ग़मगीन हो गए।
यह हदीस हमें सिखाती है कि: • हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) का मक़ाम बहुत बुलंद था। • रसूलुल्लाह ﷺ को अपने अहले बैत से गहरी मोहब्बत थी। • कर्बला का वाक़िआ इस्लामी तारीख़ का एक बड़ा और दर्दनाक हादसा है। • मुसलमानों को अहले बैत से मोहब्बत और उनका एहतराम करना चाहिए।
मुख्तसर नोट: "जब रसूलुल्लाह ﷺ को हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत की ख़बर दी गई, तो आप ﷺ ग़मगीन हो गए। यह नबी ﷺ की अपने नवासे से गहरी मोहब्बत और हज़रत हुसैन (रज़ि.) के महान मक़ाम को बयान करता है।" [📖 मुस्नद अहमद: 26684]
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23/06/2026
हदीस का मतलब: इस हदीस से पता चलता है कि रसूलुल्लाह ﷺ को अपने नवासे हज़रत हसन (रज़ि.) से बहुत मुहब्बत थी। आपने सिर्फ़ उनसे मुहब्बत ही नहीं की, बल्कि अल्लाह से उनके लिए मुहब्बत की दुआ भी की।
पैग़ाम: अहले बैत (रसूलुल्लाह ﷺ के परिवार) से मुहब्बत करना ईमान का हिस्सा है। बच्चों से प्यार करना और उन पर रहम करना सुन्नत है। जिन लोगों से अल्लाह के रसूल ﷺ मुहब्बत करते थे, उनसे मुहब्बत करना भी नेक अमल है।
यह हदीस बताती है कि हज़रत हसन (रज़ि.) अल्लाह और उसके रसूल ﷺ के बेहद प्यारे थे।
जो व्यक्ति हज़रत हसन (रज़ि.) से सच्ची मुहब्बत रखता है, उसके लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने अल्लाह से मुहब्बत की दुआ फ़रमाई है। [📖 सहीह अल-बुख़ारी: 3749]
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23/06/2026
कर्बला का पैग़ाम:रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि सबसे अफ़ज़ल सदक़ा लोगों को पानी पिलाना है। पानी इंसान की सबसे बुनियादी ज़रूरत है, इसलिए किसी प्यासे को पानी देना बहुत बड़ा नेक काम है।
लेकिन कर्बला के मैदान में एक ऐसा दर्दनाक वाक़िआ पेश आया जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया। रसूलुल्लाह ﷺ के नवासे हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु), उनके अहल-ए-बैत और उनके साथ मौजूद मासूम बच्चे प्यास से तड़प रहे थे। फ़ुरात का दरिया क़रीब होने के बावजूद उन्हें पानी तक पहुँचने से रोक दिया गया।
कर्बला सिर्फ़ एक जंग का नाम नहीं, बल्कि हक़, सब्र, क़ुर्बानी और इंसाफ़ के लिए डट जाने की मिसाल है। हज़रत हुसैन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने ज़ुल्म के सामने झुकने के बजाय सच्चाई का साथ चुना और अपनी जान तक क़ुर्बान कर दी, लेकिन हक़ का रास्ता नहीं छोड़ा।
कर्बला हमें सिखाती है कि ताक़त हमेशा जीत की निशानी नहीं होती, बल्कि असली कामयाबी हक़ पर क़ायम रहने में है, चाहे उसके लिए कितनी ही बड़ी क़ुर्बानी क्यों न देनी पड़े।
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23/06/2026
मतलब: इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने नवासों हज़रत हसन (रज़ि.) और हज़रत हुसैन (रज़ि.) से अपनी गहरी मुहब्बत और मोहब्बत भरे रिश्ते को बयान फ़रमाया है। जिस तरह इंसान ख़ुशबूदार फूलों को अपने दिल के क़रीब रखता है, उसी तरह हसन और हुसैन (रज़ि.) रसूलुल्लाह ﷺ के लिए बेहद अज़ीज़ और प्यारे थे। यह हदीस अहले-बैत से मुहब्बत करने और उनका सम्मान करने की अहमियत भी बताती है।
23/06/2026
दुनिया ने हमें सिखाया कि अपनी हर तकलीफ़ लोगों के सामने बयान करो, लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि अपनी हर तकलीफ़ अल्लाह के सामने पेश करो।
आज के दौर में लाखों लोग अपनी परेशानियाँ, डर और मुश्किलें सोशल मीडिया पर साझा करते हैं ताकि लोगों से तसल्ली और सहारा मिल सके। लेकिन एक मोमिन यह जानता है कि जिसने हर मुश्किल को पैदा किया है, वही उसे दूर करने की पूरी कुदरत भी रखता है।
अल्लाह तआला फ़रमाता है: “और जब मेरे बन्दे मेरे बारे में आपसे पूछें, तो (उन्हें बता दीजिए कि) मैं बहुत क़रीब हूँ। जब कोई दुआ करने वाला मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी दुआ क़बूल करता हूँ।” [📖 (सूरह अल-बक़रह 2:186)]
सोशल मीडिया शायद कुछ समय के लिए लोगों की तवज्जोह दिला दे, लेकिन सच्ची दुआ अल्लाह की मदद, रहमत और दिल का सुकून लेकर आती है। सबसे बेहतरीन बातें वह नहीं हैं जो हम दुनिया से करते हैं, बल्कि वे हैं जो हम अपने रब से रात की तन्हाइयों में करते हैं।
अपनी परेशानियाँ पोस्ट करने से पहले अपने हाथ दुआ के लिए उठाइए।
लोगों से तस्दीक़ (Validation) और मंज़ूरी तलाश करने से पहले अल्लाह से हिदायत माँगिए।
अपना दर्द दुनिया को सुनाने से पहले उसे उस ज़ात से कहिए जो आपके हर आँसू, हर डर और हर छुपे हुए ग़म को पहले से जानती है।
एक मोमिन की ताक़त इस बात में नहीं कि कितने लोग उसकी कहानी जानते हैं, बल्कि इस बात में है कि वह अपनी कहानी अल्लाह पर कितना भरोसा करके छोड़ देता है।
अपनी शिकायतों को दुआ में बदल दीजिए।
अपनी फ़िक्रों को तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) में बदल दीजिए।
अपनी मुश्किलों को अल्लाह के और क़रीब होने का ज़रिया बना लीजिए।
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22/06/2026
और मैंने कहा: अपने रब से माफ़ी मांगो, बेशक वह बहुत ज़्यादा माफ़ करने वाला है। वह तुम पर आसमान से खूब बारिश बरसाएगा, तुम्हें माल और औलाद से नवाज़ेगा, तुम्हारे लिए बाग़ पैदा करेगा और नहरें जारी कर देगा। [📖 सूरह नूह 71:10–12]
आज की दुनिया में लोग सुकून, रिज़्क़ और मुश्किलों के हल के लिए हर तरफ़ भटकते हैं, लेकिन अल्लाह ने हमें एक बहुत बड़ा नुस्ख़ा बता दिया है: इस्तिग़फ़ार (अल्लाह से माफ़ी मांगना)।
इस्तिग़फ़ार सिर्फ़ ज़ुबान से "अस्तग़फ़िरुल्लाह" कह देने का नाम नहीं है, बल्कि यह अपने गुनाहों को मानते हुए अल्लाह की तरफ़ सच्चे दिल से लौटने का नाम है। यह उसकी रहमत की उम्मीद और उसकी माफ़ी की तलब है।
इस्तिग़फ़ार से दिलों को सुकून मिलता है, गुनाह माफ़ होते हैं, मुश्किलें आसान होती हैं और ऐसी बरकतें नाज़िल होती हैं जिनका इंसान अंदाज़ा भी नहीं कर सकता।
जब तुम परेशान हो, तो अस्तग़फ़िरुल्लाह कहो। जब तुम्हें अपने मुस्तक़बिल की फ़िक्र हो, तो अस्तग़फ़िरुल्लाह कहो। जब तुम माफ़ी, रिज़्क़, हिफ़ाज़त या दिल का सुकून चाहते हो, तो अपनी ज़ुबान को अल्लाह के ज़िक्र और इस्तिग़फ़ार से तर रखो।
अल्लाह की रहमत के सामने कोई गुनाह इतना बड़ा नहीं कि माफ़ न हो सके, और उसकी कुदरत के सामने कोई मुश्किल इतनी बड़ी नहीं कि हल न हो सके। तौबा का दरवाज़ा तब तक खुला है जब तक इंसान की सांसें चल रही हैं।
आज दुनिया से हल मांगने से पहले अपने रब से माफ़ी मांगो। जो चीज़ तुम्हें नामुमकिन लगती है, वह उस अल्लाह के लिए बहुत आसान है जो हर चीज़ पर क़ादिर है।
अस्तग़फ़िरुल्लाह वा अतूबु इलैह।
अल्लाह तआला हमें माफ़ फ़रमाए, हमारी तौबा क़ुबूल फ़रमाए और हमारी ज़िंदगी को अपनी रहमतों और बरकतों से भर दे। आमीन।
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22/06/2026
इस हदीस में जिन "दो बड़े मुसलमानों के गिरोह" का ज़िक्र है, उनसे मुराद: हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके समर्थक (मुख्यतः इराक़ के लोग)
हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) और उनके समर्थक (मुख्यतः शाम/सीरिया के लोग)
हज़रत अली (रज़ियल्लाहु अन्हु) की शहादत (40 हिजरी) के बाद हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ख़लीफ़ा बने। उस समय मुसलमानों के बीच राजनीतिक मतभेद और गृहयुद्ध की स्थिति थी। यदि लड़ाई जारी रहती तो बहुत अधिक मुसलमानों का ख़ून बहता।
ऐसे समय में हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उम्मत की भलाई और मुसलमानों की एकता को अपनी व्यक्तिगत सत्ता से अधिक महत्व दिया। उन्होंने ख़िलाफ़त से दस्तबरदार होकर हज़रत मुआविया (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ सुलह कर ली। इसके परिणामस्वरूप मुसलमानों की आपसी लड़ाई रुक गई और उम्मत एक नेतृत्व के तहत एकजुट हो गई।
यही वह घटना थी जिसकी भविष्यवाणी रसूलुल्लाह ﷺ ने वर्षों पहले इस हदीस में की थी: "मेरा यह बेटा (नवासा) सरदार है, और अल्लाह इसके माध्यम से मुसलमानों के दो बड़े गिरोहों के बीच सुलह करा देगा।" [📖 सहीह अल-बुख़ारी: 2704]
इस हदीस में रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत हसन (रज़ियल्लाहु अन्हु) की महानता और दूरदर्शिता को बयान किया। बाद में उन्होंने अपनी ख़िलाफ़त छोड़कर मुसलमानों की एकता को बचाया और दो बड़े मुस्लिम समूहों के बीच सुलह करवा दी। इसी कारण उन्हें उम्मत के महान मेल-मिलाप कराने वालों में गिना जाता है।
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22/06/2026
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) ने कभी लोगों को अपनी इबादत करने के लिए नहीं बुलाया। उन्होंने हमेशा लोगों को एक अल्लाह की इबादत करने की दावत दी।
इस्लाम में हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) अल्लाह के महान पैग़म्बरों में से एक हैं। उनका जन्म हज़रत मरियम (अलैहिस्सलाम) के ज़रिए एक चमत्कार के तौर पर हुआ। उन्होंने अल्लाह के हुक्म से कई मोजिज़े दिखाए, बीमारों को शिफ़ा दी और लोगों को उनके पैदा करने वाले रब की सच्ची इबादत की तरफ़ बुलाया। लेकिन पूरे क़ुरआन में हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह का बंदा और रसूल बताया गया है, न कि ऐसा कोई जिसने अपनी इबादत का हुक्म दिया हो।
अल्लाह फ़रमाता है: “बेशक अल्लाह ही मेरा रब है और तुम्हारा भी रब है, इसलिए उसी की इबादत करो। यही सीधा रास्ता है।” (क़ुरआन 3:51)
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) का पैग़ाम वही था जो हज़रत नूह, हज़रत इब्राहीम, हज़रत मूसा और हज़रत मुहम्मद ﷺ लेकर आए थे: सिर्फ़ एक अल्लाह की इबादत करो और उसके साथ किसी को शरीक न ठहराओ।
इस्लाम सिखाता है कि तमाम पैग़म्बर एक ही मिशन लेकर आए थे लोगों को तौहीद यानी एक अल्लाह की ख़ालिस इबादत की तरफ़ बुलाना।
क़यामत के दिन अल्लाह हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से पूछेगा कि क्या उन्होंने लोगों से कहा था कि वे उन्हें और उनकी माँ को अल्लाह के सिवा माबूद बना लें? तब हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) अपनी बेगुनाही बयान करेंगे और कहेंगे कि उन्होंने वही बात पहुंचाई जो अल्लाह ने उन्हें हुक्म दी थी: “अल्लाह की इबादत करो, जो मेरा भी रब है और तुम्हारा भी रब है।” (क़ुरआन 5:116-117)
हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) से सच्ची मुहब्बत सिर्फ़ उनकी तारीफ़ करने का नाम नहीं है। बल्कि उनकी तालीमात पर चलना, उनकी नुबुव्वत का एहतराम करना और उसी ख़ालिक़ की इबादत करना है जिसकी इबादत वह खुद किया करते थे।
एक अल्लाह। एक पैग़ाम। एक हक़ीक़त।
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22/06/2026
इस हदीस में बच्चों के साथ भी सच्चाई और ईमानदारी बरतने की शिक्षा दी गई है। माता-पिता या बड़े लोग बच्चों से कोई वादा करें, तो उसे पूरा करें। बच्चों को झूठा दिलासा देना या वादा करके उसे पूरा न करना इस्लाम में पसंदीदा नहीं है, क्योंकि इससे बच्चे के दिल में अविश्वास पैदा होता है और उसके चरित्र पर भी असर पड़ता है।
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