Real World With Nitin
'Real World with Nitin' isn't just any old show. it's real change. It’s a real problem to solutions
रक्षाबंधन एक पारंपरिक हिन्दू त्योहार है जो भाई और बहन के प्रेम, सुरक्षा और स्नेह के अटूट बंधन का प्रतीक है। यह त्योहार भारत के साथ-साथ नेपाल और अन्य हिंदू संस्कृति वाले देशों में भी बहुत श्रद्धा से मनाया जाता है।
रक्षाबंधन क्या है?
“रक्षाबंधन” दो शब्दों से मिलकर बना है:‘रक्षा’ यानी सुरक्षा‘बंधन’ यानी बंधन या डोर
इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधती है और उसकी लंबी उम्र व सुरक्षा की कामना करती है। बदले में भाई उसे उपहार देता है और जीवनभर उसकी रक्षा करने का वचन देता है।
रक्षाबंधन की शुरुआत कैसे हुई?
रक्षाबंधन की उत्पत्ति से जुड़े कई धार्मिक और ऐतिहासिक प्रसंग हैं।
इनमें से प्रमुख हैं:
1. श्रीमद्भागवत पुराण और विष्णु पुराण की कथा:जब देवताओं और राक्षसों के बीच युद्ध हुआ था, तब इंद्राणी (देव इंद्र की पत्नी) ने इंद्र की कलाई पर एक रक्षासूत्र बाँधा था।इस सूत्र की शक्ति से इंद्र ने विजय प्राप्त की।इसे ‘रक्षाबंधन’ का पहला ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है।
2. कृष्ण और द्रौपदी की कथा:महाभारत में, एक बार श्रीकृष्ण को उंगली में चोट लग जाती है।तब द्रौपदी अपने वस्त्र का एक टुकड़ा फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध देती है।इस भावनात्मक क्षण को राखी के पवित्र बंधन का प्रतीक माना जाता है।बाद में श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की लाज बचाकर इस बंधन को निभाया
3. रानी कर्णावती और हुमायूं:
मध्यकालीन भारत में, चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर सहायता माँगी थी।हुमायूं ने इसे स्वीकारते हुए चित्तौड़ की रक्षा के लिए सेना भेजी।
रक्षाबंधन कितने साल पुराना त्योहार है?
हजारों साल पुराना: वेदों, पुराणों और महाभारत में इसका उल्लेख मिलता है।यह त्योहार वैदिक काल से चला आ रहा है, यानी कम से कम 3000 से 5000 वर्ष पुराना माना जा सकता है।
रक्षाबंधन कब और कैसे मनाया जाता है?
यह त्योहार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है (आमतौर पर जुलाई-अगस्त में)।बहन भाई की आरती उतारती है, माथे पर तिलक लगाती है और राखी बाँधती है।भाई बहन को उपहार देता है और उसकी रक्षा करने का वादा करता हैl
राखी केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं हैआजकल राखी मित्रों, गुरु-शिष्य, सैनिकों (जवानों) को भी बांधी जाती है रक्षाबंधन सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, आस्था और ज़िम्मेदारी का प्रतीक है। यह सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भारत की परंपराओं की सुंदर झलक देता है। #रक्षाबंधन
रोड कांट्रैक्टर्स और अधूरी जिम्मेदारियाँ 🚧
जब कोई कांट्रैक्टर सड़क पर किसी भी प्रकार की लाइन बिछाने का कांट्रैक्ट लेता है — चाहे वो गैस पाइपलाइन हो, सीवर लाइन , पानी की लाइन या अन्य कोई भी यूटिलिटी — तो काम की शुरुआत सड़क को तोड़कर होती है।
✅ कांट्रैक्ट मिलता है
✅ पाइप या केबल बिछाई जाती है
❌ लेकिन फिर वो सड़क को वैसे ही अधूरी हालत में छोड़ कर चले जाते हैं।
🔴 नतीजा?टूटी-फूटी सड़केंधूल, कीचड़ और जलजमावएक्सीडेंट और ट्रैफिक की दिक्कतआम नागरिकों की परेशानीकिसकी ज़िम्मेदारी है यह पुनः मरम्मत की?
📢 **समाधान क्या हो सकतासड़क की मरम्मत कांट्रैक्ट का हिस्सा होकांट्रैक्ट में स्पष्ट शर्त हो कि लाइन बिछाने के बाद सड़क को पहले जैसी या बेहतर हालत में वापस लाना अनिवार्य होगा।वर्क कम्प्लीशन सर्टिफिकेट तभी मिले जब सड़क सही होजब तक सड़क ठीक न की जाए, तब तक कांट्रैक्टर को “वर्क कम्प्लीशन” का सर्टिफिकेट न दिया जाए और उसकी पेमेंट रोकी जाए।स्थानीय निकाय द्वारा निगरानी (Monitoring)नगर निगम, PWD या संबंधित एजेंसी को यह जिम्मेदारी दी जाए कि वो निरीक्षण करे और रिपोर्ट सार्वजनिक करे।Defect Liability Period (DLP)कांट्रैक्टर को कम से कम 6-12 महीने तक सड़क की मरम्मत या किसी भी नुकसान की ज़िम्मेदारी लेनी होगी।पेनल्टी सिस्टम लागू होअगर तय समय में मरम्मत नहीं होती, तो कांट्रैक्टर पर फाइन या ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई हो।जनता की शिकायत के लिए ऐप या पोर्टलजहां लोग टूटी सड़कों की फोटो डालकर शिकायत दर्ज करा सकें और ट्रैक कर सकें कि कार्रवाई हुई या नहीं।सड़क मरम्मत की थर्ड पार्टी ऑडिटकिसी स्वतंत्र एजेंसी से सड़क मरम्मत की गुणवत्ता का मूल्यांकन करवाया जाए।
📣 विकास का मतलब अधूरी सड़कें नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार और टिकाऊ काम होना चाहिए।सड़कें जनता की हैं, उन्हें बर्बाद करने का नहीं, संवारने का ठेका होना चाहिए। #सड़क_की_जिम्मेदारी
इतिहास की सबसे लेट ट्रेन!
चार साल की देरी के बाद पहुँची मालगाड़ी!
भारत में रेलवे इतिहास की सबसे बड़ी देरी सामने आई है, जहाँ एक मालगाड़ी — जो विशाखापत्तनम (आंध्र प्रदेश) से बस्ती (उत्तर प्रदेश) के लिए रवाना हुई थी — लगभग 4 साल बाद अपनी मंज़िल पर पहुँची।
⸻
🔍 क्या था मामला?
• 📍 रूट: विशाखापत्तनम ➝ बस्ती
• 📦 माल: 1,316 बोरी DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) खाद
• ⏳ देरी: करीब 4 साल
रेलवे अधिकारियों के अनुसार, यह मालगाड़ी 10 नवम्बर 2014 में रवाना हुई थी और 25 जुलाई 2018 में बस्ती पहुँची।
⸻
❓ इतनी देरी क्यों हुई?
आर्टिकल में स्पष्ट कारण नहीं दिए गए, लेकिन संभव कारण ये हो सकते हैं:
• स्टोरेज में गलती या गाड़ी को भूल जाना
• कम प्राथमिकता वाले रूट पर भेजना
• प्रशासनिक लापरवाही
⸻
⚠️ इस घटना का महत्व
1. इन्फ्रास्ट्रक्चर पर सवाल: इतने लंबे समय तक एक मालगाड़ी का रोका जाना संसाधनों की बर्बादी है।
2. किसानों पर असर: खाद समय पर न मिलने से खेती प्रभावित हो सकती है।
3. रेलवे की जवाबदेही: ट्रैकिंग और लॉजिस्टिक्स सिस्टम में भारी खामियाँ उजागर होती हैं।
⸻
📌 निष्कर्ष:
यह घटना भारतीय रेलवे के इतिहास में सबसे अनोखी और गंभीर देरी मानी जा रही है। यह केवल एक ट्रेन की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े करती है।
पेड़ कटे… पर्यावरण रोया | Climate Crisis Explained | Save Trees, Save Future
🌍”आज एक तरफ़ सूखा है, तो दूसरी तरफ़ बाढ़।कहीं ज़रूरत से ज़्यादा ठंड, तो कहीं जानलेवा गर्मी। यहाँ तक कि अब हमें आर्टिफिशियल बारिश भी करवानी पड़ रही है।
कभी सोचा है —क्या हमने पर्यावरण के साथ छेड़छाड़ तो नहीं कर दी?
सिर्फ दिल्ली में ही विकास के नाम पर लाखों पेड़ काट दिए गए।क्या उन्हें बचाया नहीं जा सकता था?
क्या उन्हें उखाड़कर दूसरी जगह नहीं लगाया जा सकता था?
दुनिया के कई देशों में पेड़ों को बचाने के लिए इमारतों के नक्शे तक बदले जाते हैं।पर हमारे देश में, जहाँ पेड़ों को देवता माना जाता है,उन्हीं पेड़ों की सबसे ज्यादा हत्या हो रही है।
🌳 अब भी वक्त है — पर्यावरण बचाइए, वरना भविष्य नहीं बचेगा।
आज के बच्चे इतने स्मार्ट क्यों हैं?(Smart Generation – Early Age Wonders!)
🧠 मुख्य कारण:
📚 शिक्षा और टेक्नोलॉजी – स्मार्ट डिवाइसेज़ और डिजिटल लर्निंग की पहुँच
🥗 बेहतर पोषण और स्वास्थ्य – हेल्दी ब्रेन डिवेलपमेंट
📺 प्रेरणा और उत्तेजना – किताबें, गेम्स और लर्निंग एक्टिविटीज
👨👩👧 माता-पिता की भागीदारी – पेरेंट्स अब बच्चों के साथ सीखते भी हैं
🏫 आधुनिक शिक्षा प्रणाली – हर बच्चे की अलग प्रतिभा को पहचानना 2 साल में इतनी समझदारी क्यों?
🔹 प्रारंभिक शिक्षा
🔹 डिजिटल मीडिया से जल्दी सीखना
🔹 पेरेंट्स की अपेक्षाएं और सहयोग
🌟 क्या आप भी इस बदलाव को महसूस करते हैं?तो इस वीडियो को ज़रूर देखें, शेयर करें और कमेंट में बताएं कि आपके अनुभव क्या कह रहे हैं।
🌱 नया युग, नई सोच – यही है
👶 बचपन अब सिर्फ खेल नहीं, सीखने की उड़ान है!
क्या आप जानते हैं कि हमारे आसपास चमकने वाले जुगनू आज विलुप्त होने की कगार पर हैं?
🌿 “अगर जुगनू नहीं रहे, तो रौशनी सिर्फ बल्बों में रह जाएगी, दिलों में नहीं!”
🌿यह वीडियो एक जागरूकता अभियान का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य है – लोगों को यह समझाना कि जुगनू केवल सुंदर कीड़े नहीं, बल्कि पर्यावरण की सेहत के संकेतक हैं।
🎥 यह वीडियो स्कूलों, कॉलेजों, और सामाजिक संगठनों में जागरूकता फैलाने के लिए बनाया गया है।
👉 इसे ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचाएं और प्रकृति के इस संदेश को जन-जन तक पहुंचाएं।
🌍 “हम सबकी छोटी कोशिश, एक बड़ी रौशनी बन सकती है!”Watch • Learn • Share – Let’s Save Fireflies!✨ सब्सक्राइब करें पर्यावरण और प्रकृति से जुड़े और वीडियो के लिए।
गोविंद कृष्णन एम, तिरुवनंतपुरम के कन्नूर जिले के मूल निवासी
चलिए बताता हूँ इनके बारे में जिन्होंने गुरुकुल से ISRO तक सफ़र तय किया ।
गुरुकुल में उनके सहपाठियों ने पुरोहिती का विकल्प चुना, जबकि वैदिक अध्ययन में पारंगत गोविंद के विचार अलग थे। गोविंद कहते हैं, "मैं इस आम गलत धारणा से गहराई से वाकिफ हूं कि वैदिक शिक्षा करियर के अवसरों को सीमित करती है। लोग अक्सर सोचते हैं कि अध्यात्म और विज्ञान एक साथ नहीं चल सकते। लेकिन मैंने साबित कर दिया है कि वे एक साथ चल सकते हैं। यह सब संतुलन और अनुशासन के बारे में है।" "अपने जीवन के एक चरण में, मैंने वैदिक शिक्षा को अपना सर्वश्रेष्ठ दिया, और दूसरे में, मैंने अपना सब कुछ विज्ञान को दिया। लेकिन मैंने कभी भी दोनों को पूरी तरह से नहीं छोड़ा।"
गोविंद की शैक्षिक यात्रा किसी भी तरह से पारंपरिक नहीं है। 2011 में पेरम्बूर के केंद्रीय विद्यालय से चौथी कक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने नियमित स्कूली शिक्षा छोड़ दी और त्रिशूर में भ्रमस्वाम मथम में शामिल हो गए - जो एक पारंपरिक वैदिक विद्यालय है - जहाँ उन्होंने चार साल की गुरुकुल शिक्षा प्राप्त की। "यह पांच साल का कोर्स था, लेकिन मैंने इसे चार साल में पूरा कर लिया," वे कहते हैं।
उन्हें वैदिक शिक्षा में दीक्षित करने का निर्णय उनके पिता, हरीश कुमार ने लिया था, जो एक पूर्व भारतीय नौसेना अधिकारी थे और
"गुरुकुल के शुरुआती दिन मुश्किल थे, खासकर पहली बार अपने परिवार से अलग होना," गोविंद याद करते हैं। "मेरे बैच में हम पांच छात्र थे, और हमने यजुर्वेद को चुना था।" कोई किताबें या दृश्य सहायता नहीं थी - केवल एक गुरु से मौखिक शिक्षा थी। पहले चार साल तक,
"गुरुकुल में दिन सुबह 5 बजे शुरू होते थे और वैदिक मंत्रों, आध्यात्मिक दिनचर्या और सख्त अनुशासन से भरे होते थे। सब कुछ निर्धारित था। कोई लिखित में नहीं था। यह सब सुनने और याद रखने के बारे में था," वे कहते हैं।
नियमित स्कूल में वापसी
अपने प्रशिक्षण के पांचवें वर्ष में, गोविंद ने फिर से नियमित स्कूल जाना शुरू कर दिया। वह विवेकदोयम बॉयज़ हायर सेकेंडरी स्कूल, नादक्कवु में 8वीं से 10वीं कक्षा तक के लिए शामिल हो गए, जबकि वे अभी भी गुरुकुल में रहते और प्रशिक्षण प्राप्त करते रहे। "मेरी दिनचर्या वही रही। गुरुकुल के सत्र सुबह 8.30 बजे तक और स्कूल के बाद रात 9 बजे तक चलते थे, और फिर मैं स्कूल के विषयों का अध्ययन लगभग 11 बजे तक करता था, और फिर अगली सुबह जल्दी उठ जाता था," वे कहते हैं।
गोविंद, एक पूर्व गुरुकुल छात्र जिसने दसवीं कक्षा में पूरे ए+ ग्रेड हासिल किए, अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए मूडबिद्री, मंगलुरु के अल्वास कॉलेज में दाखिला लेकर एक अनोखा रास्ता चुना। उन्होंने जेईई मेन और एडवांस्ड दोनों परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पास किया, जिससे उन्हें 2021 में वलियामाला, तिरुवनंतपुरम स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेस साइंस एंड टेक्नोलॉजी (IIST) में बी.टेक इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन कार्यक्रम में प्रवेश मिला। अपनी अकादमिक pursuits के बावजूद, गोविंद ने गुरुकुल में सीखी अपनी आध्यात्मिक प्रथाओं को लगातार बनाए रखा, मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता के लिए प्रतिदिन एक घंटा समर्पित करते थे। गुरुकुल के उनके साथी, जो priesthood में चले गए, के विपरीत, उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया, और जुलाई में इसरो में शामिल होंगे। गोविंद का इरादा है कि वे अपने पेशेवर जीवन में भी अपनी आध्यात्मिक दिनचर्या जारी रखेंगे और अंततः दूसरों को वैदिक शिक्षाओं के लाभ सिखाने की उम्मीद करते हैं। वह वेदों को ध्यान, अनुशासन और शक्ति प्रदान करने का श्रेय देते हैं।
गोविंद एक अद्वितीय व्यक्ति के रूप में सामने आते हैं जिन्होंने पारंपरिक वैदिक शिक्षा को आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा के साथ सफलतापूर्वक जोड़ा। गुरुकुल से दसवीं कक्षा में शीर्ष ग्रेड के साथ पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, और प्रतिस्पर्धी जेईई परीक्षाओं के माध्यम से इसरो के प्रतिष्ठित IIST में प्रवेश प्राप्त किया। विशेष रूप से, उन्होंने अपनी आध्यात्मिक प्रथाओं को जारी रखा, मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और स्मृति के लिए प्रतिदिन एक घंटा समर्पित करते थे, इसे एक मानसिक कसरत की तरह मानते थे। यह प्रतिबद्धता उन्हें उनके गुरुकुल के साथियों से अलग करती है जो ज्यादातर पुजारी बन गए। गोविंद, जो जल्द ही इसरो में शामिल होंगे, इस संतुलन को बनाए रखने की योजना बना रहे हैं, उनका मानना है कि वेदों ने उन्हें अमूल्य ध्यान, अनुशासन और शक्ति प्रदान की है।
गोविंद की यात्रा अनुशासन की शक्ति और पारंपरिक ज्ञान के साथ आधुनिक महत्वाकांक्षा के अनूठे मिश्रण का उदाहरण है। गुरुकुल से दसवीं कक्षा में पूरे ए+ ग्रेड के साथ अकादमिक उत्कृष्टता हासिल करने के बाद, उन्होंने IIST में इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन में बी.टेक हासिल करने के लिए कड़ी प्रवेश परीक्षाओं को सफलतापूर्वक पार किया। इस दौरान, गोविंद ने अपनी आध्यात्मिक प्रथाओं को दृढ़ता से बनाए रखा, अपनी मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और स्मृति का श्रेय इस दैनिक दिनचर्या को दिया। गुरुकुल के अपने साथियों से अलग रास्ता अपनाने के बावजूद अपनी जड़ों के प्रति यह समर्पण उनके मूल्यों का प्रमाण है। चूंकि वह जुलाई में इसरो में शामिल होने की तैयारी कर रहे हैं, गोविंद को अपनी आध्यात्मिक यात्रा जारी रखने की उम्मीद है
आज जब दुनिया भर में लाइफस्टाइल डिज़ीज़ (lifestyle diseases) बढ़ रही हैं, तो यह जानना ज़रूरी है कि कौन-से देश सबसे ज़्यादा फिट हैं, वो कैसे फिट रहते हैं, और हमें क्या अपनाना चाहिए ताकि हम भी स्वस्थ और ऊर्जा से भरे रहें।
🌍 दुनिया के फिट देश (Fittest Countries in the World)🇯🇵 जापानकैसे फिट रहते हैं:साधारण, हल्का और ताज़ा भोजन (जैसे मछली, चावल, सब्ज़ियाँ)पैदल चलने और साइकिल चलाने की आदतयोग और ध्यान जैसी परंपरागत विधियाँओवरईटिंग से बचते हैं – एक नियम है “Hara Hachi Bu”, यानी पेट 80% भरने पर खाना रोक देना।
🇮🇸 आइसलैंडकैसे फिट रहते हैं:शुद्ध हवा, साफ पानीबाहर घूमने और प्रकृति में समय बिताने की आदतबहुत कम प्रोसेस्ड फूड🇸🇪 स्वीडन / नॉर्डिक देश (Norway, Finland)कैसे फिट रहते हैं:Active lifestyle — स्कीइंग, हाइकिंग, साइक्लिंग आम बात हैWork-Life Balance अच्छा होता हैहेल्दी डाइट: साबुत अनाज, बेरीज़, मछलीपर्याप्त नींद और मानसिक संतुलन
🇮🇹 इटली (खासकर भूमध्यसागरीय क्षेत्र)कैसे फिट रहते हैं:Mediterranean diet – जैतून का तेल, हरी सब्ज़ियां, फल, वाइन (थोड़ी मात्रा में)खाने का आनंद लेना लेकिन ज़्यादा नहीं खानाFamily time और धीमी ज़िंदगी
💡 हम इनसे क्या सीख सकते हैं? (What Can We Learn)भोजन- प्रोसेस्ड फ़ूड कम करें ।एक्टिविटी- रोज़ाना चलना, सीढ़ियां चढ़ना, साइक्लिंग करना, योग/मेडिटेशन और डांस। मानसिक संतुलन - योग/साधना, मोबाइल स्क्रीन कम देखना और परिवार के साथ ज़्यादा समय बितानारूटीन- फिक्स टाइम पर खाना और सोना
✅ आसान जीवनशैली टिप्स जो आप अभी से अपनाएं:हर दिन कम से कम 30 मिनट चलेंदिन में कम से कम 2-3 बार फल या सब्ज़ियाँ खाएंरात में जल्दी सोएं, मोबाइल का उपयोग कम करेंमीठा, तला हुआ, और पैकेट वाला खाना कम करेंसप्ताह में 1 दिन Digital Detox करें — सिर्फ़ प्रकृति और परिवार के साथहमें सबक्राइब जरूर करे Instagram - https://www.instagram.com/realworldwithnitin?igsh=MW1tdjA5dzg0Ynpkcg==
अगर हम आज पानी बचाने के लिए कदम नहीं उठाएंगे, तो भविष्य में जीवन संकट में पड़ सकता है। यह हमारी सामूहिक ज़िम्मेदारी है कि हम जल का आदर करें और आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखें।बूँद-बूँद से सागर भरता है, बूँद-बूँद से जीवन चलता है
08/07/2025
महाकाल की नगरी उज्जैन के त्रिवेणी घाट पर मुझे शिवलिंग और ठीक उनके सामने नंदी जी के दर्शन हुए और पीछे घाट के दर्शन भी दुर्लभ थे । मैंने देखा और सोचा कि पुराने होने पर ये खंडित होने पर ही लोग या पुजारी घाट पर रखते या विसर्जित करते है लेकिन मैंने सोचा की इतने पुराने शिवलिंग पर तो नजाने कितने ही लोगों ने पूजा अर्चना, भोग प्रसाद और ना जाने कितनी ही आरतियाँ हुई होंगी और नंदी जी के कान में कितने ही लोगों मन्नत मांगी होगी । मगर उनकी ये दशा मुझसे बिल्कुल भी देखी नहीं गई कि ये खंडित थोड़ी ना है इतनी पूजा अर्चना होने पर इनमें तो एक ऊर्जा उत्पन्न जो गई होगी । एक मन तो ऐसा किया कि मैं इन्हें घर ले जाऊँ । लेकिन सोचा की मैं शायद देख रेख और नियम से सेवा नहीं कर पाऊँगा और ये सब बाधाओं को तोड़ने का एक मन भी किया । मगर एक आख़िरी बार सोचा कि प्रभु की यही जगह सही है घाट के पास ।
क्या आप भी किसी समस्या और उसके समाधान को जानते है ?
आपका जवाब क्या है ?
Click here to claim your Sponsored Listing.
Category
Contact the public figure
Address
Delhi
110075