Shwet Prem Ras

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प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Spiritual Preacher

धर्म में पाखंड,अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्त करवाकर जीवों को तत्वज्ञान,शास्त्र सिद्धांतो से अवगत करवाकर दुखनिवृत्ति करवाना ।
www.ShwetPremRas.in

05/10/2026

प्रश्न— किसी को पूरे मन से क्षमा कैसे करें ? हमसे यह नहीं हो पाता है। कृपया मार्गदर्शन करें। 🙏🏻

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

श्रेय मार्ग पर चलना शुरू कर दीजिए, भगवान से प्रेम करना शुरू कर दीजिए। यह बीमारी ही समाप्त हो जाएगी कि हमें किसी को क्षमा करना है या नहीं।

क्षमा शब्द कब आता है?

जब हम दूसरों में दोष का दर्शन करते हैं। यह सोचते हैं कि मैं सही हूँ और वह गलत है। और अब जब मैं उससे बड़ा हो गया हूँ, तो उसे क्षमा करने का अधिकार भी मेरा है।

यही अहंकार की भावना क्षमा का भाव लाती है। हमें इन सबसे ऊपर उठना पड़ेगा।

हमें यह भान ही नहीं होना चाहिए कि यह गलती है और अब मैं - अर्थात् मेरा अहंकार, उसे क्षमा करूँ या नहीं करूँ।

क्यों इस पर बुद्धि लगानी ?

जो बीत गई, सो बात गई। बस उसे छोड़ दें। न दंड का भाव लाएँ, न क्षमा करने का।

क्योंकि क्षमा वही करेगा, जो दूसरे को गलत समझेगा और स्वयं को बड़ा एवं सही।

तो यह भाव ही क्यों लाना?

किसी व्यक्ति ने हमारे साथ गलत किया। बस एक ही उपाय है - भूल जाइए। लेकिन सावधानी यह रखें कि उस व्यक्ति के प्रति न राग हो, न द्वेष हो और उससे सावधान रहें।

बस! क्योंकि जितना इन सब पर अपनी बुद्धि और हृदय खर्च करेंगे, उतना ही हरि से दूर होते जाएँगे।

क्योंकि दिन-रात यही चिंतन चलता रहेगा कि अमुक व्यक्ति ने हमारे साथ ऐसा किया, तो हम उसे क्षमा करें या दंड दें।

और अगर चलो, क्षमा भी कर दिया, तो स्वतः अन्तःकरण में यह बात पोषित हो जाएगी कि “मैंने उसे क्षमा किया।”

किसने किया?

“मैंने।”

यही अहंकार को पोषित करेगा।

इसीलिए कबीरदास जी ने कहा है—

कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी माँगे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।

यही स्थिति लानी है—बिल्कुल राग-द्वेष-शून्य। न किसी के प्रति अनावश्यक लगाव हो और न किसी के प्रति द्वेष।

क्यों अपने छोटे-से जीवन को इन सबमें उलझाए रखना ?

बिल्कुल सहज और सरल बनिए। जितना इन सब चक्करों में पड़ेंगे, उतना ही सिरदर्द, अनिद्रा, तनाव, अवसाद और समय की बर्बादी बढ़ेगी।

जीवन को सुखपूर्वक नहीं जी पाएँगे।

इसीलिए निर्दोष बनते हुए इन सबसे ऊपर उठने का प्रयत्न करें।

अरे, किस-किस को क्षमा करेंगे या दंड देंगे?

यह जीवन जब तक है, तब तक कोई न कोई आपसे टकराता रहेगा, कभी राग के कारण, कभी द्वेष के कारण।

आपसे स्वार्थ की पूर्ति होते ही वह आपका साथ छोड़ देगा। आप भी तो ऐसा ही करते हैं, न ?

तो फिर केवल उसी का ही दोष क्यों देखना ?

जब तक भगवद्प्राप्ति नहीं हो जाती, यह रोग लगा ही रहेगा।

एक ही दिन में अगर गिनाने लगूँ, तो सौ से भी अधिक ऐसे तत्व पहुँच जाएँगे, जिन्हें आपको क्षमा करना होगा या दंड देना होगा।

क्या हम इसीलिए पैदा हुए हैं कि इसी में अपना मन उलझाए रखें कि अमुक व्यक्ति को हमें क्षमा करना है और अमुक व्यक्ति को दंड देना है ?

क्यों इतना बहुमूल्य समय नष्ट करना ?

इसीलिए इन सबसे परे होकर, बस अपने कल्याण के विषय में सोचते हुए -

राग-द्वेष से ऊपर उठिए, अपने मन को हरि में लगाइए और अपने जीवन को भगवद्प्राप्ति की ओर लगाइए।

भज गोविंदम भज गोविंदम
गोविंद भज मूढ़मते

प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक



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Note

✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , company आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।

✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349

05/10/2026

प्रश्न- राधे राधे प्रभु जी, श्राद्ध पक्ष में आपने जो लक्षण बताएं है कि इस तरह के ब्राह्मण को भोग खिलाना चाहिए, वो मिलना बहुत ही मुश्किल है उस स्तिथि में क्या करना चाहिए एवं हमारी दिनचर्या क्या होनी चाहिए इन दिनों में? जिससे हम ज्यादा से ज्यादा अपने पितरों के निमित्त कुछ कर सकें।

उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

श्राद्ध में सभी ब्राह्मण को या किसी को भी भोजन कराने का प्रावधान नहीं है ।

शील , शौच , प्रज्ञा से युक्त सदाचारी , संध्या वंदन या गायत्री से युक्त , जप तप से युक्त ब्राह्मण को ही दान करने का गम्भीर विधान है ।

तप , धर्म , दया , दान , सत्य , ज्ञान , वेदज्ञान , कारुण्य , विद्या , विनय और अस्तेय आदि गुणों से युक्त ब्राह्मण ही इसका अधिकारी है ।

इसके अतिरिक्त किसी ब्राह्मण को भी अगर आप श्राद्ध का भोजन कराते हैं तो पितृ इससे घोर त्रास पाते हैं और सब उल्टा हो जाता है ।

और कलियुग में यह सब जल्दी मिलना असम्भव सा है ।

इसीलिए तुलसीदास जी ने कहा था -

कलियुग योग यज्ञ नहीं ज्ञाना ।

एक आधार राम गुन गाना ।।

नहिं कलि कर्म न भगति विवेकू ।

राम नाम अवलंबन एकू ।।

भगवान शिव ने कहा -

उमा जोग जप दान तप नाना मख व्रत नेम ।

राम कृपा नहिं करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ।।

जहाँ जहाँ यज्ञ आया है , वह पितृ यज्ञ भी है जिसे श्राद्ध कहा जाता है ।

तो इसलिए ऐसे ब्राह्मण का चयन करें जो भगवान के प्रेम से आलप्त हो ।

जो भगवद्भजन से युक्त हो , वह चाहे ब्राह्मण कुल का हो न या हो , उसके द्वारा तर्पण किया जा सकता है ।

गरुड़ पुराण से लेकर मत्स्य पुराण से लेकर यागवल्क्य स्मृति , पराशर स्मृति सभी एकमत से यह बात स्वीकारते हैं कि अगर कोई भगवान का प्रेमी भक्त मिल जाता है तो उसे तृप्त कर , उसे दान देकर आप सभी यज्ञ सम्पन्न कर सकते हैं ।

लेकिन कलियुग में यह खोजना भी असम्भव सा है तो गाय आदि को खिलाकर जितना हो सके हरिनाम संकीर्तन या भजन करें जिससे आपके पूर्वज प्रसन्न होंगे ।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak



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✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

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#पितृपक्ष #शिव ।post #मृत्युभोज #मृत्युभोज #मृत्यु #सनातनधर्म #श्राद्ध #कनागत

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04/10/2026

प्रश्न: अंतःकरण चतुष्टय किसे कहते हैं?

उत्तर: प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज—

देखिए, बुद्धि, मन, चित्त और अहंकार—इन चारों को अंतःकरण चतुष्टय कहते हैं।

जब हम लोग कहते हैं कि साधना से अंतःकरण शुद्ध करना है, तो इसमें ये सभी सम्मिलित होते हैं।

सर्वप्रथम बुद्धि है। यही सब कुछ इंद्रियों से ग्रहण कर निश्चय या निर्णय करती है।

किसी भी चीज़, वस्तु या तत्त्व को इंद्रियों द्वारा ग्रहण किया जाता है, उसका ज्ञान बुद्धि करती है। वही निर्णय और निश्चय करती है।

मन क्या करता है?

मन संकल्प-विकल्प इत्यादि करता है।

कब करता है?

बुद्धि जब निर्णय या निश्चय करती है, तब।

तब इसी निर्णय के आधार पर मन संकल्प-विकल्प करता है।
बुद्धि के द्वारा ही मन संचालित होता है।

मन के द्वारा इंद्रियाँ संचालित होती हैं।

जो गोपियाँ करती थीं, उनकी बुद्धि ने निश्चय कर लिया था कि हमें प्रेम एकमात्र श्रीकृष्ण से करना है, वही हमारे सर्वस्व हैं।

यह निश्चय हो चुका था, जिसके कारण मन सदा उन्हीं में अनुरक्त रहता था।

इंद्रियों से कार्य करते हुए भी उनका मन सदा श्रीकृष्ण में ही रहता था।

कैसे?

ऐसे—सबने साइकिल चलाई होगी। शुरू-शुरू में खूब मन लगाना होता है कि अब पैडल मारना है, हैंडल संभालना है, बैलेंस बनाना है, ट्रैफिक का भी ध्यान रखना है। मन का पूरी तरह ध्यान उसी में लगा रहता है।

लेकिन जब इंद्रियों को साइकिल चलाने की आदत पड़ गई, फिर क्या हुआ?

अब आप दोस्तों से बात करते हुए साइकिल पर जा रहे हैं, लेकिन पैर पैडल चला रहे हैं, हाथ ने हैंडल भी पकड़ा हुआ है, शरीर का बैलेंस भी बना हुआ है, लेकिन आपका मन उस मित्र की बातों पर है या कुछ और सोच-विचार चल रहा है।

तो यह अभ्यास से आता है।

इसे ही कर्मयोग की अवस्था कहते हैं।

तन कार में और मन यार में।

इसी हेतु भक्त सभी कार्य भगवान को समर्पित करते हुए और उनके निमित्त करता है।

उसका सब कुछ संसार का होते हुए भी भगवान के निमित्त होता है। भक्त आपको सभी कार्य सांसारिक करते हुए, साधारण जन की तरह ही दिखता है, लेकिन उसमें और हममें बहुत बड़ा अंतर है।

उसकी उन कार्यों में आसक्ति नहीं होती।
वह अनासक्त भाव से सभी कर्म करता है।

“तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन् कर्म परम् आप्नोति पूरुषः॥”
— श्रीमद्भगवद्गीता

लेकिन संसार को लगता है कि अरे, वह तो हमारी तरह ही कार्य कर रहा है।

लेकिन हमारे और उसके कार्यों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।

वह सभी कार्य करते हुए भी कोई कार्य नहीं करता।

हनुमान जी ने लाखों हत्याएँ कीं, लेकिन उनका मन श्रीराम के चरणों में ही लगा रहा।

अर्जुन ने करोड़ों हत्याएँ कीं, लेकिन उनका चित्त भगवान के चरण-कमलों में ही लगा रहा।

यही कर्मयोग का सिद्धांत है।

#प्रेम_रसिक_श्री_श्वेताभ_जी_महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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04/10/2026

प्रश्न- प्रभु जी, मृत्युभोज वैध या अवैध ? इस पर विस्तृत चर्चा और शास्त्रोक्त उदाहरण, यदि मिल सके तो मार्गदर्शन कर दीजिए l

उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

मृत्युभोज है वह दान या उस मृत व्यक्ति के निमित्त दान जो उसने पूरे जीवन भर अपने अमूल्य देह की परवाह न कर , अपने आने वाली generation के लिए इकट्ठा किया है ।

उसके समय द्वारा जो धन इक्कठा हुआ है , वह किसी तरह परोपकार या दान में काम आ जाये जिससे उसका कुछ समय पुण्य भाग में परिवर्तित हो जाये , इसलिये मृत्यु भोज बनाया गया ।

अन्न दान सबसे उत्तम दान कहा जाता है ।

लेकिन एकमात्र वंचितों , गरीबों , साधु , संतों के निमित्त ही ।

लेकिन आज परिभाषा बदल गयी और लोगों ने अपने सगे संबंधियों को खिलाने लगे।

मृत्युभोज का तो भोजन शास्त्रों में वर्जित बताया गया है साधकों को ।

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पुनः प्र०- साधक यदि मृत्युभोज कर ले, तो क्या उस तप, साधन शून्य ?

उ०-

बिल्कुल उसका पुण्य और साधना का ह्रास होता है । अतः इससे बचना चाहिए l

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★ पुनः प्र०- क्या साधक को अपने पितरों के निमित्त यह करना भी नहीं चाहिए?

उ०-

नहीं l करना तो अवश्य चाहिए ।

इस बहाने जितना दान हो सके वह सही है।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
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03/10/2026

स्वच्छता अभियान :
पता नहीं कैसे लोग किसी भी चीज़ का श्रेय किसी और पर थोप देते हैं ।

ऐसा लगता है जैसे भारतीयों से गंदी कोई कौम नहीं थी । सब मल मूत्र लपेटे पड़े रहते थे । सदियों से कोई नहाता तक न था । लोगों के शरीर पर मक्खी भिनभिनाती रहती थी ।
लोग जिस थाली में खाते थे उसी में ही मल मूत्र त्याग करते थे ।
वो तो भला हो एक महामानव का जो अफ्रीका से पढ़कर आया और उसने भारतीयों को स्वच्छता सिखाई । उसने ही नहाना सिखाया , उसने ही धोना सिखाया ।
मल मूत्र का त्याग कहाँ किस स्थान पर करते हैं ,उसी व्यक्ति ने हमें बताया ।

धन्य हैं लोग !!!

अरे जिसकी धार्मिक पुस्तकें बिना हाथ धोए छूना वर्जित था , जिसकी संस्कृति में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर एकमात्र सिर्फ स्नान के पश्चात ही कोई कार्य करने का विधान हो उस संस्कृति को क्या कोई स्वच्छता सिखाएगा ???

जहाँ सिर्फ किसी स्थान पर बैठने तक के लिए शुद्धिकरण मंत्र है । जहाँ किसी पदार्थ को उपयोग में लाने के लिए शुद्धि की जाती हो , ऐसे संस्कृति पर यह ठप्पा लगाना कि उसको स्वच्छता एक विशेष व्यक्ति ने सिखाई , हमारी गुलाम मानसिकता का परिचायक है ।

शुद्धिकरण के लिए एक मंत्र ही बना दिया गया:-

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थाम गतोsपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यांतरः शुचि ।।

अर्थात बाह्य तो शुद्ध हो ही और अंतःकरण भी शुद्ध करना है ।

अरे यहाँ तक कि एक गंदे शव को भी स्नान कराने के पश्चात ही अंत्येष्टि की जाती है ।
कोई मात्र किसी के घर किसी के मरने पर बस उसके घर चला भी जाता है तो घर में उसका प्रवेश वर्जित होता है जब तक वह वहीं बाहर नहा धोकर वस्त्र न बदल ले ।

यही कारण था जिसके कारण मृत पशुओं के चमड़ा रक्त या मांस का व्यापार करने वाले व्यक्ति को कोई छूता तक नहीं था और मंदिरों में प्रवेश की तो बात ही दूर है ।

जिसके कारण हम पर जातिवाद का आरोप लगा हमें ज़लील किया जाता है , वह एकमात्र स्वच्छता तत्व ही था ।
यही स्वच्छता थी जिसके कारण मल ढोने वाले लोगों को मंदिरों में प्रवेश वर्जित कर दिया गया कि जब तक वह नहा न लें , तब तक वह मंदिर में प्रवेश नहीं करेंगे , जिसको आधार बनाकर हमें जातिवादी बोला गया ।

आज भी हमारे समाज में कई लोग हैं , जो अधम कार्य करने वाले व्यक्ति के हाथ का पानी तक नहीं पीते । उनके घर का भी पानी तक नहीं पीते , अन्न कण की बात तो दूर है ।

मुझे याद है हमारे मामा ने एक बार दोस्तों के प्रभाव में आकर कहीं Non Veg खा लिया था , तो मेरी नानी ने 28 दिन तक उनको केले के पत्ते पर भोजन दिया था और घर के किसी भी पात्र में उनको खाने की इजाजत तक नहीं थी । उनका बिस्तर , कपड़े तक सब अलग कर दिए गए थे कि जब तक उस मांस के भोजन का रस शरीर से बाहर नहीं जाता तब तक वह अलग थलग कर दिए गए थे ।
क्योंकि 28 दिन तक भोजन का प्रभाव रहता है ।
मैं इस बात का पक्ष नहीं ले रहा , परंतु यही दिखाने की कोशिश कर रहा हूँ कि पहले के लोग आचार , विचार , संयम , आंतरिक शुद्धता पर कितना बल देते थे ।

मैं challenge के साथ कहता हूँ कि सनातन धर्म को छोड़कर विश्व का कोई ऐसा धर्म नहीं जिसमें शौच या स्वच्छता के विषय में कोई अध्याय लिखा गया हो । हमारे हर शास्त्र में , उसके हर पृष्ठ पर कोई न कोई स्वच्छता से सम्बंधित श्लोक या मंत्र मिल जाएगा ।
यहाँ तक कि इसी शुद्धिकरण के लिए केले के पत्ते पर भोजन करने का प्रावधान था और उसे भी शुद्ध करने के पश्चात ही भोजन के लायक कहा जाता था ।
यहाँ तो लोग बाह्य स्वच्छता ही जानते हैं , हमारी संस्कृति में तो आंतरिक एवं बाह्य स्वच्छता दोनों पर विशेष जोर दिया गया ।
हमारे सारे कर्मकांड स्वच्छता को लेकर ही हैं ।

अरे कौन सा ऐसा धर्म होगा जो शव तक को स्नान कराता है , यह जानते हुए भी कि मात्र 10 मिनट बाद इसको जला देना है ?????

गीता में तो भगवान कृष्ण ने सोलहवें अध्याय में स्वच्छता पर बल देने के उद्देश्य से बाह्य परिवेश से अंतर्मन की शुद्धता ही बता दी ।

वेदों में तो स्वच्छता को ईश्वरीय गुण ही बता दिया गया है ।
यज्ञ , हवन , होम इन सबका विधान बनाया गया ताकि पूरा पर्यावरण में व्याप्त नकारात्मक बैक्टीरिया वायरस इत्यादि से भी शुद्धिकरण हो जाये ।

जिसके सभी तीर्थ एकमात्र सरोवर , नदियों और जलाशयों के किनारे हों , उसको स्वच्छता सिखाना ऐसा है जैसे कोई अनपढ़ Nikola Tesla को बिजली के विषय में कोई जानकारी दे ।

यही भगवान श्रीकृष्ण थे जिन्होंने स्वच्छता के ही महत्व को दर्शाने के लिए युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के दौरान झूठे पत्तलों को उठाने की सेवा ली और स्वयं सबके झूठे पत्तल उठाये और समस्त विश्व को संदेश दिया कि स्वच्छता अत्यंत आवश्यक है और यह छोटा बड़ा कार्य नहीं है ।

हो सकता है कि गांधी जी के पास ऐसे लोगों का बाहुल्य हो जो नहाते न हों , गंदगी में रहते हों , स्वच्छता का ध्यान न देते हों , उनके लिए उन्होंने स्वच्छता के लिए बोला हो ।
परन्तु अन्य लोग जब उन्हें स्वच्छता के पुरोधा के रूप में प्रेषित करते हैं तो लगता है हम क्यों हज़ारों वर्षों तक गुलाम रहे ।

यह ध्यान रहे कि हमारा सनातन धर्म स्वच्छता से ही शुरू होता है और स्वच्छता पर ही उसका अंत होता है ।

- श्वेताभ पाठक
Shwetabh Pathak
Shwet Bhakti Ras
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#स्वच्छताअभियान
#सफाईअभियान

03/10/2026

प्रश्न :- महाभारत को घर में रखना चाहिए या नहीं?

उत्तर :-
लोग कह रहे हैं कि #महाभारत घर में नहीं रखनी चाहिए और देखनी भी नहीं चाहिए । ये लोग कहाँ से आते हैं भाई? कौन लोग हैं यह? पूछने पर बताते हैं कि इससे घर में लड़ाई हो जाएगी और यह घर के लिए शुभ नहीं होता। ओह्ह !

आप महाभारत घर में रखिए या ना रखिए अगर मानसिक स्वास्थ्य सही नहीं है तो कलह फिर भी होगा। वैसे इसका मुख्य कारण वामपंथियों द्वारा फैलाई गई झूठी बातें हैं। महाभारत रखिये भी और पढ़िए भी। कुछ दुर्बुध्दि जीव स्वयं से पढ़कर अच्छे पात्रों का अनुसरण करने की बजाय दुर्योधन और कंस जैसों को उचित ठहराते हैं।

मतलब जब वेदव्यास जी ने महाभारत लिखी होगी तो वेदव्यास जी की सभी लोगों से लड़ाई हो गयी होगी? गीता प्रेस या कोई भी प्रेस या Publisher जब इसको छाप रहा होगा या लिख रहा होगा, तब सब आपस में लड़-कट कर मर गए होंगे? वह पुस्तक की दुकान, वह डाकिया जहाँ-जहाँ पुस्तक गयी होगी, सब लड़-कट कर मर गए होंगे?

अरे ! मुझे यह बताईये कि "महाभारत" शब्द में कहाँ से आपको लड़ाई-झगड़ा वाला अर्थ नज़र आया? अगर किसी के कान से पस भी बह रहा होगा या किसी को मोतियाबिंद भी हो गया होगा, वह भी महाभारत शब्द सुन या देख कर यह नहीं कह सकता कि इसका भाव लड़ाई-झगड़ा निकल रहा है।

"महाभारत" का क्या अर्थ है? "महाभारत - महान या विशाल + भारत या आर्यावर्त" इसका अर्थ है- "उस महान या विशाल भारत की कहानी।" इसमें किसने लड़ाई-झगड़ा खोज लिया? ये पता नहीं क्यों मूर्ख लोग यह शब्द प्रयोग करने लगे कि "मैं महाभारत करवा दूंँगा या महाभारत हो जाएगी?" अगर हो भी जाएगी तो अच्छी बात है, मतलब यह भारतवर्ष फिर महान बन जायेगा। लोगों ने क्यों इस शब्द का प्रचलन किया, यह समझ के बाहर है?

महाभारत तो बहुत अच्छी पुस्तक है। यह नीति-ज्ञान, धर्म-कर्म, कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में कितनी अच्छी शिक्षा देती है। यह पुस्तक तो जानबूझ कर रखनी चाहिए कि हमारे घर से अधर्म का नाश होगा और धर्म की स्थापना होगी।

कुछ लोग वह अर्जुन को गीता का उपदेश करते भगवान कृष्ण वाली फ़ोटो भी नहीं लगाते कि यह अपशकुन होता है। अरे ! अपशकुन तो तुम्हारी बुद्धि बन गयी है जो उस चरित्र और उस घटना की साक्षी को अपने घर में नहीं लगा रहे, जो अधर्म का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए हुई थी।

भगवान कृष्ण ने तो यही करवाया था न? सभी अधर्मियों को मरवा दिया था और धर्म की स्थापना की। तो फिर इससे क्यों डरना? अरे ! सर्वश्रेष्ठ "गीता ज्ञान" जिसके सामने पूरा विश्व नतमस्तक है, इसी से मिला है। “विदुर नीति” जैसी महान नीति की शिक्षा, इसी से मिली है। भगवान की विभिन्न लीलाओं का वर्णन इसी में हैं और जिसमें भगवान की लीलाओं और उनके जन का वर्णन हो, उसको तो शास्त्र सर्वोपरि संज्ञा देते हैं।

ऐसे देखा जाय तो, रामायण में भी भगवान ने बचपन से ही हज़ारों राक्षसों का वध किया। रावण जैसे दुरात्मा का अंत करने के लिए लाखों की सेना बनी और लाखों लोग युद्ध के ग्रास बने।

यही #रामायण है जिसमें राज्यतिलक से एक दिन पहले ही चौदह वर्ष का वनवास हो जाता है। भगवान राम एवं सीता जी वन को भेज दिए जाते हैं, लक्ष्मण जी उर्मिला से अलग, भरत जी मांडवी से अलग, शत्रुघ्न श्रुतिकीर्ति से अलग, दशरथ जी की तड़प-तड़प कर पुत्र वियोग में मौत, तीनों रानियों का विधवा होना, श्रवण कुमार की मौत, लक्ष्मण जी को शक्ति लगना एवं नागपाश में बंधना, सीता जी का हरण होना, सीता जी की अग्निपरीक्षा, सीता जी का वनवास, सीता जी के पुत्रों का वन में ही जन्म देना, उन दोनों का तो वैवाहिक जीवन जैसे उथल-पुथल में रहा।

फिर तो "रामायण" या #रामचरित्रमानस" भी नहीं रखनी चाहिए घर में, क्योंकि इससे दाम्पत्य जीवन खराब होगा या कोई तुम्हारी स्त्री को उठा ले जाएगा और हो सकता है तुम्हारे बच्चे भी वन में ही जन्म लें !

अरे ! कोई भी अपने इतिहास को उठा लो, सब में धर्म की स्थापना के लिए लड़ाईयाँ हुई हैं, तभी वह आज स्थायित्व या स्वीकार्यता में है। अगर संघर्ष या लड़ाईयाँ नहीं होंगी तो वह कथा ही नहीं बनती या उसको ऐतिहासिक पटल पर मान ही नहीं मिलता।

किसी की भी कथा या Story उठा लो, सब में संघर्ष या लड़ाई है। राजा हरिश्चन्द्र, नल-दमयंती, सती सावित्री, ध्रुव, प्रह्लाद इत्यादि कोई भी नाम ले लो, सब में संघर्ष व लड़ाई है।

अच्छा ! सब छोड़ो, दुर्गा सप्तशती होगी सबके घर में। उससे वीभत्स कोई लड़ाई हो तो मुझे बता देना। पूरी सप्तशती तो एकमात्र लड़ाई पर ही Based है। फिर भी वह घर में है ना, और नवरात्रि के वक़्त सभी पाठ करते होंगे, तो क्या लड़ाई हुई सबसे?

#शिव पुराण, #विष्णुपुराण, देवी पुराण इत्यादि सबमें धर्म की स्थापना के लिए असुरों का संहार किया गया है लेकिन सबके घर में होती है यह। भगवान शंकर का रूप देखिये, काल भी थर्रा जाय, लेकिन सबके घर में हैं भगवान। कोई भी देवी-देवता की छवि उठा लें, सबके हाथों में गदा, धनुष, चक्र, तलवार से लेकर तमाम तरह के अस्त्र-शस्त्र हैं, तो क्या आपके घर में सबकी हत्या हो गयी?

कभी तो तर्क से सोच लिया करो। यह लड़ाई-झगड़े कोई पुस्तक नहीं करवाती, एकमात्र व्यक्ति की सोच, नज़रिया और उसका आचरण करवाती है। इसलिए, फालतू के प्रपंचों को छोड़कर सिद्धांतों पर ध्यान केंद्रित करिये ताकि अपनी और अपने शास्त्र या धर्म की हँसी उड़ने से बचे।

श्वेत तत्व दर्शन, भाग - 1, पृष्ठ संख्या - 552
#प्रेम_रसिक_श्री_श्वेताभ_जी_महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
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✨ अक्टूबर में शरद पूर्णिमा के अवसर पर साधना समागम का आयोजन किया जा रहा है,जो कि 24 से 28 अक्टूबर 2026 तक प्रस्तावित है, इस 5 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349

03/10/2026

प्रश्न: प्रभु जी, पंचबलि क्या होती है? कृपया शंका समाधान कर दीजिए।


उत्तर: प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

पंचबलि होता है -

1. गोबलि - गाय के लिए भोजन निकालना , या चारा निकालना या कोई भी अन्न या चारा खिलाना ।

2. श्वानबलि - कुत्ते के लिए भोजन निकालना या उसे खिलाना ।

3. काकबलि - पक्षियों के लिए भोजन निकालना । चूँकि कौवा पक्षियों में अधम माना जाता है इसलिए कौवा है । अन्यथा काकबलि का अर्थ है पक्षियों की प्रजाति के लिए निकालना ।

4. देवादिबलि - जिसमें लौकिक देवताओं के लिए निकालना ।

5. पिपिलादिक बलि - चीटियों या कीड़ों के प्रजाति के लिए निकालना भोजन ।

यह पंचबलि इसलिए किया जाता है कि इन पाँचों योनियों से सम्बंधित जीवों को भोजन करवाया जाय । क्योंकि इन्हीं में से अगर किसी भी योनि में हमारे पितृ होंगे तो उनको प्राप्त हो जाएगा ।

ये पाँच ही क्यों लिए गए , यह भी बता देता हूँ ।

देखिये दस प्रकार की सृष्टि होती है ।

इनको दो भागों में बाँटा गया है ।

पहला प्राकृत सृष्टि ।

दूसरा वैकृत ।

प्राकृत आप लोग नहीं देख सकते ।

इनमें 6 सृष्टियाँ आती हैं । ऊपर ऊपर से समझ लीजिए ज्यादा नहीं समझाऊँगा , बहुत समय लग जायेगा ।

1. महतत्त्व की सृष्टि ।

2. अहंकार की सृष्टि

3. भूतसर्ग की सृष्टि

4. इन्द्रियों की सृष्टि

5. इन्द्रिय अधिष्ठाता देवताओं की सृष्टि

6. अविद्या की सृष्टि

बाकी 3 वैकृत सृष्टि है जो हमारे चर्मचक्षुओं से दिखती है ।

7. स्थावर वृक्षों की ।

8. तिर्यग योनियों की जिनमें पशु पक्षी आते हैं ।

यही अभी अपने काम की है कि क्यों इन्हीं 5 जीवों को ही लिया गया श्राद्ध में ।

तो इसको समझते हैं ।

यह तिर्यगयोनि 28 प्रकार की होती हैं ।

इन्हें काल का ज्ञान नहीं होता , विचारशक्ति , दूरदर्शिता का अभाव होता है ।

इनमें दो खुर वाले प्राणी आते हैं जिनमें गौ , बकरा , भैंसा , सुवर , ऊंट हिरन आदि ।

दूसरे होते हैं एक खुर वाले - गधा , घोड़ा , खच्चर आदि ।

तीसरे पाँच नखवाले जिनमें कुत्ता , गीदड़ , बन्दर , हाथी , बाघ , मगर आदि ।

चौथे होते हैं उड़ने वाले पक्षी जिनमें बगुला , मोर , हंस , कौवा आदि आते हैं ।

पांचवे कीड़े मकोड़े चींटी आदि ।

बाकी का आपको बताने का कोई लाभ नहीं क्योंकि पोस्ट लम्बी हो जाएगी ।

तो 9th पर आते हैं

9. मनुष्य योनि की सृष्टि ।

10. देवसर्ग की योनि जिनमें प्राकृत और वैकृत दो प्रकार की देवयोनि होती है ।

तो यह सब वैकृत सृष्टियाँ होती हैं ।

और एक और होती है जिनमें दोनों प्राकृत और वैकृत सृष्टि की योनि होती है ।

इनमें सनत्कुमार , सप्तर्षि , मनु आदि ऋषि आते हैं ।

अस्तु हमें 10 तक से ही अभी मतलब है ।

तो जो अभी तिर्यक योनियाँ बताई हैं पशु पक्षी की , उनमें से एक एक ऐसे जीव को चुन लिया गया जो प्रचूर मात्रा में उपलब्ध हों और हर जगह उपलब्ध हों ।

एक जीव , एक सृष्टि की योनि को प्रदर्शित करता है या उसका representative है ।

जैसे गाय , कुत्ता , कौवा , चींटी , मनुष्यों में ब्राह्मण और देवताओं की योनि ।

तो इन्हीं में से अगर किसी भी योनि में हमारे पितृ गए होते हैं तो हम इन्हीं को आधार मानकर इनको भोजन करवाते हैं ।

एक एक जीव इनमें से एक शृंखला को प्रदर्शित करता है ।

इसलिए इस पंचबलि का विधान बनाया गया है ।

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak



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