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क्या आप जानते हैं कि जब तो अर्जुन को न मार डाले तब तक के लिए कर्ण ने अपने पैर न धोने की कसम खाई थी ??
25/10/2019
धनतेरस- 13 अंक दिलाएगा धन
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यूं तो ईसाई धर्म में 13 को बहुत ही अशुभ अंक माना जाता है और 13 तारीख को लोग कुछ भी अच्छा काम करने से बचते हैं लेकिन सनातन धर्म में सभी दिनों को किसी ना किसी कार्य के लिए शुभ माना जाता है। पूर्णिमा हो या अमावस्या हो सभी दिन किसी न किसी देवता या देवी के नाम पर समर्पित हैं। ऐसा ही एक दिन है धनतेरस का । तेरस यानि कार्तिक मास कृष्ण पक्ष के तेरहवें दिन भगवान धनवंतरि की पूजा की जाती है। धनवंतरि को अमृत प्रदान करने वाला देवता माना जाता है। धनवंतरि को ही स्वास्थ्य और आयुर्वेद का देवता भी माना जाता है। यानि अमरता के लिए धनवंतरि की पूजा की जाती है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान आज ही की तिथि को विष्णु के अँशावतार भगवान धनवंतरि का प्रादुर्भाव हुआ था। भगवान धनवंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे जिसे पी कर सभी देवता अमर हो गए। इसके अलावा आज ही के दिन धन के देवता कुबेर की भी उपासना की जाती है। कुबेर यक्षों के राजा हैं और अलकापुरी में वास करते हैं । उन्हें ही रावण का सौतेला भाई भी कहा जाता है। दक्षिण भारत में कथा है कि भगवान व्यंकटेश ने माता लक्ष्मी से विवाह करने के लिए कुबेर से धन उधार लिया था जिसे आज भी वो चुका रहे हैं। यही वजह है कि तिरुपति बाला जी में धन का दान किया जाता है जिस धन को लेकर भगवान व्यंकटेश कुबेर को लौटाते हैं और धन दान के बदले आशीर्वाद देते हैं।
12/09/2019
अनंत से अनंत ऐश्वर्य की यात्रा का महापर्व - अनंत चतुर्दशी
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भगवान श्री हरि विष्णु के दश अवतारों जिसमें कच्छप, कूर्म, वाराह, नरसिंह. वामन, परशुराम, श्रीराम, और श्री कृष्ण के बारे में तो हम सभी जानते हैं। लेकिन इन अवतारों के अलावा भी भगवान ने कई ऐसे अवतार लिए हैं जिनकी जानकारी आज भी बहुत कम लोगों को है। ऐसे अवतारों में नर- नारायण अवतार, मोहिनी अवतार, कपिल मुनि और अनंत अवतार प्रमुख हैं। भगवान का अनंत अवतार समुद्र मंथन से निकला है। इस अवतार के साथ साथ भगवान श्री विष्णु का ऐश्वर्य भी जुड़ा है। कहा जाता है कि जब पांडव जुए में सब कुछ हार बैठे और चौदह साल का वनवास काट कर गरीबी का जीवन व्यतीत कर रहे थे तब भगवान श्री कृष्ण ने उन्हें अपने स्वरुप अनंत का रहस्य बताया था और पांडवो को अनंत चतुर्दशी के दिन व्रत करने को कहा था। महाभारत के मुताबिक भगवान के इसी स्वरुप की अराधना करने की वजह से पांडवों को फिर से अपना राज्य प्राप्त हुआ। भगवान के वैसे तो हरेक अवतार का अपना उद्धेश्य रहा है। दत्तात्रेय अवतार के माध्यम से अगर भगवान गुरु का उद्धेश्य बताते हैं। तो राम के रुप में वो मर्यादा स्थापित करते हैं। वाराह के रुप में वो पृथ्वी के तारण हार बन कर आते हैं तो मत्स्य अवतार ले कर वो वेदों को पुन स्थापित करते हैं। इसी प्रकार अनंत अवतार लेकर वो अपने ऐश्वर्य का परिचय देते हैं। ऐश्वर्य शब्द से ही ईश्वर शब्द बना है। ईश्वर वो है जिसके पास सब कुछ है और सब कुछ देने की क्षमता है। कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु के एक अवतार अनंत का प्राकट्य हुआ और उनके साथ ही 14 रत्न भी निकले जिसमें ऐरावत हाथी, उच्चश्रैवा घोड़ा, कौस्तुभ मणि, कल्प वृक्ष, पारिजात वृक्ष, कामधेनु गाय और पाांचजन्य शंख प्रमुख थे । इन सबका संबंध भगवान से है। जिसके पास भी कामधेनु गाय या कल्प वृक्ष या पांचजन्य शंख हो उसके पास किसी भी चीज़ की कमी नहीं हो सकती है। अनंत ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाला ये व्रत इसी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्ति करने के लिए किया जाता है। इन चौदह रत्नों के प्रतीक के रुप में ही अनंत के धागे में 14 गांठे होती हैं और इसे चौदह दिन तक पहना जाता है। जो भी इस व्रत को करता है और अनंत को पहनता है उसे भगवान अनंत सारी सुख और समृद्धि देते हैं।
06/09/2019
राधाष्टमी पर विशेष
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सीता और राधा - दो अधूरी प्रेम कहानियां
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आज श्री कृष्ण की आराधिका और आह्लादकारिणी शक्ति श्री राधा जी का जन्म दिवस है। कृष्ण और राधा जी की प्रेम कहानी को पूरे विश्व में एक आदर्श माना जाता है । लेकिन ये गज़ब का संयोग है कि न तो माता सीता और न ही माता राधा अपने आराध्य श्री राम और श्री कृष्ण के साथ आजीवन रह सकीं। दोनों की जिंदगियों में कितनी समानता है ये देख कर आप आश्चर्यचकित रह जाएंगे। जहां भगवान श्री राम का जन्म चैत्र नवमी के दिन हुआ था वहीं माता सीता का जन्म भी ठीक एक महीने बाद वैशाख नवमी को हुआ था। भगवान श्री कृष्ण का जन्म जहां भादो महीनें की कृष्णपक्ष अष्टमी को हुआ तो वहीं राधा जी का जन्म भादो महीनें में ही शुक्ल पक्ष अष्टमी को हुई। माता सीता को भूमिजा कहा जाता है , मतलब वो भूमि से प्रगट हुई थीं। पद्म पुराण के मुताबिक मां राधा भी भूमि पर ही प्रगट पाई गईं थी। कहानी के मुताबिक राधा जी के पिता वृषभानु जब यज्ञ भूमि को साफ कर रहे थे तो वहीं जमीन पर राधा जी दिखीं। माता सीता को जहां एक धोबी के आरोपों की वजह से और अयोध्या में उनकी बदनामी की वजह से श्री राम को उन्हें वन भेजना पड़ा वहीं राधा जी को भी सामाजिक बदनामी कृष्ण प्रेम की वजह से झेलनी पड़ी। राधा जी को कृष्ण जब 11 वर्ष 52 दिन की उम्र में छोड़ कर मथुरा और बाद में द्वारिका चले गए तब कृष्ण राधा जी के पास सिर्फ उनकी मृत्यु के ठीक पहले ही आ पाए। सीता जी को भी राम का दर्शन ठीक उसी वक्त हुआ जब वो भूमि में समाने वाली थी।दोनों की ही प्रेम कहानियों के अधूरेपन को आज भी कोई तर्कसंगत ठहरा नहीं पाया है।
28/08/2019
अहंता ममतानाशे सर्वथा निरहंकृतो।स्वरुपस्थो यदा जीव: कृतार्थ: स निगद्यते।। अर्थात जो व्यक्ति अहंकार यानि मैं.. और ममता यानि ये मेरा है.. से मुक्त हो जाता है उस अवस्था को ही कृतार्थ कहा जाता है।
महाप्रभु वल्लभाचार्य।
24/08/2019
श्रीकृष्ण क्यों हैं परम पुरुष?
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भगवान श्री कृष्ण को आम तौर पर भगवान श्री विष्णु का पूर्णावतार माना जाता रहा है। वैष्णव मत और श्री मद्भभागवतम के मुताबिक श्री कृष्ण साक्षात विष्णु हैं। अन्य अवतारो के विपरीत जहां भगवान विष्णु ने अपने अंशों को पृथ्वी पर भेजा था वहीं कृष्ण के रुप में वो साक्षात स्वयं धरती पर आए। वाल्मिकि रामायण के ठीक से अध्ययन से यही पता चलता है कि जब राम पृथ्वी पर थे तब भी विष्णु वैकुंठ में वास कर रहे थे। जब हनुमान जी लंका भी जाते हैं और रावण उनसे परिचय पूछता है तो वो कहते हैं कि मैं उन राम का सेवक हूं जिनके आदेश से विष्णु सृष्टि का पालन करते हैं- 'जाके बल बिरंची हरि ईसा..पालत सृजत हरत दससीसा' इसके अलावा भी जब भगवान श्री राम सीता जी को अग्निपरीक्षा के लिए कहते हैं तो ब्रम्हा के साथ विष्णु भी आते हैं और राम को उनके स्वरुप के बारे में बताते हैं। लेकिन भगवान विष्णु कभी भी भगवान श्री कृष्ण के जीवन में कहीं भी नजर नहीं आते हैं। भगवान जब गीता भी कहते हैं तो भी वो विष्णु से पृथक कह कर खुद को संबोधित नहीं करते । भागवतम में भी कृष्ण को सर्वोपरि माना गया है। ब्रम्हवैवर्त पुराण के मुताबिक कृष्ण वैकुंठ से भी कई योजन उपर गोलोक में निवास करते हैं। और उनके ही द्वारा ब्रम्हा, विष्णु और महेश की उत्पत्ति होती है। खुद विष्णु श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए देखे जा सकते हैं। ये श्लोक कुछ इस प्रकार है- वरं वरेण्यम वरदं वराहम....। श्री कृष्ण से संबंधित एक मुहर भी हड़प्पा सभ्यता के सिंध के लरकाना जिले में मिली है जिसमें श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन है। यानि भगवान श्री कृष्ण जिन्हें हम मथुराधीश या द्वारिकाधीश के रुप में द्वापर में देखते हैं उनसे पहले भी कृष्ण का कोई स्वरुप था। ऋग्वेद में भी कृष्ण का सांकेतिक जिक्र एक गड़ेरिये के रुप में दिखाई देता है जो हर युग में धरती पर आकर धर्म की स्थापना करता है। ब्रम्हवैवर्त पुराण , श्रीमद् भागवतम, हरिवंश पुराण भगवान श्री कृष्ण से ही सारी सृष्टि की उत्पत्ति मानते हैं और उन्हें ही परम पुरुष के रुप में देखते हैंं।
03/10/2018
सुंदरकांड- स्त्रियों के संघर्ष की दास्तान
सुंदरकांड- स्त्रियों के संघर्ष की दास्तान
सुंदरकांड रामचरितमानस और रामायण का एक ऐसा अध्याय है जिससे होकर राम कथा के सारे पात्रों की जिंदगी के समाधान का राह खुलता है। हनुमान जी को इसी कांड में अपने देवत्व और शक्ति का अहसास होता है । राम और रावण के बीच फंसे विभिषण को राम के शरण में जाने का मार्ग मिलता है। माता जानकी को फिर से राम के पास वापस लौटने की उम्मीद मिलती है। भगवान श्री राम को माता जानकी का पता मिलता है । लेकिन इस कांड में एक बड़ा रहस्य यह भी छिपा है कि इसमें स्त्रियों के संघर्ष और लंका में उनकी दयनीय स्थिति का पता भी चलता है । जैसे ही हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं वहां सालों से राम के आने की उम्मीद पाली हुई लंकिनी से उनका साक्षात्कार होता है। लंकिनि उन्हें देखते ही कहती है कि ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा था कि विकल होसी जब कपि ते मारे तब जानेहु निसिचर संहारे... तात मोर अति पुन्य बहुता देखेउं नयन राम कर दूता... इसके आगे भी लंकिनि यही कहती हैं कि तात स्वर्ग अपवर्ग सुख ...धरिये तुला एक अंग..तूल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सतसंग... इसका अर्थ यही है कि लंकिनी भी वहां रावण के राज की मारी हुई एक ऐसी नारी थी जो लंका के द्वार पर सालों से इंतजार कर रही थी कि कोई मुक्तिदाता आयेगा और उन्हें रावण के राज़ से मुक्ति दिलाएगा। इसी प्रकार जब हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं और अशोक वाटिका के एक वृक्ष पर जाकर बैठते हैं। तब जब रावण माता सीता को प्रताड़ना देने के लिए त्रिजटा को आदेश देकर जाता है । तब शायद लंकिनी के द्वारा त्रिजटा तक यह संदेश पहुंच जाता है कि राम के दूत हनुमान लंका में प्रवेश कर चुके हैं। तभी त्रिजटा को भी यही उम्मीद बंधती है कि रावण के राज़ से मुक्ति अब संभव है और माता जानकी के साथ तब तक अच्छा व्यवहार होना चाहिए । त्रिजटा कहती है कि सबन्हौ बोली सुनाएसी सपना .. सीतहि सेई करहुं हित अपना । यहां तक कि त्रिजटा एक स्वप्न की कहानी गढ़ कर हनुमान जी को भी परोक्ष रुप से यही संदेश भेजती है कि वो लंका को जला डालें । त्रिजटा कहती है कि सपने बानर लंका जारे .. जातुधान सेना सब मारे। यहां तक कि कुबेर की पूर्व पत्नी मंदोदरी भी परोक्ष रुप से माता जानकी के पक्ष में ही खड़ी रहती हैं। जब रावण माता जानकी को मारने का प्रयास करता है तो उसे युक्ति पूर्वक दूर ले जाती हैं और कहती है .. सुनत बचन पुनि मारन धावा .. मयतनया कही नीति बुझावा.. कहेसी सकल निसचरन्हि बोलाई.. बहु बिधि सितहिं त्रासहु जाहि...। यहां तक कि जब हनुमान जी लंका जला कर वापस लौट जाते हैं तो इस अवसर पर जनता में फैले डर का भी इस्तेमाल मंदोदरी रावण के सामने करती है ताकि रावण डर कर माता जानकी को लौटा दे। मंदोदरी कहती है .. दूतिन्ह सन पुरजन बानी ..मंदोदरी अधिक अकुलानी...रहसि जोरी कर पति पग लागी ..बोली बचन नीति रस पागी..कंत करष हरि सन परिहू.. मोर कहा अति हित हिय धरहु.. समुझत जासु दूत कई करनी ..स्रवही गर्भ रजनीचर धरनी..तासु नारि निज सचिव बोलाई....पठहउं कंत जो चहहु भलाई...सुनहू नाथ सीता बिनु दिन्हे.. हित न तुम्हार संभु अज किन्हें.... इन सारी नारियों के कथनों से यह तो जरुर स्पष्ट होता है कि जिस रावण के राज के बारे में आज कल बुद्धिजीवी यह कहते पाए जाते हैं कि उसके राज़ में स्त्रियों की स्थिति बराबरी की थी। वहां स्त्रियां अपने पसंद का वर चुन सकती थी जैसे शूर्पनखा। वहां स्त्रियों का काम करने की आजादी थी जैसे लंकिनी । लेकिन रावण का राज उन औरतों के लिए दुखभरा था जिन्हें रावण ने बलपूर्वक अपहरण कर लंका में लाकर कैद करके रखा था। रावण ने वेदवती से लेकर हजारों स्त्रियों का शीलभंग किया था। लेकिन माता जानकी का चरित्र ऐसा था जिसने उन सभी दबी कुचली स्त्रियों के भीतर वो उम्मीद जगा दी कि रावण का प्रतिकार भी संभव है । माता जानकी ने हमेशा रावण को उसकी सीमाएं दिखाईं और ढृढता से उसके सम्मुख प्रतिकार की आवाज़ बन कर उभरीं । माता जानकी ने रावण को हमेशा यही दिखाया कि उसका चरित्र राम के उद्दात चरित्र के सामने बौना है । भले ही रावण प्रकांड पंडित था लेकिन श्री राम के रुपी सूर्य के सामने उसकी स्थिति एक जूगनू से ज्यादा नहीं थी.. सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।। जय श्री राम
03/10/2018
सुंदरकांड- स्त्रियों के संघर्ष की दास्तान
सुंदरकांड रामचरितमानस और रामायण का एक ऐसा अध्याय है जिससे होकर राम कथा के सारे पात्रों की जिंदगी के समाधान का राह खुलता है। हनुमान जी को इसी कांड में अपने देवत्व और शक्ति का अहसास होता है । राम और रावण के बीच फंसे विभिषण को राम के शरण में जाने का मार्ग मिलता है। माता जानकी को फिर से राम के पास वापस लौटने की उम्मीद मिलती है। भगवान श्री राम को माता जानकी का पता मिलता है । लेकिन इस कांड में एक बड़ा रहस्य यह भी छिपा है कि इसमें स्त्रियों के संघर्ष और लंका में उनकी दयनीय स्थिति का पता भी चलता है । जैसे ही हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं वहां सालों से राम के आने की उम्मीद पाली हुई लंकिनी से उनका साक्षात्कार होता है। लंकिनि उन्हें देखते ही कहती है कि ब्रह्मा जी ने उन्हें कहा था कि विकल होसी जब कपि ते मारे तब जानेहु निसिचर संहारे... तात मोर अति पुन्य बहुता देखेउं नयन राम कर दूता... इसके आगे भी लंकिनि यही कहती हैं कि तात स्वर्ग अपवर्ग सुख ...धरिये तुला एक अंग..तूल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सतसंग... इसका अर्थ यही है कि लंकिनी भी वहां रावण के राज की मारी हुई एक ऐसी नारी थी जो लंका के द्वार पर सालों से इंतजार कर रही थी कि कोई मुक्तिदाता आयेगा और उन्हें रावण के राज़ से मुक्ति दिलाएगा। इसी प्रकार जब हनुमान जी लंका में प्रवेश करते हैं और अशोक वाटिका के एक वृक्ष पर जाकर बैठते हैं। तब जब रावण माता सीता को प्रताड़ना देने के लिए त्रिजटा को आदेश देकर जाता है । तब शायद लंकिनी के द्वारा त्रिजटा तक यह संदेश पहुंच जाता है कि राम के दूत हनुमान लंका में प्रवेश कर चुके हैं। तभी त्रिजटा को भी यही उम्मीद बंधती है कि रावण के राज़ से मुक्ति अब संभव है और माता जानकी के साथ तब तक अच्छा व्यवहार होना चाहिए । त्रिजटा कहती है कि सबन्हौ बोली सुनाएसी सपना .. सीतहि सेई करहुं हित अपना । यहां तक कि त्रिजटा एक स्वप्न की कहानी गढ़ कर हनुमान जी को भी परोक्ष रुप से यही संदेश भेजती है कि वो लंका को जला डालें । त्रिजटा कहती है कि सपने बानर लंका जारे .. जातुधान सेना सब मारे। यहां तक कि कुबेर की पूर्व पत्नी मंदोदरी भी परोक्ष रुप से माता जानकी के पक्ष में ही खड़ी रहती हैं। जब रावण माता जानकी को मारने का प्रयास करता है तो उसे युक्ति पूर्वक दूर ले जाती हैं और कहती है .. सुनत बचन पुनि मारन धावा .. मयतनया कही नीति बुझावा.. कहेसी सकल निसचरन्हि बोलाई.. बहु बिधि सितहिं त्रासहु जाहि...। यहां तक कि जब हनुमान जी लंका जला कर वापस लौट जाते हैं तो इस अवसर पर जनता में फैले डर का भी इस्तेमाल मंदोदरी रावण के सामने करती है ताकि रावण डर कर माता जानकी को लौटा दे। मंदोदरी कहती है .. दूतिन्ह सन पुरजन बानी ..मंदोदरी अधिक अकुलानी...रहसि जोरी कर पति पग लागी ..बोली बचन नीति रस पागी..कंत करष हरि सन परिहू.. मोर कहा अति हित हिय धरहु.. समुझत जासु दूत कई करनी ..स्रवही गर्भ रजनीचर धरनी..तासु नारि निज सचिव बोलाई....पठहउं कंत जो चहहु भलाई...सुनहू नाथ सीता बिनु दिन्हे.. हित न तुम्हार संभु अज किन्हें.... इन सारी नारियों के कथनों से यह तो जरुर स्पष्ट होता है कि जिस रावण के राज के बारे में आज कल बुद्धिजीवी यह कहते पाए जाते हैं कि उसके राज़ में स्त्रियों की स्थिति बराबरी की थी। वहां स्त्रियां अपने पसंद का वर चुन सकती थी जैसे शूर्पनखा। वहां स्त्रियों का काम करने की आजादी थी जैसे लंकिनी । लेकिन रावण का राज उन औरतों के लिए दुखभरा था जिन्हें रावण ने बलपूर्वक अपहरण कर लंका में लाकर कैद करके रखा था। रावण ने वेदवती से लेकर हजारों स्त्रियों का शीलभंग किया था। लेकिन माता जानकी का चरित्र ऐसा था जिसने उन सभी दबी कुचली स्त्रियों के भीतर वो उम्मीद जगा दी कि रावण का प्रतिकार भी संभव है । माता जानकी ने हमेशा रावण को उसकी सीमाएं दिखाईं और ढृढता से उसके सम्मुख प्रतिकार की आवाज़ बन कर उभरीं । माता जानकी ने रावण को हमेशा यही दिखाया कि उसका चरित्र राम के उद्दात चरित्र के सामने बौना है । भले ही रावण प्रकांड पंडित था लेकिन श्री राम के रुपी सूर्य के सामने उसकी स्थिति एक जूगनू से ज्यादा नहीं थी.. सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा॥आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।। जय श्री राम
21/09/2018
रामकथा में सुंदरकांड का महत्व
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वाल्मिकी रामायण हो या फिर रामचरितमानस या फिर किसी भी भाषा में लिखी गई रामकथा अगर पूरी राम कथा में किसी खास अध्याय को सबसे ज्यादा महत्व है तो वो है सुंदरकांड । आखिर सुंदरकांड को इतना महत्वपूर्ण और पवित्र क्यों माना गया है आखिर इसका रहस्य क्या है । सबसे पहले सुंदरकांड का नाम सुंदर क्यों पड़ा इसी से शुरुआत करते हैं।बंदर का एक पर्यायवाची शब्द सुंदर भी होता है। चूंकि इस अध्याय मेें वानराधीश श्री हनुमान जी के पराक्रम की असली शुरुआत होती है । वो लंका जा कर माता सीता का पता लगाते है इसी वजह से ऐसा माना जाता है कि इस कांड को बंदरकांड की जगह एक बेहतर नाम सुंदरकांड दिया गया । लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है । सुंदरकांड रामायण का वो अध्याय है जिसमें सारे संकटों के निवारण की राह निकलती है। हनुमान जी जो पहले सिर्फ सुग्रीव के एक मंत्री भर थे वो राम कृपा से अपने अवतार स्वरूप में आते हैं । इस कांड के बाद से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि आने वाले कांडों में हनुमान जी की भूमिका बड़ी होने वाली है और वो भगवान श्री राम के सबसे प्रिय और संकटमोचक सिद्ध होने वाले हैं । दूसरी बात ये है कि इसी कांड के दौरान सीता जी केे सकुशल लंका में होने का पता भगवान श्री राम को लगता है । इससे भगवान को ये स्पष्ट हो जाता है कि माता जानकी कहां है और उन्हें वापस लाना संभव है। तीसरी बीत इसी अध्याय में माना वैदेही के दुखमय जीवन में एक उम्मीद ही रोशनी आती है जब हनुमान जी माता के पास अशोक वाटिका में पहुंचते हैं और उन्हें ये दिलासा देते हैं कि भगवान स्वयं आएंगे और रावण को मार कर उन्हें सकुशल ले जाएंगे। इसके पहले माता को भी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या वो सच में वापस लंका से लौट पाएंगी। चौथी बात ये है कि विभीषण को भी उनके आराध्य राम के चरणों में जाने का सौभाग्य प्राप्त हो जाता है और उनके जीवन की राह सुनिश्चित हो जाती है । इस प्रकार कई मायनों मे यही वो अध्याय है जो रामायण का वो पल है जब सारी निराशाओं के बाद आशाओं की शुरुआत होती है ।fइसके ठीक विपरीत रावण और लंका के लिए ये निराशाओं का और पतन की शुरुआत का दौर है। लंका दहन और विभीषण का पलायन इसी अध्याय में होता है । इसीलिए कहा जाता है कि सुंदरकांड को पढ़ने के बाद आपके जीवन में निराशाओं का अंत होता है और आपको जीवन में एक सुनिश्चित राह की प्राप्ति होती है ।
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