Shwet Prem Ras
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प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Spiritual Preacher
धर्म में पाखंड,अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्त करवाकर जीवों को तत्वज्ञान,शास्त्र सिद्धांतो से अवगत करवाकर दुखनिवृत्ति करवाना ।
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10/08/2026
प्रश्न: प्रभुजी जैसे श्रावण/ कार्तिक मास होते हैं इनकी भी कोई विशेषता है या ये भी ऐसे ही बनाए गए हैं?
उत्तर: प्रेम रसिक श्री श्वेताभ् जी महाराज
श्रावण मास या कोई भी मास नक्षत्र के आधार पर बना है ।
जब चन्द्रमा और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते करते किसी नक्षत्र के angular स्थैतिज्य पर आ जाते हैं तो उसे बोला जाता है कि ये इस नक्षत्र में प्रवेश कर गया ।
नक्षत्र है क्या ??
हमारे सूर्यमंडल की तरह अनंत सूर्यमंडल हैं जो हमसे कई लाखों करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर स्थित हैं ।
यह कई सौरमंडलों का समूह होता है ।
मतलब कई लोकों का समूह होता है ।
ऐसा नहीं जो हमें 5 तारे दिख रहे हैं वह एक ही साथ हैं ।
जो तारे एक दूसरे के पास दिख रहे हैं , वह ऊपर नीचे आगे पीछे मिलाकर एक दूसरे से कई करोड़ मीलों की दूरी पर स्थित होते हैं , और पृथ्वी से भी कई कई गुना दूर होते हैं ।
लेकिन हम लोगों को ऐसे दिखते हैं मानो एक साथ हों ।
तो इन तारों को groupings के आधार पर इनको नाम दे दिया गया है ।
ये कुल 27 नक्षत्र होते हैं जो पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा के समय दिखते और प्रभावित करते हैं ।
उसी के आधार पर मास बनाये गए हैं ।
तो यह जो श्रावण मास है यह चन्द्रमा के श्रवण नक्षत्र में प्रवेश या हमारे दृष्टि से प्रवेश होने पर आता है ।
इसे श्रवण नक्षत्र इसलिए कहा गया है क्योंकि गुरुपूर्णिमा के समय सब लोग गुरु धारण करते हैं और सावन और भादों या चतुर्मास में बाहर यात्रा करने की मनाही होती है , जिससे संतों महापुरुषों ने एक विधान बनाया है कि इस समय नदी नाले , रास्ते पर्वत सब वर्षा की चपेट में रहते हैं , अतः अब गुरु को धारण कर केवल उनके वचनों को श्रवण करने का समय है ।
इस कारण इस मास का नाम श्रावण मास पड़ा जिसका अपभ्रंश सावन हो गया ।
अब सोमवार का महत्व समझिये ।
सोमवार कुछ नहीं था ।
चूँकि सोम अर्थात चन्द्रमा ने अपने क्षय होने के लिए भगवान शंकर की आराधना की थी और भगवान ने उसको वर दिया था , इस कारण सोम के तप या आराधना के कारण इसे सोमवार से जोड़ दिया गया ।
दक्ष प्रजापति के शाप से चन्द्रमा क्षय होने लगा था तो नारद जी ने उसे भगवान शिव की आराधना करने को कहा था कि तुम्हें क्षय से केवल वही बचा सकते हैं ।
आपने देखा होगा इसी कारण महाकालेश्वर उज्जैन में भी चंद्रदेव का मंदिर है , गुजरात का सोमनाथ मंदिर बहुत प्रसिद्ध है ।
अब समझिये कि इसे symbolic तरीके से शास्त्रों में कैसे बताया गया है ।
ध्यान से समझियेगा सब लोग ।
सोम अर्थात चन्द्रमा ।
सोम का अर्थ अमृत होता है । आनन्द होता है ।
चूँकि मन का द्योतक चन्द्रमा है ।
ऋग्वेद कहता है -
चंद्रमा मनसो जायतश्चक्षो ।
चंद्रमा मन का कारक है ।
तो शास्त्रों पुराणों में जितनी भी कथायें हैं वह सब मानवीकरण करके समझाई गयी हैं ।
चन्द्रमा मन है ।
चन्द्रमा की चंचलता देखकर प्रजापति दक्ष ने उसे शाप दे दिया था कि तुम्हारा क्षय होता जाएगा ।
क्योंकि प्रजापति पूरे ब्रह्मांड का स्वामित्व करता है जिसके अंदर समस्त जीव चराचर आते हैं ।
और चन्द्रमा अपनी धुरी पर परिक्रमा इस प्रकार कर रहे थे कि 27 नक्षत्रों में प्रत्येक क्रम से विचरण करने के स्थान पर बार बार रोहिणी नक्षत्र में ही घूमते , जिससे पृथ्वी पर असंतुलन फैल रहा था ।
चूँकि चंचल मन के कारण जीवों चर अचर प्राणियों में और अन्य तत्त्वों में स्थिरता नहीं प्राप्त हो रही थी जिससे ब्रह्मांड की गतिविधियों का संचालन करने के लिए सही विधान नहीं बैठ पा रहा था और उसमें बाधा पहुँच रही थी , इस कारण प्रजापति दक्ष ने चन्द्रमा को क्षय होने का शाप दे दिया जिसे पुराणों में क्षय रोग के नाम से दर्शाया गया है ।
तो नारद जी के कहने से चन्द्रमा ने भगवान शिव की आराधना शुरू की इस क्षय रोग से निजात प्राप्त करने के लिये ।
अब देखिए समझिये थोड़ा ।
शिव कौन है ??
कल्याणकारी स्वरूप ।
शिव किसके द्योतक हैं ??
पंच प्राणों के । पंचमुखी इसी कारण भगवान शिव को दिखाया जाता है ।
ये पाँच मुख कौन ??
ईशान
तत्पुरुष
अघोर
वामदेव
सद्योजात
ये पाँचों पांच प्राणों के उद्देष्यकारक हैं ।
पाँच प्राण कौन ??
प्राण
अपान
समान
उदान
व्यान
इन्हीं प्राणों के आयाम को अगर हम नियन्त्रित कर लें तो मन पर नियंत्रण आसान हो जाता है ।
मैंने कई कई बार बताया है कि मन को स्थिर करने का तरीका श्वांसों पर ध्यान देना है ।
इसी कारण तप , स्वाध्याय , पूजन करने से पहले प्राणायाम का विधान बनाया गया है ।
अब आगे समझिये ।
तो मन को सही अवस्था या उच्च अवस्था में लाने के लिए शिवत्व की आवश्यकता होती है ।
जब हम शिवात्म में स्थित होते हैं तो ही मन स्थिर और सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त होता है ।
अब क्षय का अर्थ हुआ demotivated या पूरी तरह निरुत्साह अवस्था ।
तो उसके लिए केवल और केवल प्राणों पर ध्यान , श्वांसों पर ध्यान और भगवान का ध्यान ही एकमात्र उपाय है ।
इसी कारण मन को शिव की आराधना करने को बोला गया है ।
इसी कारण भगवान शिव ने चन्द्रमा को अपनी जटाओं में बाँधा हुआ है ।
चन्द्रमा मतलब सोम ।
सोम का अर्थ होता है अमृत ।
मन ही सुख और दुःख का कारण है ।
जब मन शिवत्व की अवस्था में आ जायेगा तो स्वतः ही अमृत तत्त्व निकलने लगता है अर्थात मन आनंदित रहता है ।
मन ही अमृत और विष का कारण है ।
जिसका मन शिवत्व में स्थित है अर्थात कामनाओं से रहित और प्राणों पर नियंत्रण है , उसी को सुख या अमृत तत्त्व प्राप्त होता है ।
Hormones ऊपर pituitary glands , hypothalamus जो मस्तिष्क का भाग है उसी से स्रावित होता है जिससे आनन्द मिलता है ।
इसी कारण चन्द्रमा को भगवान शिव के शीश पर दिखाया गया है ।
सोमवार को श्जलाभिषेक की परंपरा ऐसे ही शुरू हुई जब सोम ने भगवान शिव की आराधना की ।
लोगों ने इसे सोमवार से जोड़कर कर दिया ।
अपितु इसे सोमदेव ने पूजन किया था भगवान का निरन्तर कई महीनों तक , तो ये उस सोमदेव से सम्बंधित था ।
और अब ये सोमदेव किसका symbolic है मन का ।
मनसो जायते चन्र्दमा ।
मन से भगवान शंकर को भाव रूपी जल चढ़ाने को भोले भाले लोगों ने सोमवार से सम्बद्ध कर दिया और यही परम्परा चलती आ रही है ।
श्रावण में चूँकि गुरु शंकर रूपिणी है और उनके वचनों को मन यानि सोम से श्रवण करके उनको भावर्पित जलाभिषेक करना है तो लोगों ने दूसरे तरीके से करना शुरू कर दिया ।
कलियुग में सब मतिभ्रम के कारण ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है और वह परम्परा के रूप में विकसित हो जाती है ।
अगर उसको समझाने का भी प्रयत्न करेंगे तो भी नहीं समझ आता है क्योंकि मस्तिष्क उसे ही सही मानने लगती है ।
तो इस श्रावण में पूरे समय मन को प्राण रूपी शंकर से बाँधकर गुरु वचनों को श्रवण कर उनको भावों से अभिषेक करते हुए शिवत्व को धारण करें और अपना कल्याण करें ।
ॐ नमः शिवाय ।
💐💐
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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Note
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#सावन
#शिव
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09/08/2026
***** सर्वे मित्राणि समृध्दिकाले ।*******
समृद्धि काल में सब मित्र बनते हैं ।
इसीलिए अगर इस संसार में मित्र रखना हो या बनाना हो तो पहले समृद्ध बनो ! चाहे धन , यश , कीर्ति , ज्ञान , रूप किसी एक में अवश्य समृद्ध बनो !
पर लोगों को आकर्षित करने के लिए ताकि वो आपका मित्र बने , धन से समृद्धशाली होना अत्यंत आवश्यक है !
सब यही चाहते हैं कि येन केन प्रकारेण अमुक व्यक्ति से उसका काम निकले या बने । जिस व्यक्ति से जितनी मात्रा का कार्य सिद्ध होगा उतनी ही मात्रा का दूसरा व्यक्ति उसका मित्र होगा या उससे प्यार होगा ।
जिस दिन उसे यह समझ आ गया कि आप उसके काम के नहीं , उस दिन Tata Bye Bye !
THIS IS BITTER TRUTH !!
Shwetabh Pathak
Shwet Prem Ras
09/08/2026
प्रश्न :- मानस पुण्य और मानस पाप भी होता है क्या...
उत्तर :- -प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महराज
मानस पुण्य और मानस पाप ही होता है और कुछ नहीं होता ।
शरीर या इन्द्रियाँ पाप और पुण्य नहीं करती , एकमात्र मन ही है जो पाप और पुण्य करता है।
क्योंकि इसकी आज्ञा के बिना न इन्द्रियाँ कार्य नहीं करती और इन्द्रियाँ कार्य नहीं करेंगी तो शरीर तो जड़ है वह भी कार्य नहीं कर सकता ।
इसलिए समस्त वेद शास्त्रों में केवल कर्ता मन को माना गया है और इसी को कहा गया है कि मन ही समस्त कर्मों का कर्ता है , इसी का शोधन करना है क्योंकि यही मोक्ष और बंधन का कारण है।
★ पुनः प्रश्न- जैसे कि मन में आये की पैसा होता तो उनकी मदद करता या ऐसे ही गलत विचार आतें हैं तो इसका प्रतिफल भी मिलता है क्या ??
*-प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महराज*
बिल्कुल मिलेगा । मन के ही संकल्प विकल्प note किये जाते हैं ।
आपने जो शुभ संकल्प किया , उसका फल आपको मिलेगा। और जो गंदा किया तो वह भी note होगा ।
इसलिए सदा कहा गया है कि मन में दूषित विचार न लाओ। सदा शुभ संकल्प रखना है।
★पुनः प्रश्न- वो तो ठीक है भईया।
पर मनसा, वाचा, कर्मणा के अलग अलग पापों का फल अलग अलग विधि से मिलता है। ऐसा आचार्य जन कहते हैं।
यहां पर यदि केवल मन ही पाप करता तो मृत्युपरांत यातना शरीर बनने बनना ही संभव नहीं होता।
मन से किए गए पापों का कलियुग में अभय है , बस कर्मेंद्रिया उस आकांक्षा को न पूरी करें ।
*-प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महराज*
बहुत दिनों बाद प्रश्न आया है अभिमन्यु की ओर से ।
अब समझिए इसे ।
कोई जीव कर्म कब करता है ??
जब उसे उसका मन या बुद्धि यह निश्चय करा देती है कि अमुक कार्य करने से तुम्हारा फायदा होगा या तुम्हे फल की प्राप्ति होगी।
अगर मन नहीं आज्ञा देगा तो इंद्रियाँ कार्य कर ही नहीं सकती ।
मन ही संकल्पित करता है कि अमुक कार्य करना है।
मन ने निश्चय किया कि इसकी हत्या करनी है , करनी है करनी है ,बस यह विचार पुष्ट होते ही ,बुद्धि ने इंद्रियों को आदेश किया और हत्या हो गयी।
तो यह कर्मणा हुआ ।
वाचा अर्थात वाणी भी मन के अनुसार ही काम करेगी।
जब मन कहेगा तभी वह बोलेगी । जब मन दूषित होता है तो तभी आप किसी को गाली निकालते हैं ।
अगर मन नहीं दूषित है तो लड़के आपसे में गाली तक देकर बात करते हैं तो कोई बुरा नहीं मानता । लेकिन अगर दूषित मन से आपने किसी को साले भी बोल दिया तो सामने वाला गुस्सा हो जाता है।
तो यह सब मन के द्वारा होता है।
संसार वाले कब पीड़ा अनुभव करेंगे जब मन अपने भावों को इंद्रियों के माध्यम से प्रकट करेगा ।
क्योंकि संसार वाले अंतर्यामी नहीं है कि आपके मन मे क्या चल रहा है।
वह तो बस इंद्रियों का ही कार्य देखेंगे और उस पर ही react करेंगे।
बस इसीलिए कहा गया है कि मनसा वाचा कर्मणा से किसी को दुख न पहुंचाओ।
वरना तो कोई व्यक्ति किसी को देख कर सोच रहा हो कि मैं इसकी हत्या कर दूँगा, या इज़का बलात्कार कर दूंगा तो यह संसार वालों को थोड़ी न पता चलेगा न ही वह पीड़ा अनुभव करेंगे।
लेकिन भगवान के account में वह note हो गया ।
तो मन ही मुख्य है । बस इसी को कंट्रोल कर लो वाचा और कर्मणा अपने आप रुक जाएंगे।
-प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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अयोध्या मे एकदिवसीय सत्संग आयोजन
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09/08/2026
प्रश्न- प्रभु जी, शिवलिंग पर बेलपत्र अर्पित करने का क्या महत्व है?
उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
शिवलिंग पर हम जो भी तत्व का समर्पण करते है या चढाते हैं वह सब प्रतीक हैं जिनका हमने मूल स्वरूप भुला दिया और प्रतीक को ढो रहे हैं ।
बिल्वपत्र सत रज तम का प्रतीक है ।
जो हम भगवान शंकर पर अर्पित करते हैं ।
बिल्वपत्र पर राम नाम लिखकर भी अर्पित किया जाता है कि यह हमारे अंदर के सात्विक राजसिक तामसिक गुण सभी भगवदविषय से आलप्त और आच्छादित रहें ।
बिल्व पत्र के सेवन से मानसिक दौर्बल्यता नष्ट होती है और इन्द्रियों पर control होता है ।
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भगवान को अर्पित करने वाले जितने भी तत्व हैं सब प्रतीक हैं याद दिलाने के लिए कि हमें क्या क्या अर्पण करना है ,लेकिन कलियुग में सब नष्ट भ्रष्ट हो गया और हम स्वयं के विकारों को , श्रद्धा को, आंतरिक तत्वों के समर्पित करने के स्थान पर बाह्य प्रतीकों में ही उलझ कर अपना समय नष्ट करने लगे ।
जैसे architect के घर के नक्शे को देखकर प्रसन्न होकर उसी पर रहने लगे कि हमारा घर बन गया ।
जैसे कुत्ता हड्डी जब चूसते चूसते उसके मसूड़े से खून आने लगता है तो वह उसी अपने खून को चूसता रहता है और सोचता है यह हड्डी से निकल रहा है ।
इसीलिए तमाम कबीरदास , तुलसीदास , नाभादास से लेकर हर एक संतों ने मूल पर लौटने पर जोर दिया लेकिन हम अपनी अज्ञानतावश उनको ठुकराते रहे ।
और अब भी नहीं मानते ।
Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak
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