Samman

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19/04/2026

अर्श से फर्श तक आपने सुना होगा, लेकिन ये कहानी है फ़र्श से अर्श तक की.. एक ऐसी काबिल महिला जिसके अंदर इतनी सारी काबिलियत थी मगर परिवार ने इस महिला के साथ कम से कम इंसानी और मानवीय व्यवहार तक करना उचित नहीं समझा.

ये कहानी है एक ऐसी महिला का जो दर्द,तकलीफ़ और इम्तिहानों की क़ैद से बाहर निकल कर IAS तक का सफ़र तय किया, ये कहानी है उस महिला का जिसने मौत को गले लगाने का फैसला ले लिया था, लेकिन अगले ही पल इसे इस बात का समझ आया कि मौत किसी समस्या का समाधान नहीं है, आत्महत्या करने से, जिंदगी खत्म करने से चुनौतियां खत्म नहीं होती हैं बल्कि जुर्म और शोषण करने वाले लोगों के हौसले बुलंद होते हैं और यह प्रवृति एक ऐसी व्यवस्था को, एक ऐसी सामाजिक मान्यता को जन्म देती है जो आने वाले समय में किसी और को अपना शिकार बनाती है।

महज 16 साल की उम्र में इस महिला की शादी हो गई। उनकी शादीशुदा जिंदगी तब बहुत कलीफदेह हो गई जब पति ने इस महिला का साथ देने के बजाय, इस महिला के साथ खड़े होने के बजाय सबके सामने मारना पीटना धमकाना और बेइज्जती करना शुरू कर दिया।

जिस महिला को ससुराल से प्यार मिलना चाहिए था उसे ठीक से खाना मिलना भी मुश्किल हो गया।

जिसे दुनियां बहु समझ रही थी वह उस घर की एक नौकरानी से भी बदतर जिंदगी जीने लगी, घर की साफ सफाई करने के बाद खाना बनाने के लिए कहा जाना कोई ऐसी बुराई नहीं थी लेकिन घर का सारा काम सिर्फ वही करे और एक रोटी खाने के लिए इस तरह की पाबंदी जो उसे अंडरगार्मेंट में रोटी छुपा कर बाथरूम में ले जाकर खाना पड़े, यह वाकया उनके साथ जुर्म और शोषण की एक अलग ही लेवल की कहानी पेश करते हैं।

इस दौर से गुजरते हुए उस महिला को इस बात का अहसास नहीं हो रहा था कि आखिर उनके साथ हो क्या रहा है।

समय के साथ शोषण बढ़ता गया, उन्हें छोटी छोटी बातों पर पीटा जाता था। दिन रात शारीरिक हिंसा का शिकार बनाया जाता था, जब एक दिन उनके पिता उनसे मिलने आए, तो उन्होंने घर ले जाने और इस नर्क से बाहर निकालने की विनती की। पिता ने वापस आने और उसे घर ले जाने का वादा किया लेकिन वे वापस नहीं आए। उस दिन, इस महिला को समझ आया कि इस नरक से बाहर निकालने के लिए, इसे बचाने के लिए कोई भी नहीं आएगा, उसे इस संघर्ष को खुद ही लड़ना होगा।

वह महिला फांसी लगाने ही वाली थी... इस समय तक वह दो बच्चों की मां बन चुकी थीं, फिर भी उनकी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ था।

वे बताती हैं 'मेरा माथा फटा हुआ है, हाथ पर कट के निशान हैं, पीठ जली हुई है। रोज रोज के अत्याचार अब सहन करना मुश्किल हो गया था। पता था कि खुद की जान लेना गलत है लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता नजर नहीं आ रहा था। एक दिन उन्होंने अपनी जान देने का फैसला किया।

उन्होंने बताया, मैंने अपने बेटे को सुला दिया। दूसरे बेटे को फीड कराया। माथा चूमा जैसे कि आखिरी बार सुला रही हूं। एक स्टूल खींचा और पंखें पर साड़ी लटका दी। मैं फांसी लगाने ही वाली थी कि खिड़की से मेरी सास का चेहरा दिखाई दिया। उन्होंने मुझे देखा, लेकिन उन्होंने रोका नहीं, उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। वे वहां से ऐसे चली गईं जैसे उन्होंने कुछ देखा ही नहीं या उनके लिए इस महिला की आत्महत्या कोई मायने नहीं रखता।

यही पल उनके लिए एक निर्णायक पल था। उन्होंने कहा, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं ऐसे लोगों के लिए अपनी जान नहीं दे सकती। हिम्मत जुटाकर वे ससुराल से भाग निकलीं।

ससुराल से भागने के बाद इस महिला ने अपनी चचेरी बहन की भाभी के घर में रहने लगी थीं। पार्लर में काम किया, ट्यूशन पढ़ाया और संघर्ष करते करते आगे की पढ़ाई की। लेकिन अभी सब खत्म नहीं हुआ था। अलग होने के बाद भी पति कभी कभी आता था और मारपीट करता था।

उन्होंने बताया, वह बच्चों के सामने मुझे पीटता था। एक दिन एक बाल्टी में पेशाब किया और मुझ पर फेंक दिया। उस समय मैं एग्जाम देने जा रही थी। मैं फिर से नहाई, कपड़े बदले और अपना पेपर देने चली गई। मेरा दिल वाकई में कठोर हो गया था।

उस महिला का लक्ष्य अच्छी सरकारी नौकरी पाने का था। उन्होंने अकेले बच्चों की परवरिश करते हुए सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की और बहुत जल्द उनकी मेहनत रंग लाई। कई सालों के संघर्ष और परेशानियों से जूझते हुए इस महिला ने अपने पहले ही प्रयास में मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा पास कर ली। वे एक सरकारी अधिकारी बन गईं। एक आदिवासी छात्रा के तौर पर उनकी इस उपलब्धि के लिए, सरकार ने उन्हें 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति भी दी।

इसके बाद उन्होंने यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा 2017 का फॉर्म भरा। पहले ही अटेंप्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू कर लिया था। आज, वह महिला एक IAS अधिकारी हैं। वे अपने पद का इस्तेमाल दूसरों की मदद करने के लिए करती हैं, खासकर गरीब समुदायों की महिलाओं और लड़कियों की। वे उनके शिक्षा के अधिकार और एक निडर जीवन के लिए संघर्ष करती हैं।

उस महिला का नाम है सविता प्रधान जो कि एक आईएएस अधिकारी हैं, मूल कहानी सोशल मीडिया से लिया है।
Sharma Amarendra

07/03/2026

वो लड़की जो तीन बार मारी गई
पहली बार — अपनी सरकार की गोली से।
दूसरी बार — अपने"मुक्तिदाताओं" की मिसाइल से।
तीसरी बार — हमारी चुप्पी से।

एक सवाल — इसे पढ़ने से पहले।

क्या एक 14 साल की लड़की का धर्म देखकर
आप तय करते हैं कि वो जीने लायक थी या नहीं?

अगर हा— तो यह पोस्ट आपके लिए है।
अगर नहीं — तो यह पोस्ट अभी भी आपके लिए है।

पहले — एक तस्वीर। 1970 का तेहरान।
एक विश्वविद्यालय परिसर।
लड़कियाँ — बिना हिजाब के। जींस में। किताबें हाथ में। हँसती हुई।

यह कोई यूरोपीय शहर नहीं।
यह ईरान है।

उस ईरान में — महिलाएँ वोट देती थीं, संसद में बैठती थीं, डॉक्टर थीं, वकील थीं, प्राध्यापक थीं।

रूमी की धरती। हाफिज की कविता का देश।

और फिर — 1979।

वो साल जब एक देश ने खुद को खो दिया।
वह इसीलिए कि शासक शाह को विरोधी स्वीकार नहीं थे
उसकी पुलिस की ज्यादतियों की इंतहा कर दी।

1979 में शाह के धर्मनिरपेक्ष राजतंत्र को उखाड़ फेंका गया।
अयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में एक ईश्वर-शासित इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई।

पर वो क्रांति सिर्फ धार्मिक नहीं थी।

उसमें वामपंथी थे, बुद्धिजीवी थे, छात्र थे, महिला समूह थे — सब एक साथ।
पर जैसे ही शाह गए —
खुमैनी के गुट ने एक-एक करके सबको किनारे कर दिया।

मार्च 1979 में खुमैनी ने घोषणा की:
"यह शब्द 'लोकतांत्रिक' मत इस्तेमाल करो। यह पश्चिमी ढंग है।"

लड़कियों की विवाह की न्यूनतम आयु नौ साल कर दी गई।
महिलाओं को न्यायपालिका से निकाल दिया गया।

रूमी की धरती पर — रूमी की आत्मा को मार दिया गया।

यहाँ रुकिए।

यही वो क्षण है — जो हर धर्म के इतिहास में आता है।
जब धर्म — ईश्वर का रास्ता नहीं रहता।
जब वो सत्ता का हथियार बन जाता है।

मनोवैज्ञानिक एरिक हॉफर ने 1951 में लिखा था:
*"जन आंदोलन ईश्वर में विश्वास के बिना उठ सकते हैं — पर शैतान के बिना कभी नहीं।"*

हर आंदोलन को एक शैतान यानी विलेन चाहिए।
ईरान को मिले — अमेरिका और इजरायल।
हिटलर को मिले — यहूदी।
स्टालिन को मिले — पूँजीपति।

जब सत्ता को दुश्मन चाहिए — वो मिल ही जाता है।

और फिर — वो 46 साल।

2009 के चुनावी विरोध में 72 मारे गए।
2019-20 में 300 से 1,500 तक।
2022-23 में महसा अमिनी विरोध में 551 मारे गए।

हर विरोध। हर आह। हर "आज़ादी" की आवाज़।
गोली से दबाई गई।

2022। महसा अमिनी।

22 साल की लड़की।
हिजाब सही से न पहनने पर — नैतिकता पुलिस ने गिरफ्तार किया।
हिरासत में मर गई।

ईरान की सड़कों पर — लड़कियों ने बाल काटे। हिजाब जलाए। नाचीं।
नारा था — "ज़न। ज़ंदगी। आज़ादी।"

तंत्रिका वैज्ञानिक एंटोनियो डमासियो ने कहा था:
"हम सोचने वाले प्राणी नहीं जो महसूस करते हैं — हम महसूस करने वाले प्राणी हैं जो सोचते हैं।"

वो लड़कियाँ सोच नहीं रही थीं। महसूस कर रही थीं।
46 साल का दर्द — एक पल में फट गया।

दिसंबर 2025। इतिहास का सबसे बड़ा विद्रोह कुचला गया।

100 से ज़्यादा शहरों में लाखों लोग सड़कों पर।
1979 के बाद का सबसे बड़ा जन-उभार।

क्यों? क्योंकि —
प्रति व्यक्ति आय 2012 में 8,000 डॉलर से गिरकर 2024 में 5,000 डॉलर पर आ गई।
1 डॉलर = 14,50,000 रियाल। मुद्रास्फीति 42%।

वो लोग जो सड़कों पर थे —
आतंकी नहीं थे। दुश्मन नहीं थे।
बस — वो थे जिनके घर में गैस नहीं था। बच्चों के लिए दवा नहीं थी।

8 जनवरी 2026। वो रात जो भूली नहीं जाएगी।

तेहरान के कहरिजाक में — एक नागरिक पत्रकार ने कैमरा खोला।
काले थैलों में सैकड़ों शव। सिर, पेट, सीने पर गोली के घाव।

5 फरवरी 2026 तक — 7,015 घोषित मौतें।
ईरान सरकार ने खुद 3,117 स्वीकारीं।

सुप्रीम लीडर खामेनेई ने माना — "हज़ारों मारे गए।"
फिर उसने सभी विद्रोहियों को "अमेरिका-इजरायल के एजेंट और आतंकवादी" बताया।
और — "किसी भी तरह विद्रोह कुचलो" का आदेश दिया।

28 फरवरी 2026। ऑपरेशन लाइन रोर।

इजरायल और अमेरिका का संयुक्त हमला शुरू हुआ।

उसी दिन — दो दृश्य।

सुबह। मिनाब। एक बालिका विद्यालय।

7 से 12 साल की बच्चियां। नीली वर्दी। किताबें। रंग पेंसिलें।
मोहाना ज़री — पहली कक्षा। अभी थैला खुला भी नहीं था।

एक मां को विद्यालय से संदेश आया — "युद्ध शुरू हो गया, बच्चों को ले जाइए।"
वो निकलीं। पर मिसाइल उनसे पहले पहुंच गई।

उनके अपने शब्दों में:
"जब तक हम पहुंचे — पूरा विद्यालय बच्चों के ऊपर ढह चुका था।"

165 बच्चियां। एक छत के नीचे।

शाम। लामर्ड। एक खेल ऑडिटोरियम।

किशोर लड़कियाँ। वॉलीबॉल। गेंद हवा में थी।

एक प्रत्यक्षदर्शी का बयान:
"कुछ ही पलों में खिड़कियाँ हज़ारों टुकड़ों में बिखर गईं। काला धुआँ भर गया। बारूद की गंध ने साँस लेना असंभव कर दिया।"

18 लड़कियाँ — लगभग सभी मारी गईं।
वो गेंद — जो हवा में थी — फिर नहीं उतरी।

वो लम्हा जब इतिहास रोता है।

मिनाब के उस विद्यालय के बाहर — एक मां।
कैमरे के सामने। आंखें सूखी।

"मरीज़ों और बच्चों को निशाना बनाना — मानवीय सिद्धांतों का खुलेआम उल्लंघन है।"

उसके पीछे — उसकी बच्ची की कब्र थी।

कुछ दर्द — आंसुओं से बड़े होते हैं।

अब — भारत के मेरे पाठक — यहाँ रुकिए।

इससे पहले जब मैंने गाजा में मेरे गए बच्चों खास कर shaly को लेकर लिखा था
तो टिप्पणियों में मुझसे कहा गया था--

"हमास ने पहले किया।"
"मुसलमानों से हमदर्दी क्यों?
"कश्मीरी पंडितों का क्या?
बांग्लादेश में हिंदुओं को लेकर दर्द नहीं होता?
सब सवाल जायज हैं। सब दर्द असली हैं।
हर जुल्म का हिसाब होना चाहिए।

पर —
मोहाना ज़री ने हमास को समर्थन दिया था?
लामर्ड की उन लड़कियों ने खामेनेई को सही कहा था?

मनोवैज्ञानिक हेनरी ताजफेल ने 1970 में सिद्ध किया था:
इंसान को समूह बनाने के लिए किसी कारण की जरूरत नहीं।
और एक बार समूह बने
तो दूसरे का दर्द अदृश्य हो जाता है।

1947। विभाजन।

मरे — हिंदू भी, मुसलमान भी, सिख भी।
किसने किया? सत्ता के भूखे नेताओं ने। धर्म के ठेकेदारों ने।

मंटो ने लिखा था:
"अगर तुम बँटवारे की कहानियाँ नहीं सह सकते — तो यह बँटवारे का कसूर है, मेरा नहीं।"

उसी तरह "अगर आप मिनाब की बच्चियों का दर्द नहीं देख सकते — क्योंकि वो मुस्लिम थीं — तो यह उन बच्चियों का कसूर नहीं। यह हमारी इंसानियत का कसूर है।"

इतिहास हमसे यह नहीं पूछेगा — हम किस पक्ष में थे।

बच्चे पूछेंगे क्या हुआ था?
और आपने कैसा महसूस किया?
तब हम क्या कहेंगे?

"हमने देखा — और बिना तकलीफ महसूस किए
आगे बढ़ते रहे।"

तोल्स्तोय ने "युद्ध और शाँति" में लिखा था:
"सबसे साहसी काम — अपने शत्रु के बच्चे के दुख को अपना समझना है।"

यही वो लकीर है — जो इंसान को पशु से अलग करती है।

इतिहास पूछेगा —
जब मोहाना ज़री मलबे में थी —
तब हमारे भीतर क्या था?

06/03/2026

Some truths just hit differently. 💔
This one line says it all – "Desh ne nahi diya sammaan." We cheer, we celebrate, but how many of us truly remember? The ones who gave everything for the nation often fade away in silence, without the respect they truly deserved.
It’s time we change that. Not just with words, but with action. Let’s honor our real heroes while they can still feel it. 🙏

05/03/2026

जंग सीमाओं पर नहीं, औरतों के शरीरों पर भी लड़ी जाती है ताकि मर्द अपनी हार का गुस्सा या जीत का जश्न मना सकें! -- मृदुलिका झा

"13 साल की थी, जब खेत पर जाते हुए जापानी सैनिकों ने मुझे उठा लिया और लॉरी में डालकर मुंह में मोजे ठूंस दिए, बदबूदार- ग्रीस और कीचड़ से सने हुए। फिर बारी-बारी से सबने मेरा रेप किया। कितनों ने, नहीं पता। मैं बेहोश हो चुकी थी। होश आया तो जापान के किसी हिस्से में थी। एक लंबे कमरे में तीन संकरे रोशनदान थे, जहां लगभग 400 कोरियन लड़कियां थीं।
उसी रात पता लगा कि हमें 5 हजार से ज्यादा जापानी सैनिकों को ‘खुश करना’ है। यानी एक कोरियन लड़की को रोज 40 से ज्यादा मर्दों का रेप सहना है।”

चोंग ओके सन (Chong Ok-sun) का ये बयान साल 1996 में यूनाइटेड नेशन्स की रिपोर्ट में छपा था। इस रिपोर्ट पर कभी खुलकर बात नहीं हुई। ये दरअसल शरीर का वो खुला हिस्सा था, जिसे छिपाए रखने में ही बेहतरी थी, वरना इंसानियत नंगी हो जाती।

बात दूसरे विश्व युद्ध की है। जापान ताकतवर था। उसके लाखों सैनिक जंग लड़ रहे थे। राशन और गोला-बारूद तो उनके पास थे, लेकिन शरीर की जरूरत के लिए लड़कियां नहीं थीं। तो बेहद ऑर्गेनाइज्ड जापान ने इसके लिए एक तरीका निकाला। वो ‘कुंवारी’ कोरियन, चीनी, फिलीपीनी लड़कियों को पकड़ता और अपने कंफर्ट स्टेशन्स में कैद कर लेता। कंफर्ट स्टेशन उस जगह का नाम है, जहां लड़कियां सेक्स स्लेव की तरह रखी जातीं।

1944 की यह तस्वीर अमेरिका के नेशनल आर्काइव्स में रखी है। ये महिलाएं सेक्स स्लेव्स हैं, जिन्हें दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान जापानी सैनिकों की शारीरिक भूख मिटाने के लिए चीन में बंधक बनाया गया था। तब इन्हें कम्फर्ट वुमन कहा जाता था। माना जाता है कि जापानी सेना ने चीन-कोरिया समेत कब्जाए गए इलाकों में 2 लाख से ज्यादा महिलाओं को सैनिकों की हवस मिटाने के लिए गुलाम बनाया था।

कच्ची उम्र की एक-एक बच्ची रोज 40 से 50 पके हुए सैनिकों को सर्व करती। जो विरोध करती, उसका गैंगरेप सबक की तरह सारी लड़कियों के सामने होता और फिर बंदूक की नोंक मार-मारकर ही उसकी जान ले ली जाती। गोली से नहीं- क्योंकि सैनिक गुलाम लड़कियों पर गोली भी खर्च नहीं करना चाहते थे।

लड़कियां प्रेगनेंट न हों, इसके लिए भी तगड़ा बंदोबस्त था। हर हफ्ते उन्हें एक इंजेक्शन दिया जाता। ‘नंबर 606’ नाम के इस इंजेक्शन में ऐसा केमिकल होता, जो नसों में घुलकर प्रेगनेंसी को रोकता, या अबॉर्शन हो जाता। दवा के ढेरों साइड-इफेक्ट थे। लड़कियों की भूख मर जाती, चौबीसों घंटे सिरदर्द रहता। पेट में ऐंठन होती और अंदरुनी अंगों से खून रिसता रहता, लेकिन ये कोई समस्या नहीं थी। जरूरी ये था कि वे प्रेग्नेंट हुए बगैर सैनिकों की भूख मिटाती रहें।

पहले ऊंची रैंक के अफसर रेप किया करते, फिर पुरानी होने के बाद लड़कियों को नीचे की रैंक के सैनिकों के पास छोड़ा जाने लगा, लेकिन एक बात कॉमन थी कि रोज पचासों मर्दों की भूख मिटाने वाली किसी लड़की को यौन बीमारी हो जाए वो रातोंरात गायब हो जाती। जापानी सैनिक अपनी साफ-सफाई और हेल्थ को लेकर काफी पाबंद थे!"

ये औरतें युद्ध की वो कहानी हैं, जो कभी नहीं कही जाएंगी। या कही भी जाएंगी तो खुसफुसाकर, जैसे किसी शर्म को ढंका जा रहा हो।

जंग में मिट्टी के बाद जिसे सबसे ज्यादा रौंदा-कुचला गया, वो है औरत! विश्व युद्धों के अलावा छिटपुट लड़ाइयों में भी औरतें यौन गुलाम बनती रहीं। अमेरिकी जर्नल नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग एब्यूज में जिक्र है कि कैसे छोटी-छोटी लड़कियों का यौन शोषण हुआ। सात-आठ साल की बच्चियां जिनके गुदगुदे गाल देखकर प्यार करने को दिल चाहते है, उन बच्चियों को ड्रग्स दिए गए ताकि उनकी देह भर जाए और वे सैनिकों को औरत की तरह सुख दे सकें।

वियतनाम युद्ध में ताकतवर अमेरिकी आर्मी के जाने के बाद देश में बेबी बूम हुआ। एक साथ पचासों हजार बच्चे जन्मे, जिनमें बहुतेरे अपाहिज थे। बहुतेरों की नाबालिक मांओं ने उन यादों से नफरत के चलते जन्म देते ही शिशुओं को सड़क पर फेंक दिया। इन बच्चों को वियतनामी में बुई दोई यानी Dirt of life कहा गया। ये वो बच्चे थे, जिन्हें उनकी मांएं कलेजे से लगाते हुए डरती थीं।

साल 2018 में कांगो के पुरुष गायनेकोलॉजिस्ट डेनिस मुकवेज को नोबेल पुरस्कार मिला- उन औरतों का वजाइना रिपेयर करने के लिए, जो युद्ध में सेक्स स्लेव की तरह इस्तेमाल हुई थीं। एक सवाल ये भी उठता है कि सर्जरी करने वाले को नोबेल जैसा प्रतिष्ठित पुरस्कार देने की बजाय क्या उन स्त्रियों को दुलराया नहीं जाना चाहिए, जो युद्ध के बाद की तकलीफ से जूझ रही थीं।

क्या वजाइना रिपेयरिंग की बजाय कोई ऐसी चीज नहीं होनी चाहिए थी, जो औरतों की चिथड़ा-चिथड़ा आत्मा को सिल सके?

कल रात यूक्रेन के कीव से एक वॉट्सएप कॉल आया। लड़की रुआंसी थी कि उसके आसपास की तमाम दुकानों में सैनिटरी पैड्स का स्टॉक खत्म हो चुका। 23 साल की लड़की को 30 साल पीछे जाकर कपड़े का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। बात सुनने में मामूली है, लेकिन ये युद्ध की शुरुआत है, वो युद्ध जो सीमाओं के साथ-साथ औरतों की शरीरों पर लड़ा जाएगा।

सीमा पर युद्ध रुक जाएंगे। मुल्क आपस में हाथ मिलाएंगे। तेल-कोयला-मोबाइल-मसाला के व्यापार चल पड़ेंगे। रुकी रहेंगी तो औरतें। वे औरतें, जो युद्ध में शामिल हुए बिना मारी गईं।

07/12/2022
02/07/2020

Women and Lockdown

I heard my mother and my sister-in-law whispering during these days of lockdown, that when this lockdown will be over. I asked them, what will you do after this lockdown, are you planning to go anywhere? They replied where we would go!! , we can't go anywhere, because we have lots of house chores to do. Suddenly their expressions changed and they took a deep breath and said, there is always lockdown for us, and we even never realized it.
Actually, they were absolutely correct. A woman is always busy in doing her house chores. After her birth, she stays at home for a long time. Right after her birth when she grows up a little bit, she gets trapped under the burden of responsibilities. In some rural areas of India, after secondary education, girls don't go for further studies as parents think that what they will do after higher studies, they have to go to their in-laws' house after marriage. When she gets married, she gets involved, looking after her husband, nourishing her children, and taking care of her in-laws and forgets about her goals and ambitions. She remains locked completely.
In the rural area of India maximum women stays at home. They are not allowed to go out for work. Maximum women are working as labor in MANREGA. A woman remains busy with her house chores all the time. She repeats the same routine every day with a massive burden of responsibilities.

During this lockdown, we were not able to go out of our home, offices, and were not able to meet friends. We have completely kept ourselves aside from social life. Now we are going out according to our work and need but with certain guidelines. Undoubtedly the Coronavirus will be over when the scientists will find the vaccine. What about this patriarchal conservative thought of this society, which is killing us every day as a social virus.
Think about it.

Photos from Samman's post 29/04/2020

Because of sudden lockdown, people even couldn't found an opportunity to buy a mask. So samman have decided to provide masks
to people. Samman have distributed masks to the people. Samman is still making more mask and will distribute masks to people.

Photos from Samman's post 19/02/2020

On the date 15 to 16 of February 2020, samman had organized two day's workshop with adolescent girls. In this workshop, adolescent had understand about inequality, what is inequality actually?? They came to know more about basic menstruation hygiene, sanitation. In this workshop, they have understood the difference between gender and s*x. In this workshop, 24 adolescent girls had participated. The medium of the workshop was a group discussion, games, drama, storytelling, and movies.

Photos from Samman's post 11/02/2020
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