Vishal Rastogi
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27/03/2026
वो मेरे घर नहीं आता,
मैं उसके घर नहीं जाता,
फिर भी ये दिल का रिश्ता,
चुपके से निभ जाता।
न वो मुझसे कुछ कहता है,
न मैं उससे कुछ कह पाता,
पर खामोशी के लफ़्ज़ों में,
सब हाल समझ आ जाता
न दरवाज़ों की आहट है,
न कदमों की
फिर भी उसकी यादों का मौसम,
हर शाम चला आता।
दूरी है बस राहों की,
दिल तो पास ही रह जाता,
वो मेरे घर नहीं आता,
मैं उसके घर नहीं जाता।
23/05/2025
जब तन्हा होते हैं, तो मोहब्बत चुपचाप करवट बदलती है,
जो दिल किसी और के लिए धड़का था,
वो अब खुद की धड़कनें सुनने लगा है।
कभी जो नज़रों को तेरी तलाश रहती थी,
अब वो आईना देखकर मुस्कुराने लगी है,
जिन राहों पर तेरा इंतज़ार करते थे,
अब उन्हीं राहों पर खुद से मिलने लगी है।
हवा जब बालों को छू जाए,
तो लगे जैसे कोई प्यार से पुकारे,
ये खामोशियाँ अब बोझ नहीं,
बल्कि रूह सुकून देती है।
रातें अब खाली नहीं लगतीं,
क्योंकि चाँद मेरा हमराज़ बन गया है,
जो बातें तुझसे कहना चाही थीं,
अब तारों को हर रोज़ कहता हूँ
वो अधूरे ख़्वाब अब बोझ नहीं,
बल्कि अपनी कहानी बन गए हैं,
जो आँसू कभी तुझ पर बहते थे,
अब खुद को समझाने लग गए हैं।
जब टूटते हैं तो बिखरते नहीं,
कभी-कभी हम फिर से जुड़ते हैं,
जो प्यार किसी और ने अधूरा छोड़ा,
वो प्यार अब खुद से शुरू करते हैं।
इस अकेलेपन में एक गहराई है,
जहाँ दर्द भी पूजा सा लगता है,
मोहब्बत तुझसे शुरू हुई थी,
अब खुद से एक रिश्ता बनता है।
अंत मे -
"अब मोहब्बत किसी और से नही
अब मोहब्बत मेरी ख़ामोशी से है,
क्योंकि जब कोई साथ नहीं होता,
तब चाँद भी अपना लगता है…"
17/05/2025
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कभी सोचा है ---
जब कोई चीज़ हमसे छीनी जाए,
दिल में टीस सी उठती है।
अधूरी सी लगती है ज़िंदगी,
हर ख़ुशी कहीं खो जाती है।
पर कभी सोचा, हम जो लेते,
हर दिन धरती से चुपचाप,
वो धूप, वो छाँव, वो पानी,
उनका क्या कोई हिसाब?
पेड़ों की सांसें हमने छीनी,
नदियों से छीना बहाव।
हवाओं में भर दिया ज़हर,
फिर भी कहते, "हम सभ्य हैं अब!"
हम दर्द में तड़पते हैं,
जब अपना कुछ हमसे जाता है।
पर जो प्रकृति से लूट लिया,
उसका ग़म कौन बताता है?
कभी धरती ने पूछा हमसे?
"तुम क्यों मेरा हरा लहू पीते हो?"
नदी ने कब कहा,
"अब और नहीं, मैं सूख रही हूँ धीरे-धीरे।"
फिर भी वो देती रही सब कुछ,
बिन कहे, बिन कुछ माँगे।
और हम?
सिर्फ़ लेते गए, जैसे हक़ हो हमारा।
अब भी वक़्त है, सोच बदलो,
थोड़ा लौटाओ, थोड़ा सँभालो।
वरना जो प्रकृति देगी जवाब,
वो होगा एक अनकहा भूचाल।
विशाल रस्तोगी
ऐ मन, तू सुन ज़रा, किसी से बहस मत किया कर,
हर बात को दिल पर लेना छोड़, अब थोड़ा सह लिया कर।
हर बार तू ही क्यों टूटे, हर बार तू ही क्यों बोले?
थोड़ा सा चुप रहकर, अपने ज़ख्मों को धो लिया कर।
तेरे शब्द कभी-कभी रिश्ते तोड़ देते हैं,
तू समझता है न्याय कर रहा है — पर दिल तोड़ देते हैं।
हर बार तर्क नहीं काम आते,
कभी मौन से भी सुलझ जाते हैं रास्ते।
ऐ मन, तू थक गया है ना?
कभी किसी की बेरुख़ी पर रोया है चुपचाप?
कभी अपनों की अनकही बातें चुभी हैं?
फिर क्यों हर बार तू ही चीख़ कर जवाब ढूँढता है?
बहस में जो जीते, वो भी क्या पाए?
कभी कोई अपना ही तो खो जाए…
तो किस काम की वो जीत, ऐ मन?
जिसमें तन्हाई ही साथ रह जाए।
तो सुन… अब खुद से प्यार करना सीख ले,
हर सवाल का जवाब देना छोड़ दे।
कुछ लोग समझेंगे तुझे ख़ामोश देखकर,
बाकी जो जाएं — उन्हें जाने दे।
ऐ मन, तू अब बस इतना कर,
तू सुकून ढूँढ... बहस नहीं।
कभी अपनी चुप से भी रिश्ता निभा,
कभी आंसू पीकर भी मुस्कुरा।
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अकेले मुस्कराकर जीना सीख लिया है
हर आँसू को चुपचाप पीना सीख लिया है
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"अकेले मुस्कुराकर जीना सीख लिया है"
अकेले मुस्कुराकर जीना सीख लिया है,
हर आँसू को चुपचाप पीना सीख लिया है।
जो भी मिला दर्द रास्तों में कहीं,
उसे अपना तक़दीर मान लेना सीख लिया है।
अब किसी के इंतज़ार में वक़्त नहीं जाता,
हर ख़्वाब बिना वजह टूट भी जाता।
लेकिन फिर भी, दिल को समझा लिया है,
हर खालीपन को भी अपनाना सीख लिया है।
अकेले हँसना भी सीख लिया है,
बिना किसी वजह जीना सीख लिया है।
अब मुस्कान भी झूठी नहीं लगती,
ये दिल की आवाज़ सी लगती।
जब भी आँखें भीग जाती हैं चुपचाप,
कोई काँधा नहीं ढूँढता अब ये ख़्वाब।
ख़ुद ही आँसुओं को समझा लिया है,
दर्द को भी धीरे-धीरे गले से लगा लिया है।
न शिकवा किसी से, न कोई गिला है,
अब खुद से ही हर रिश्ता मिला है।
जो लोग साथ थे, अब यादों में हैं,
उनसे भी हँसकर जुदा होना सीख लिया है।
ज़िंदगी अब अकेले भी हसीन लगती है,
हर शाम तन्हा सही, मगर रंगीन लगती है।
अब ज़रूरत नहीं किसी सहारे की,
मैंने खुद को ही अपना बना लिया है।
विशाल रस्तोगी
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ऐ मन, तू सुन ज़रा, किसी से बहस मत किया कर,
हर बात को दिल पर लेना छोड़, अब थोड़ा सह लिया कर।
हर बार तू ही क्यों टूटे, हर बार तू ही क्यों बोले?
थोड़ा सा चुप रहकर, अपने ज़ख्मों को धो लिया कर।
तेरे शब्द कभी-कभी रिश्ते तोड़ देते हैं,
तू समझता है न्याय कर रहा है — पर दिल तोड़ देते हैं।
हर बार तर्क नहीं काम आते,
कभी मौन से भी सुलझ जाते हैं रास्ते।
ऐ मन, तू थक गया है ना?
कभी किसी की बेरुख़ी पर रोया है चुपचाप?
कभी अपनों की अनकही बातें चुभी हैं?
फिर क्यों हर बार तू ही चीख़ कर जवाब ढूँढता है?
बहस में जो जीते, वो भी क्या पाए?
कभी कोई अपना ही तो खो जाए…
तो किस काम की वो जीत, ऐ मन?
जिसमें तन्हाई ही साथ रह जाए।
तो सुन… अब खुद से प्यार करना सीख ले,
हर सवाल का जवाब देना छोड़ दे।
कुछ लोग समझेंगे तुझे ख़ामोश देखकर,
बाकी जो जाएं — उन्हें जाने दे।
ऐ मन, तू अब बस इतना कर,
तू सुकून ढूँढ... बहस नहीं।
कभी अपनी चुप से भी रिश्ता निभा,
कभी आंसू पीकर भी मुस्कुरा।
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