P. D. Educational
Tutorial classes are available for class VI to XI
मानसिक शुद्धता हीं सात्विक संसकार विकसित कर सकतीहै। आप सोच सकते हैं वही दृश्य कभी व्यक्ति को यौन उत्तेजना से भर देती है जबकि कभी आपपर कोई प्रभाव नहीं डालती और कुछ परिस्थितियों में आपको न सिर्फ शर्मिंदगी का अहसास करातीहै अपितु क्रोध और प्रतिशोध जैसी भावनाओं को प्रबलित करती हैं।
यह सब व्यक्ति, व्यवस्था, रिश्ते, स्थान, आपके परिवेश की मानसिकता और सबसे बड़ा आपके सांस्कृतिक संस्कार आदि पर निर्भर करता है।
दूसरों की अच्छा भविष्य दिखाने या देने से पूर्व अपना भविष्य संवारना जरूरी होता है।
हमारे देश में s*x education तो है जिसमें बच्चों को
S*x organ के structure and Function को बताया जाता है जिससे वे act of s*x and s*xual activity के जानकार हो जाते हैं परंतु साथ ही साथ ब्रह्मचर्य और इसके महत्व पर विशेष चर्चा न होना उनमें समय पूर्व यौन क्रिया में संलिप्तता जैसे भटकाव पैदा करते हैं ।
अधिकांश असफलताओं का मूल कारण असफलता का भय है।
दुश्मन हो या शिकार उसे कमजोर समझना सबसे बड़ी भूल है
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।
अतः अपना और अपने बच्चों के मन को शुद्ध और सबल बनाना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए।
नास्तिक होना कोई बुरी बात नहीं है, बिना किसी मंदीर, मस्जिद, मठ, गिरजाघर या गुरुद्वारा गए भी अपनी इंसानियत कायम रख सकते हैं। पर एक मनोवैज्ञानिक सत्य यह भी है किसी भी इश्वर में आस्था रखने वाले मानसिक अवसाद ( depression) से जूझने की अपेक्षाकृत अधिक क्षमता रखते हैं।
कई ऐसे कृत्य (कार्य) है, या ऐसी परंपराएँ/प्रथाएं भी हैं जो स्थान विशेष , धर्म विशेष अथवा स्थानीय संस्कृति या संस्कार विशेष के आधार पर कहीं प्रशंसित होती तो कहीं हेय अर्थात नीच कर्म माना जाता है।
अब यह आपपर निर्भर है आप किससे प्रभावित हो अपने बच्चों को कैसे संस्कार देना चाहते हैं।
उचित तो यह है कि हमें अपनी परम्परागत कृत्यों के वैज्ञानिक पहलुओं पर विशेष ध्यान दें।
आप अपने बच्चों को साहसी बनाना चाहते हैं या कायर...!
यह सब अभिभावक पर निर्भर करता है। बचपन में अगर बच्चे को भूतों का भय दिखाया जाता है तो आजिवन उनके मन में भूत का भय बना रहता है । यही बात सभी क्षेत्रों में लागू हो सकती है।
शत्रु, आतंकी, डाकू, डाक्टर, पूलिस, शिक्षक, माँ, पिता या फिर अन्य कोई....
अब यह निर्भर करता है इस बात पर कि उसे भय किन परिस्थितियों में और किस उद्देश्य से दिखाया गया।
बच्चों को चाहे जिस किसी भाषा में कोई चिज रटाई जाती है वो उसे तात्कालिक तौर पर भले ही नहीं समझ पाते पर उनके मष्तिष्क के किसी कोने में अपनी आंशिक छाप छोड़ देती हैं जो उनके व्यक्तित्व को भी प्रभावित करती है,। @
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