Shwet Prem Ras

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प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक
Spiritual Preacher

धर्म में पाखंड,अंधविश्वास की बेड़ियों से मुक्त करवाकर जीवों को तत्वज्ञान,शास्त्र सिद्धांतो से अवगत करवाकर दुखनिवृत्ति करवाना ।
www.ShwetPremRas.in

08/06/2026

🔴 LIVE Day 5 | S 4 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

08/06/2026

🔴 LIVE Day 5 | S 3 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

08/06/2026

🔴 LIVE Day 5 | S 2 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

08/06/2026

प्रश्न: गुरुजी प्रणाम, अध्यात्म में प्रवेश करने से पहले क्या संसारी माया लोभ प्रपंच आदि देकर रोकना चाहती है या यह मन की परीक्षा होती हैं या कुछ और?

उत्तर: प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

परीक्षा आदि कुछ नहीं होता ।
यह सब मन की धारणा जो हमारे मन में बसी हुई है , उन धारणाओं के विपरीत कोई बात आ जाती है तो हम उसे परीक्षा बोल देते हैं ।

परीक्षा या भगवान ने या गुरु ने मेरी परीक्षा ली , यह सब केवल हमारे मन की धारणा है , इससे भगवान का कुछ लेना-देना नहीं है ।

जो लोग कहते हैं कि भगवान परीक्षा लेते हैं , यह सब केवल अपने मन को बहलाने का तरीका मात्र है ।

अपनी गलती को भगवान पर मढ़ने का तरीका या बचाव ।

इसका आध्यात्मिक सत्य से कोई लेना देना नहीं है । यह एक धारणा है । एक खतरनाक धारणा है ।

इसको समझिये -

जब आप यह धारणा लेकर भक्ति के मार्ग पर चलते हैं कि "मुझे दुःख आएगा, या मेरी परीक्षा होगी", तो आपका मन वह सब पैदा करना शुरू कर देता है ।
दुःख आता है , परीक्षा आती है , कष्ट आता है ।
और आप सोचते हो – "देखो, भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं।" पर भगवान कहीं खड़ा हुआ कुछ कर नहीं रहा है । यह सब आपका मन कर रहा है ।
आपकी धारणा कर रही है जो आपके मन में समाज , परिवार , पढ़ाई , लिखाई , सदियों से ठूसी गयी धारणायें और मान्यतायें हैं ।

भगवान न तो तुम्हें दुख देने के लिए खड़ा है, न सुख देने के लिए । वह तो बस है एक जगह स्थित , एक नियम उसने बना दिया है और सब उसी से संचालित हो रहा है ।

यह सब खेल हमारे मन का है ।

मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम् ।।

अर्थ – मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है। जब मन विषयों (धारणाओं, विचारों) में आसक्त होता है, तो वही बंधन बन जाता है । और जब वही मन उन धारणाओं , मान्यताओं से मुक्त हो जाता है, तो मोक्ष मिलता है या जीव मुक्त माना जाता है ।

*संकल्पो हि जगत् सर्वम् ।*

मनमूलः हि संसारः ।

यह पूरा जगत तुम्हारे संकल्प से, तुम्हारी धारणा से ही बना है । जो दुख तुम देख रहे हो, वह बाहर नहीं है – वह तुम्हारी धारणा का प्रक्षेपण है ।

तो क्या करना है ??

होश संभालो , दृष्टा बनो । धारणाओं को देखना शुरू करो ।
मान्यताओं को समझना शुरू करो जिसने तुम्हें बाँधा हुआ है । अपनी बुद्धि से काम लो ।
साक्षी भाव से देखो ।
बस एक बार सारी धारणाओं को गिरते हुए देख लो ।
उसे घुलते हुए , नष्ट होते हुए देखो और सब कुछ नष्ट कर दो , क्या अच्छा क्या बुरा , क्या विधि क्या निषेध ।

जिसकी सारी धारणाएँ गिर जाती हैं, उसे अपने स्वरूप का बोध हो जाता है ।
वह समझ जाता है कि वह शरीर नहीं, नाम नहीं, रूप नहीं – वह शुद्ध चेतना है । वह भगवान का अंश है । उसी आनंद का अंश जिसमें कोई धारणा मान्यता या मन की बनाई इधर उधर की बातें नहीं हैं ।
भक्ति का मतलब है आनंद में विलीन होना, शांति में डूब जाना ।

एक प्रयोग करके देखो –

अपने मन में बैठी किसी एक दृढ़ धारणा को लो – जैसे *"मुझे हमेशा देर से सफलता मिलती है"* या *"भगवान ने मुझे दर्द दिया है"।*
या *मुझे कोई समझता नहीं है , मेरे दर्द को कोई समझने वाला नहीं* ,
या कोई victim card खेलना शुरू कर दो , अब उस धारणा को पकड़ो, और पूछो – क्या यह सच है ??
क्या भगवान ने खुद आकर तुमसे कहा या ये दुःख दिया या तुमने यह स्वयं से सोच लिया या उसको स्वयं ही पकड़ा है मन की feeling से ।
फिर उस धारणा को छोड़ो , गिरा दो नीचे । बस देखो कि उसके बिना तुम क्या हो ।
आप पायेंगे – सारा दुख उसी धारणा के गिरने और नष्ट होने के साथ चला गया । नया प्रकाश आ गया ।

जब आप यह समझ जाते हैं कि दुख और परीक्षा भगवान नहीं, आपकी अपनी धारणाएँ पैदा कर रही हैं – तो आप डरना बंद कर देते हैं ।
दुःख की समाप्ति हो जाती है ।

आप किसी से नहीं डरते, आप अपनी धारणाओं के मालिक बन जाते हैं ।
और जब मात्र विचार करने से ही जगत में हलचल पैदा कर सकते हैं – तो फिर क्या असंभव है ??
धारणा शक्ति ही सबसे बड़ी शक्ति है। उसे पहचानिये , उसे समझिये, उसे अपने वश में करिये ।

एक लाइन में सार –

"भगवान तुम्हारी परीक्षा नहीं ले रहा – तुम्हारी अपनी धारणाएँ तुम्हारी परीक्षा ले रही हैं ।
बस साक्षी बनकर देखो, सारी धारणाएँ गिर जाएँगी, और तुम अपने शुद्ध स्वरूप में स्थिर हो जाओगे ।"

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

Shwetabh Pathak
Shwetabh Pathak


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Note

✨यदि आप अपने शहर , नगर , ग्राम आदि में भी समागम करवाना हो तो वह सम्पर्क कर सकते हैं । college , Institutions , Management संस्थान , सरकारी संस्थान , आदि में Motivational सत्र या व्याख्यान के लिए भी आप नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सूचना प्राप्त कर सकते हैं ।

✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨जून के साधना समागम 7 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349

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#अध्यात्म #माया #लोभ #लालच #संसार #भगवान #प्रेम #वृंदावन

07/06/2026

🔴 LIVE Day 5 | S 1 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

07/06/2026

🔴 LIVE Day 4 | S 3 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

07/06/2026

🔴 LIVE Day 4 | S 2 | श्वेत प्रेम रस महोत्सव | गुरु धाम वृन्दावन | प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज

07/06/2026

प्रश्न- गुरुदेव, कहते हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड हमारे अंदर व्याप्त है। इसका क्या अर्थ है?

हमे जो अनंत ब्रह्माण्ड दिखता है, क्या वो एक virtual reality है?

क्या वो सिर्फ हमारी छोटी सी बुद्धि के लिए अनन्त है, या सच मे इतना विशाल है?

ये भी कहते हैं कि भगवान के एक- एक रोमकूप में एक एक ब्रह्माण्ड व्याप्त है। 🙏🙏🙇🏻‍♂️🙇🏻‍♂️

कृपया प्रकाश डालें गुरुदेव।

उत्तर- प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज---

parallel universe इसे ही कहते हैं ।

सब हमारे अंदर है ।

प्रत्येक ब्रह्मांड हमारे अंदर संचालित है ।

जो कुछ भी भौतिक रूप से हम बाहर देखते हैं , वह सब आंतरिक रूप से हमारे अंदर प्रत्यक्ष है ।

यतपिण्डे तत ब्रह्माण्डे ।

सब कुछ हमारे अंदर है ।

बस हम लोग भौतिक नेत्रों का उपयोग ज्यादा करते हैं , आंतरिक कम ।

इस पर लेख है ,👇

ज्यों ज्यों अंदर का पट खुलने लगेगा , त्यों त्यों बाहर का पट बन्द होने लगेगा ।

ज्यों ज्यों आंतरिक आनंद मिलने लगेगा , बाह्य आनंद ढूँढने की बीमारी खत्म होने लगेगी ।

ज्यों ज्यों आंतरिक वार्तालाप होने लगेगा , त्यों त्यों बाह्य वार्तालाप बन्द होने लगेगा और व्यक्ति मौन होने लगेगा ।

ज्यों ज्यों आत्मा सम्बंधित ज्ञान बढ़ने लगेगा त्यों त्यों शरीर सम्बंधित ज्ञान अज्ञान लगने लगेगा ।

ज्यों ज्यों भीतर मिलता जाएगा , त्यों त्यों बाहर छूटता जाएगा ।

ज्यों ज्यों सूक्ष्म संसार की विराटता से साक्षात्कार होता जाएगा त्यों त्यों बाह्य विराट संसार की सूक्ष्मता से नाता टूटता जाएगा ।

जो अचानक से संसार छोड़ देते हैं , फ़कीर बन जाते हैं , संसार का सारा खज़ाना छोड़ देते हैं , संसार वाले समझते हैं कि उनके पास कुछ नहीं है लेकिन उन्हें वह मिल गया होता है जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर वैसा खजाना नहीं होता।

ज्यों ज्यों बाहर की आँखें बंद होने लगेगी त्यों त्यों आंतरिक आँखें खुलने लगेगी ।

अंदर सूक्ष्म संसार है जहाँ प्रवेश करने से विराट संसार मिलता है ।

बाहर विराट भौतिक संसार है जहाँ प्रवेश करने से न्यूनता और सूक्ष्मता मिलती है ।

एक बार आँख बंद करके तो देखिए कि कितना बड़ा दिव्य आध्यत्मिक संसार आपकी प्रतीक्षा कर रहा है ।

हम बस इस सामने दिखने वाले भौतिक संसार को ही सब कुछ समझकर मृग की भाँति मरीचिका में दौड़ लगा रहे हैं ।

जिनके नेत्र बन्द होते हैं , वह किसी अन्य दिव्य रमणीय संसार में भ्रमण कर रहे होते हैं ।

वह आंतरिक संसार इतना विराट है इतना विराट है कि जो एक बार प्रवेश कर गया उसे दुबारा भैतिक संसार में वापस लाने के लिए ऋद्धि सिद्धि आदि भरसक प्रयत्न कर डालते हैं ।

ज्यों ज्यों बाह्य वाणी बन्द होने लगती है त्यों त्यों आंतरिक वाणी जागृत होने लगती है ।

ज्यों ज्यों बाह्य जिह्वा का स्वाद बन्द होने लगता है , त्यों त्यों आंतरिक स्वाद मिलना शुरू हो जाता है ।

ज्यों ज्यों बाह्य नासिका या घ्राणेन्द्रिय अपना कार्य बंद करने लगती है त्यों त्यों आंतरिक नासिका या घ्राणेन्द्रिय अपना कार्य शुरू करने लगती है ।

यही हाल अन्य इन्द्रियों के साथ होता है । यह बात विरले ही जानते हैं और अनुभव कर पाते हैं ।

बाहर आंनद वह ढूंढ़ते हैं जिसे आंतरिक आनंद मिला नहीं हो । जिसे पता ही न हो कि इस भौतिक संसार से विलग भी एक दिव्य अद्भुत आनंदमय संसार है , वह मौन और एकांत का रस क्या जाने !!!!

एकांत ही एक ऐसी जगह है और समय है जब आपको "स्व" से परिचित होने का अवसर मिलता है ।

मौनं सर्वार्थ साधनम ।

पहले लोग एकांत ढूंढ़ते थे अब लोग भीड़ ढूँढते हैं ।

उन्हें लगता है कि भीड़ के पास आनंद है पर होता अज़ीब है , वह भीड़ दूसरों में आनंद ढूँढ रही होती है ।

सब एक दूसरे को मूर्ख बना रहे होते हैं और एक दूसरे में आनंद ढूँढ रहे होते हैं ।

बाकी का कुछ लोगों को ये अवसाद ही लगेगा क्योंकि उनको उस अंर्तनिहित आनंद की अनुभूति कभी हुई नहीं होती है ।

उनको लगता है भला एक व्यक्ति एकांत में कैसे रहता होगा !!!

लेकिन एकांत में ही उस अद्भुत रस से साक्षात्कार होता है ।

हाँ मैं उसी प्रेम में हूँ । ;)

Prem Rasik Sh Shwetabh Ji Maharaj
प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज
आध्यात्मिक दिग्दर्शक

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Note

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✨अगर आप श्वेत प्रेम रस संस्था से जुड़ना चाहते हैं और प्रेम रसिक श्री श्वेताभ जी महाराज जी के सानिध्य में प्रैक्टिकल साधना का लाभ लेते हैं तो नीचे दिए गए नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

✨जून के साधना समागम 7 दिवसीय वृन्दावन महोत्सव में भी जो आना चाहते हैं, वह इस नंबर पर सम्पर्क कर सकते हैं ।

8950072203, 9305529349

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06/06/2026

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