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केतु 2
आवारा हूँ ।
04/03/2026
नये साल पर करिए ये महा उपाय और जीवन बदलिए ।
एसे दुकानदारों और उपायो से दूर रहिए, कोई भी उपाय कुंडली देख कर ही होता है।
ख़ुद को बर्बाद ना करिए ।
27/12/2025
केतु की महादशा
यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में केतु ग्रह मंदा या पीड़ित अवस्था में हो, तो केतु की महादशा के दौरान उस व्यक्ति को आमतौर पर भटकना ही पड़ता है। यह भटकाव जानबूझकर हो सकता है या अनजाने में, लेकिन व्यक्ति का जीवन मुख्य रूप से भटकाव की दिशा में ही जाता है। वह स्थिरता से दूर रहता है, और उसकी जिंदगी में अनिश्चितता, दिशाहीनता और बार-बार बदलाव आते रहते हैं। केतु एक छाया ग्रह है जो मोक्ष, आध्यात्मिकता, अलगाव और भ्रम से जुड़ा होता है, लेकिन जब यह मंदा होता है, तो यह नकारात्मक प्रभाव डालता है, जैसे कि व्यक्ति का मन विचलित रहना, निर्णय लेने में कठिनाई, और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में असफलता या अस्थिरता। इस दौरान व्यक्ति नौकरी, रिश्तों, या व्यक्तिगत लक्ष्यों में बार-बार बदलाव महसूस करता है, और वह खुद को एक जगह टिकाए रखने में असमर्थ पाता है।
अब, यदि केतु गुरु (बृहस्पति) ग्रह को दृष्टि दे रहा हो, या दोनो आपस में टकराव में हो यानी एक दूसरे से छठे और आठवें तो स्थिति और भी जटिल हो जाती है। (AstroPro Academy by Kashif Azami) गुरु ज्ञान, शिक्षा, आध्यात्मिक मार्गदर्शन और सच्चे गुरु का प्रतीक है। लेकिन केतु की दृष्टि से प्रभावित होने पर, व्यक्ति को किसी सच्चे गुरु का साथ नहीं मिलता। या तो वह खुद अपने गुरु को धोखा देकर भाग जाता है, अर्थात विश्वासघात करता है या संबंध तोड़ देता है। या फिर यदि कोई गुरु मिल भी जाए, तो वह व्यक्ति को गलत रास्ता दिखा सकता है – जैसे कि झूठी आध्यात्मिकता, गलत सलाह या भटकाने वाली दिशा में ले जाना। इससे व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास रुक जाता है, और वह और अधिक भ्रम में पड़ जाता है। कुल मिलाकर, यह योग व्यक्ति को जीवन में सही मार्गदर्शन से वंचित रखता है, और उसे निरंतर भटकाव की ओर धकेलता है।
ज्योतिष शास्त्र में केतु को एक रहस्यमयी और आध्यात्मिक ग्रह माना जाता है, लेकिन जब यह कुंडली में कमजोर या मंदा होता है, तो यह व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता और भटकाव लाता है। महादशा के दौरान, केतु का प्रभाव व्यक्ति को सामान्य जीवन से अलग कर सकता है, जैसे कि यात्राएं बढ़ना, नौकरी में बदलाव, या मानसिक रूप से विचलित रहना। यह जानबूझकर नहीं होता, बल्कि अनजाने में व्यक्ति खुद को ऐसी स्थितियों में पाता है जहां वह स्थिर नहीं रह पाता।
गुरु पर केतु की दृष्टि का मतलब है कि ज्ञान और मार्गदर्शन के क्षेत्र में बाधाएं आती हैं। गुरु सकारात्मकता और बुद्धिमत्ता देता है, लेकिन केतु की दृष्टि इसे विकृत कर सकती है। परिणामस्वरूप, व्यक्ति या तो सच्चे गुरु से दूर रहता है, खुद विश्वासघात करता है, या गलत गुरु के चंगुल में फंस जाता है। और अंत में आजीवन भटकता ही रहता है।
20/11/2025
अक़्ल के साथ एक सब से बड़ी परेशानी ये है कि जिस इंसान के पास अक़्ल कम होती है वो इंसान ख़ुद को बहुत ज़्यादा अक़्लमंद महसूस करता है, करना भी चाहिए क्योकि हर बच्चा ख़ुद को अपने बाप से ज़्यादा अक़्लमंद समझता है जब तक वो ख़ुद बाप ना बन जाए, या टक्कर खा कर दांत ना टूट जाये।
यही हाल दुनियावी चेलों का है अलिफ़, बे, ते (A,B,C,D) जोड़ना आते ही वो ख़ुद को बहुत बड़ा उस्ताद समझने लगते है।
मंदे बुध वाले के साथ दिक़्क़त ही यही होती है की वो ख़ुद की सवा सो ग्राम अक़्ल को किलो भर से कम नहीं समझता और मंदे केतु वाला ख़ुद को अपने उस्ताद से भी ऊपर मानता है, इनको आप अमूमन कहते सुनोगे की में तो उस्ताद से भी ज़्यादा जानता हूँ, बस चले तो ये लोग अपने बाप के भी एहसान फ़रामोश हो जाये।
बुध गोल है जिसका कोई ओर छोर नहीं होता, यही हाल अक़्ल का है और जब अक़्ल धोखा देने पर आती है तो इंसान को सब से पहले उसका बाप ( बुजुर्ग, उस्ताद, अक़्ल देने वाला इंसान) ही अपना सब से बड़ा दुश्मन नज़र आने लगता है।
ख़ैर - होइहि सोई जो राम रची राखा ।
05/06/2025
ज्योतिष में सूर्य ग्रह का महत्व
सूर्य, जिसे नवग्रहों का राजा कहा जाता है, वैदिक ज्योतिष में एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह आत्मा, पिता, प्रतिष्ठा, नेतृत्व, सरकारी सेवाएँ और शक्ति का प्रतीक माना जाता है। सूर्य की स्थिति किसी जातक की कुंडली में उसके व्यक्तित्व, आत्म-विश्वास और समाज में उसकी प्रतिष्ठा को दर्शाती है।
🌞 सूर्य का ज्योतिषीय स्वरूप
सूर्य अग्नि तत्व का ग्रह है और इसका स्वामी सिंह (Leo) राशि है। यह दिन में केवल एक राशि में रहता है और लगभग 30 दिनों में एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। सूर्य का उच्च स्थान मेष (Aries) राशि में और नीच स्थान तुला (Libra) राशि में होता है।
🌞 सूर्य से जुड़े मुख्य कारक
प्रतिनिधित्व
तत्व- अग्नि
वर्ण- क्षत्रिय
प्रकृति- क्रूर एवं पिंगल
दिशा- पूर्व
दिन- रविवार
रत्न- माणिक्य (Ruby)
धातु- तांबा
अंग- आँखें, आत्मा
देवता- भगवान विष्णु / सूर्यदेव
🌞 सूर्य की कुंडली में भूमिका
1. सकारात्मक सूर्य: यदि कुंडली में सूर्य शुभ भावों में स्थित हो, तो व्यक्ति में नेतृत्व क्षमता, आत्मविश्वास, प्रशासनिक योग्यता, सरकारी क्षेत्र में सफलता, सम्मान और प्रसिद्धि मिलती है। ऐसे लोग आमतौर पर आत्मनिर्भर होते हैं।
2. नकारात्मक सूर्य: यदि सूर्य नीच का हो या पाप ग्रहों से पीड़ित हो, तो अहंकार, क्रोध, पिता से मतभेद, आँखों से जुड़ी समस्या, हृदय रोग आदि परेशानियाँ आ सकती हैं।
31/05/2025
केतु
आप खुद चेक कर लीजिए कि आपका केतु कैसा है या आप कैसे केतु हैं।
एक ऐसा जिस्म जिस पर सर ही नहीं है अब जब सर ही नहीं है तो बुद्धि कहां से होगी मतलब निर्बुद्ध,
ऐसे में, बल्कि कहना चाहिए कि इस ही कारण से केतु को आवश्यकता होती है बृहस्पति की हालांकि केतु के पास अपना खुद का सर, राहु भी है लेकिन केतु को सही रास्ता बृहस्पति ही दिखाएगा राहु उसको सही रास्ता नहीं दिखता, इसीलिए केतु बृहस्पति के ही सहारे से आगे बढ़ता है।
लेकिन अगर किसी भी तरह से केतु खराब हो रहा हो, ऐसे में खराब केतु वाला जातक अपने गुरु का ही गुरु बनने का प्रयास करेगा बल्कि ऐसा दिखाएगा जैसे मैं गुरु हूं और मेरा जो गुरु है वह मेरा चेला है, मैं अपने गुरु से उत्तम हूं क्योंकि यह भ्रम उसको उसके खुद की खोपड़ी अर्थात राहु देता है। केतु के पास ना तो सिर है ना आंख, ना कान, ना मुंह, यह इंद्रिय उसके पास नहीं है उसको सर के रूप में बृहस्पति के ही ज्ञान की आवश्यकता होती है क्योंकि राहु उसको ज्ञान नहीं देगा वह उसको भ्रम देगा।
लाल किताब का नियम है कि केतु देखे बृहस्पति को तो बृहस्पति खराब होगा और यदि बृहस्पति देख केतु को तो केतु उम्दा होगा लेकिन चंद्र खराब हो जाएगा और यदि ऐसे में बुध अच्छा हुआ तब चंद्र खराब नहीं होगा हालांकि लाल किताब की यह चार लाइन बहुत कुछ कहती हैं इसको अगर हम सामान्य भाषा में समझाने का प्रयास करें तो जब केतु को बृहस्पति ने देखा, केतु के ऊपर बृहस्पति की नजर हुई तब केतु अच्छा रहा लेकिन केतु तो फिर केतु ही है, चंद्र खराब हो गया मतलब मन की शांति चली गई क्योंकि उस्ताद की नजर हर वक्त अपने चेले के ऊपर है ऐसे में किसी भी शिष्य का घबरा जाना या मानसिक रूप से अशांत हो जाना स्वाभाविक है लेकिन यही अगर उस शिष्य का बुध अर्थात बुद्धि अच्छी हुई तब वह मानसिक रूप से नहीं घबराएगी ना परेशान होगा, उसको मालूम होगा कि मेरा बृहस्पति अर्थात मेरा गुरु मुझे तराश रहा है सुधार रहा है और आने वाले समय में मैं ही अर्थात केतू ही बृहस्पति बनेगा, अब अगर केतु, बृहस्पति को देख रहा है तो बृहस्पति खराब होगा लेकिन केतु अच्छा या उम्दा नहीं होगा बेशक यह केतु बृहस्पति की शान में गुस्ताखी करके बृहस्पति को जरूर मंदा कर देगा लेकिन यह वाला केतु आगे चलकर बृहस्पति नहीं बनेगा यह केतु, केतु ही रहेगा केतु मतलब कुत्ता।
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Reason…??
Meta jaane
घसीट घसीट के मारा है और कितना बड़ा बदलाव चाहिए …?
ख़ैर अभी तो शुरुवात है ..!
हर स्तर पर दुनिया बदलेगी ।
29/03/2025
शेष व्याख्या शायद कल
29/03/2025
शनि का गोचर मीन में, लेकिन क्या वास्तव में यह मात्र शनिदेव का ही गोचर है यदि हम देखेंगे तो पाएंगे कि यह मात्र शनि का गोचर नहीं है।
नवग्रहों में जो सबसे अधिक महत्वपूर्ण गोचर है वह गोचर है, शनि, बृहस्पति, राहु और केतु का क्योंकि यह चार ग्रह एक राशि में सबसे अधिक समय व्यतीत करते हैं, जहां शनि लगभग 30 महीने, बृहस्पति 1 वर्ष और राहु, केतु 18 महीने एक राशि में विचरण करते हैं।
अब यदि हम वर्तमान का गोचर देखें तो हमें पता लगेगा कि शनि का गोचर आज मीन में होने वाला है वहीं राहु केतु का गोचर कुंभ और सिंह राशि में और बृहस्पति का मिथुन राशि में मई माह के अंत तक हो जाएगा, कहने का तात्पर्य यह है की चारों बड़े गोचर 60 दिन के अंदर अंदर घटित हो रहे हैं, इस अवस्था में मात्र यह समझ लेना कि जो भी परिणाम आ रहे हैं वह परिणाम मात्र शनिदेव के गोचर के कारण आ रहे हैं सरासर गलत होगा।
शनि देव जोकि स्वयं विलंब और सुस्त गति के कारक हैं वह आकस्मिक प्रभाव नहीं देते, शनि देव के गोचर से संबंधित परिणाम आने वाले समय में धीरे-धीरे सामने आएंगे।
क्रमशः
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